हिन्दू धर्म में गृहस्थ जीवन और धर्मशास्त्र महत्व

हिन्दू धर्म में गृहस्थ जीवन और धर्मशास्त्र का क्या महत्व है?

धर्मशास्त्रों के उद्धरण

कहा जाता है कि अगर पूरा भारतवर्ष खत्म हो जाता है तो इस संसार में सब आध्यात्मिकता, नैतिकपूर्णता, सारी आदर्शवादिता और धर्म (Dharma) के लिए पूरे के पूरे आध्यात्मिक मधुरता खत्म हो जाएगी तथा उसकी जगह पर काम-वासना तथा विलासिता की द्वैत्यामकता दो देवियों की तरह धन को अपना पंड़ित लगाकर राज्य करेगी, जालसाजी, ताकत तथा अनुचित प्रतियोगिता के अनुष्ठान होंगे और उनमें मानव आत्मा की बली दी जाएगी। इसलिए इस तरह का इस संसार में कभी होने ही मत दो। भारत को अवश्य ही तरक्की करनी होगी, परंतु शारीरिक ताकत से नहीं, बल्कि आध्यात्मिकता से, विनाश से नहीं बल्कि शांति तथा प्रेम का झड़ा फहरा कर। लोगों में आपस में लड़ाई-झगडे करवा कर नहीं, बल्कि उनमें आपस में एकता लाकर। इसके बारे में ऋग्वेद (Rig Veda) में भी कहा गया है कि तुम सब मिलकर एक ही मन के बनो तथा तुम सबके एक ही विचार होने चाहिए। हमें एक आदर्श राज्य बनाना चाहिए जिसमें वैदिक युग के बारे में जानकारी, संस्कृति तथा रीति-रिवाज (customs and traditions) हों, अनुशासन, लगन और सेना की तरह कर्त्तव्य निभाने की भावना होनी चाहिए और जिसमें व्यापारिक संसार की बुराईयों के बिना उसकी वितरण भावना तथा समानता का आदर्श होना चाहिए। हमें अपनी गहरी नींद को छोड़कर तथा जागृत होकर यह दिखाना है कि हमारी धरती मां दुबारा से ताकत से परिपूर्ण होकर अपने शाश्वत सिंहासन पर बैठे और पहले से भी ज्यादा गौरव को प्राप्त करें।

शुद्ध तथा अच्छे नियमों का पहला स्रोत वेद को माना जाता है तथा इसके बाद रीति-रिवाज और शुद्ध तथा पवित्र व्यक्तियों एवं वेदों की जानकारी रखने वाले व्यक्तियों का स्वभाव तथा आत्म-संतोष। सतयुग का मुख्य गुण कठिन मेहनत करना तथा तपस्या करना, त्रेता युग का दिव्य ज्ञान पाना, द्वापर का त्याग करना और कलयुग का दान करने के बारे में कहा गया है।

हमारे पूजे जाने वाले भगवान ने इस संसार की सुरक्षा करने के लिए अपने शरीर से पैदा होने वाले सभी व्यक्तियों के लिए अलग-अलग तरह के कर्तव्य तथा अलग-अलग कार्यों को निर्धारित किया है। धर्मग्रंथ में (dharmagranth)  शुद्ध सिद्धान्तों के बारे में अच्छी तरह से बताया गया है तथा इसके साथ ही मनुष्य के अच्छे कार्यों या कर्मों तथा गंदे कामों के बारे में बताते हुए सभी के द्वारा पालन करने योग्य स्वभाव का अविस्मरणीय सिद्धान्त भी बताया गया है। जो व्यक्ति या पुरुष धर्मग्रंथों में बताए गए सिद्धान्तों का सही तरह से पालन करता है, वह व्यक्ति इस संसार में कीर्ति पाता है और मर जाने के बाद बहुत ही ज्यादा सुख भी प्राप्त करता है। श्रुति का मतलब वेदों से होता है और स्मृति (रीति-रिवाज) का शुद्ध सिद्धान्त की संहिता से। इन दोनों के द्वारा ही शुद्ध सिद्धान्तों की अभिव्यक्ति होती है, इसलिए उनके बारे में किसी भी तरह की कोई बात नहीं होनी चाहिए।




