हिन्दू पंचांग अथार्त हिन्दू कैलेंडर क्या है?

Hindu Calendar Panchang

हिन्दू पंचांग तिथि कैलेण्डर (Hindu Calendar)

नक्षत्र, तिथि, कर्ण (संख्या), योग और तिथि अथवा वार आदि अर्थात इन पांच भागों को मिलाकर हिंदू कैलेंडर (Hindu Calendar) बनाया जाता है और इसे पंचाग के नाम से भी जाना जाता है।

हिंदू कैलेंडर दो तरह की विधियों को अपनाकर बनाया जाता है, पहला चंद्रमा के द्वारा धरती के चारों तरफ चक्कर काटने की गति पर निर्भर करता है और दूसरा धरती के द्वारा सूरज का चक्कर लगाने की गति पर निर्भर करता है। हिंदूओं के नए साल के पहले दिन कर्नाटक में युगादि, महाराष्ट्र में गुढ़ी पाडवा, केरल तथा कर्नाटक के तटीय इलाकों में विशु, पश्चिमी बंगाल में वैसाकी, पंजाब में होने वाले वैसाखी का त्यौहार और इसी तरह से और दूसरे देशों में अलग-अलग त्यौहारों को मनाया जाता है। चंद्रमा के अनुयायियों के लिए चंद्रमान युगादि तथा सूरज के अनुयायियों के लिए स्वर्णमान युगादि कहलाता है।

चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीष, पौष, माघ तथा फाल्गुन ये बारह महीनें चंद्र कलेंडर में माने जाते हैं। सभी महीनें को दो हिस्सों में बांटा जाता है, जिनमें से सभी में चौदह से सौलह दिन होते है, जैसे-

  • शुक्ल पक्ष- अमावस्या से पूर्णिमा तक।
  • कृष्ण पक्ष- पूर्णिमा से अमावस्या तक।




Hindu Calendar के अनुसार हर साल मार्च से लेकर अप्रैल मास तक एक दिन चंद्रमान युगादि होता है। सूरज के कलैंडर में भी बारह महीनें ही माने जाते हैं जैसे मेष. वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ तथा मीन। स्वर्णमान युगादि अधिकतर सभी साल चौदह अप्रैल को पड़ते हैं।

अन्य विस्तार के तथ्य जैसे- तिथि, वार (दिन), नक्षत्र (ताराओं का समूह), करण (संख्या में 11), योग (संख्या में 27) पर भी दोनों तरह के पंचांग को बनाते समय इस पर सोच-विचार किया जाता है। जिस तरह से सभी लोग इस बात को जानते हैं कि एक सप्ताह में सात दिन गिने जाते हैं, जो कि राहु ग्रह और केतु ग्रह को निकालकर सात ग्रहों के नाम से जाने जाते हैं।

इसी तरह से Hindu Calendar में एक साल को भी दो हिस्सों में विभाजित (बांटा) गया है, जैसे कि- उत्तरायण तथा दक्षिणायण। इनका भी सभी वस्तुओं के लिए बहुत ही ज्यादा महत्व होता है। यही वजह होती है कि पूर्व दिशा के साथ उत्तर-पूर्व दिशा और दक्षिण-पूर्व दिशाओं को भी बहुत ही ज्यादा महत्व दिया जाता है। सूरज हर साल छः महीने जैसे कि- चौदह जनवरी से पंद्रह जुलाई तक पृथ्वी के उत्तरी हिस्से पर गतिशील रहता है और उसे उत्तरायण के नाम से जाना जाता है तथा बाकी के बचे छः महीनें जैसे कि- सोलह जुलाई से चौदह जनवरी तक पृथ्वी के दक्षिणी हिस्से पर गतिशील रहता है, जिसको दक्षिणायण के नाम से जाना जाता है। परंतु अंग्रेजी के कलेंडर के अनुसार इक्कीस दिसंबर से बीस जून तक उत्तरायण और इक्कीस जून से बीस दिसंबर तक दक्षिणायण होता है। उत्तरायण में दिन का समय ज्यादा जाना जाता है तथा रात के समय में कम तथा दक्षिणायण में बिल्कुल इसके उल्टा होता है।

छः ऋतुएः- हिंदू कैलेंडर (hindu calendar) के अनुसार छः ऋतुए मानी जाती है, सभी ऋतुएं दो महीने तक चलती है।

ये छः ऋतुएं निम्नानुसार बताई जा रही है जैसे-

क्रम संख्यां ऋतुएं चंद्र के महीने अंग्रेजी में
1. वंसत चैत्र से वैशाख मार्च से मई
2. गर्मी ज्येष्ठ से आषाढ़ मई से जुलाई
3. बारिश श्रावण से भाद्रपद जुलाई से सितंबर
4. शरद आश्विन से कार्तिक सितंबर से नवंबर
5. हेमंत मार्गशीष से पौष नवंबर से जनवरी
6. शिशिर माघ से फाल्गुन जनवरी से मार्च

जिस तरह से छः ऋतुएं होती है उसी तरह से एक साल में चार मौसम भी माने जाते हैं जैसे कि बताया गया है-

