जीवन और वास्तुशास्त्र का संबंध

वास्तु शास्त्र

वास्तुशास्त्र का जीवन से संबंध

इस संसार में उत्पन्न होने वाला प्रत्येक प्राणी अपने जीने के लिए निरंतर सुख-साधनों को जुटाने में लगा रहता है। मनुष्य अपने लिए न केवल आवास का ही निर्माण करता है बल्कि समाज एवं समाज में जीने योग्य नियमों को भी बनाता है जिससे आगे चलकर उसका जीवन सुखमय व्यतीत हो सके। व्यक्ति अपने अनुसार निवास स्थान बनाता है और उसमें निवास करके सुखमय जीवन व्यतीत करने की इच्छा रखता है। जिन निवास स्थानों से मनुष्यों के सुख-दुखों का जुड़ाव होता है उस निवास स्थान पर निर्माण होने के बाद वह मकान पूर्ण रूप से दोषरहित एवं उत्तम होना चाहिए। अतः इन सभी बातों पर ध्यान देते हुए ही हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों ने Vastu Shastra की रचना की जिसके आधार पर निर्माण कार्य किया जा सके और उसमें रहने वाले लोग सुखी एवं प्रसन्न रह सके।

वास्तुशास्त्र का प्रभाव

 Vastu Shastra आज से दो सौ वर्ष पहले तक हमारे जीवन के हर पहलू को प्रभावित करता था लेकिन जब भारत में अंग्रेजों का शासन प्रारंभ हुआ वैसे ही इस अदभुत विद्या की हानि होने लगी। लोग-बाग इसे अपने जीवन में स्थान देने की बजाए ढोंग समझने लगे। व्यक्ति धर्म के प्रति काफी डरपोक होता है। उसके जीवन में जरा सा दुख आया नहीं कि वह हमेशा या किसी ऐसे सहारे की तलाश करता है जो उसे दर्द से छुटकारा दिला सकता है। इसी वजह से इन शास्त्रों की आवश्यकता पडने लगी। वर्तमान समय में लगभग सभी क्षेत्रों में इन शास्त्रों की आवश्यकता होती है।

वास्तु शब्द का ऋग्वेद से संबंध

     वास्तु शब्द ‘वस्तु’ शब्द से बना है। कोई भी योजना एवं निर्मित वस्तु-वास्तु के अंतर्गत आती है परंतु ऋग्वेद में वास्तु का अर्थ मकान के निर्माण के बारे में लिया गया है। वास्तुशास्त्र की उत्पत्ति वास्तु नामक पुरुष से हुई। पुराणों के अनुसार प्राचीन काल में एक विशाल प्राणी का जन्म हुआ जिसे देखकर इन्द्रादि देवता आश्चर्य चकित एवं भयभीत हुए क्योंकि इसका शरीर सारे लोकों में फैला हुआ था। सभी देवताओं ने उस प्राणी को मिलकर पृथ्वी पर गिरा दिया जिससे उसका शीश ईशान कोण में तथा पांव नैऋत्य कोण में हो गए। ब्रह्माजी ने इसे वास्तु पुरुष का नाम दिया जो भूमि पर शयन करते हैं।




     अधोमुख वास्तु पुरुष के शरीर में शिख्यादि देवों का स्थापन किया जाता है परंतु पूजाकाल के समय उत्तान देय का स्मरण करना चाहिए। गृहकर्म में इक्यासी एवं प्रसाद कार्य में चौंसठ कोष्ठात्मक वास्तु मंडल निर्माण एवं पूजा का विधान है। इसीलिए विश्वकर्मा ने सबसे पहले मकान के चित्रांकन एवं निर्माण की विधि को प्रकट किया जिसे वास्तुशास्त्र कहते हैं।

        ग्यारहवीं शताब्दी में महाराजा भोजदेय ने ‘समरांगण सूत्रधार’ नामक पुस्तक लिखी जो Vastu Shastra का प्रमाणिक एवं अधिकृत ग्रंथ है। इस ग्रंथ में सम्पूर्ण राष्ट्र, नगर, बस्तियां, सभा भवन, वेश्य एवं विभिन्न प्रकार के पलंग, बैठने के आसन आदि तथा इनके अतिरिक्त अन्य जिन निर्माण कार्यों में वास्तु शास्त्र के नियमों का पालन किया गया है वही कल्याणकारी है।

     इस तथ्य से कोई अंजान नहीं है कि मानव शरीर पंचतत्वों से निर्मित हुआ है। पृथ्वी, जल, आकाश, वायु एवं अग्नि। मानव जीवन में ये तत्व संतुलित रहें तो मानव जीवन सुख शांति एवं प्रसन्नतापूर्वक व्यतीत होता है। बुद्धि संतुलित रहती है और व्यक्ति अपने जीवन में उच्च निर्णय लेकर सुख संतोष प्राप्त करता है।

     पृथ्वी जिस प्रकार घूमती है ठीक उसी प्रकार ग्रह भी परिक्रमा करते हैं। पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण शक्ति आभा मंडल की शक्तियां, चुम्बकीय शक्ति तथा विद्युत चुम्बकीय शक्तियों का प्रभाव ही Vastu Shastra का मूलभूत सिद्धांत है। यही शक्तियां किसी भी निर्माण किए गए मकान में भी मौजूद रहती है जो मानव शरीर की विद्युत चुम्बकीय शक्ति को प्रभावित करके शुभ या अशुभ फल देती है।

वास्तु शास्त्र की सम्पूर्ण जानकारियां

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  7. वास्तु का व्यक्ति के जीवन पर प्रभाव
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(This content has been written by Super Thirty India Group)

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