Sun. Jul 5th, 2020
जमीन की गुणवत्ता और उसकी जानकारियां

जमीन की गुणवत्ता और उसकी जानकारियां

किसी भी जमीन पर रहने के लिए मकान बनाने से पहले जमीन की गुणवत्ता के बारे में सोच-विचार करना बहुत ही आवश्यक होता है।




वास्तुशास्त्र के अनुसार जमीन की गुणवत्ता के बारे में परीक्षण करने के लिए जमीन के लक्षणों के बारे में चार तरह की संज्ञा के बारे में बताया है जैसे-

कल्पद्रुम के आधार परः-

सुगन्धा ब्राह्नाणी भूमि रक्तगन्धा तु क्षत्रिया।
मधुगन्धा भवेद्वैश्या मद्यगन्धा च शुद्रिका।।

Madhugandha bhavedwashya maghagandha cha shudrika.

1. Plot with fragrance It is called Brahmin.
2. Plot with the smell of blood. It is known as kshatriya.
3. Plot with the smell of grains It is known as Vaisya.
4. Plot with the smell of wine It is called shudra.

रसों के अनुसार जमीन के लक्षण-

जमीन के बारे में कहा भी जाता है कि ब्राह्नाण वाली जमीन सुख देने वाली, क्षत्रिय जमीन राज्य के पद को देने वाली, वैश्या वाली जमीन धन-संपत्ति को देने वाली तथा शूद्रा जमीन को छोड़ देने में ही भलाई मानी जाती है।

वशिष्ठ एवं नारद आदि ऋषियों के मतानुसार ब्राह्नाण, क्षत्रिय, वैश्य तथा इनके अलावा अन्य व्यक्तियों के लिए क्रमशः सफेद, लाल, हरी और काले रंग की मिट्टी वाली जमीन अच्छी मानी जाती है तथा इन चारों तरह के रंगों में ब्राह्नाण घी की खुश्बू, रक्त गंध, वैश्य अन्न गंध तथा अन्य व्यक्तियों को शराब के गंध वाली जमीन सुख देने वाली मानी जाती है।

इस तरह से मिट्टी के रंग कुशा, घास, खुश्बू और रस के अनुसार ही Jameen Ki Gunvatta के बारे में भी सोच-विचार करके ही मकान को बनाने के बारे में जमीन का चुनाव करना बहुत ही अच्छा माना गया है।

मकान को बनाने के लिए उसकी जगह का चुनाव-

किसी भी मकान को बनाने के लिए उसके मुख्य स्थान की जरुरत पड़ती है और उस मकान को बनाने के लिए जमीन का चुनाव करने के लिए सबसे ज्यादा सावधानी रखनी चाहिए। साधारणतः मकान को बनाने के लिए जमीन का चुनाव (Zameen ka chunav) करने के बाद उसकी रूपरेखा (बनावट) को बनाने के लिए वास्तुशिल्पी को उस जगह पर बुलाया जाता है, लेकिन मकान को बनाने के लिए जमीन को खरीदने से पहले ही उस वास्तुशिल्प का सलाह-मशवरा लेना बहुत ही जरूरी होता है। मकान को बनाने के लिए Jameen ka Chunav करते समय निम्नलिखित बातों की तरफ अगर ध्यान दिया जाए तो मकान बहुत ही सुंदर तथा वास्तुशास्त्र के अनुसार ही बन जाता है जैसे-

मिट्टी की किस्म-

मिट्टी का वर्गीकरण उसके रंग जैसे कि ईंट-सा लाल, गहरा भूरा, सफेद, लाल, पीला, मिला-जुला रंग, काला आदि से करने के अतिरिक्त उसकी खुशबू, स्वाद, रूपरेखा आदि के अनुसार ही किया जाता है। काली अथवा चिकनी मिट्टी का प्रयोग मकान को बनाने के लिए अच्छा नहीं माना जाता है और मकान की नींव व आधार की रूपरेखा को बनाते समय मिट्टी के भार सहने की ताकत का अवश्य ही अच्छे तरीके से मालूम कर लेना चाहिए। बड़े गोल पत्थरों वाले, दीमकों के बिल वाले या जिस जगह पर किसी की हत्या की जा चुकी हो या फिर किसी के शव को दफनाया जा चुका हो, जिस जगह की मिट्टी कमजोर या ढीली हो अथवा जिसमें मिट्टी भरी गई हों, इस तरह के मकान बनाने वाली जगह (स्थानों) से दूर ही रहना अच्छा होता है।

स्थान और वहां का माहौल या वातावरण-

जहां तक हो सके मकान को बनाने वाली जगह की सतह एक जैसी ही हो तो वह अच्छी होती है। अगर वह ढलान लिए हो, तो वह उत्तर दिशा और पूर्व दिशा की तरफ अथवा उत्तर-पूर्व दिशा की तरफ ही होनी चाहिए। जिस तरह से अधिकतर कस्बों और नगरों में होता है, कि अगर बनाने की जगह छोटी हो तो उसके आस-पास में कोई बड़ें पेड़ जैसे कि- पीपल, बरगद, आम, इमली आदि को नहीं होने चाहिए क्योंकि उन पेड़ों की जड़ें और शाखाएं मकान या इमारत को किसी भी तरह की हानि पहुंचा सकती है। अगर मकान को बनाने की जगह बडी़ है तो मकान या इमारत का क्षेत्र उनसे कुछ दूरी पर होना चाहिए। उपजाऊ मिट्टी वाली, फूलों और फलों के पेड़ों वाली, घास से ढकी हुई आदि जमीन को मकान के बनाने के लिए अच्छा माना जाता है।    जिस जमीन के नीचे पानी न निकलता हो, उस तरह की जमीन को नहीं खरीदना चाहिए। मंदिरों, आश्रमों, स्कूल-कालेजों, अच्छे कामों को करने के लिए तथा कल्याण मंडपों से भिड़ी हुई Jameen पर मकान बनाने के लिए जगह के बारे में साफ तरीके से नहीं बताया जाता है। विष्णु भगवान के मंदिर के पीछे अथवा दुर्गा मां के मंदिर के बाई तरफ ही मकान को बनाने के लिए जगह को उचित नहीं माना जाता है, शिव भगवान के मंदिर से रहने वाले मकान कम से कम पचास मीटर की दूरी पर हो, तो अच्छा माना जाता है। (पहाड़ी के दक्षिण दिशा अथवा पश्चिम दिशा की जगह को छोड़ देने में ही अच्छा जाना जाता है तथा पहाड़ी के पूर्व दिशा की तरफ अथवा उत्तर दिशा में स्थित जगह पर मकान को बनाना चाहिए।) लेकिन इस तरह का होना सभी तरह के मामलों के लिए ठीक नहीं होता है।

जमीन अथवा वास्तु-

अगर जमीन की आकृति, कोण, रूप आदि वास्तु के नियम (सिद्धान्त के अनुसार हो, तो जमीन को अच्छा माना जाता है। शहरों और कस्बों में कई वजह से चुनाव करने की सीमाएं होती है, परंतु जहां तक हो सके, शास्त्रों के अनुसार सभी जगहों को पाने के लिए कोशिश करनी चाहिए। जिस तरह से कहा जाता है कि उपचार करने से तो ज्यादा अच्छा उसका बचाव करना होता है। गलत फैसले के हो जाने के बाद उसके बुरे असरों (प्रभावों) को सहन करने की बजाय यह कहीं ज्यादा अच्छा होता है कि शुरू में ही अगर सावधानी बरत ली जाए।

जमीन का आकार-

मकान को बनाने की जगह का चुनाव करने के लिए जमीन का आकार (Zameen ka Aakar) एक विशेष तरह की भूमिका को निभाता है। मकानों, उद्योगों, व्यापारिक सस्थानों और रहने के कमरों के लिए जमीन के बारे में वास्तु के नियम एक जैसे ही है, केवल जमीनों के माप के जो कि अलग-अलग तरह से होते हैं जैसे-

  • जमीन वर्ग के आकार की अथवा आयताकार होनी चाहिए (आयताकार होने की अवस्था में चौड़ाई का लंबाई से अनुपात एकःदो से ज्यादा नहीं होनी चाहिए) उत्तर दिशा और दक्षिण दिशा की अपेक्षा (तुलना) में पूर्व दिशा तथा पश्चिम दिशा की Jameen का फैलाव ज्यादा होना चाहिए, लेकिन इस तरह की बड़ी जमीन से अच्छा कुछ नहीं होता है, जिसमें की चारों तरफ खाली जगह को छोड़ दिया जाए।
  • तीन कोण के आकार की, गोल आकार की, पांच किनारों के आकार की, छः भुजा के आकार की, आठ भुजा के आकार की, कई भुजा के आकार की जमीन और ऐसी जमीन जिसका आकार खराब और एक समान न हो, अच्छी नहीं मानी जाती है।
  • गाय के मुंह के आकार की जमीन जिसके सामने के भाग की चौड़ाई पिछले भाग (हिस्से) से कम होती है, भावनात्मक वजह से अच्छी मानी जाती है, परंतु इसके साथ ही यह भी जरूरी होता है कि उस मकान के पास का मार्ग (रास्ता) सिर्फ दक्षिण दिशा अथवा पश्चिम दिशा की तरफ से होना चाहिए, पूर्व दिशा अथवा उत्तर दिशा की तरफ से नहीं होना चाहिए।
  • शेर या चीते के आकार की जमीन, जिसके सामने के भाग का फैलाव पिछले हिस्से (भाग) से बड़ा होता है, इस तरह की जमीन अच्छी नहीं मानी जाती है। लेकिन अगर इस तरह की Jameen के पूर्व दिशा और उत्तर दिशा की तरफ सड़क या मार्ग हों, तो ऐसी जमीन अच्छी मानी जाती है।
  • जमीन के अलग-अलग किनारों के कोण भी उसके गुणों को निश्चित करने में समान रूप से महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