शुरुआत और ब्रह्नाचर्य-

  1. किसी व्यक्ति के यहां जब अपना बच्चा जन्म लेता है तो उस बच्चे के जन्म लेने के दसवें अथवा बारहवें दिन बच्चे का नामकरण संस्कार करना चाहिए। बच्चे का नामकरण किसी अच्छे चंद्रदिवस पर अच्छे मुहूर्त और अच्छे नक्षत्र में किया जाता है। चौथे महीने में नवजात बच्चे का पहली बार अपने घर को छोड़ कर जाना वाला निष्क्रमण करना चाहिए, नवजात शिशु को छठे महीने में पहली बार अन्न या चावल आदि को खाने के लिए देना चाहिए तथा परिवार के रीति-रिवाज के अनुसार ही अन्य शुभ समारोह आदि करने चाहिए।
  2. आध्यात्मिक लाभ (Spiritual benefits) के लिए नवजात शिशु के पहले तथा तीसरे साल में सिर के बाल (मुंडन) कटवाने चाहिए तथा आठवें, ग्यारहवें अथवा बारहवें साल में परिवार के रीति-रिवाज के अनुसार ही बच्चे की शिक्षा-दीक्षा का संस्कार करवाना चाहिए। विशिष्टता पाने की चाहत होने पर इसे जन्म के होने के बाद पांचवें, छठे अथवा आठवें साल में भी शिक्षा-दीक्षा दी जा सकती है।
  3. दीक्षा पाने वाले बच्चे को बनाए गए सिद्धान्तों के आधार पर ही सबसे पहले अपनी मां अथवा अपनी बहन या फिर अपनी मामी या और अन्य स्त्री से भिक्षा मांगनी चाहिए। जिस किसी भी स्त्री से वह बालक भिक्षा मांगता है उस स्त्री को भिक्षा देने के लिए मना नहीं करना चाहिए तथा उसको भिक्षा दे देनी चाहिए। सभी व्यक्तियों के जरूरत के अनुसार खाना खा लेने के बाद उस बालक को अपने गुरु को बता करके तथा उनसे खाना खाने की अनुमति लेकर पूर्व दिशा की तरफ अपना मुंह करके खाना खाना चाहिए तथा खाना खाने के बाद पानी पीकर अपने आपको शुद्ध कर लेना चाहिए।
  4. उस बालक को हमेशा ही खाना खाने से पहले पूजा करनी चाहिए तथा उसको बगैर किसी बात के खाना खा लेना चाहिए। उस खाने को देखकर उसे खुश होना चाहिए तथा अपने हंसते (मुस्कराते) हुए मुंह से भगवान से यह प्रार्थना करनी चाहिए कि हे भगवान वह हमेशा ही खाना खाने के प्रति स्वस्थ रहना चाहिए। जिस खाने की हमेशा ही पूजा की जाती है यानी कि उस खाने को प्यार तथा खुशी से खाया जाता है, वह खाना ताकत तथा पौरुष शक्ति (Virgin power) को प्रदान करने वाला होता है, परंतु अनादर से खाया जाने वाला भोजन खाने वाले तथा खाने दोनों को ही नुकसानदायक होता है। भूख से ज्यादा खाना स्वास्थ्य, प्रसिद्धि, स्वर्ग से मिलने वाले आनंद तथा आध्यात्मिक शक्ति को भी नुकसान देता है।
  5. वेद पाठ की शुरुआत तथा आखिरी में ॐ का उच्चारण करने से अच्छी तरह से समझ में आ जाता है और वह याद भी रहता है। कुश पर पूर्व दिशा की तरफ मुख करके बैठने के बाद तीन बार कुंभक प्रणाम करने के बाद शिक्षा पाने वाले बच्चों को ॐ शब्द का उच्चारण करना चाहिए। जो बालक अपने से बड़ों को साक्षात प्रमाण करता है तथा उनका बराबर से सम्मान करता है, उन बच्चों को लंबी उम्र, ज्ञान, कीर्ति तथा ताकत मिलती है। गाड़ी में जाने वाले व्यक्ति, 90 साल की उम्र के व्यक्ति, स्त्री, रोग से पीड़ित रहने वाले व्यक्ति, वजन को उठाने वाले व्यक्ति, दूल्हे, भगवान को न मानने वाले व्यक्ति को इस तरह के रास्ते नहीं अपनाने चाहिए।
  6. ब्रह्नाचर्य व्यक्ति को रोजाना ही हवन करना चाहिए, उसको भिक्षा मांगनी चाहिए, उसको जमीन पर सोना चाहिए तथा अपने गुरु के लिए जो भी लाभदायक हो वह उस व्यक्ति को करना चाहिए। इस तरह के काम उस व्यक्ति को जब तक करने हैं जब तक कि वह व्यक्ति अपने घर में वापिस जा करके समावर्तन नहीं करता है।
