बॉडी लेंगुएज क्या है?, मनव इतिहास से इसका संबध

Body Language

आज हम 20वीं सदी को पार करके 21वीं सदी में प्रवेश कर चुके हैं क्योंकि पूरा संसार ईसा वर्ष के अनुसार ही चलता है इसलिए बात 20वीं और 21वीं सदी की ही होती है। लेकिन ईसा वर्ष के अनुसार चलने से हम मानव इतिहास को केवल 2000 वर्ष तक ही सीमित रख पाते हैं जो वास्तव में सही नहीं है क्योंकि मानव इतिहास तो आज से कई हजार वर्षों पहले से चलता आ रहा है और इसके साथ साथ बॉडी लेंगुएज (Body Language) भी चलता आ रहा है।

ईसा युग तो मानव की उत्पति के कई हजार वर्षों बाद उदय हुआ। असल में हमारे ऋषि-मुनि, वेद-पुराण और धार्मिक ग्रंथ मानव इतिहास की लम्बी कड़ियों को हजारों वर्ष पहले से ही जोड़ रहे हैं लेकिन आज के युग में जब कोई उस जमाने की बात कहता है तो हमारी नई पीढ़ी या खुद हमें भी बहुत आश्चर्य होता है क्योंकि 21वीं सदी में हम अपनी सभ्यता और संस्कृति को भूलकर पश्चिमी सभ्यता में इतने रंग चुके हैं कि चाहते हुए भी ऐसी बातों पर यकीन करना थोड़ा मुश्किल हो जाता है।

असल में मानव इतिहास तो उस युग से आरम्भ होता है, जब इस संसार में केवल जंगल और पहाड़ थे और इंसान जुबान होते हुए भी कुछ नहीं बोलता था। अब सोचिए कि जब कोई इंसान कुछ बोलता ही नहीं था तो दूसरे इंसान से कैसे बात करता था।

सच बोलें तो उस समय इंसान को बोलने की जरूरत ही नहीं थी वो सिर्फ इशारों से अर्थात अपनी शारीरिक अंगों की मुद्राओं द्वारा ही दूसरे इंसान को अपनी बात समझा देता था। उस समय के लोग रहने के लिए गुफाओं आदि का प्रयोग करते थे।




खाने के लिए शिकार पर या फलों पर निर्भर करते था लेकिन बोलते फिर भी नहीं थे क्यों, क्योंकि इसकी भी एक वजह थी। उस समय के लोगों के पास जबान होते हुए भी कोई भाषा नहीं थे इसलिए वे कुछ नहीं बोलते थे। लेकिन कहते हैं न कि इंसान का दिमाग कुदरत की बनाई हुई चीजों में से सबसे तेज चलता है जिसके बल पर एक दिन इंसान ने अपने बोलने के लिए भाषा भी खोज ही निकाली।

मानव जाति का पहला कदम यही था कि दूसरे इंसान को अपनी बात समझाने के लिए भाषा का प्रयोग किया जाए लेकिन इसके साथ-साथ इंसान ने अपनी पुरानी भाषा अर्थात शारीरिक मुद्राओं द्वारा बात करने का तरीका बंद नहीं किया जो आज भी चल रहा है। इसे ही बॉडी लेंगुएज अर्थात शरीर की भाषा कहते हैं ।

बॉडी लेंगुएज द्वारा हम उस दूर खड़े उस इंसान के मन की बात, जो वह हमसे कह भी नहीं सकते, वह जान सकते हैं। हम उसके चेहरे के भावों को पूरी तरह पड़ सकते हैं कि वह उस समय किस तरह की मनोस्थिति में है, उसके मन में क्या चल रहा है।

बॉडी लेंगुएज का उदाहरण देखना हो तो आप एक छोटे से बच्चे को देख सकते हैं जो मां के पेट से ही इस भाषा को सीखकर आता है। एक बच्चा जो हमारी भाषा नहीं समझता और न ही कुछ बोल पाता है लेकिन कैसे जब आप उसको उसके नाम से पुकारते हैं तो वह तुरंत ही अपना नाम सुन लेता है।

आप जब उसके पास आते हैं, उसे गोदी में उठाते हैं तो कैसे वह जोर-जोर से उछलने लगता है, किलकारियां मारने लगता है। जब उसे भूख लगती है तो जोर-जोर से रोने लगता है ताकि उसकी मां समझ जाए कि उसे भूख लगी है और पेट भरने के बाद खुद ही दूध पीना छोड़कर दुबारा से अपनी धुन में मग्न हो जाता है।

यही भाषा हमारे घर में पाले जाने वाले जानवरों अर्थात बिल्ली-कुत्ते आदि पर लागू होती है। किसी भी जानवर को अपने घर में पालने के कुछ दिन बाद ही उस जानवर औऱ उसके मालिक में एक ऐसी भाषा द्वारा संबंध स्थापित हो जाता है जिसे दोनो ही बिना बोले बहुत अच्छी तरह से समझ लेते हैं।

जैसे हम अपने घर में किसी कुत्ते को पालते हैं और सुबह के समय उसे शौच आदि आ रही हो तो वह पूरे घर में चक्कर लगाने लगता है मानों वह कह रहा हो कि मुझे शौच के लिए बाहर लेकर चलिए। शाम को ऑफिस से जैसे ही मालिक घर में कदम रखता है तो कुत्ता उसके पैरों में लौटने लगता है जैसे कि मालिक का स्वागत कर रहा हो।




इसी तरह अपने पालतु कुत्ते के सामने किसी बॉल आदि को दूर फैंके तो आप देखेंगे कि आपका कुत्ता स्वयं ही उस बॉल को मुंह में दबाकर दुबारा से आप ही के पास ले आएगा। इसे कहते हैं जानवरों की Body Language

बॉडी लेंगुएज को हॉलीवुड के एक बहुत ही महान कलाकार चार्ली चेपलीन जी ने अपनी फिल्मों द्वारा लोगों तक पहुंचाने में बहुत बड़ा योगदान दिया था। वह अपनी फिल्मों में बिना बोले ही सिर्फ बॉडी लेंगुएज द्वारा ही लोगों को इतना हंसाते थे कि कोई बोलकर भी क्या हंसाएगा।

उनकी किसी फिल्म में कोई संवाद नहीं होता था लेकिन सामने बैठा दर्शक उनके द्वारा किए गए अभिनय द्वारा अर्थात बॉडी लेंगुएज द्वारा सबकुछ समझ जाते थे। हमारे देश में भी कुछ लोगों ने इस तरह की कोशिश की थी जो ज्यादा कामयाब नहीं हुई।

जबकि भारत में सबसे पहले फिल्मों की शुरूआत इसी तरह की फिल्मों से हुई थी और लोग भी उस समय ऐसी फिल्मों को देखकर आनंदित होते हैं लेकिन कहते हैं न कि जैसे-जैसे समय बदलता है वैसे ही इंसान भी बदलता है। इसी कारण इंसान भी आज की बोलती हुई फिल्मों को देखकर उन फिल्मों और उस भाषा को भी भूल चुका है।

Leave a Reply

error: Content is protected !!