जमीन के कोण-

अगर जमीन के चारों कोण 90 डिग्री के हो, तो अच्छा माना जाता है। यह बहुत ही महत्वपूर्ण होता है कि दक्षिण-पश्चिम कोण 90 डिग्री का अथवा उससे कम हो तो इससे ज्यादा अच्छा माना जाता है। जमीन का उत्तर-पश्चिम कोण 90 डिग्री के लगभग अथवा उससे ज्यादा होना चाहिए, परंतु इससे कम कभी-भी नहीं होना चाहिए। उत्तरी-पूर्वी कोण को भी लगभग 90 डिग्री के आसपास अथवा कम होना चाहिए, लेकिन उससे ज्यादा नहीं होना चाहिए। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो उत्तरी-पूर्वी किनारे से दक्षिणी-पश्चिमी किनारों तक की दूरी हमेशा ही उत्तरी-पश्चिमी किनारे से दक्षिण-पूर्वी किनारे तक की दूरी से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। सड़क के बारे में जमीन की अवस्था या स्थिति- वास्तुशास्त्र के नियमों के अनुसार, मकान को बनाने की जगह अथवा जमीन के आगे के भाग की दिशा और रास्ते की स्थिति उस Jameen का महत्व निश्चित करती है और उन जमीनों का नामकरण भी उसी के अनुसार ही किया जाना चाहिए जैसे-

  1. पूर्वी (ब्लाक) का भाग- वे जमीन, जिसकी सिर्फ पूर्व दिशा की तरफ से रास्ता या सड़क होती है, वह पूर्वी जमीन कहलाती है।
  2. दक्षिण-पूर्वी भाग- ऐसी Jameen , जिनकी पूर्वी और दक्षिण दिशाओं की तरफ सड़कें होती है, वह दक्षिण-पूर्वी जमीन मानी जाती है।
  3. दक्षिणी भाग- वे जमीन जिसकी दक्षिण दिशा की तरफ से रास्ते या सड़कें होती है, वे दक्षिणी जमीन होती है।
  4. दक्षिणी-पश्चिमी भाग- वे जमीन जिसकी दक्षिण दिशा और पश्चिम दिशा की तरफ सड़कें होती है, वे दक्षिण-पश्चिमी जमीन कहलाती है।
  5. पश्चिमी भाग- वे जमीन जिसकी पश्चिमी दिशा की तरफ सड़क या रास्ता होता है, वे पश्चिमी जमीन मानी जाती है।
  6. उत्तर-पश्चिमी भाग- वे जमीन जिनका रास्ता या सड़क उत्तरी दिशा की तरफ से होता है, वे उत्तर-पश्चिमी जमीन जानी जाती है।
  7. उत्तरी भाग- वे जमीन जिनकी सड़क उत्तरी दिशा की तरफ से हो, तो वह उत्तरी जमीन कहलाती है।
  8. उत्तरी-पूर्वी भाग- वे Jameen जिनकी सड़के या रास्ता उत्तरी दिशा और पूर्व दिशा की तरफ से होता है, उन जमीनों को उत्तरी-पूर्वी जमीन कहते हैं।

जमीनों अथवा मकानों को बनाने का वर्गीकरण-

जमीन के आगे के भाग की दिशा से जाने वाली सड़क या सड़कें और उसकी संख्या के अनुसार ही जमीनों का वर्गीकरण किया जाता है।

भाग- अ-

  • जिस जमीन के चारों तरफ सड़कें होती है वह जमीन (Land) बहुत ही अच्छी मानी जाती है और अगर उत्तर दिशा और पूर्व दिशा की तरफ सड़कें जमीन से नीची हों, तो इससे और भी ज्यादा लाभ तथा आराम मिलता है। अगर दक्षिणी-पश्चिमी कोण और उत्तर-पूर्व कोण 90 डिग्री से कम हो, तो उसके बहुत ही ज्यादा तथा अच्छे लाभ प्राप्त होते हैं।
  • जिस जमीन की पूर्व दिशा, उत्तर दिशा और पश्चिम दिशा की तरफ सड़क होती है तथा उत्तर दिशा और पूर्व दिशा की सड़क पश्चिम दिशा में उपस्थित सड़क से नीची हो, तो वह जमीन भी बहुत ही उत्तम मानी जाती है। उत्तर-पूर्वी किनारा, उत्तर दिशा अथवा पूर्व की दिशा की तरफ ज्यादा फैलाव लिए हो और दक्षिण-पश्चिमी किनारा उत्तर-पूर्व किनारे की सतह से ज्यादा ऊंचा हों, तो इससे अच्छे लाभ ही मिलते हैं।
  • इसी तरह से उत्तर-पूर्व के क्षेत्र आते हैं। ऐसी Jameen के उत्तर दिशा और पूर्व दिशा की तरफ सड़क होती है, उत्तर-पूर्वी किनारा उत्तर दिशा अथवा पूर्व दिशा में ज्यादा फैला हुआ होता है और मकान के बनाने की जगह की सतह सड़कों से ऊंची होती है तथा सड़क की ढलान उत्तरी पूर्वी किनारों की तरफ होता है तथा मकान को बनाने की जगह की दक्षिण-पश्चिम सतह ज्यादा ऊंची होती है।
  • उत्तर-पश्चिमी भाग- इस तरह के मकान बनाने वाली जगह के उत्तर दिशा तथा पश्चिम दिशा की तरफ सड़क होती है एवं उत्तरी-पूर्व का किनारा उत्तर दिशा अथवा पूर्व दिशा की तरफ ज्यादा बढ़ा हुआ होता है, इसके साथ ही साथ पश्चिम दिशा की तरफ तथा जमीन के दक्षिण-पश्चिम किनारे की तरफ की सड़क की सतह उत्तरी-पूर्व की दिशा की सतह से कुछ ऊंची होती है, इस तरह की जमीन भी बहुत ही अच्छी मानी जाती है।

भागब-

  • इस तरह की जमीन जिसकी पूर्व दिशा और पश्चिम दिशा की तरफ से रास्ता या सड़क होती हो, सड़क और जमीन की सतह पश्चिमी दिशा की तुलना में पूर्वी दिशा में थोड़ी नीची हो, तो वह जमीन अच्छी मानी जाती है।
  • ऐसी जमीन जिसकी उत्तरी दिशा और पश्चिमी दिशा की तरफ सड़क या मार्ग हो, परंतु जमीन और मार्ग की सतह उत्तर दिशा की तरफ दक्षिण दिशा की तुलना में हो और पश्चिम दिशा की तरफ ऊंची-ऊंची इमारते हो, तो वह जमीन बहुत ही लाभदायक तथा अच्छी मानी जाती है।
  • इस तरह की जमीन जिसके पूर्व दिशा की तरफ मार्ग हो, Jameen और मार्ग की ढलान उत्तर-पूर्व दिशा की तरफ से हो, जमीन की सतह ज्यादा ऊंचाई में हो और पश्चिम दिशा की तरफ ज्यादा ऊंची-ऊंची इमारते भी हों, तो इस तरह की जमीन काफी फायदेमंद तथा अच्छी मानी जाती है।
  • ऐसी जमीन जिसके उत्तर दिशा की तरफ मार्ग या रास्ता हो, जमीन और मार्ग की ढलान उत्तर-पूर्व दिशा की तरफ हो तथा जमीन की सतह ज्यादा ऊंची हो और इमारतें भी दक्षिण दिशा की तरफ हो तो वह जमीन बहुत ही अच्छी मानी जाती है।
  • ऐसी जमीन जिसकी पश्चिम दिशा को छोड़कर अन्य तीनों तरह की दिशाओं में रास्ता या मार्ग हों और पश्चिम दिशा की सड़क अन्य दो दिशाओं की सड़कों से नीची हो, तो इस तरह की जमीन बहुत ही लाभदायक तथा अच्छी मानी जाती है।
  • ऐसी जमीन जिसकी पूर्व दिशा, पश्चिम दिशा और उत्तर दिशा की तरफ सड़के हों और पश्चिम दिशा की सड़क अन्य दो दिशाओं की सड़क से नीची हो, तो ऐसी जमीन ज्यादा अच्छी मानी जाती है।