  7. जब तक किसी व्यक्ति से कुछ भी न मालूम किया जाए, तब तक उस व्यक्ति को किसी को कुछ भी नहीं बताना चाहिए। या फिर जो व्यक्ति बिना वजह से प्रश्न के बारे में मालूम करता है उस व्यक्ति को कोई जबाब नहीं देना चाहिए, समझदार व्यक्ति को दूसरे लोगों के साथ एक मूर्ख व्यक्ति की तरह घूमना चाहिए और प्रश्न के जबाव के बारे में मालूम होने के बाद भी दूसरे व्यक्ति को कुछ भी नहीं बताना चाहिए। ये दोनों व्यक्ति जो अनाधिकार रूप से किसी वस्तु के बारे में चर्चा करते हैं और वह जो अनाधिकारी होकर जबाब पूछते है, उनमें से एक अथवा दोनों की ही मृत्यु हो जाती है या फिर किसी दूसरे व्यक्ति से दुश्मनी कर लेते हैं।
  8. जहां गुण तथा धन पढ़ाई के द्वारा नहीं प्राप्त किये जाते और न किसी की आज्ञा के पालन के द्वारा प्राप्त किये जा सकते हैं, वहां ज्ञान उस तरह से नहीं देना चाहिए, जिस तरह से एक बंजर जमीन में अच्छा बीज नहीं डाला जा सकता है। वेद का ज्ञान (Knowledge of the Vedas) देने वाले व्यक्ति को संकट के समय में भी अपने ज्ञान को कुपात्र देने की बजाय अपने ज्ञान के साथ ही मर जाना अच्छा होता है।
  9. जिस तरह से अपने बच्चों को जन्म देने के लिए माता-पिता जो परेशानी तथा तकलीफ सहते हैं, उस परेशानी तथा तकलीफ की सौ सालों तक भी भरपाई नहीं की जा सकती है। उस संतान को उसी तरह से करना चाहिए जिससे कि उसके माता-पिता को प्रसन्नता मिलती हो तथा जिससे उस बच्चे के गुरु को खुशी मिलती हों। जब ये तीनों ही खुश होते हैं तो उसे भी वे सभी तरह की खुशियां मिल जाती है तो किसी घोर तपस्या के करने पर मिलती है।
  10. कहा गया है कि जहर से भी अमृत मिल जाया करता है, बच्चे से भी अच्छी सलाह-मशविरा मिल सकता है, दुश्मन तक से अच्छे व्यवहार का पाठ पढ़ा जा सकता है या अच्छी शिक्षा भी ली जा सकती है तथा अपवित्र सामान से सोना भी प्राप्त किया जा सकता है। नई-नई जानकारियां, अच्छी स्त्रियां, अच्छे कानून या विधियां का ज्ञान, शुद्धता का सिद्धान्त, अच्छी सलाह-मशविरा और अलग-अलग तरह की कलाएं को किसी से भी ली जा सकती है।
  11. मन को लुभाने वाली कामुक वस्तुओं के सामने तो इन्द्रियां भी निरंकुश हो जाती है, इसलिए अच्छे समझदार तथा बुद्धिमान व्यक्तियों को अपनी इंद्रियों को उसी तरह से अपने वश में करना चाहिए, जिस तरह से एक सारथी अपने घोड़ों को अपने वश में रखता है। अपनी इन्द्रियों पर (विषय वासना के सुख के लिए) आसक्ति की वजह से व्यक्ति अवश्य ही पाप का भोगी बनेगा, परंतु अगर वह व्यक्ति अपनी इंद्रियों को पूरी तरह से अपने वश में रखता है तो उस व्यक्ति को अपने सभी कार्यों के लक्ष्यों में कामयाबी अवश्य ही मिल जाएगी।
  12. अगर किसी व्यक्ति को उसके माता-पिता, गुरु और उसके बड़े-भाई आदि के द्वारा कभी-कोई गंभीर चोट पहुंचती है तो उस व्यक्ति को इस तरह से होने पर अपने आप में बेइज्जती महसूस नहीं करनी चाहिए। क्योंकि गुरु को ब्रह्ना की मूर्ति का रूप दिया गया है, पिता को प्रजापति का, माता को धरती मां का तथा बड़े भाई को अपने आपकी मूर्ति का रूप दिया गया है। वह व्यक्ति जो अपने परिवार के बन जाने के बाद भी इनकी उपेक्षा नहीं करता है, उस व्यक्ति ने समझो कि तीनों लोक (संसार) में विजय प्राप्त कर ली और देवता की तरह ही वह भी तेजस्वी बन जाएगा तथा स्वर्ग की तरह ही सुख प्राप्त करने वाला बन जाएगा।




