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प्रवेश द्वार की सजावट

प्रवेश द्वार की सजावट

मुख्य द्वार की सजावट

DECORATION OF A DOOR

प्रवेश द्वार की सजावट  के लिए सरल वास्तु शास्त्र में निम्न बातें बताई गई है-

  1. कुल देवता- परिवार के कुलदेवता कीमूर्ति की लम्बाई लगभग 18 इंच से अधिक नहीं होनी चाहिए।
  2. दो पहरेदार- प्रवेश द्वार की सजावट के दोनों तरफदोनों पहरेदार अच्छे वस्त्रों को पहने हुए हो, आभूषणों से सजे हों, यौवन औरसौंदर्य से पूर्ण हो तथा जिनके हाथों में एक लाठी और तलवार हो। उन दोनों के साथएक-एक स्त्री द्वार रक्षिका भी होनी चाहिए।
  3. धात्री (एक नाटी नर्स)- इस धात्री के पीछे उसकीस्त्री सेविका, विदूषक आदि होनी चाहिए।
  4. शंख और पद्मनिधि- शखं एवं पद्मानिधि होनीचाहिए जिनसे मुद्राएं निकल रही हों।
  5. अष्टमंगल- कमल के आसन पर आठ शुभ प्रतीकों की पवित्र माला पहने हुए।
  6. लक्ष्मी- कमल के आसन परवस्त्राभूषणों से भली प्रकार सजी-धजी लक्ष्मी जिन्हें हाथी स्नान करा रहे हों।
  7. गाय- गाय अपने बछड़े समेतजिसे फूलों की मालाओं से पूर्णरूप से सजाया गया हो।

सरल वास्तु शास्त्र के अनुसार- इस बात पर ध्यान दियाजाना चाहिए कि आज के लोग अति उत्साह में कृष्ण, गणेश, विष्णु आदि देवताओं की मूर्तियोंतथा अन्य निषेध किए गए मूलभाव चित्रों से अपने मकान की सजावट करते हैं। इससे बचनाचाहिए और केवल उन चित्रों व मूर्तियों का ही उपयोग करना चाहिए जिनका हमारे प्राचीनग्रंथों में उल्लेख किया गया है।

प्रवेश द्वार की सजावट केसंबंध में प्राचीन ग्रंथों में भिन्नताएं- कुछ ग्रंथों में प्रवेश द्वार की सजावट के बारे में वर्णन किया गया है कि दक्षिण की ओर मुख वाला द्वार शुभ औरपश्चिम की ओर मुख वाला अशुभ होता है लेकिन अनेक ग्रंथों में इसके विपरीत कहा गयाहै। इस विषय के अधिकांश विद्वानों का मत है कि पश्चिम की ओर मुख वाले द्वार से कोईहानि नहीं होती। लेकिन दक्षिण दिशा की ओर मुख वाले द्वार को लगाने से बचना चाहिए।वे अपने मत की पुष्टि में यह तर्क देते हैं कि हम कोई कार्य या धार्मिक समारोहदक्षिण की ओर मुख करके नहीं करते हैं सिवाय स्वर्गीय आत्मा का अंतिम संस्कार याबरसी मनाने के।

इस तथ्य पर भी ध्यानदेना चाहिए कि ऐसे विषयों में प्राचीन शास्त्रों के अतिरिक्त युगों पुरानी प्रचलितपरंपराओं के पालन पर भी विचार करना आवश्यक हो जाता है। भारतीयों विद्वानों के अनुसार दक्षिण दिशा पर मृत्यु का देवता यम का आधिपत्य है। अतः वे सामान्यतः किसीमकान को दक्षिण दिशा से प्रवेश करने का द्वार नहीं बनवाते। उपद्वार दक्षिण दिशामें होने पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता। दक्षिण की ओर मुख वाले द्वार के बुरेप्रभावों को उत्तर-उत्तर-पूर्वी या पूर्वोत्तर-पूर्व में दूसरा द्वार बनाकर यथेष्टसीमा तक कम किया जा सकता है।