भाग- स-

   इस भाग में जमीन की विशेषताएं भाग ’अ’ की जमीनों के विपरीत होती हैं जैसे-

  • इस तरह की जमीन जिसके पूर्व दिशा की तरफ सड़कें निकलती है, परंतु उन सड़कों की सतह जमीन से नीची हों, परंतु तीनों तरफ ऊंची-ऊंची इमारतें तथा पहाड़ आदि हों, तो इस तरह की जमीन को अच्छा माना जाता है।
  • इस तरह की जमीन जिनके तीन तरफ से रास्ते हों, परंतु पूर्व दिशा में ऊंची इमारतें अथवा पहाड़ आदि हो, पश्चिम दिशा और दक्षिण दिशा की सड़के Jameen से नीची हो, तो ऐसी जमीन काफी लाभदायक तथा अच्छी मानी जाती है।
  • इस तरह की जमीन जिसकी उत्तर दिशा और दक्षिण दिशा की तरफ से रास्ता हो तथा पूर्व दिशा की तरफ ऊंची-ऊंची इमारतें भी हों और दक्षिण दिशा की तरफ की सड़क नीची हों तथा पश्चिमी दिशा की जगह खाली हों, ऐसी जमीन अच्छी मानी जाती है।
  • इस तरह के मकान बनाने वाली जगह अथवा जमीन जिनकी पश्चिमी दिशा की तरफ सड़क आदि हो, तो वह अच्छी मानी जाती हैं।

भाग- दः-

    इस श्रेणी के मकानों की विशेषताएं भाग- स के मकानों के विपरीत मानी जाती है।

  • अगर जमीन के चारों दिशाओं में सड़क हों तो यह सबसे अच्छा माना जाता है, क्योंकि इससे चारों तरफ से खुशी और हर तरह की सुख-संपन्नता मिलती है।
  • इस तरह के मकान को बनाने की जगह को चुनना हमेशा ही लाभदायक माना जाता है, जिस जमीन के एक तरफ की ओर से ज्यादा सड़कें हो तथा जिस मकान के बनाने की जगह के उत्तर दिशा और पूर्व दिशा की तरफ से सड़क हों, तो इस तरह की जमीन बहुत ही अच्छी मानी जाती है।
  • जिन व्यक्तियों की जमीन की दक्षिण दिशा और पश्चिम दिशा की तरफ सड़क हो, वह व्यापारिक व्यक्तियों के लिए बहुत ही अच्छी होती है। दक्षिण दिशा और पूर्व दिशा की सड़के स्त्री संगठन और उनकी गतिविधियों के लिए अच्छी नहीं मानी जाती है, परंतु इस तरह के मामलों में मकान को बनाते समय उसकी रूपरेखा (बनावट) की तरफ अगर ध्यान दिया जाए तो ऐसी जमीन पर मकान बनाना अच्छा होता है।
  • सड़क तथा जमीन की सतहें दक्षिण दिशा और पश्चिम दिशा की अपेक्षा में उत्तर दिशा और पूर्व दिशा की तरफ से नीची होनी चाहिए। पश्चिम दिशा और दक्षिण में ऊंची सतह की जमीनों का होना अच्छा माना जाता है।
  • उत्तरी दिशा में पश्चिम दिशा से पूर्व दिशा की तरफ बहता हुआ किसी भी तरह का कोई नाला, नदी हो, तो वह एक तरह की अच्छी स्थिति मानी जाती है, क्योंकि इसके होने पर अच्छे लाभ प्राप्त होते हैं।
  • जिन जमीनों के उत्तरी-पूर्वी दिशा के किनारे गोल होते हैं, वह Jameen अच्छी नहीं होती है, परंतु जिस जमीन के दक्षिण-पूर्व दिशा के किनारे गोलाकार स्थिति में हो, उस जमीन का कुछ सीमाओं तक इस्तेमाल किया जा सकता है।

अन्य तरह की जमीन-

  • इस तरह की जमीन जिसके उत्तर-पूर्व दिशा के किनारे उत्तर दिशा अथवा पूर्व दिशा की तरफ से बाहर निकले हुए हो, तो ऐसी जमीन अच्छी मानी जाती है।
  • जिस जमीन के दक्षिण-पूर्व दिशा, दक्षिणी-पश्चिमी दिशा, उत्तरी-पश्चिमी दिशा के किनारे बाहर की तरफ निकले हुए हो, इस तरह की जमीन अच्छी नहीं मानी जाती है, परंतु इस जमीन का सही तरह से सुधार करने के बाद इस जमीन का इस्तेमाल किया जा सकता है।
  • पांच तरह के किनारों वाली जमीन अथवा जिस जमीन का उत्तर-पूर्व दिशा का किनारा कटा हुआ हो, वह जमीन अच्छी नहीं होती है, परंतु इस तरह की जमीन पर सुधार करने के बाद उसका इस्तेमाल किया जा सकता है।
  • चार किनारों वाली इस तरह की जटिल जमीन भी अच्छी नहीं मानी जाती है, जिसका उत्तरी-पूर्व दिशा का किनारा कटा हुआ हों अथवा दक्षिणी-पश्चिमी कोण 90 डिग्री से ज्यादा हों या फिर जिसके दक्षिण-पश्चिम दिशा से उत्तर-पूर्व दिशा की दूरी दक्षिण-पूर्व दिशा से उत्तर-पश्चिम दिशा की दूरी से कम हो। मकान की रूपरेखा (डिजाइन) बनाने से पहले इस जमीन में सुधार कर लिया जाए तो इस जमीन की इस्तेमाल में लाया जा सकता है।

जमीनों का फैलाव-

जब मकान को बनाने की जगह के पास से मिली हुई दूसरी जगह अथवा उसके हिस्से को जोड़कर बढा़ना अथवा फैलाव करना हो, तो नीचे बताई गई बातों की तरफ ध्यान देना बहुत ही जरूरी हो जाता है जैसे-

  • इस तरह की जमीन जो दक्षिण-दक्षिण-पश्चिम दिशा की तरफ से बाहर की ओर निकली हुई या बढ़ी हुई होती है, वह जमीन अच्छी नहीं मानी जाती है, क्योंकि इस तरह की जमीन से, जमीन के मालिक का स्वास्थ्य, धन या अन्य कई तरह की समस्याएं पैदा होती रहती है।
  • जो जमीन दक्षिण अथवा पश्चिम दिशा की तरफ से बढी हुई हो या ज्यादा बाहर की तरफ निकली हुई हो, इस तरह की जमीन के होने पर किसी भी तरह की दुर्घटना और धन का नुकसान होने जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
  • जिस व्यक्ति की Jameen दक्षिण-पूर्व दिशा की तरफ से ज्यादा बढ़ी हुई होती है, उस व्यक्ति को आग लगने की दुर्घटना, मुकद्दमों और चोरी-चकारी होने का हमेशा ही डर लगा रहता है।
  • ऐसी जमीन जो उत्तर-पश्चिम दिशा की तरफ ज्यादा बढी़ हुई होती है, वे अच्छी नहीं होती है, इस तरह की जमीन के होने पर व्यक्ति को मानसिक परेशानी तथा बहुत ही ज्यादा खर्चों को उठाना पड़ता है।
  • जो जमीन उत्तर पूर्वी-उत्तर दिशा और पूर्व दिशा की तरफ से ज्यादा बढ़ी हुई या आगे की तरफ निकली हुई हो, वह अच्छी मानी जाती है। इस तरह की जमीन के होने से व्यक्ति को धन, संपत्ति, नाम, ऐश्वर्य तथा सब तरह की हर तरह की खुशी प्राप्त होती रहती है।
  • अगर नई जमीन का भाग भी वास्तुशास्त्र (Vastu Shastra) के अनुसार हो, तो खरीदी गई जमीन के उत्तर दिशा, उत्तर-पूर्व दिशा या पूर्व दिशा में पास लगे या कुछ दूर पर स्थित नई जमीन के भाग को खरीदने से हर तरफ से कामयाबी प्राप्त होती है। इसी तरह से पश्चिम दिशा अथवा दक्षिण दिशा में स्थित जमीन को खरीदने पर इसके गलत (नुकसानदायक) प्रभाव पड़ते है।