गृहस्थी-

  1. पिता, भाई, पति तथा देवर जो कि कल्याण की कामना रखते हैं, उन्हें स्त्रियों का मान-सम्मान करना चाहिए। जिस जगह या जिस घर में स्त्रियों का मान-सम्मान (Respect) किया जाता है, कहते हैं कि स्वयं उस घर में देवता भी निवास करते हैं तथा उस घर में खुश रहते हैं। परंतु जिस घर या जिस स्थान पर स्त्रियों की इज्जत नहीं की जाती है, वहां पर किसी भी तरह का कोई पवित्र धार्मिक अनुष्ठान का अपना कोई अच्छा लाभ नहीं मिलता है। जिस परिवार की स्त्रियां हमेशा परेशान या दुखी रहती है, वह पूरा ही परिवार बहुत ही जल्दी बिखर जाता है, परंतु जिस परिवार में स्त्रियां खुश रहती है, वह परिवार हमेशा ही सुखी-संपन्न माना जाता है।
  2. जिस किसी भी परिवार में पति अपने पत्नी से ज्यादा खुश रहता है और पत्नी अपने पति से, उस परिवार में अवश्य ही ज्यादा खुशियां नजर आती है।
  3. विवाह-शादी के शुभ अवसर पर जलाई जाने वाली आग की ज्योति से एक ग्रहस्थ नियमानुसार ग्रहस्थी के अनुष्ठान तथा पांच यज्ञ (अथवा बलिदान) करता है और उससे अपने परिवार के रोजाना के पेट को भरने का कार्य करता है।
  4. एक गृहस्थ व्यक्ति के लिए जो रोजाना ही व्यक्तिगत तरीके से वेदों के पाठों को पढ़ता है, देवताओं को कोई ना कोई भेंट आदि चढ़ाता है, जो व्यक्ति यज्ञों को करने में चतुर या कुशल होता है, वह धन तथा संपत्ति सभी तरह के व्यक्तियों की सहायता करता है। आग को सही तरीके से दी गई सामग्री सूरज के पास पहुंचती है, वह सूरज बारिश पैदा करता है तथा उस बारिश से खाना मिलता है तथा उस भोजन से सभी व्यक्ति तथा प्राणी अपने जीवन को जीते हैं।
  5. एक अच्छे गृहस्थ जीवन में चार तरह की वस्तुएं हमेशा ही मिल जाती है जैसे कि- कुश, आराम करने के लिए कमरा, पानी तथा प्यार से बोलने वाली मीठी बोली। वह देवताओं, ऋषियों, व्यक्तियों, पूर्वजों तथा अपने कुल देवता आदि को सम्मान पूर्वक भोग लगाने के बाद जो बाकी बचा हुआ रह जाता है, उसको ही खाता है।

