गंभीरता और कल्पना – गंभीर व्यक्तित्व की पहचान

गंभीरता और कल्पना - गंभीर व्यक्तित्व की पहचान

गंभीरता और कल्पना के सागर में डूबे हुए लोग

गंभीरता और कल्पना: जैसा कि मैनें आपको पिछले पृष्ठों में बताया है कि हमारे शरीर के हर अंग में ही एक भाषा छिपी हुई है। बस उस भाषा को पढ़ने वालों की ही कमी रहती है। जो शारीरिक अंगों की भाषा को समझ लेते हैं उनकी प्रगति के द्वार भी खुल जाते हैं। अब मैं आपको एक ऐसे गंभीर व्यक्ति के विषय में बताता हूं जो चित्र-12 में एक कुर्सी पर बैठा है। उसमे अपने दाएं हाथ को ठोड़ी के नीचे खड़ा कर रखा है और उसकी आंखों में एक विचित्र सी चमक नजर आ रही है जिसका अर्थ है कि वह कल्पना के सागर में डूबा हुआ है।

     यह आदमी, अपनी दुनिया में इतना मस्त है कि उसे अपने आस-पास की भी कोई खबर नहीं। उसका एक हाथ तो मुंह का सहारा बना हुआ है जबकि दूसरे हाथ को अपने दाएं बाजू पर रखे हुए है। एक टांग को दूसरी टांग पर रखकर वह निरंतर सोच रहा है। उसके चेहरे की भाषा यह बात स्पष्ट कर रही है कि वह किसी सोच में डूबा हुआ है। वह अपने मुंह से तो कुछ भी नहीं बोलता मगर हम उसकी शक्ल देखकर उसके चेहरे से बड़े आराम से यह भाषा पढ़ सकते हैं।

     यह आदमी कल्पना के सागर में डूबा हुआ है और इस समय हमें इसे पुकारना नहीं चाहिए क्योंकि इसने कल्पना का जो संसार अपने मन में बसाया है हुआ है, वह एक पल में ही टूटटक बिखर जाएगा। उस समय यह साधारण आदमी नजर आएगा। ऐसे अवसर पर हमें ऐसे किसी व्यक्ति से बिना कुछ कहे ही समझ जाना चाहिए कि वह क्या कर रहा है। उसके शारीरिक अंगों पर लिखी भाषा से ही हम यह कार्य कर सकते हैं। जिन लोगों के पास शारीरिक भाषा का ज्ञान नहीं है, वे ऐसे आदमी के पास जाकर अपने आप बातें करने लगते हैं या फिर बच्चे आस-पास शोर मचाने लगते हैं और नहीं तो कोई सज्जन टी.वी. का बटन दबा देगा या फिर कोई रेडियो, टेप रिकार्ड को चालू कर देगा।

     यह सब अज्ञानता के कारण ही होता है क्योंकि हमें मानव शरीर की भाषा का ज्ञान नहीं है।

     ऐसे कई व्यक्ति समाज में और भी मिलेंगे जो काफी गंभीरता के मूड़ में बैठे होते हैं। उदाहरण के लिए, यदि आप किसी दफ्तर में अपना कोई कार्य करवाने के लिए जाते हैं या फिर आप नौकरी की तलाश में जाते हैं अथवा कोई ठेका लेना चाहते हैं, ऐसी हालत में यदि कोई आदमी गंभीर एवं अपनी कल्पनाओं में डूबा बैठा मिले तो आप उसके चेहरे से उसके मन की भाषा को पढ़ सकते हैं और यह भी जान सकते हैं कि ऐसा आदमी अभी कोई भी काम करने के मूड में नहीं है। यदि आप ऐसे में उससे काम के बारे में कहते भी हैं तो समझ लीजिए कि आपका काम खराब ही होगा।

     कुछ लोग ऐसे आदमियों को देखकर यह सोच लेते हैं कि वे उदास हैं और खामोश भी हैं मगर उनकी यह धारणा सिरे से ही गलत होती है क्योंकि वे न तो खामोश होते हैं और न उदास। जो लोग इनके बारे में ऐसा सोचते हैं, उन्हें यह बात जान लेनी चाहिए कि इंसान कभी-कभी अकेले में बैठकर गंभीर रूप में अपने मन से बातें करता है। जैसे कोई कवि, कलाकार, लेखक अपने ख्यालों में खोकर अपने आप से ही बाते करता रहता है। इस कल्पना के संसार की अपनी एक अलग ही भाषा होती है, जिसे कल्पना करने वाला ही समझ सकता है। कल्पना की दुनिया सपनों की दुनिया से अलग जरूर है, मगर इन दोनों का कार्य एक जैसा ही है।

     गंभीर मुद्रा में बैठे किसी भी इंसान को हम भले ही अकेला जान लें मगर वह अकेला नहीं होता। हां, उसके अंगों की भाषा को यदि हम पढ़ने का प्रयास करें तो हमें यह पता चल सकता है कि वह क्या सोच रहा है। हो सकता है वह अपनी कल्पना के संसार में बहुत बड़ा प्लान बना रहा हो। कोई कारोबार करने का मिल लगाने का, सम्पत्ति खरीदने या धन कमाने का रास्ता खोज रहा हो। ऐसे में यदि आप उसे टोक देते हैं या उसके पास शोर मचाते हैं तो जानते हैं क्या होगा?

     उसके सपने के सारे महल रेत के घरौंदे की भांति टूटकर बिखर जाएंगें। उसके काल्पनिक संसार का विनाश हो जाएगा।

     यह सारी बातें हमारी शारीरिक भाषा से ही संबंध रखती है। हम यदि शारीरिक भाषा का ज्ञान रखते हैं तो किसी के बसे हुए काल्पनिक संसार को उजड़ने से बचा सकते हैं।

     हर इंसान को मस्तिष्क से ऐसे संकेत मिलते रहते हैं जो मन की भावनाओं को सारे शरीर के अंदर बिजली के करंट की तरह घुमाते रहते हैं। वही भाव इंसान के शारीरिक अंगों में स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। मगर इनकी अपनी एक भाषा है।

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