अलग-अलग आकारों के लाभ तथा हानियां-

  • जो जमीन वर्ग के आकार की होती है, वह सबसे अच्छी मानी जाती है। इस तरह की जमीन पर मकान बनाकर रहने वाले परिवार के सदस्यों को सब तरह की संपन्नता तथा प्रसन्नता मिलती है।
  • जिस व्यक्ति की जमीन आयताकार होती है, वह जमीन अच्छी मानी जाती है तथा इसमें रहने वाले व्यक्तियों का स्वास्थ्य अच्छा रहता है और इनको धन तथा संपन्नता मिलती रहती है।
  • जिन व्यक्तियों की जमीन तीन कोणों के आकार की होती है, वह जमीन (Zameen) अच्छी नहीं मानी जाती है। इस तरह की जमीन के होने पर व्यक्ति को मुकद्दमें एवं कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
  • जिनकी जमीन गोल आकार की अथवा वृत्त के आकार की होती है, इस तरह की जमीन को भी अच्छा नहीं माना जाता है और ऐसी जमीन वाले व्यक्तियों को रोजाना किसी ना किसी तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
  • ऐसी जमीन जिसका आकार पांच कोणों की तरह, आठ कोणों की तरह, बहुत भुजा वाली अथवा और कई तरह के आकारों वाली होती है, वे जमीन भी अच्छी नहीं मानी जाती है। ऐसी जमीन वाले व्यक्ति अपने जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों में रोजाना मानसिक उद्वेग और अस्थिरता का सामना करते रहते हैं।

सभी तरह की जमीन की भूमि का स्तरः-

  • जिस जमीन की सतह दक्षिण दिशा और पश्चिम दिशा से ऊंची हो, वह शुभ होती है।
  • जमीन की सतह उत्तर दिशा तथा पूर्व दिशा की तरफ से नीची हों, तो इस तरह की जमीन अच्छी मानी जाती है।
  • जमीन का स्तर उत्तर-पूर्व के कोने में सबसे नीचा होना चाहिए।
  • जमीन की सतह दक्षिण-पूर्व दिशा और उत्तर-पश्चिम दिशा में एक जैसी अथवा एक सी रखी जा सकती है, परंतु यह और भी ज्यादा अच्छा होगा कि उत्तर-पश्चिम दिशा का किनारा दक्षिण-पूर्व दिशा के किनारे से नीचा हों।
  • दक्षिण-पूर्व दिशा और उत्तर-पश्चिम दिशा में जमीन का स्तर उत्तर-पूर्व की दिशा से ऊंचा होना चाहिए जबकि दक्षिण-पश्चिम दिशा की तरफ से नीचा होना चाहिए।
  • उत्तर दिशा की जमीन का स्तर  (Jameen ka star) दक्षिण दिशा से नीचा और पूर्व दिशा का पश्चिम दिशा से नीचा होना चाहिए।
  • संक्षेप में कहा जा सकता है कि उत्तर-पूर्व दिशा की जमीन का स्तर सबसे नीचा हो, तो अच्छा होता है जैसे-
  • उत्तर-पश्चिम दिशा का स्तर उत्तर-पूर्व की दिशा से ऊंचा होना चाहिए।
  • दक्षिण-पूर्व दिशा का स्तर उत्तर-पश्चिम दिशा से ऊंचा होना चाहिए।
  • दक्षिण-पश्चिम दिशा का स्तर दक्षिण-पूर्व की दिशा से ऊंचा होना चाहिए।
  • दक्षिण-पश्चिम दिशा के किनारे की Jameen का स्तर सबसे ज्यादा ऊंचा होना चाहिए।

बाहरी जमीन का स्तर-

मकान को बनाने वाली जगह के स्तर से उत्तर दिशा और पूर्व दिशा की सड़कों का स्तर नीचा होना चाहिए। इन सड़कों की सतह दक्षिण दिशा और पश्चिम दिशा की सड़कों से भी नीची होनी चाहिए। अगर जमीन (Jameen) के दक्षिण दिशा और पश्चिम दिशा की तरफ ऊंची-ऊंची पहाड़ियां या पहाड़, टीले अथवा ऊंची-ऊंची इमारते आदि हो तो इस तरह की जमीन को अच्छा माना जाता है। उत्तर दिशा, पूर्व दिशा तथा उत्तर-पूर्व दिशा की तरफ से बहते हुए नदी-नाले आदि को अच्छा माना जाता है, लेकिन ये उत्तर दिशा से पूर्व दिशा की तरफ बहते हों, तो इस तरह की जमीन और भी ज्यादा अच्छी मानी जाती है। उत्तर-पूर्व दिशा के किनारों में तालाबों, झीलें आदि हों, तो व्यक्ति हर तरफ से सुख-समृद्धि प्राप्त करता है।

कई वास्तुशास्त्र के विद्वानों ने जमीनों को दो त्रिकोणों में बांटा है, जिसके बारे में चित्र के माध्यम से बताया गया है।

बाहरी जमीन का स्तर

उत्तर-पूर्व दिशा के त्रिकोण को सूर्य ग्रह का और दक्षिण-पश्चिम दिशा के त्रिकोण को चंद्रमा का प्रतीक माना गया है।

इसके बारे में यह भी निर्धारित किया गया है कि चंद्र ग्रह का स्तर ऊंचा और सूर्य ग्रह का स्तर नीचा होना चाहिए। चंद्र क्षेत्र से बने हुए मकान का भाग भी भारी और ऊंचा होना चाहिए, क्योंकि यह देखा जाता है कि जिस तरह से चंद्रमा के समुद्र पर पड़ने वाले असर (प्रभाव) की वजह से ज्वार-भाटा उतपन्न होता है या आता है, ठीक उसी तरह से ही चंद्र ग्रह का असर भी धरती के स्थल भाग पर भी बहुत ज्यादा होता है।

मकान के बनने वाली जगह के स्तर का असर (प्रभाव)-

Impact of plot’s level (surface)-

Direction Lower level (surface) Higher level (surface)
When the plot is in east direction, Good health, profits of money and longer life. Detachment (absence) of life partner, children and other family members.
When the plot is in south-east direction, Fear about fire related accidents, enemies, harmful also for fair sexes and children, etc. in case of lower the north-east direction. Much profit from business when north-east and north-west directions of plot are lower.
When the plot is in south direction, Obstruction (disturbance) in the progress of family members, diseases and economical problems. Good health, wealth, prosperity, etc. in case of higher surface of plot.
When the plot is in south-west direction, Habitual of dirty habits, bad health, even death, etc. in case lower south-west direction. All types of comforts, popularity, name, fame, etc. when its surface is higher.
When the plot is in west direction, Bad health, loss of dignity (respect) and name, etc. when its surface is lower. All types of pleasures and prosperity in case of higher its surface.
When the plot is in north-west direction, Fear of litigation and enemies in case of being its north-east direction as lower. If its south-west direction is lower than south-east direction, it is considered as good. When the north-east part of this plot is higher, one gets success by doing business. But, when it is higher in its south-west direction, it is considered as very bad.
When the plot is in north direction, It the surface of plot is lower, one gets normal prosperity and good health. This type of plot is considered as good in respect of economical condition. When the surface of it is higher, one gets failure in every of his works.
When the plot is in east direction, Good health, wealth and all types of comforts as well as publicity when the surface of such plot is lower. More troubles, worse conditions, etc. in case of higher surface of the plot.

 

कोणः- 90 डिग्री के कोण, 90 डिग्री के कम के कोण अथवा 90 डिग्री के कोण का पता लगाने की बहुत ही आसान

कोणः

सी विधि-

अगर ए सी की दूरी पंदह फुट से ज्यादा है तो कोण बी 90 डिग्री से ज्यादा है, अगर यह पंद्रह फुट से कम है तो यह कोण 90 डिग्री के कोण से भी कम है।

अगर जी ई की दूरी दस फुट से ज्यादा है तो कोण एफ 90 डिग्री से ज्यादा है और अगर यह दस फुट 10 इंची से भी कम है तब उस अवस्था में कोण 90 डिग्री से कम अथवा छोटा होता है।

जब पूर्व दक्षिण-पूर्व की दिशा की तरफ जमीन का फैलाव (Jameen ka Phailav) ज्यादा होता है, तो इससे परिवार के अंदर लड़के तथा लड़कियों की संख्या बहुत ही ज्यादा होगी। यहां तक की अगर ये बच्चे लड़के होगें तो वे अपने जीवन में कुछ भी नहीं कर पाएंगे। तथा इस तरह के मकान में रहने वाले सदस्यों का स्वभाव भी नीच हो जाता है।

जब जमीन का पूर्व उत्तर-पूर्व की दिशा की तरफ फैलाव किया जाता है तो इससे व्यक्ति को कीर्ति, प्रसिद्धि और संसार में लोकप्रियता प्राप्त होती है, लेकिन यह आर्थिक लाभ के लिए ज्यादा अच्छा नहीं होता है।

अगर किसी जमीन का दक्षिण-दक्षिण-पूर्व की तरफ ज्यादा फैलाव किया जाता है तो इस तरह से करने पर छोटे बच्चों (छोटे-शिशु) की मृत्यु नहीं होती है, व्यक्ति की कीर्ति में भी कोई कमी नहीं आती है। लेकिन धन और धन को कमाने के संबंध में परेशानियां उत्पन्न होती रहेगी। पुरुषों के स्वास्थ्य पर भी गलत असर पड़ सकता है। अदालती मुकद्दमें तथा अन्य मामलों में भी परेशानियां पैदा होती रहेगी।