मकान के अग्रभाग में बाहरी द्वार किस स्थान पर हो, यह एक दूसरा विषय है जिसके संबंध में मतभेद हैं। कुछ प्राचीन ग्रंथों के अनुसार यह मध्य में होना चाहिए। दूसरों का मानना है कि उस ओर के दोनों अंतिम बिंदुओं के क्षेत्र को आठ भागों में विभाजित किया जाना चाहिए और प्रथम, द्वितीय, सप्तम तथा अष्टम भागों को छोड़कर तृतीय से षष्टम भाग तक को मुख्य द्वार लगाने के लिए निश्चित किया जा सकता है। कुछ अन्य प्राचीन ग्रंथों के अनुसार दक्षिण दिशा को नौ भागों में बांटना चाहिए और प्रत्येक भाग को नौ ग्रहों के अनुसार पड़े ग्रह से प्रभावित समझना चाहिए और किसी विशेष स्थान के द्वार के लिए चुनाव करने से पूर्व उस ग्रह के अच्छे या बुरे प्रभाव को जान लेना चाहिए।

परंतु इस विषय के अधिकांश उद्भट विद्वानों के अनुसार प्रवेश द्वार की सजावट कभी भी मध्य या केंद्र में न होकर उससे हटकर किसी अनुकूल स्थान पर बनाना चाहिए। इसी प्रकार मुख्य द्वार कभी भी सबसे अंतिम कोने में नहीं बनवाना चाहिए।

काष्ठकला के गुण और दोष- प्राचीन ग्रंथों मेंउपयोग में लाई जाने वाली सामग्री, कारीगरी, लकड़ी के आकार, अनुपात, नाप, काष्ठकलाऔर उसकी कलात्मक शैली को बहुत महत्व दिया गया है। ग्रंथ में काष्ठकला के उन लगभग17 सम्भावित दोषों का विस्तार से वर्णन किया गया है जिनसे बचना चाहिए। जो दरवाजेखुलने या बंद होने के समय आवाज करते हैं उन्हें खराब समझना चाहिए। जो दरवाजे स्वयंबंद हो जाते या खुलते हों उन्हें भी अशुभ माना जाता है। कपाटों या प्रवेश द्वार की सजावट करने की परंपरा जो आज भी चली आ रही है बहुत प्राचीन है क्योंकि सादे दरवाजोंका उल्लेख अशुभ रूप में किया गया है। केवल दरवाजों की ही नहीं बल्कि मकान कीदीवारों, सभा भवनों और छतों आदि की भी सजावट होती है। धर्मनिरपेक्ष वास्तुकला (Vastu Shastra) मेंलगभग उन सभी मूल भाव चित्रों का वर्णन किया गया है जिनका सजावट करने के लिए उपयोग करनेकी अनुमति थी या जिनका निषेध था। जिन मूलाभव चित्रों या मूर्तियों का निषेध कियागया है उनकी कुल संख्या लगभग उन्नचास है जिनका उपयोग करने की अनुमति है उनकीसंख्या सत्रह है। यहां उनमें से कुछ चुने हुए मूलभाव का ही वर्णन किया जा रहा है।

मूलभाव चित्र या मूर्तियां जिनका उपयोग करना मना है- सभी देवता, गंधर्व, नाग गण, अप्सराएं नास्तिकगण, घायल, जले, पागल, नपुंसक, मुर्ख, नग्न लोग, अंधे, नाटे, हाथी पकड़ने वाले, दैत्यों और दानवों का युद्ध, शिकार करना, जंगल की अग्नि, आग में जलते मकान, फूल रहित पेड़, उल्लू, गिद्ध जैसे पक्षी, हाथियों, घोड़ों, भैंसों, सियारों आदि पशुओं की तस्वीर नहीं लगानी चाहिए।

मकान में लगाए जाने वाली तस्वीर- कुलदेवता, शंख सहित कोष निधियां, कमल आदि लक्ष्मी, कुबेर, श्री, बैल, गाय अपने बछड़े सहित, हंस, अद्यान, बाग-बगीचे, हंसों, सारसों आदि जल पक्षियों से घिरी बड़ी झीलों नृत्य-गान करती स्त्रियां, तोता, मैना, मोर, मुर्गी आदि पक्षियों की तस्वीर लगाना अच्छा माना जाता है।

