हमारे अंग स्वयं बोलते हैं

Hamara Shareer Bolta Hain

इस टाईटल को पढ़ने के बाद आप सबके मन में एक ख्याल तो जरूर आ रहा होगा कि मानव शरीर के अंग अपने आप कैसे बोलने लगते हैं।    वैसे इसमें आश्चर्यचकित होने की कोई बात नहीं है। वैसे तो मानव शरीर जन्म लेते ही बोलने लगता है, फिर अगर उम्र बढ़ने के साथ-साथ उसके अंग भी बोलने लगें, तो इसमें आश्चर्य की कौन-सी बात है?

उदाहरण के लिए देखें, जब दो व्यक्ति आपस में हाथ मिलाते हैं, उनमें से अगर एक व्यक्ति बुझे मन से दूसरे व्यक्ति से हाथ मिलाता है तो उसका हाथ बहुत बेजान सा होगा। उसमें कोई गर्मजोशी नजर नहीं आएगी, जबकि दूसरा व्यक्ति जो खुशी से हाथ मिलाता है उसके हाथ की पकड़ बहुत मजबूत होगी।

बुझे मन से हाथ मिलाने की भाषा हमें यह साफ बता देती है कि वह व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से हाथ मिलाकर खुश नहीं है और केवल दिखावे के लिए ही उससे हाथ मिला रहा है। जो काम उस व्यक्ति ने उसे बताया है वह या तो करेगा ही नहीं और यदि करेगा भी तो उसमें उसे कोई विशेष सफलता नहीं मिलेगी। वह मुंह से तो इस काम के लिए इंकार नहीं कर रहा, मगर उसके शरीर की भावनाएं जो ढीले हाथ के द्वारा प्रकट हो रही हैं उनका अर्थ यही है कि वह उस काम को नहीं करना चाहता।

इसके विपरीत जब दोनों के हाथ मिलाने में जोश होता है तो हमें यह जान लेना चाहिए कि दोनों के हाथ इस बात के साक्षी है कि जो काम वे करना चाहते हैं, वे उसे पूरा करने के लिए मन से कोशिश करेंगे और उसमें सफलता भी प्राप्त करेंगे।

दोनों के हाथों में जो जोश होता है और भावना होती है, वह सच्चे मन से प्रकट होती हैं। इसी में उनकी सफलता का रहस्य छिपा हुआ है। हम इन हाथों की भाषा से उनके मन की बात जान सकते हैं क्योंकि उनके मन की भावनाओं का सीधा सम्पर्क इन हाथों से रहता है।

आपके मन में क्या है, आप भले ही इसे खोलकर न बताएं मगर आपके शरीर के अंग खुद ब खुद ही उसे प्रकट कर देंगे। उदाहरण के लिए जाने-अंजाने में जब हमसे कभी कोई गलत काम हो जाता है या हम कोई बुरा काम कर बैठते हैं तो हमारे चेहरे पर घबराहट और डर साफ-साफ झलकने लगता है, जैसा कि आपने देखा होगा कि यदि कोई 4-5 साल का बच्चा झूठ बोलता है तो उस पर एक मनोवैज्ञानिक दबाव सा पड़ता है।

उसका मन यह जानता है कि उसने झूठ बोलकर बहुत बड़ी भूल की है मगर वह अपनी जुबान से इस भूल को स्वीकार नहीं करता क्योंकि उसने तो झूठ बोला है, जो एक गलत काम है, परंतु उसके मन से जब आवाज आती है कि यह झूठ है और झूठ बोलना पाप है।

तब इस ख्याल के आते ही वह बच्चा झट से अपने दोनों हाथों से अपने मुंह को ढांप लेता है। इस चित्र में एक ऐसी बच्ची दिखाई गई है जिसने झूठ बोला लेकिन जब उसके मन से आवाज आई कि झूठ बोलना गलत काम है तो उसने अपने मुंह पर हाथ रख लिए जैसे कि वह कह रही हो मैने ये क्या कर दिया।

बस। इसी डर के कारण उसके हाथ और मुंह दोनों ने अपना कार्य शुरू कर दिया। मुंह से उसने झूठ बोला, हाथों ने उसका मुंह बंद करने का प्रयास किया, यह सब कैसे हुआ?

मन की आवाज बॉडी लेंगुएज बनकर उस बच्ची के अंगों पर लिखी गई जिसे वही पढ़ सकता है जो बॉडी लेंगुएज विज्ञान के बारे में पूरी जानकारी रखता है।

यहां एक बात पर और ध्यान देने की जरूरत है कि बच्चे की बॉडी लेंगुएज और किशोर की बॉडी लेंगुएज में भी अंतर होता है। इस बात को बहुत कम लोग ही समझ पाते हैं क्योंकि यह मनोवैज्ञानिक प्रभाव की बात है।

मानव शरीर के अंदर जो भी प्रभाव उसके मन पर पड़ता है उसके ही परिणाम स्वरूप जो विचार उत्पन्न होते हैं, उन विचारों की शक्ति से ही हमारे शरीर के अंग काम करने लगते हैं और यह विचार आयु के अनुसार ही अपना प्रभाव डालते हैं।

ऊपर दिए गए चित्र में आप एक बच्ची के झूठ बोलने पर उसके बॉडी लेंगुएज द्वारा उसे पहचान चुके हैं कि उसके मन पर ऐसी गलती करने पर क्या प्रभाव पड़ा है।

अब इस चित्र में देखें, इसमें आप जिस किशोरी को देख रहे हैं, उसके हाथ की 2 अंगुलियां आधे होंठों को ढके हुए हैं। उसकी आंखों में आश्चर्य तो साफ झलक रहा हैं, मगर उसकी आंखों की पुतलियां आश्चर्य से मस्तिष्क की ओर नहीं चढ़ गई है।

जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उसे इस झूठ पर पश्चाताप तो है मगर कोई इससे उसकी अंतरआत्मा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वह मानती है कि उससे गलती हुई है मगर उसकी नजर में यह कोई इतनी बड़ी गलती नहीं है, जिसके लिए उसे डरना पड़े।

इस किशोरी ने भी झूठ ही बोला, मगर चूंकि इसकी आत्मा उस बच्चे की तरह पवित्र नहीं है। इसलिए इसके मन पर इस झूठ का इतना प्रभाव नहीं पड़ा, जितना कि उस बच्ची पर पड़ा था क्योंकि आयु के हिसाब से किशोरी में सहनशक्ति भी बढ़ गई।

जहां पर छोटी बच्ची ने अपने दोनों हाथों से मुंह को ढक लिया था वहीं पर इस किशोरी ने केवल एक ही हाथ से अपने आधे मुंह को ढका है। उस बच्ची के आंखों में डर साफ-साफ झलक रहा था लेकिन इस किशोरी की आंखों में उतना डर नहीं है। दोनों चित्रों को परखकर किशोरी और बच्ची दोनों की ही आंखों को। इनकी आंखों की भाषा कितनी साफ पढ़ी जा सकती है।

इन दोनों चित्रों की भाषा मिलती-जुलती सी लगती है मगर इनके अर्थ में जो अंतर आता है, वह सिर्फ इन दोनों की आयु का अंतर है। छोटे बच्चे के मन में किसी भी पाप के बोझ को सहन करने की शक्ति नहीं होती मगर जैसे-जैसे उसकी आयु बढ़ती जाती है वैसे-वैसे उसकी आत्मा की शक्ति भी बढ़ती जाती है।

मन पर भी वह थोड़ा काबू पा लेता है। उसका डर कम हो जाता है। उसे झूठ बोलना इतना बड़ा पाप नहीं लगता, जितना कि उसे बचपन में लगता था।

इस विषय को लेकर बॉडी लेंगुएज विज्ञान के प्रसिद्ध लेखक Allan Pease ने अपनी पुस्तक में लिखा हैं-

उनके विचारों से यह बात साफ हो जाती है कि व्यक्ति की आयु का प्रभाव उसके विचारों पर भी पड़ता है। वही विचार अलग-अलग शक्लों में उसके शरीर में पढ़े जा सकते हैं। बचपन और किशोर आयु के व्यक्तियों में किसी भी झूठ को हजम करने की शक्ति नहीं होती, मगर इसके विपरीत प्रौढ़ावस्था में पहुंच चुके लोगों के झूठ बोलने का अपना अंदाज होता है।

देखें इस चित्र में एक प्रौढ़ व्यक्ति ने जब झूठ बोला तो उसके मन की भावनाएं उसके चेहरे पर भाषा बनकर उभरी और साथ ही उसका हाथ उसके होंठों पर गया और उसने केवल एक ही अंगुली से अपने होठों को आधा ढक लिया।

उसकी आंखों की चमक, चेहरे पर थोड़ी सी गंभीरता और सोचने का अंदाज और दोनों कंधों का तनाव, यह सब उसकी बॉडी लेंगुएज है, जिन्हे देखकर हम उसके मन की भावनाओं को जान सकते हैं लेकिन यह तभी संभव हो सकता है जब हमें बॉडी लेंगुएज का ज्ञान हो।

वैसे इन तीनों चित्रों में हम इंसानों के आधे ही शरीर को देख रहे हैं जिन्होंने एक ही गुनाह किया है-यानी झूठ बोला है मगर इन तीनों के चेहरों और शरीर के अंगों में कितना अंतर है।

इस अंतर का कारण क्या है? इन तीनों के शरीर एक जैसे नजर क्यों नहीं आते? झूठ तो तीनों ने ही बोला है लेकिन ऐसी कौन-सी शक्ति है जिसने इन तीनों को एक जैसा अपराध करने पर भी एक-दूसरे से अलग कर दिया है।

आम लोगों के लिए यह बात समझना थोड़ा मुश्किल काम है  उसे तो यही सोचना होगा कि हमारे बॉडी लेंगुएज क्या कहती है? हमने एक ही बात के तीन रूप कैसे देखे और फिर तीन रूपों को अलग-अलग देखकर एक ही नतीजे पर कैसे पहुंचे।

इन सब प्रश्नों का उत्तर मनोवैज्ञानिक प्रभाव के साथ ही जुड़ा हुआ है। इसमें भी कोई संदेह नहीं कि हमारी आयु के साथ ही हमारी बॉडी लेंगुएज का रूप भी बदलता रहता है। इस विषय में बॉडी लेंगुएज के एक प्रसिद्ध विद्वान के विचार इस तरह से हैं-

“हमारा चेहरा हमारे दिल से उठने वाली भावनाओं को प्रकट करता है लेकिन जो लोग बड़ी आयु के हैं वे अपने मस्तिष्क से जो आदेश प्राप्त करते हैं उनका अर्थ भी अच्छी तरह से निकाल सकते हैं मगर जब कोई 5 वर्ष का बच्चा अपने मन की भावनाओं को प्रकट करता है तो उसके चेहरे में काफी अंतर होता है।

ऐसा ही अंतर युवा वर्ग के लोगों और प्रौढ़ावस्था में चल रहे लोगों में आ जाता है। इसके लिए तीनों वर्ग के लोगों को हमें अलग-अलग नजरिये से देखना पड़ेगा।”

Leave a Reply

error: Content is protected !!