क्रमः मौसम अंग्रेजी में
1. वंसत (Spring) 21 मार्च से इक्कीस जून तक
2. गर्मी (Summer) इक्कीस जून से बाईस सितंबर तक
3. पतझड़ (Autumn) बाईस सितंबर से बाईस दिसंबर तक
4. शरद (सर्दी) (Winter) बाईस दिसंबर से इक्कीस मार्च तक



तिथि (तारीख)- Hindu Calendar में बताया गया  है कि सूरज तथा चंद्रमा के बीच में दिखाई देने वाली दूरी के तीस हिस्सों (भाग) होते हैं और इसलिए इनको तिथि के नाम से जाना जाता है। जब वे सारी एक जैसी रेखा में दिखाई देती है, उस समय नया चंद्र दिन जाना जाता है और जब वे एक-दूसरे से अलग होती है, तो पूरा चंद्र दिन होता है। सभी तारीख एक दूसरे से बारह डिग्री पर होती है तथा शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष, इन दोनों में पंद्रह तिथियां जानी जाती है।

शुक्ल पक्ष- अमावस्या से पूर्णिमा तक प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्ठमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुदर्शी तथा पूर्णिमा, ये सब आपस में बारह डिग्री पर स्थित होते हैं।

कृष्णपक्ष- पूर्णिमा से अमावस्या तकः- प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्ठमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुदर्शी तथा अमावस्या, ये सब आपस में बारह डिग्री पर स्थित होते हैं।

मकान बनवाते समय के शुरुआती बिंदु से लेकर मकान के ग्रह प्रवेश तक के किसी भी तरह के महत्वपूर्ण मौके के लिए अच्छे मुहूर्त (शुभ मुहूर्त) को निकालने के लिए पंचांग (कलेंडर) के साथ-साथ जन्मपत्री की भी जरूरत पड़ती है। जिस किसी व्यक्ति को इसके बारे में अच्छी जानकारी नहीं होती है, वह व्यक्ति इसके बारे में सही तरीके से समाधान नहीं निकाल सकता है, आखिर में उस व्यक्ति को किसी अच्छे जानकार विद्वान-पंड़ित से मदद लेनी चाहिए।

योग- सूरज, चंद्र और तारा, इन तीनों समुदाय के एक विशेष अवस्था के होने से पैदा होने वाले प्रभाव के परिणामस्वरूप योग बनता है।

इन योगों की संख्या 27 मानी जाती है, जो निम्नलिखित होती है-

1. विष्कंभ, 15. वज्र,
2. प्रीति, 16. सिद्धि,
3. आयुष्मान, 17. व्यतिपात,
4. सौभाग्य, 18. वरीयान,
5. शोभन     , 19. परिध,
6. अतिगंड, 20. शिव,
7. सुकर्म, 21. सिद्ध,
8. घृति 22. साध्य,
9. शूल, 23. शुभ,
10. गंड, 24. शुक्ल,
11. वृद्धि, 25. ब्रह्ना,
12. ध्रुव, 26. ऐन्द्र,
13. व्याघात, 27. वैधृति।
14. हर्षण,

करण (संख्या)- Hindu Calendar अथार्त पंचाग के अनुसारतिथि, वार, तारा समुदाय (नक्षत्र) की एक विशेष अवस्था के पड़ने वाले असर (प्रभाव) को करण के नाम से जाना जाता है। एक तारीख या तिथि में दो करण होते हैं यानी कि महीने की तीस तारीखों में साठ करण माने जाते हैं। अगर इस तरह से देखा जाए तो ग्यारह करण होते हैं जैसे-

1. बव, 7. विष्टि (भद्र),
2. बालव, 8. शकुनी,
3. कौलव, 9. चतुष्मद,
4. तैतुल, 10. नाग,
5. गरज 11. किंस्तुघ्न।
6. वणिज,

हिंदू वर्ष (संवत्सर)- हिंदुओं के साठ साल निम्नानुसार माने जाते हैं जैसे-

1. प्रभव 2. विभव 3. शुक्ल 4.प्रमुदत्त
5. प्रज्ञह्तपति 6. अंगिरस 7. श्रीमुख 8. भाव
9. युव 10.धातु 11. हीविलाम्बी 12. विलम्बी
13. विकारी 14. शारवरि 15. प्लव 16. शुभाकृतु
17. शोभाकृतु 18. क्रोधी 19. विश्वावसु 20. पराभव
21. ईश्वर 22. बहुधान्य 23. प्रमादी 24. विक्रम
25. विशु 26. चित्रभानु 27. श्वाभानु 28. पार्थिवि
29. व्याव्य 30.. सर्वजितु 31.. सर्वधारि 32. तारना
33. विरोधी 34. विकृति 35. खर 36. नन्दन
37. विजय 38. जय 39. मन्मथ 40. दुर्मुखी
41. प्लवंग 42. कीलक 43. सौम्य 44. साधारण
45. विरोधीकृत 46. परीधावी 47. प्रमादीक्षा 48. आनन्द
49. राक्षस 50. नल 51. पिंगल 52. कालयुक्ति
53.सिद्धार्थी 54. रौद्रि 55. दुर्मति

56. रुधिररोधगारी

57. दुदुंभि 58. रक्ताक्षी 59. क्रोधान 60. अक्षय

वास्तु शास्त्र की सम्पूर्ण जानकारियां

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  8. वास्तु का व्यक्ति के जीवन पर प्रभाव
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