Sun. Jun 7th, 2020

Dharti, Pani, Hawa tatha Jiwan – Vastu Shastra

धरती, पानी, हवा तथा जीवन

धरती, पानी, हवा तथा जीवन

गहरी घाटियां , मैदान, ऊंचे-ऊंचे पहाड़ तथा पठार  ये सब सागरों से घिरे हुए स्थलों पर होते हैं जो नदियों की नसों तथा धाराओं और झीलों के जाल के द्वारा जीवन से अनुप्राणित  है। धरती के ऊपर और तह (स्तर) के नीचे अलग-अलग मात्राओं में मिट्टियां तथा खनिज पदार्थ है, जो जीवन को अनुपजाऊ अथवा संपन्न करते हैं। पृथ्वी के घूमने की वजह से रात तथा दिन होते हैं, जो कि पेड़-पौधों और जीवनधारियों के जीवन को व्यवस्थित करते हैं। पृथ्वी के द्वारा सूरज के चारों तरफ कुछ झुकी हुई धूरी पर घूमने की वजह से मौसम अथवा ऋतुएं होती है, जो फसलों और वनस्पतियों के लिए जरूरी होती है। कोई जगह ठंड़ी जानी जाती है या गर्म, यह उसकी भूमध्य रेखा से होने वाली दूरी तथा समुद्र की तह से ऊंचाई पर निर्भर करता है।

जलवायु climate मिट्टी के बनाने की प्रक्रिया में ही महत्वपूर्ण भूमिका नहीं निभाती, बल्कि पौधों तथा पशुओं की विशेषताओं और सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण मनुष्य की ऊर्जा पर भी असर (प्रभाव) डालती है।

कुदरत के छिपे हुए रूप जीवन को जन्म देते हैं और चाहें अच्छाई के लिए हो अथवा फिर ज्यादा खराबी के लिए, कुदरत के सिद्धान्त उस जीवन को नियंत्रित करते हैं, इसी वजह से प्राकृतिक पृष्ठभूमि से घनिष्ठ  सामंजस्य उसकी पहली जरूरत बन जाती है।

कई पशुओं की अपेक्षा में मनुष्य जाति की शारीरिक नम्यता तथा अपने को कुदरती की ताकतों के पक्ष में बनाने की ताकत कहीं कम होती है। पशुओं के शरीर में अलग-अलग तरह की विरोधी जलवायु का सामना करने के लिए प्राकृतिक सुरक्षाएं होती है। पक्षीगण भी अपने शरीर को जलवायु के पक्ष में बनाने की ताकत को रखते हैं और जब कुदरती परेशानी नहीं सही जाती है, तो वे दूसरी जगहों की तरफ उड़ जाते हैं, जहां की हवा-पानी इनके अनुसार होती है। पक्षीगण और अन्य जीव जैसे कि- चींटियां, दीमक, मधु-मक्खियां आदि कुदरत के अनुकूल बन जाने की अपनी शारीरिक ताकत पर पूरी तरह से निर्भर नहीं करते, बल्कि वे अपने रहने की जगह को बनाने के लिए योग्यता का भी फैलाव करते हैं। वे जिन अलग-अलग रूपों और नमूनों में इनको बनाते है, वे युगों से एक जैसे रहते आए है, इनसे हमको ज्ञानवर्धक illuminating/enlightening उदाहरण मिलते हैं।

पक्षियों के खुले हुए घोंसलों में ऊष्मा को रोकने के गुण भी देखे जा सकते हैं। रेशों और घास की लचकीली ताकत का इस्तेमाल लटकते हुए घोंसलों में पाया जाता है। हवा की शक्तियों से बचने की तकनीक को पेंडुलम की तरह हिलाने वाले घोंसले के रूप में जाना जाता है। मिट्टी और तिनकों से बने बड़े घोंसलों के ढलानदार प्रवेश करने वाले रास्ते से हम सूरज की सीधी पड़ने वाली किरणों और बारिश से बचने के उपाय को सीख सकते हैं। मिट्टी और तिनकों से बने हुए कुछ इस तरह के सीधे घोंसले होते हैं जो आजकल की इमारतों के कमरों की तरह के होते हैं, इनमें छेद वाला एक निजी घोंसला भी होता है, जिसमें दो छोटे कमरे से बने होते हैं। इनमें से पहला प्रवेश करने वाला उपकक्ष और दूसरा अंडे देने वाला और सोने के कमरे के काम में इस्तेमाल किया जाता है। बहुत सीधी दीवारों वाले घोंसलों में सूरज की सीधी पड़ने वाली किरणों के बहुत ही ज्यादा गर्मी को मिट्टी की मोटी परत के द्वारा रोक दिया जाता है।

पक्षियों की ये कोशिश व्यक्तिगत या जोड़े के द्वारा की जाती है, जबकि कीड़ों की कोशिश सामूहिक  होती है। दीमक छोटी-छोटी पहाड़ियों को बनाती है, जिन्हें हम बांबी anthill के नाम से जानते हैं। इनको वे अपने भूमिगत रहने वाली जगह के ऊपर बनाती है। ये अपने चारों तरह की परिस्थितियों के अनुसार ही अलग-अलग तरह की जानी जाती है। दीमकों को भी मनुष्यों की तरह ही नियंत्रित हवा-पानी में काम को करना अच्छा लगता है।