गृहस्थ जीवन तथा उसको निर्वाह करने के लिए उपाय-

  1. किसी व्यक्ति को अपने परिवार का पालन-पोषण करने के लिए इस तरह के साधन को जरूर ही ढूंढना चाहिए जिससे कि वह दूसरों को किसी तरह की कोई परेशानियां न पहुंचाए अथवा कम से कम दूसरों को पीड़ा हो। उसे सिर्फ मुसीबत के समय को छोड़कर अपने जीवन में इसी साधन को जुटाने में हमेशा ही लगाए रखना चाहिए। उसको अपने जीवन की कम से कम जरूरतों को पूरा करने के लिए अपने लिए सोचे गए अच्छे व्यापार करके धन को इकट्ठा करना चाहिए। लेकिन इस तरह का काम करते समय उसको अपने शरीर की तरफ भी ध्यान रखना बहुत ही जरूरी होता है तथा उसको अपना शरीर ज्यादा थकाना नहीं चाहिए तथा उसे अपने शरीर को थोड़ा सा आराम भी देना बहुत ही जरूरी होता है। किसी भी व्यक्ति को अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए कभी-भी संसार के गलत तरीकों (जिसके द्वारा दूसरों को तकलीफ पहुंचती हो) को अपनाना नहीं चाहिए। उसको पवित्र, साफ तथा ईमानदारी से अपने सम्पूर्ण जीवन को बिताना चाहिए।
  2. जो व्यक्ति सुख के बारे में लालसा रखता है, उस व्यक्ति को अपना मन वश में रखना चाहिए तथा पूरी तरह से अपने को संतुष्ट रखने की कोशिश करनी चाहिए। चाहे किसी वजह से कोई व्यक्ति ज्यादा धन-संपत्ति वाला हो या वह किसी परेशानी आदि से पीड़ित हो, उसे व्यक्तियों को नुकसान करने वाले तरीके से धन नहीं कमाना चाहिए, न ही गलत व्यावसायों के द्वारा धन कमाना चाहिए। किसी भी व्यक्ति की भेंट को, चाहे वह किसी भी तरह की क्यों न हों, उसे नहीं लेनी चाहिए।
  3. किसी भी व्यक्ति को अपने सुख की लालसा के लिए विषय भोगों में आसक्त नहीं होना चाहिए तथा बहुत ही सावधानी से उनकी व्यर्थता पर विचार कर उनसे मुक्त रहना चाहिए।
  4. व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार ही आने वाले मेहमानों का जलपान, खाना, आराम करने के लिए स्थान देना तथा आदर-सम्मान करना चाहिए। परंतु गलत व्यापारों को करने वाले, समाज को नुकसान पहुंचाने वाले और कपटी व्यक्तियों का कभी-भी आदर-सम्मान नहीं करना चाहिए।
  5. एक अच्छे गृहस्थी व्यक्ति को अपने बाल, नाखून तथा अपनी दाढ़ी आदि हमेशा ही काटकर रखने चाहिए। उसे अपनी इंद्रियों को अपने वश में करना चाहिए। उसे सफेद कपड़ों को धारण करना चाहिए तथा अपने आपको शुद्ध रखना ही एक अच्छे गृहस्थ व्यक्ति की पहचान मानी जाती है। ऐसे व्यक्ति हमेशा ही वेदों के बारे में अध्ययन करने वाले तथा अपने कल्याण के कामों में लगा रहने वाले होते हैं।
  6. किसी भी व्यक्ति को अपने मुख की फूंक के द्वारा अग्नि नहीं बुझानी चाहिए, न ही उसमें किसी अपवित्र वस्तु को डालना चाहिए तथा न ही उस अग्नि से अपने पैरों की सिंकाई करनी चाहिए। सोने या आराम करने के लिए इस्तेमाल आने वाली चारपाई या पलंग के नीचे आग (अग्नि) भी नहीं रखनी चाहिए और न ही उस अग्नि के ऊपर से उसको उलांगना चाहिए। सोते समय कभी-भी अग्नि को पैर की तरफ नहीं रखना चाहिए। किसी भी तरह के जीव-जंतुओं को भी परेशान नहीं करना चाहिए। शाम या सूरज के छिप जाने के बाद खाना नहीं खाना चाहिए।
  7. किसी दूसरे व्यक्ति के द्वारा इस्तेमाल में लाई गई वस्तु जैसे कि- जूते, कपड़े, जेवर, गहने, जनेऊ, माला या पानी के बर्तन का प्रयोग नहीं करना चाहिए। पूरी तरह से सूरज के उदय हो जाने के बाद सुबह के समय सूरज को नहीं देखना चाहिए तथा मरे हुए व्यक्ति की चिता से उठते हुए धुएं के पास नहीं जाना चाहिए। अपने दांतों को अपने नाखूनों से तथा अपने बालों को अपने-आप नहीं काटना चाहिए। गाय तथा बैल के ऊपर सवारी करना एक बहुत बड़ा दोष माना जाता है।
