बॉडी लैंग्वेज कैसे सीखें?

बॉडी लैंग्वेज विज्ञान

बॉडी लैंग्वेज कैसे सीखें?

How to learn body language?

बॉडी लैंग्वेज विज्ञान

दूसरों के बारे में जानकारी प्राप्त करना या उनके मन की भावनाओं को उनके बिना बोले सिर्फ शरीर के हाव-भाव से पढ़ लेना ही बॉडी लैंग्वेज विज्ञान है। इस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए आपके लिए कुछ बातों को ध्यान में रखना जरूरी है-

सबसे पहले आपको रोजाना दिन में कम से कम 10-15 मिनट तक किसी भी एक व्यक्ति के शरीर के अंगों की ओर बड़े ध्यान से देखते हुए उसके अंदर से उठने वाली भावनाओं का अध्ययन करना है। उस व्यक्ति के शरीर के हर अंग की ओर देखना है कि वह बात करते समय अपने अंगों को कैसे हिलाता है, उसकी आंखों की चमक किस प्रकार का संकेत कर रही है। उसकी आंखों की पुतलियां और भौंहे किस अंदाज से चल रही है।

किसी भी रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर खड़े होकर उन लोगों की भीड़ की ओर देखें, जो अपने रिश्तेदारों आदि को विदा करने के लिए आते हैं। गाड़ी चलते समय जब सबके बिछड़ने का दृश्य सामने आता है तो उनमें से बहुत से लोगों की आंखों में आंसू आ जाते हैं। विदा करने वालों का हाथ भी कांपने लगता है।

इससे यह बात साफ हो जाती है कि जब भी लोग बिछड़ते हैं तो उनकी जुबान काम नहीं करती मगर आंखों में आंसू आ जाते हैं। अलविदा कहने वाले हाथ उठते जरूर हैं लेकिन हिल नहीं सकते। सीने की गहराइयों से जब एक ठंडी आह निकलती है तो आत्मा का पूरा दुख शारीरिक अंगों द्वारा बाहर निकल आता है। ये सारी चीजे बॉडी लैंग्वेज विज्ञान को जानने से पता चलता है।

किंतु इसके विपरीत- पास ही एक गाड़ी बाहर से आ रही है। वहां पर खड़े कुछ लोग अपने किसी सगे संबंधी, मित्रों को लेने के लिए आए हैं। दो मिनट के लिए आप यह सोच लें कि आने वाला विदेश से आ रहा है। वे सब उसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। उनमें स्त्री-पुरुष सभी शामिल है। उनके हाथों में फूलों के हार है, गुलदस्ते हैं।

जैसे ही आने वाला व्यक्ति गाड़ी से उतरता है तो सब लोग उसका स्वागत करते हैं, उनके चेहरों पर हंसी नाच उठती है। वे आने वाले से बारी-बारी गले मिलते हैं। पूरा वातावरण खुशी में डूब जाता है। यह सारी खुशी आपको उनके चेहरों पर, आंखों में नाचती नजर आती है।

लोग उसे दोनों बांहों में भरकर जब छाती से लगाते हैं, उस समय उनका मन खुशी से इतना अधिक भर जाता है कि वे कुछ बोल ही नहीं पाते लेकिन न बोलने पर भी यह बात साफ हो जाती है कि वे इस समय बहुत खुश है।

अब दोनों दृश्य आपके सामने हैं। खुशी का भी और गम का भी। हंसी का भी, रोने का भी। इन दोनों दृश्यों में जुबान तो कोई काम नहीं करती, मगर फिर भी आपने यह कैसे जान लिया कि इन दोनों में खुशी और गम अलग-अलग है?

ऐसे ही न, कि आपने उन लोगों की बॉडी लैंग्वेज विज्ञान को समझ लिया। इससे पता चल जाता है कि कौन लोग दुखी है और कौन सुखी। दुखी लोगों की बॉडी लेंगुएज समझें, उनके मन की भावनाओं को उनके चेहरे पर, आंखों से, अलविदा कहते हुए, रुकते हुए, होंठों का रुकना, मुंह का लटक जाना, इन सब चीजों को बड़े ध्यान से देखते रहें, सब लोगों के शरीर के अंगों का बड़ी गहराई से अध्ययन करने का प्रयास करें कि इस उदासी के अवसर पर उनके शरीर के अंग किस प्रकार से काम कर रहे हैं।

फिर दूसरी ओर के लोगों को देखिए, जो खुशी से झूम रहे हैं। उनके चेहरे कैसे खिले हैं। आने वाले के गले में हार डाल रहे हैं, उसका मुंह चूम रहे हैं।

दोनों पक्षों के शारीरिक अंगों का अध्ययन करें तो आपको बॉडी लैंग्वेज विज्ञान का ज्ञान प्राप्त होना शुरू हो जाएगा। ऐसे ही, कई दृश्य आपको बड़े-बड़े शहरों में, गांवों आदि में देखने को मिलेंगे जिनसे लोगों के मन के भावों को उनके बिना कहे भी उनके शारीरिक अंगों के कार्य से जान सकते हैं। यह भी शिक्षा है, ज्ञान है। जिसे व्यक्ति अपने ही जैसे लोगों से सीखता है।

अपने मन के अंदर के इशारों को लेकर दूसरे व्यक्ति के मन के इशारों से मिलकर इस भाषा का ज्ञान प्राप्त हो जाता है। कभी आप टी.वी. पर फिल्म देख रहे हैं तो बीच में 10-15 मिनट के लिए टी.वी. की आवाज को बंद कर दें और फिल्म को देखकर यह अंदाजा लगाने की कोशिश करें कि इस फिल्म के किरदार एक-दूसरे से क्या कह रहे हैं।

केवल उनके शारीरिक अंगों के अभिनय से ही आपको यह सब कुछ जानना है कि वे क्या कह रहे हैं।

फिर टी.वी. की आवाज को खोल दें और उससे यह अंदाजा लगाएं कि आपने जो कुछ भी उन पात्रों के बारे में बिना उनके बोले-उनके विषय में सोचा था, वह ठीक था या गलत।

बॉडी लेंगुएज का ज्ञान प्राप्त करने का यह तरीका भी बहुत अच्छा माना जा रहा है। बॉडी लैंग्वेज विज्ञान को सीखने वाले लोगों के लिए यह सबसे अच्छा रास्ता है क्योंकि इससे तो आपकी परैक्टिस भी साथ-साथ हो जाती है।

ऊपर लिखी बातों के माध्यम से आपको बॉडी लैंग्वेज ज्ञान के कुछ रास्ते बताए जा रहे हैं। इनके साथ-साथ आप खुद भी ऐसे ही अनेक रास्ते अपने लिए तलाश करके जीवन की इस प्रयोगशाला में लगातार आगे बढ़कर इस ज्ञान के शिक्षक भी बन सकते हैं।

यही एक ऐसी शिक्षा है जो केवल मानव शरीर से ही मिलती है इसमें जुबान से काम नहीं लिया जाता, बल्कि सूझ-बूझ से काम लिया जाता है।

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