Vastu Shashatra – An essential part of Life

औद्योगिक इकाई

औद्योगिक इकाइयां दो प्रकार की होती है। पहली इकाई वे होती है जो शहर की सीमा में होती है तथा दूसरी वे जो निर्धारित औद्योगिक स्थान में स्थापित होती है।

शहरी उद्योग- शरीर उद्योग में यंत्र-तंत्र फैले हुए होते हैं। निजी जमीन पर या किराए के मकानों में ये छोटे मोटे कारखाने होते हैं जैसे- लोहा, प्लास्टिक, मिठाई के डिब्बे बनाने का कारखाना।

औद्यागिक आस्थानों (इंडस्ट्रियल एरिया) की औद्योगिक इकाईयां

औद्योगिक विकास के साथ-साथ देश में हर प्रदेश की सरकारों ने अक्सर हर बड़े शहर के बाहर औद्योगिक इंडस्ट्रियल एरिया बना दिया है। इंडस्ट्रियल एरिया में सरकार हल्के व भारी उद्योग लगाने के लिए सही मूल्य में जमीन देती है तथा इन औद्योगिक जमीनों का वास्तु में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। भूमि व वास्तु के प्रमुख सिद्धांत सारी जगहों पर समान रूप से लागू होते हैं अतः औद्योगिक क्षेत्र में जो जमीन पसंद की जाए वह जमीन वास्तुशास्त्र के अनुरूप होनी चाहिए। उद्योग में मशीनों की स्थिति सबसे महत्वपूर्ण है।




प्रमुख मशीनों की स्थापना-

दक्षिण-पश्चिम दिशा की जगह में फैक्ट्री की प्रमुख व भारी मशीनों को लगाना चाहिए। ऐसा करने से मशीनों की आयु लम्बी तथा उत्पादन बढ़ने से फैक्ट्री मालिक की समृद्धि में बढ़ोत्तरी भी होगी।

ऊर्जा-स्त्रोत, बिजली बायलर (भट्टी) आदि की जगह

ऊर्जा के सभी स्रोत व संसाधन आग से संबंधित है। ये गर्मी पैदा करते हैं। इनकी स्थापना आग्नेय कोण में करना वास्तुशास्त्र के सिद्धांतों के अनुरूप होता है। यदि आग से संबंधित सामान आग्येन कोण में हो तो दुर्घटना की संभावनाएं कम रहती है।

रिसेप्शन व पूजाग्रह-

पूजागृह व रिसेप्शन ईशान दिशा में होना चाहिए। इस जगह की पवित्रता का बहुत ध्यान रखना चाहिए। यह कोण भगवानों के रहने की जगह होती है। यदि आग्नेय कोण में रिसेप्शन हो तो उत्पादन में खराबी या व्यापार में घाटा होता है।

प्रशासनिक कार्यालय-

इस कार्यालय के लिए पूर्व का बीच भाग, पश्चिम का बीच भाग तथा उत्तर व दक्षिण का बीच भाग सही समझा जाता है। इसमें पूर्व व पश्चिम का भाग अधिक उत्तम होता है। ईशान व औद्योगिक भाग का हृदय स्थल प्रशासनिक कार्य के लिए सही नहीं होता है। इन भागों में कार्यालय बनाने पर हमेशा गलत फैसले का शिकार होना पड़ता है व तनाव बना रहता है। प्रशासन से असंतुष्ट होकर सभी कर्मचारी हड़ताल करके कंपनी को बंद भी करवा सकते हैं।

कच्चेमाल के लिए भंडार घर-

कच्चेमाल का गोदाम उत्तर व पश्चिम के बीच तथा पूर्व के थोड़े से भाग में बनवाना चाहिए। ईशान कोण के मध्य भाग में कच्चेमाल को रखना सही नहीं होता है।

तैयार माल का गोदाम-

हमेशा तैयार माल रखने के लिए वायव्य दिशा की जगह ही चुननी चाहिए। इस दिशा में तैयार माल रखने से माल की खूबसूरती व चमक ज्यादा लम्बे समय तक बनी रहती है तथा माल भी जल्द ही बिक जाता है। ईशान, नैऋत्य व औद्योगिक स्थल के बीच तैयार माल नहीं रखना चाहिए। इससे माल खराब होने की संभावना रहती है व माल का लाभ भी प्रभावित होता है।

चौकीदार व कर्मचारियों के रहने की जगह-

चौकीदारों के रहने के लिए आग्नेय कोण को अधिक उत्तम माना गया है। यहां चौकीदार को रात के समय नींद नहीं आती तथा फैक्ट्री में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए वायव्य कोण में रहने का मकान बनाना चाहिए। वायव्य कोण में इन्हें गहरी नींद आएगी व पूरा आराम मिलेगा। कर्मचारियों को मेहनत के बाद नींद आना व आराम मिलना जरूरी है ताकि वे दूसरे दिन फिर तरोताजा होकर काम कर सकें। ईशान, नैऋत्य के बीच भाग में कर्मचारियों व चौकीदारों के रहने की जगह नहीं बनानी चाहिए इससे उद्योग को क्षति पहुंचने की संभावना बनी रहती है।

कुछ जरूरी नियम-

  • किसी भी औद्योगिक इकाई (कंपनी) के मुख्यद्वार के पास चौकीदार के कमरे का दरवाजा दिशा के अनुसार मुख्य द्वार के बाई या दाई ओर होना चाहिए। उदाहरण के लिए मुख्यद्वार उत्तर में होने पर यह द्वार से पश्चिम में होना चाहिए। यदि मुख्यद्वार पूर्व में हो तो द्वार के दक्षिण, मुख्यद्वार पश्चिम में हो तो द्वार के उत्तर और मुख्यद्वार दक्षिण की ओर हो तो द्वार के पूर्व की ओर बनवाना चाहिए।
  • प्रशासकीय कार्यालय के लिए निर्दिष्ट दिशा में स्थित जगहों में निर्माण किया जाना चाहिए। सर्वोच्च अधिकारी के बैठने की व्यवस्था दक्षिण-पश्चिम या दक्षिण-पूर्व भाग में होनी चाहिए। तकनीकी सहायक, लेखाकार आदि उनसे पूर्व उत्तर या दक्षिण-पूर्व की ओर बैठाए जाने चाहिए। विक्रय अधिकार, चौकीदार या अस्थाई कर्मचारी आदि के बैठने की जगह कार्यालय के उत्तर-पश्चिम भाग में ही रखनी चाहिए।
  • कार्यालय में आने वाले के लिए स्वागत कमरा उत्तर-पूर्व भाग में या प्रतीक्षालय के लिए ही प्रयोग में लाना चाहिए या फिर यह भाग खाली रखा जाए, जगह खाली रखने पर वहां छोटा सा बाग-बगीचा लगाना चाहिए।
  • किसी सामान के नापतोल आदि के लिए उत्तर-पश्चिम भाग सही रहता है। अस्थाई तौर पर उत्तर-पूर्व के खाली भाग का प्रयोग भी किया जा सकता है।
  • पीने के पानी की जगह के लिए उत्तर-पूर्व भाग उत्तम माना जाता है।
  • प्रसाधन उत्तर-पश्चिम या दक्षिण-पूर्व भाग के पास ही बनाया जाए तो वास्तु सम्मत होता है।

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