  8. सूर्य के छिप जाने के बाद कभी-भी तिल से बना हुओ भोजन नहीं करना चाहिए तथा कभी-भी नहाते समय नंगा होकर नहीं नहाना चाहिए। इसी तरह से खाना खा लेने के बाद कुल्ला आदि करके तथा अपने हाथों को धोकर ही कहीं भी जा सकते हैं। अच्छी तरह से हाथ-पैरों को धोने के बाद ही भोजन करना चाहिए। इस तरह से जो भी व्यक्ति खाना खाता है वह व्यक्ति बहुत ही ज्यादा उम्र व्यतीत करने वाला होता है।
  9. कभी-भी अपने दोनों हाथों से अपने सिर को नहीं खुजलाना चाहिए तथा गंदे हाथों से भी सिर को नहीं छूना चाहिए एवं बिना सिर को गीला करे नहीं नहाना चाहिए। अगर आपको गुस्सा आता है तो उस समय न तो अपने बालों को पकड़े तथा न ही किसी दूसरों के बालों को पकड़े और न ही सिर से किसी तरह की कोई चोट आदि पहुंचाए। सिर से नहाने के बाद अपने किसी भी अंग पर तेल का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
  10. वेद पाठ करने के सिद्धान्तों को जानने वालों का यह ही कहना है कि बारिश के मौसम में दो शुभ मौकों या अवसरों पर वेद का पाठ कभी-भी नहीं करना चाहिए- एक तो उस समय जब रात के समय में वायु या हवा के चलने की ध्वनि सुनाई दे रही हों तथा दूसरा उस समय जब दिन में धूल भरी हवा चक्कर काटती हुई ऊपर की तरफ उठती हुई दिखाई देती हो। उस समय भी जब गांव में किसी की लाश पड़ी हों या अनुचित रीति से धन को अर्जित करने की उपस्थिति में अथवा जब किसी के रोने की ध्वनि या आवाज आदि सुनाई देने लगे तथा उस समय जब कई आदमियों की भीड़ लगी हों, उस समय वेद का पाठ अवश्य ही बंद कर देना चाहिए।
  11. यह एक बिल्कुल ही बना हुआ सिद्धान्त (Theories) है कि हमेशा सच बोलना चाहिए तथा मीठा बोलना चाहिए।
  12. कभी-भी ऐसे व्यक्तियों पर किसी भी तरह की कोई परेशानी नहीं आती है जो अच्छे रीति-रिवाजों तथा अच्छे व्यवहारों के सिद्धान्तों का पूरे दिल से पालन करते हैं एवं जो हमेशा अपनी पवित्रता की तरफ ध्यान देते हैं तथा वेद पाठ और हवन आदि करवाते रहते हैं।
  13. अपने घर में आने वाले मेहमानों को आदर-सम्मान देना चाहिए तथा उनको दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करना चाहिए। आने वाले मेहमानों को अपनी जगह या आसन देना चाहिए, उनके पास हाथ जोड़कर बैठना चाहिए तथा जब वे मेहमान घर से जाने लगे, तो उनके पीछे-पीछे बाहर तक जाना चाहिए।
  14. इस तरह के सभी कामों से दूर ही रहना चाहिए, जिस काम को करने के पीछे किसी दूसरे की कामयाबी (तरक्की) छिपी हो, परंतु इस तरह के काम को पूरा मन लगाकर करना चाहिए जिनकी कामयाबी अपने आप पर ही निर्भर करती हो। दूसरे पर आश्रित रहने वाले व्यक्ति, वस्तुए तथा काम, बाद में परेशान ही करते हैं तथा अपने पर आश्रित रहने वाले काम हर तरह से सुख देने वाले होते हैं। सुख तथा दुख के देने की यह एक तरह से साधारण भाषा मानी जाती है।
  15. इस बात के बारे में सभी व्यक्ति जानते हैं कि जो व्यक्ति झूठ बोलकर, दूसरे व्यक्ति को नुकसान पहुंचाकर या किसी गलत तरीके से धन प्राप्त करता है, वह व्यक्ति इस संसार में तथा अपनी जिंदगी में कभी सुख से नहीं रह पाता है। गलत काम को करने वाले व्यक्ति का धीरे-धीरे सब कुछ समाप्त होता चला जाता है।
  16. किसी दूसरे व्यक्ति के तालाब में बिना उसकी इजाजत के नहाने से वह व्यक्ति पाप का भागी बनता है। दूसरे व्यक्तियों की गाड़ी अथवा वाहन, सोने की जगह, गद्दी, कुआं, बाग-बगीचा तथा मकान आदि का उसके मालिक के बिना इजाजत लिए इस्तेमाल करने से उस सामान के स्वामी के चौथाई पाप का भोगी बनना पड़ता है।