जब पश्चिम उत्तर-पश्चिम दिशा की तरफ Jameen ka Phailav किया जाता है तो इससे व्यक्ति को आर्थिक लाभ प्राप्त होता है, राजनैतिक शक्ति में बढ़ोतरी होती है तथा महिलाएं सक्रिय एवं ताकतवर बनती है।

जब उत्तर,उत्तर-पश्चिम दिशा की तरफ जमीन का फैलाव किया जाता है तो इससे मकान में रहने वाले पुरुषों को बुरी आदतें लग जाती है तथा स्त्रियों को अदालती मुकद्दमों का सामना करना पड़ता है।

जब उत्तर, उत्तर-पूर्व दिशा की तरफ जमीन का फैलाव किया जाता है तो इससे मकान में रहने वाले सभी सदस्यों का स्वास्थ्य अच्छा रहता है तथा उनको सुख-शांति मिलती है। इस परिवार की स्त्रियों को हर कार्य में यश भी प्राप्त होता है।

जब दक्षिण,दक्षिण-पश्चिम दिशा की तरफ जमीन का फैलाव होता है तो इस तरह से करने पर इस मकान की स्त्रियों को परेशानी तथा दुखों का सामना करना पड़ता है तथा इस परिवार के पुरुष भी बदमाश बन जाते हैं।

जब पश्चिमी दक्षिण-पश्चिमी दिशा की Jameen का फैलाव किया जाता है तो इस मकान में रहने वाले पुरुष के सदस्य गलत तरीके से धन को कमाते हैं तथा फिजूलखर्ची करते हैं। ऐसे व्यक्ति बहुत ही ज्यादा घमंड करने वाले बन जाते हैं, जिससे की उनके नाम तथा कीर्ति को भी नुकसान पहुंचता है। इस परिवार की स्त्रियां मानसिक रूप से कमजोर हो जाती है।

जब दक्षिण दक्षिण-पूर्व की जमीन का ज्यादा फैलाव किया गया हों, तो अगर दक्षिण दक्षिण-पूर्व दिशा के किनारे पर मकान के मुख्य गेट या दरवाजे को लगाया गया हो, जो कि दक्षिण-पश्चिम दिशा के सामने की तरफ पड़ता हो, तो यह हानिकारक माना जाता है, इसलिए हो सके, तो उत्तर उत्तर-पूर्व के सामने की तरफ दूसरे गेट या दरवाजे को लगवा लें क्योंकि इसे अच्छा माना जाता है।

दक्षिण दक्षिण-पश्चिम दिशा की जमीन की तरफ ज्यादा फैलाव किया गया है, तो अगर मकान का मुख्य गेट या दरवाजा दक्षिण-पूर्व दिशा की तरफ है। यदि हो सके, तो यह और भी ज्यादा ही अच्छा रहेगा की एक और द्वार पूर्व उत्तर-पूर्व के सामने की तरफ लगा दिया जाए।

उत्तर उत्तर-पश्चिम जमीन का फैलाव किया गया हो और अगर उस का मुख्य दरवाजा या गेट पूर्व दिशा की तरफ है, जो कि उत्तर उत्तर-पूर्व के सामने है, तो इस तरह से होना लाभदायक माना जाता है।

उत्तर उत्तर-पूर्व दिशा में फैलाव किया गया है तथा मकान का द्वार उत्तर उत्तर-पश्चिम दिशा के सामने उत्तर-पूर्व दिशा की तरफ है, इस तरह का होना नुकसानदायक माना जाता है। अगर हो सके, तो एक अन्य द्वार को भी पूर्व उत्तर-पूर्व दिशा की तरफ लगवा दिया जाए तो अच्छा माना जाता है।

पश्चिम दक्षिण-पश्चिम दिशा का फैलाव किया गया है तथा गेट या दरवाजा पश्चिम उत्तर-पश्चिम दिशा के सामने है, तो नुकसानदायक माना जाता है, अगर हो सके, तो इससे अच्छा तो यही होगा कि दूसरे दरवाजे को उत्तर-पूर्व किनारे की तरफ लगवा लें।

पूर्व उत्तर-पूर्व की दिशा की तरफ की जमीन को बढ़ाया गया हों और मकान का दरवाजा पूर्व दक्षिण-पूर्व के सामने है, तो इस तरह का होना अच्छा नहीं माना जाता है। अगर हो सके तो दूसरे दरवाजे को उत्तर उत्तर-पूर्व की दिशा में लगा लें क्योंकि जाए यह अच्छा माना जाता है।

पश्चिम उत्तर-पश्चिम दिशा के भाग की तरफ Jameen ज्यादा बढ़ी हुई हो तथा मकान का मुख्य गेट या दरवाजा पश्चिम दक्षिण-पश्चिम दिशा की सीधाई या सामने की तरफ पड़ता हो, तो इस तरह से होना नुकसानदायक माना जाता है। अगर हो सके, तो दूसरे द्वार को पूर्व उत्तर-पूर्व दिशा की तरफ लगा दिया जाए तो इससे बहुत ही ज्यादा लाभ प्राप्त होता है।

दिखाए गए चित्र के अनुसार मकान को बनाने की जगह नुकसानदायक मानी जाती है, इस तरह की जमीन पर सुधार किया जाए तो इसको इस्तेमाल में लाया जा सकता है।

पूर्व उत्तर-पूर्व की दिशा की जमीन को आगे की तरफ ज्यादा बढ़ाया गया हो, तो इस तरह की जगह पर मकान बनाने का कार्य अच्छा तथा लाभदायक माना जाता है।

पश्चिम उत्तर-पश्चिम की जमीन का फैलाव किया गया हो, तो इस तरह की जगह मकान बनाने के लिए अशुभ मानी जाती है, इसलिए इस तरह की जमीन को छोड़ देने में ही भलाई होती है।

दक्षिण दक्षिण-पश्चिम जमीन का फैलाव किया गया हों, तो इस तरह की जमीन मकान बनाने के लिए नुकसानदायक होती है। अगर मकान का मुख्य गेट या दरवाजा दक्षिण दक्षिण-पश्चिम दिशा से हों, तो यह बहुत ज्यादा हानिकारक मानी जाती है।

दक्षिण दक्षिण-पूर्व की जमीन का फैलाव किया गया हों तो इस तरह की जमीन मकान बनाने के लिए अच्छी नहीं मानी जाती है।

ऐसी जमीन जिसका उत्तर-पूर्व दिशा की तरफ ज्यादा फैलाव होता है वह जमीन मकान बनाने के लिए लाभदायक होती है। अगर इस Jameen के पास रास्ता या सड़क दक्षिण दिशा की तरफ से हो, तो इस जमीन पर मकान की रूपरेखा बनाते समय बहुत ही ध्यान देने की जरूरत होती है।

अगर जमीन का फैलाव दक्षिण-पूर्व दिशा की तरफ हो, तो इस तरह की जमीन मकान को बनाने के लिए अच्छी नहीं मानी जाती है, इस तरह की जमीन को मकान बनाने से पहले यदि सुधार लिया जाए तो इसको इस्तेमाल में लाया जा सकता है।

उत्तर-पश्चिम दिशा की तरफ यदि जमीन बढ़ी हुई हो, तो इस तरह की जमीन को अच्छा नहीं माना जाता है। इस तरह की जमीन में सुधार करके इसको इस्तेमाल में लाया जा सकता है।

पूर्व दक्षिण-पूर्व की दिशा की तरफ अगर जमीन का फैलाव ज्यादा हो तथा इस जमीन में मकान बनाने के लिए मुख्य द्वार उत्तर उत्तर पूर्व की दिशा की तरफ हो, तो यह बहुत ही लाभदायक मानी जाती है।

जिस जमीन के पश्चिम दिशा के सामने सड़क या मार्ग होता है तथा मकान का मुख्य दरवाजा या गेट पश्चिम उत्तर-पश्चिम दिशा की तरफ होता है एवं उस मकान में पानी का कुआं उत्तर उत्तर-पूर्व दिशा में अथवा पूर्व उत्तर-पूर्व दिशा की तरफ होता है, इस तरह की जमीन बहुत ही लाभदायक मानी जाती है।

सड़क उत्तर दिशा की तरफ हो, मकान का मुख्य दरवाजा या गेट उत्तर उत्तर-पूर्व की दिशा में हों तथा कुआं उत्तर उत्तर-पूर्व की दिशा में अथवा पूर्व उत्तर-पूर्व की दिशा में हो, तो इस तरह की जमीन अच्छी मानी जाती है।

जिन जमीन पर मकान को बनाने के बाद मकान का रास्ता या सड़क उत्तर दिशा और पश्चिम दिशा की तरफ से हो तथा उत्तर उत्तर-पूर्व दिशा की तरफ मकान का मुख्य गेट या दरवाजा हों, तो इस तरह की जमीन को अच्छा माना जाता है।