उदाहरण के लिए पश्चिमी आस्ट्रेलिया की कंपास दीमक अपने रहने वाली जमीन का तापक्रम रात-दिन, गर्मी और सर्दी में 31 डिग्री सेल्सियस से एक डिग्री के अंदर तक रखती है, जबकि बाहर का तापमान 3 डिग्री सेल्सियस से 42 डिग्री सेल्सियस के मध्य में बदलता रहता है। दीमक अपने घोंसलों अथवा रहने वाली जमीन के तापमान को उसके अंदर बहने वाली हवा को नियंत्रित करके करती है। उनकी बांबी की आकृति और उसकी रूपरेखा (बनावट) जो कि तीन मीटर की ऊंचाई तक जाती है, उनके अंदर के तापमान को प्रभावित करती है, उनकी मीनारें पच्चर की आकृति की तरह और हमेशा ही उत्तर दिशा की तरफ झुकी होती है।

जैसे ही वे मीनारे गर्म होती है, उनके अंदर की हवा ऊपर उठ जाती है और उनकी जगह पर दीमकों के रहने के कमरों से ताजी हवा आने लगती है। मीनारों के ऊपर बहने वाली हवा भी घोंसले में से वायु को खींचने में सहायता करती है। इस संपूर्ण विधि को चिमनी प्रभाव के नाम से भी जाना जाता है और दीमक हवा के बहाव को वंश में करने के लिए हवा के आने वाले रास्तों को खोलती है अथवा बंद करती रहती है। मनुष्य तापमान को इतनी सूक्ष्मता (एयरकंडीशनिंग) वातानुकूलन विधि की मदद से वश में कर सकता है, जिसमें ज्यादातर ऊर्जा खर्च होती है और जिसके बारे में यह माना जाता है कि वह स्वास्थ्य के लिए भी ठीक नहीं है।

कई व्यक्ति यह भी जानना चाहते हैं कि परमात्मा द्वारा रचित मानव के अलावा भी किसी जीव के पास अपने मकानों को बनाने के कामों के लिए वास्तुशिल्प  की तरह का ज्ञान है। अन्य तरह के जीवों का जीवन प्रणाली का बहुत ही गहरा अध्ययन करने के बाद पांच मूल तत्वों यानी कि पंचमहाभूतों और वास्तुशास्त्र के अनुसार सूरज के पड़ने वाले प्रभावों के बारे में उनकी सही तरह की जानकारी का मालूम हो जाता है।

एक जैसे माहौल या वातावरण में मानव जाति उन्ही चिंताओं और दबावों का सामना करती है, जो अन्य जीव करते हैं। मनुष्य साफ रूप से किसी भी काम में रह सकता है, जहां उसे अपने जीवन को चलाने के लिए भोजन-पानी मिल सकें लेकिन इस तरह की परिस्थितियां बहुत ही सीमित हैं, जिसमें उसकी शारीरिक और मानसिक ताकतों तथा नैतिकचरित्र  का पूरी तरह से विकास हो सके। प्रतिकूल हवा-पानी में उसका शरणस्थल या रहने वाली जगह सबसे बडी़ ही सुरक्षित मानी जाती है। मकानों की रूपरेखा या बनावट राष्ट्रीय सीमाओं के द्वारा कम परंतु हवा-पानी के कटिबंधों के द्वारा ज्यादा चर्चा होती है, इनमें बस स्थानीय पसंदगी  और रीति-रिवाज की थोड़ी-सी ही भिन्नता होती है, आधुनिक वास्तुकला  दृष्टिगत पक्ष (यानी कि वह मकान जो देखनें में अच्छा तथा सुंदर दिखाई देता हो), सांसारिक  क्रियाओं तथा व्यक्ति के सामाजिक और अपने आप पर निर्भर करती है। परंतु वास्तुशास्त्र को एक ऐसा विज्ञान माना जाता था, जो मनुष्य, कुदरत और उसके मकानों के बीच में खुशी ला सके। आधुनिक वास्तुकलाविद्  आराम अथवा सुख को ज्यादा महत्व देते हैं, जबकि प्राचीन भारतीय वास्तुकला प्राकृतिक (कुदरती) तत्वों से सुरक्षा तथा आध्यात्मिक  कोशिशों एवं जीवन में आराम या सुख देने के माहौल (वातावरण) के प्रबंध पर बल दिया जाता है।

वास्तुशास्त्र और धर्मशास्त्र (Vastu Shastra and Theology)

  1. भारतीय ज्योतिष शास्त्र
  2. भारतीय रीति-रिवाज तथा धर्मशास्त्र
  3. प्राचीन भारत की धर्मनिरपेक्ष वास्तुकला
  4. वेद तथा हिन्दू शब्द की स्तुति
  5. हिन्दू पंचांग अथार्त हिन्दू कैलेंडर क्या है?
  6. युग तथा वैदिक धर्म
  7. वास्तु तथा पंचतत्व
  8. अंक एवं यंत्र वास्तु शास्त्र
  9. जन्मपत्री से जानिये जनम कुन्डली का ज्ञान

👉 Suvichar in Hindi and English

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