शुद्धिकरणः-

  1. आत्मसंयम का ज्ञान, आग, शुद्ध खाना, आंतरिक अंगों का संयम, पानी, गोबर लेपना, हवा (वायु), धार्मिक अनुष्ठान, सूर्य तथा समय, ये सब तत्व सांसारिक जीवों को पवित्र करने वाले माने जाते हैं। पवित्र करने वाली सभी विधियों में से धन को पवित्र विधि से प्राप्त करना सबसे ज्यादा अच्छा जाना जाता है। अपने आपको मिट्टी तथा पानी से पवित्र करने वाला व्यक्ति पवित्र नहीं माना जाता है, परंतु असलियत में वह व्यक्ति पवित्र जाना जाता है जो दूसरों को नुकसान पहुंचाए बिना ही धन की प्राप्ति करता है। शरीर पानी से पवित्र होता है, शरीर के अंदर के अंग व्यक्ति के सच बोलने पर तथा व्यक्ति के शरीर की अंदर की आत्मा शुद्ध ज्ञान (Soul pure knowledge) से और संयम से एवं व्यक्ति का दिमाग सच्चे ज्ञान के द्वारा पवित्र माना जाता है।
  2. इसी तरह से कहा जाता है कि घास, लकड़ी और भूसा पानी से पवित्र होता है। व्यक्ति का मकान सफाई, गोबर को लगाने से या लेपने से पवित्र माना जाता है। मिट्टी के बर्तन दोबारा से अग्नि पर रखने से पवित्र किए जाते हैं। मिट्टी के जो बर्तन स्प्रिट वाली मदिरा (शराब), पेशाब, पीब (मवाद), रक्त (खून) तथा मल से अपवित्र हो जाता है, उस बर्तन को अगर दुबारा से अग्नि पर गर्म किया जाए तो भी वह पवित्र नहीं होता है।
  3. जब तक किसी बर्तन से अपवित्र वस्तु के रहने की वजह से उसकी बदबू या उसकी गंध खत्म नहीं हो जाती है और उसमें से कोई दाग-धब्बा नहीं हटता है, तब तक उस वस्तु की मिट्टी तथा उस बर्तन को पानी से रगड़-रगड़ कर साफ करते रहना चाहिए।




वास्तु शास्त्र की सम्पूर्ण जानकारियां

  1. जीवन और वास्तुशास्त्र का संबंध
  2. जाने घर का सम्पूर्ण वास्तु शास्त्र
  3. घर, ऑफिस, धन, शिक्षा, स्वास्थ्य, संबंध और शादी के लिए वास्तु शास्त्र टिप्स
  4. वास्तु शास्त्र के आधारभूत नियम
  5. वास्तु शास्त्र के प्रमुख सिद्धान्त
  6. अंक एवं यंत्र वास्तु शास्त्र
  7. विभिन्न स्थान हेतु वास्तु शास्त्र के नियम एवं निदान
  8. वास्तु का व्यक्ति के जीवन पर प्रभाव
  9. हिन्दू पंचांग अथार्त हिन्दू कैलेंडर क्या है?
  10. युग तथा वैदिक धर्म
  11. भारतीय ज्योतिष शास्त्र
  12. भवनों के लिए वास्तुकला

(This content has been written by Super Thirty India Group)

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