लकड़ी के लिए सामान- प्राचीन ग्रंथों में इसका भी उल्लेख है कि लकड़ी के लिए बूढ़े और जवान पेड़ का उपयोग नहीं करना चाहिए। इसका कारण ये हैं कि जब पेड़ की आयु अधिक हो जाती है तो उसकी लकड़ी का रंग हल्का पड़ने लगता है और उसमें निहित तैलीय तत्व भी कम हो जाता है। इसी प्रकार युवा पेड़ की लकड़ी आवश्यक शक्ति और नाप की नहीं होती है। काटे जाने वाले पेड़ की उचित आयु 66 वर्ष होती है।

निम्नलिखित पेड़ों को मकानों में उपयोग करने के लिए अनुचित समझा गया है-

  1. श्मशानों में उगे पेड़, गांवों की सड़कों पर उगे पेड़, तालाबों के किनारों और मंदिरों की सीमा में लगे पेड़ नहीं काटने चाहिए।
  2. सूखे या कमजोर पेड़, ऐसे पेड़ जिनमें छेद हो गए हों, टेढ़े-मेढ़े या जले हुए हों, शाखाहीन पेड़, आकाशीय विद्युत से जले पेड़ आदि को काटकर मकान में उपयोग नहीं करना चाहिए। ऐसे पेड़ जिनमें शहद की मक्खियों, सांपों, मांसहारी पक्षियों आत्माओं आदि का वास हो जिन पर मकड़ियों के जाले हों जिन्हें जंगली पशुओं ने खुर्च डाला हो या हाथियों ने जिन्हें नुकसान पहुंचाया हो या जो रोगग्रस्त पेड़ हो उसका इस्तेमाल मकान में नहीं करना चाहिए।
  3. ऐसे पेड़ जिनसे भूमि की सीमा निर्धारण की गई हो उनका उपयोग भी मकान में नहीं करना चाहिए।
  4. बेमौसम के फल-फूल वाले पेड़ भी उपयोगी नहीं माने जाते हैं।
  5. कांटेदार, स्वादिष्ट फल देने वाले, दूध जैसे और सुगंधित पेड़ का उपयोग भी मकान के लिए अच्छा नहीं माना जाता।
  6. पीपल, बेर, रेशमी, रूई आदि उत्पन्न करने वाले पेड़ को भी मकान के लिए नहीं काटना चाहिए।

इस तरह के किसी भी पेड़ को काटने के लिए पहले शुभ मुहूर्त एवं दिन देखना चाहिए और उसके बाद उसी दिन पेड़ को कटवाना चाहिए। पेड़ को इस प्रकार कटवाना चाहिए कि वह दक्षिण या पश्चिम दिशा में गिरें। पेड़ गिरने के बाद उसे पूजा-पाठ करके छोड़ देना चाहिए। इस तथ्यों से पता चलता है कि हमारे पूर्वज वास्तुकला (Vastu Shastra) के प्रत्येक पक्ष पर कितनी गहराई से विचार करते थे।

यह जानना रोचक होगा कि पेड़ का लिंग उनकी कोमल पत्तियों का परीक्षण करके ज्ञात किया जा सकता है। यदि पत्ती की दाहिनी ओर की कोमल नसों की संख्या सम हो और बाईं ओर की कोमल नसों की संख्या विषम हो तो पेड़ पुरुष होता है इसके विपरीत होने पर स्त्री। दोनों ओर की नसों की संख्या बराबर होने पर पेड़ नपुंसक होता है। आश्रमों और मंदिरों आदि के निर्माण के लिए नपुंसक पेड़ों की लकड़ियां पवित्र मानी जाती है।

इसी प्रकार कुशल शिल्पी पत्थर पर विशेष औजार को मारकर उसकी ध्वनि सुनता है और उस ध्वनि से उसके लिंग का निर्धारण करता है। पुरुष पत्थर का उपयोग केवल पुरुषों की मूर्तियों के लिए किया जा सकता है और स्त्री पत्थर का उपयोग स्त्रियों की मूर्तियों के लिए।

मकान के निर्माण के लिए देवदार, श्री गंधा, सफेद और लाल मत्ति, सागवान, नीम, साल, बोगी, किरल बोगी, कटहलआदि की लकड़ियां अच्छी मानी गई हैं। बिल्ब, सहजन, कल्लि, आम, बरगद, ताड़ आदि केपेड़ की लकड़ी दूसरी श्रेणी की लकड़ी मानी जाती है। पीपल, नारियल, अत्ति आदि शुभपेड़ की लकड़ का उपयोग मकान निर्माण में नहीं किया जाता है।

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