सड़क पश्चिम दिशा अथवा दक्षिण दिशा की तरफ हो तथा पश्चिम उत्तर-पश्चिम दिशा की तरफ से मकान का मुख्य दरवाजा या गेट हो, तो इससे मकान के सदस्यों की स्थिति बहुत ही अच्छी मानी जाती है।

उत्तर-पूर्व दिशा की तरफ यदि Jameen को ज्यादा बढाया गया हो, तो इस तरह की जमीन को मकान बनाने के लिए अच्छा माना जाता है।

अगर किसी जमीन का उत्तर-पूर्व दिशा का किनारा गोल आकार का है, तो इस तरह की जमीन मकान को बनाने के लिए हानिकारक मानी जाती है।

उत्तर-पश्चिम दिशा की तरफ जिस जमीन को आगे की तरफ बढ़ाया जाता है, इस तरह के मकान बनाने की जगह या जमीन को अच्छा माना जाता है।

अगर दक्षिण-पश्चिम का कोण 90 डिग्री से भी कम हो तथा जिस जमीन को दक्षिण-पश्चिम दिशा की तरफ से आगे की तरफ बढा़या गया हो, तो इस तरह की जमीन नुकसान देने वाली मानी जाती है तथा इससे उस जमीन पर रहने वाले लोगों पर गलत असर भी पड सकता हैं।

पूर्व दक्षिण-पूर्व दिशा की तरफ Jameen को बढा़या गया हो, तो ऐसी जमीन पर मकान को बनाना नुकसानदायक माना जाता है।

उत्तर उत्तर-पश्चिम दिशा की तरफ यदि जमीन को आगे की तरफ बढ़ाया गया हो, तो इस तरह की जमीन को अशुभ समझा जाता है।

जिस जमीन पर उत्तर उत्तर-पूर्व दिशा की तरफ फैलाव किया गया हो, तो ऐसी जगह मकान को बनाने के लिए अच्छी मानी जाती है।

उत्तर उत्तर-पूर्व की दिशा की तरफ जमीन को अगर बढ़ाया गया हो, तो ऐसी जगह पर मकान को बनाना लाभदायक माना जाता है।

जिस जमीन को पूर्व दक्षिण-पूर्व दिशा की तरफ से ज्यादा आगे की तरफ बढ़ाया गया हों, तो इस तरह की जमीन पर मकान को बनाने का कार्य अच्छा नहीं माना जाता है, क्योंकि यह जमीन अशुभ मानी जाती है।

उत्तर उत्तर-पश्चिम दिशा की तरफ अगर Jameen को बढ़ाया गया हो, तो इस तरह की जमीन को मकान बनाने के लिए अच्छा नहीं माना जाता है तथा यह जमीन हानिकारक होती है।

जिस जमीन को पश्चिम दक्षिण-पश्चिम दिशा की तरफ बढ़ाया गया हों, ऐसी जमीन मकान बनाने के लिए अच्छी नहीं मानी जाती है।

इस तरह की जमीन जिसका पश्चिम दक्षिण-पश्चिम की तरफ से फैलाव किया गया हों, ऐसी जमीन मकान को बनाने के लिए नुकसानदायक मानी जाती है।

मकान को बनाने से पहले जमीन की मिट्टी की परीक्षा करने की विधि-

मकान बनाने के लिए खरीदी गई जमीन पर मकान की नींव डालने से पहले उस जमीन की मिट्टी का परीक्षण करना बहुत ही आवश्यक माना जाता है। मिट्टी का परीक्षण करने से इस बात के बारे में मालूम हो जाता है कि मिट्टी में किस तरह के गुण है। यह भी मालूम हो जाता है कि वह मिट्टी कितना बोझ सहन कर पाने के काबिल है अथवा उस मिट्टी पर कितना बोझ डाला जा सकता है। जमीन की मिट्टी के परीक्षण के लिए अधिकतर निम्नलिखित तरीकों को अपनाया जाता है जैसे-

जांच या परीक्षण-

किसी भी मकान का डिजाइन तैयार करने से पहले उस जगह की जांच करना बहुत ही आवश्यक होता है। इसके लिए उस क्षेत्र में बने गड्ढों और पहले से ही बनी हुई ऊंची-ऊंची इमारतों की नींव से उस जगह के बारे में अन्दाजा लगाया जा सकता है। उस क्षेत्र (भाग) में एक नए गड्ढे को खोदकर उस इलाके की Jameen के बारे में मालूम किया जा सकता है। नगरपालिका, विकास प्राधिकरण अथवा अन्य तरह की सोसाइटी जो कि सारे इलाके में होने वाले कार्य की देखरेख करती रहती है और मकानों को बनाने के नक्शों को पास करती है, उनके पास उस इलाके की वहन शक्ति का पूरा ब्यौरा होता है। उनसे इनके बारे में मालूम करके व कच्चे कुओं के बारे में जांच करके उस इलाके की जमीन की बहुत ही जरूरी जानकारियों के बारे में मालूम किया जा सकता है।

जमीन की गहराई को मापना-

किसी भी जमीन की गहराई वहां ही पर मापी जा सकती हैं जहां कि मिट्टी नरम हो औऱ जहां पर मिट्टी, बजरी अथवा रेत आदि हों। इस तरह की जांच द्वारा मिलने वाले परिणाम ज्यादा भरोसेमंद नहीं होते हैं तथा उनके लिए और भी उपायों को करना पड़ता है। इस तरह की जांच-क्रिया में 2.5 सेंमी से 4 सेंमी व्यास की एक बहुत ही बारीक तथा नुकीली छड़ का इस्तेमाल किया जाता है। यह छड़ हथौड़े से अथवा किसी दूसरे तरीके से जमीन के अंदर डाल दी जाती है। थोड़ी-थोड़ी गहराई तक उस छड़ को डालकर बाहर की तरफ वापस निकाल लिया जाता है तथा छड़ पर लगी हुई मिट्टी के बारे में जांच की जाती है। इस छड़ को उस समय तक जमीन के अंदर डाला जाता है जब तक की उसकी आगे की नोंक या किनारा किसी सख्त तत्व से नहीं टकराता है, इसके बीच-बीच में हमें छड़ की नोंक या किनारे पर लगी हुई मिट्टी के अलग-अलग तहों की गहराई के बारे में अन्दाजा लगाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त हथौड़े की चोट के लगने पर जितनी छड़ जमीन के अंदर जाएगी, उससे मिट्टी की परतों की गहराई के बारे में मालूम लगाया जा सकता है। एक समझदार व्यक्ति छड़ के अंदर जाने की दर से मिट्टी के गुणों के बारे में बहुत ही आराम से अंदाजा लगा सकता है।

मिट्टी में तथा रेत के अंदर कम गहरी नींवों के बारे में जांच करने के लिए एक यंत्र, जिसकों लकड़ी के बरमें के नाम से जाना जाता है, वह बहुत ही अच्छा तथा लाभदायक माना जाता है।

बेधन वाली क्रिया-

अलग-अलग तरह के बरमों से मिट्टी में किसी भी तरह के छेद किए जा सकते हैं। इसलिए इस क्रिया को बेधन-क्रिया के नाम से जाना जाता है। साधारण तरह के मकानों की नीवों की जांच करने के लिए इस तरह के बरमें बहुत ही आरामदायक और लाभदायक माने जाते हैं। बेधन करने की क्रिया कई तरह की होती है जैसे-

बरमा बेधन क्रिया-

मिट्टी वाली और रेत वाली जमीन की जांच करने के लिए इस तरह की क्रिया बहुत ही ज्यादा लाभदायक मानी जाती है। इसमें बरमें को एकदम सीधे तरीके से खड़ा किया जाता है तथा इसके बाद उसके ऊपर के हिस्से पर लगे हुए हैण्डल की मदद से उस बरमें को नीचे की तरफ दबाते हुए इसको घुमाया जाता है। लगभग एक फुट गहरा छेद के हो जाने के बाद उस बरमें को बाहर निकाल लिया जाता है तथा उसकी मदद से इकट्ठी की गई मिट्टी को जांच करने के लिए रख लिया जाता है।

इस बरमें की सहायता से लगभग पंद्रह मीटर की गहराई तक मिट्टी की जांच की जाती है। पथरीली अथवा रेत वाले स्थान (जगह) पर इस क्रिया का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

धारा छेदन क्रिया-

इस विधि को करने पर चिकनी मिट्टी के कण नीचे की तरफ नहीं बैठते है। चिकनी मिट्टी के कण नीचे न बैठने की वजह से ही यह अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है। इस विधि में ये दोष होते हुए भी इससे जिस भी तरह की जानकारी मिलती है वे बहुत ही महत्वपूर्ण होती है। इसके बाद यह मालूम करना चाहिए कि यह विधि किस तरह की है। इस तरह की विधि का इस्तेमाल उस समय किया जाता है जब ऊपर से अधिक गहराई पर पथरीली Jameen में जांच करनी होती है। इस तरह की क्रिया में एक बिल्कुल ही खाली लोहे के पाइप कुछ नीचे गहराई तक डाल दिए जाते हैं। उसके बाद इस खाली तथा खोखले पाइप में गैस के एक पाइप को डाला जाता है। यह गैस का पाइप खाली तथा खोखले पाइप की परिधि (व्यास) से कम होता है। इसके बाद गैस पाइप के ऊपरी सिरे को पानी के प्रबंध के लिए जोड़ दिया जाता है।

गैस पाइप के नीचे के किनारे का व्यास कम होता है। गैस पाइप के दबाव पड़ने की वजह से पाइप के नीचे जो मिट्टी होती है, वह बाहर निकल आती है तथा पानी के अंदर मिल जाती है। यह मिली हुई मिट्टी इसके बाद पाइप के बीच के खाली स्थान से निकल करके धरती पर आ जाती है। इस तरह से इस मिट्टी को इकट्ठा कर लिया जाता है। इस मिट्टी को इकट्ठा करने के बाद उसकी जांच की जाती है तथा इस मिट्टी की जांच करने के बाद इससे यह मालूम हो जाता है कि मिट्टी में क्या-क्या गुण है।

आघात छेदन क्रिया-

इस क्रिया के अंदर काटने वाले भारी यंत्रों जैसे छेनी आदि की मदद से लगातार चोटें मार-मार कर पत्थरों जैसी सख्त जमीन को भी तोड़ दिया जाता है ताकि इससे वह टूट जाए तथा बारीक हो जाए। उसके बाद इन यंत्रों की मदद से किए गए छेद के अंदर पानी को डाल दिया जाता है। पानी डालने से बारीक मिट्टी मिल जाती है। इस मिट्टी के मिल जाने या घुल जाने पर उसको पम्प की सहायता से अथवा किसी अन्य विधि या क्रिया के द्वारा बाहर निकाल लिया जाता है। इसके बाद इस मिली हुई या घुली हुई मिट्टी को धूप में सुखा लिया जाता है। इसके बाद इस सूखी हुई मिट्टी की जांच की जाती है। इस मिट्टी की जांच करने से मिट्टी के गुणों के बारें में मालूम हो जाता है। एक बात के बारे में ध्यान रखना चाहिए कि यह जांच पथरीली Jameen के लिए लाभदायक होती है और चिकनी मिटटी वाली जमीन के लिए लाभदायक नहीं होती है।

गुल्ली बेधन क्रिया-

जब पथरीली चट्टानों या पत्थरों में जांच करने के लिए छेद करना हों, तो इसके लिए गुल्ली छेद करने वाली क्रिया का इस्तेमाल किया जाता है। गुल्ली छेद क्रिया चिकनी मिट्टी तथा रेत आदि पर जांच करने के लिए भी इस्तेमाल की जाती है। चिकनी मिट्टी में हथौड़े की चोट की मदद से सबसे पहले लोहे की नाल को डाला जाता है। उसके बाद उसके अंदर के तत्व को एक खाली या खोखले बरमे की सहायता से बाहर की तरफ निकाला जाता है। चट्टान या पत्थर में छेद करने के लिए एक फलका इस्तेमाल में लाया जाता है जो कि घूमते हुए काटने वाले यंत्रों के अपघर्षण से छेद करता है। क्योंकि बरमें में एक खाली या खोखली नाली होती है, इसलिए यह बहुत ही आसानी से चट्टान या पत्थर की मजबूत से मजबूत गुल्ली को बाहर की तरफ ले आता है।

मिट्टी की धारण करने वाली शक्ति या ताकत-

किसी भी तरह की मिट्टी की धारण करने की शक्ति से यह मतलब होता है कि वह मिट्टी संरचना का कितना ज्यादा बोझ या वजन आसानी से सहन कर सकती है। मिट्टी की यह धारण (सहन) करने की शक्ति मिट्टी के कणों पर भी निर्भर करती है। मिट्टी के आयतन का जितना ज्यादा वजन होगा उसकी सहन करने की ताकत भी उतनी ही अधिक होती है। संरचना या बनावट की सुरक्षा की दृष्टि से यह बात भी जरूरी है कि उसकी नींव पर ज्यादा वजन न डाला जाए तो अच्छा होता है। अगर Jameen की सहन करने की ताकत एक टन प्रति वर्गफुट सहन करने की होती है और हमने उसके ऊपर एक टन बोझ इस तरह से डाल दिया है कि जमीन का ½ वर्ग फुट उसे सहन करे तब वह जमीन उस सारे वजन को सहन न कर सकेगी और वजन नीचे ही नीचे धंसता चला जाएगा।

    लेकिन अगर हम ऊपर के एक टन वजन को इस तरह से डालें कि दो वर्ग फुट जमीन के ऊपर दबाव पड़े तो वह दबाव जमीन उसे अच्छी तरह से सहन कर सकेगी, जिस तरह से कि चित्र में दिखाया जा रहा है।

मिट्टी की धारण (सहन) करने की शक्ति के बारे में जांच करना-

मिट्टी की सहन करने की शक्ति के बारे में जानने के लिए कई तरह के तरीके होते हैं। इन तरह के तरीकों में से एक तरीका इस तरह से भी है कि जिस मिट्टी का परीक्षण करना हों, उस जमीन में एक फुट चौड़ा, एक फुट लम्बा और दो फुट गहरा गड्ढा को खोदा जाए। इसके बाद उस गड्ढे के ऊपर लकड़ी के एक वर्ग फुट चौकोर टुकड़े को रखा जाए। लकड़ी के इस चौकोर तरह के टुकड़े की लंबाई या तो आठ फुट नहीं तो दस फुट के आसपास होनी चाहिए। इस तरह के टुकड़े को उस चौकोर गड्ढे के अंदर एकदम से बिल्कुल सीधा खड़ा कर देना चाहिए। उस लकड़ी के ऊपर वाले हिस्से पर लकड़ी के मोटे तख्त इस तरह के लगा देने चाहिए कि उन पर जो वजन पड़े, वह बीच वाले लकड़ी के टुकड़े के ऊपर ही पड़ना चाहिए। इसके बाद उन तख्तों के ऊपर रेत से भरी हुई बोरियों को इस प्रकार से रखे कि उन सब बोरियों का वजन उस तख्ते पर ही पड़े।    जितना भार हम एक वर्ग फुट जमीन पर डालना चाहते हैं, उससे पच्चीस प्रतिशत ज्यादा भार को डालकर कई घंटों तक उस खंभे की जमीन में रसने देना चाहिए। जब हमको यह मालूम हो जाए कि खंभा अब नीचे की तरफ नहीं खिसक रहा है तो हम को यह जान लेना चाहिए कि इतनी गहराई में मिट्टी की ताकत निश्चित वजन को सहन कर सकती है। खंभे के ऊपर अगर फुटों और इंचों के निशान को लगा देते हैं तो एक दिन में रसने के हिसाब के बारे में भी मालूम कर सकते हैं। इस तरह की विधि से नींव की गहराई के बारे में अंदाजा लगाया जा सकता है।

मिट्टी की धारण करने की शक्ति में सुधार करना-

मिट्टी की धारण करने की शक्ति में सुधार करने के लिए कई तरीके होते हैं, जिनमें से कुछ तरीकों को निम्नलिखित रूप में बताया गया है जैसे-

  • अगर जमीन पर मकान को बनाने के लिए उसकी नींव को ज्यादा गहराई तक भरा जाए तो इससे नींव की मिट्टी को धारण करने की शक्ति बहुत ही ज्यादा बढ़ जाती है। लेकिन गहराई बढ़ने के साथ-साथ परतों की नमी को नहीं बढ़ने देना चाहिए।
  • जिस जगह पर मिट्टी ज्यादा मुलायम या नरम हो, उस जगह पर रेत, बजरी, रोड़ी अथवा रेत को फैलाकर अच्छी तरह से कुटाई करने से मुलायम अथवा नर्म मिट्टी की सहने की शक्ति बढ़ जाती है।
  • हमें इस बात के बारे में तो मालूम है कि मिट्टी की सहन करने की शक्ति एक निश्चित नमी पर ज्यादा होती है। इसलिए हम मिट्टी में से पानी को निकालने के प्रबंध में सुधार करके मिट्टी की सहन करने की शक्ति को और भी ज्यादा बढ़ा सकते हैं।
  • नींव में रेत को भरकर इसकी कुटाई करने से उसकी सहन करने की शक्ति बढ़ जाती है। यह सब उन स्थानों पर नहीं करना चाहिए, जिस जगह पर यह भय हो कि बहते हुए पानी में यह मिट्टी बह जाएगी। यह तरीका नदी के किनारे, कुएं के पास जहां पर चूहें व अन्य जानवर अपने घरों (बिलों) को बना सकते हों, जिनकी मदद से रेत दबाव पा करके बाहर की तरफ निकल सके, नहीं अपनाया जाना चाहिए।

जमीन को एकसमान करनाः-

जमीन की सफाई करना-

खरीदी गई जमीन पर सफाई के काम को शुरू करने से पहले उस जगह पर लगी हुई झाड़ियों, पेड़ों, घास एवं अन्य तरह की वनस्पति आदि को अच्छी तरह से साफ करना बहुत ही जरूरी होता है। इस जगह पर मलबा अथवा कूड़ा-करकट काम करने वाली जगह से पचास मीटर के अंदर साफ करना होता है। पेड़ों की जड़ों को जमीन के स्तर से कम से कम साठ सेंटीमीटर की गहराई तक खोदना चाहिए तथा उसके बाद इस जगह को मिट्टी से भर देना चाहिए।

मकान की बनावट को ठीक तरह से करना व बनाना-

जरूरी जगह पर स्तंभों की चिनाई निर्देश तल चिन्ह का काम करती है। यह निर्देश स्तर निशान जी.टी. एस से मिलते-जुलते होते हैं। इस तरह के काम को शुरू करने से पहले ही मकान को बनाने के तल का सही तरीके से कील, बांस व रस्सी या बुर्ज की बनावट को तैयार करके दिखाया जाता है। इस तरह की बनावट को काम के पूरा होने तक रखा जाता है।

कटाई तथा भराई-

जमीन की कटाई अधिकतर ऊपरी जमीन के ऊपरी हिस्से से नीचे की तरफ की जाती है। किसी भी स्थिति में जमीन के मध्य में कटाई करना अच्छा नहीं जाना जाता है। कटाई करने के बाद Jameen की सतह को अच्छी तरह से एक समान कर दिया जाता है। भराई को एक समान सतहों के रूप में किया जाता है, जबकि बीस सेंटीमीटर से ऊपर यह भराई नहीं होनी चाहिए। जमीन पर किसी भी तरह की जड़, घास व कूड़ा आदि नहीं होना चाहिए। इस तरह से एक समान सतह मिट्टी के ढोंकों के बिना होनी चाहिए। जरूरत होने पर इस पर पानी का छिड़काव भी किया जा सकता है। ऊपरी सतह अच्छी तरह से एक समान की जानी चाहिए। जमीन की कुटाई व भराई जरूरत के मुताबिक ही किसी भी सतह से की जा सकती है।

मिट्टी के काम का वर्गीकरण- अलग-अलग तरह की मिट्टी के काम करने के बारे में निम्नलिखित तरह से बताया गया है जैसे-

  1. एक समान जमीन में अलग-अलग प्रकार होते हैं जैसे-
    • वनस्पति या रासायनिक जमीन, तृण रहित जमीन, बालू, कंकड़, ईंट बनाने की मिट्टी, गारा, पथरी, चिकनी मिट्टी, गली हुई लकड़ी के टुकड़े, परतदार पत्थर।
    • ’अ’ में बताई गई मिट्टी का मिश्रण।
    • गारा क्रंकीट जमीन की सतह से नीचे।
    • साधारण तरीके से किसी भी तरह का सामान जिसके अंदर खोदने के गुण हों तथा परतों में तोड़ने के गुण हो।
  2. सख्त जमीन- इस तरह की जमीन निम्नलिखित प्रकार की होती है जैसे-
  • सख्त वजनदार मिट्टी, सख्त परतदार पत्थर, कोई भी मिट्टी जो कि फावड़े आदि से बहुत ही आराम से तोड़ी जा सके।
  • नाले की तल आधार की मिट्टी।
  • सड़को तथा मार्ग की सोलिंग और मजबूत अंदर की मिट्टी का मजबूत भाग।
  • किसी भी तरह की सतह जो कि पत्थर के टुकड़ों को पीटकर बनाई गई हो (घोल आदि)।
  • चूना, कंक्रीट, पत्थर की चिनाई (चूने के मसाले में) चूने अथवा सीमेंट के मसाले में ईंट का कार्य यह सब जमीन के स्तर से नीचे होता है।

साधारण चट्टानें या पत्थर- ये भी निम्नलिखित तरह के होते हैं जैसे-

  • चूने का पत्थर, लैटराईट, अन्य गर्म अथवा पृथक चट्टानें जो कि कीलों से तोडी जा सके।
  • प्रचलित सीमेंट कंक्रीट (जमीन की सतह से नीचे।)

अलग-अलग तरह की मिट्टियां-

मिट्टियां भी कई प्रकार की होती है जैसे-

चट्टानें- इस तरह की मिट्टी मकान की नींव डालने के काम में लाई जाती है। इसकी सहन करने की ताकत बहुत ही ज्यादा होने की वजह से यह मिट्टी दबाव डालने पर बहुत ही कम धसकती (बैठती) है।

रेत- रेत सूखा रहने पर असमंजक होता है, लेकिन रेत के गीला हो जाने पर अल्पसमंजक हो जाता है। रेत के कण छः मिलीमीटर से भी बड़े होते हैं। कई बार यह कण दो मिलीमीटर से भी छोटे हो जाते हैं। अगर इसको रोकने का ठीक तरह से इंतजाम किया जा सके, तो यह नींव में इस्तेमाल किया जा सकता है। अगर रेत पर दबाव डाला जाए तो इसका फैलाव बढ़ जाता है।

काली मिट्टी- काली मिट्टी पीट या बंगम के नाम से भी जानी जाती है। काली मिट्टी को गीला करने पर इसके ज्यादा फैल जाने की वजह से नींव के लिए इसका इस्तेमाल करना सही नहीं होता है। यह मिट्टी सूख जाने के बाद सिकुड़ जाती है। यह मिट्टी अधिकतर नदी आदि के किनारों पर मिलती है व दक्षिण भारत में यह मिट्टी बहुत ही ज्यादा पाई जाती है।

जलोद मिट्टी- इस तरह की मिट्टी पानी को बहुत ही आसानी से अपने अंदर सोख लेती है। इसलिए इस मिट्टी का इस्तेमाल जमीन में नींव के लिए अच्छी नहीं माना जाता है। इससे दोमट मिट्टी, चिकनी मिट्टी व रेत की परतें एक के बाद एक चढ़ी हुई होती है।

चिकनी मिट्टी- चिकनी मिट्टी के कण चिकने व कोमल लगभग 2.002 मिलीमीटर से भी छोटे आकार के होते हैं। इसलिए यह समंजक है। जब इस तरह की मिट्टी सूखी हो, तो मजबूत आकार की हो जाती है। यह मिट्टी पानी के मिलाने पर बहुत ही ज्यादा फैल जाती है, इससे इसका आयतन बढ़ जाता है और सूखने पर यह मिट्टी सिकुड़ जाती है। इस तरह से यह मिट्टी भी नींव के काम के लिए अच्छी नहीं मानी जाती है।

पत्थर तथा चिकनी मिट्टी मिली मिट्टी बोल्डर मिट्टी के नाम से जानी जाती है।

अगर इसमें रेतीले पत्थर भी हों, तो इसे हागिन के नाम से जाना जाता है और वनस्पतिक वस्तुएं मिली हुई होने पर दुमुट मिट्टी के नाम से जानते हैं।

कंकड़- कंकड़ अधिकतर रेत के अंदर मिले हुए होते हैं। इसके कण गोल व नोकदार होते हैं। अगर इसमें चिकनी मिट्टी की संख्या ज्यादा न हो, तो यह रेत नींव के लिए अच्छी मानी जाती है। यह रेत दबाव देने से ज्यादा नहीं फैलती है। लेकिन इस रेत का फैलाव रोकना बहुत ही जरूरी होता है।

चाक- चाक वैसे तो सख्त होता हैं लेकिन पानी में डालने से यह चाक मुलायम तथा नर्म हो जाता है। इसका नींव के लिए इस्तेमाल करना अच्छा नहीं माना जाता है।

मकान और भवनों के लिए वास्तु शास्त्र (Vastu Shastra for Home)

  1. भवनों के लिए वास्तुकला
  2. वास्तु सिद्धांत – भवन निर्माण में वास्तुशास्त्र का प्रयोग
  3. वास्तु शास्त्र के अनुसार घर कैसा बनना चाहिए
  4. विभिन्न प्रकार की भूमि पर मकानों का निर्माण करवाना – Vastu Tips
  5. घर की सजावट – सरल वास्तु शास्त्र
  6. मकान के वास्तु टिप्स – मकान के अंदर वनस्पति वास्तुशास्त्र
  7. मकान बनाने के लिए रंगों का क्या महत्व है?
  8. रसोईघर वास्तुशास्त्र – भोजन का कमरा
  9. वास्तु अनुसार स्नानघर
  10. वास्तु शास्त्र – बरामदा, बॉलकनी, टेरेस, दरवाजा तथा मण्डप
  11. वास्तु शास्त्र के अनुसार बच्चों का कमरा
  12. औद्योगिक इकाई – इंडस्ट्रियल एरिया

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