भारतीय ज्योतिष शास्त्र

Hindu Astrology

ज्योतिष शास्त्र (Hindu Astrology) – व्यावहारिक खगोलशास्त्र

अंग्रेजी भाषा का एस्ट्रालाजी शब्द दो शब्दों एस्ट्रों-नक्षत्र और लोगोस-कारण अथवा तर्क से मिलकर बना है। संस्कृत में इसे ज्योतिष शास्त्र अथवा प्रकाश का विज्ञान कहा जाता है। हिंदू ज्योतिष शास्त्र (Hindu Astrology) समय के विकास के नियमों पर आधारित है।

हमारे पुराने महर्षि ज्ञान की सभी शाखाओं के बारे में पूरी तरह से जानकारी रखते थे और उन्होने जीवन की उन सभी परेशानियों का हल निकाल लिया था, जिन्हें अब आधुनिक विज्ञान हल करने के लिए कोशिश में लगा हुआ है। हमारे चतुर तथा कुशल ज्योतिषी किसी व्यक्ति के होने वाली कई तरह की अलग-अलग रोगों के बारे में पहले से ही भविष्यवाणी कर सकते हैं, ये क्षमताएं दूसरों के पास नहीं है।

इसके बारे में कुछ ऋषियों ने इस तरह से भी कहा है कि-    

दर्पण मिथ्यावत्’ यानी कि दर्पण के द्वारा जो दृश्य देखा जाता है वह असलियत में सच्चाई का प्रतिनिधित्व नहीं करता है। नक्षत्र और ग्रह अंतरिक्ष में पदार्थ की अभिव्यक्ति हैं और वे हमेशा गुरुत्वाकर्षण के प्राकृतिक सिद्धान्तों के अनुसार ही चलते हैं, ज्योतिष शास्त्र (Hindu Astrology)  वह विज्ञान है जो मनुष्यों और सांसारिक कामों पर पड़ने वाले उनके असर (प्रभावों) के बारे में जानकारी रखता है। संबद्धता, आंसजन अथवा चिपकाव, गुरुत्वाकर्षण और रासायनिक संयोग ब्रह्माण्डीय शक्तियां है जो हमेशा कार्य को करती रहती है। किसी भी तत्व का सबसे छोटा कण जिसके बारे में हम सोच सकते हैं, एक अणु है। इसके केंद्र बिंदु में एक नाभिक भी होता है, जिसको प्रोटोन के नाम से जाना जाता है। इसके चारों तरफ बनाए गए रास्ते पर इलेक्ट्रोन चक्कर काटते रहते हैं, जिस तरह से सूरज के चारों तरफ ग्रह चक्कर काटते हैं। इस जमीन पर रहने वाला मनुष्य ऐसे कई अणुओं का मिला-जुला मिश्रण है और निश्चित रूप से सौरमंडल में होने वाले बदलावों से प्रभावित होता रहता है।




चट्टानों को बनाना और उनका टूटना, जलवायु और माहौल का बदलाव, रात तथा दिन, वस्तुओं का बनना तथा बिगड़ना, यह सब कुछ सौरप्रभावों द्वारा होता है जिसका ज्ञान ज्योतिष शास्त्र (Hindu Astrology) में दिया गया है। सूरज की वजह से बारिश होती है तथा इस बारिश का हमारी फसलों और पेड़-पौधों पर भी असर होता है तथा इसके बाद उनका असर पशुओं और मनुष्यों के जीवन, उनके स्वास्थ्य, धन-संपत्ति तथा आर्थिक मामलों पर भी होता है।

जब किसी बच्चे का जन्म होता है और जिस महत्वपूर्ण समय में वह बच्चा अपनी पहली सांस लेता है, उस समय उसके चारों तरफ की परिस्थितियां उसके भविष्य पर भौतिक असर डालने वाली होती है, इसलिए जन्म के संयोग की किसी भी तरह से तुलना नहीं की जा सकती है। ग्रहों की किरणों का कोणीय निर्माण हर सेकेंड़ के बाद बदलता रहता है, इसके फलस्वरूप, सांसारिक प्राणियों तथा वस्तुओं आदि पर भी उसका असर आवश्यक रूप से बदलता रहता है। इस धरती पर लगभग दो अरब से ज्यादा मनुष्यों की आबादी है, लेकिन कोई भी दो व्यक्ति, यहां तक कि दो जुड़वां बच्चें भी अलग-अलग तरह से अपना व्यावहार करते रहते हैं।

अपने जन्म लेने के बारे में मनुष्य के पास अपनी कोई पसंद नहीं होती है, जिसके बारे में यह कहा जा सके कि उस व्यक्ति को अपनी पसंद के माता-पिता के यहां ही जन्म लेना चाहिए। यह सब कुछ भगवान के ऊपर ही निर्भर होता है, जो मनुष्य के पहले के जन्म के कर्मों के अनुसार ही किया जाता है। एक धनवान व्यक्ति का बच्चा अपने जन्म के संयोग से लाखों का उत्तराधिकारी हो जाता है, परंतु हो सकता है कि एक बहुत ही ज्यादा प्रतिभाशाली व्यक्ति अच्छे जीवन के स्तर को बिताने के काबिल भी नहीं होता है। इसी तरह के कर्म का नियम अथवा निरंतता का सिद्धान्त प्रकट होता है, क्योंकि इसके बगैर संसार में जो अनेको बुराईयां होती है, उनका संतोषजनक रूप से बखान नहीं किया जा सकता है। एक गाली देने वाली आवाज बहुत ही छोटी सी न दिखाई देने वाली तरंग होती है, जो कि व्यक्ति के दिमाग पर असर ड़ालती है और उसको दुख पहुंचाती रहती है, इसी तरह से छोटी सी प्रंशसा के बारे में भी कहा जा सकता है। चंद्रमा क्योंकि दिमाग पर असर ड़ालता है, इसलिए सम्पूर्ण चंद्र और नवचंद्र के दिनों में हम पागलों को बहुत ज्यादा सनकी होते हुए देखते हैं। ज्योतिष शास्त्र (Hindu Astrology) में यह बताया गया है कि व्यक्तियों की तीन प्रवृत्तियां सत्तव (शुद्धता), राजस (कार्य) और तामस (आलस्य) उसके द्वारा ग्रहण किये जाने वाले भोजन पर निर्भर करता है। इन सभी तरह की बातों में हम वास्तविक व्यक्तियों पर बहुत ही छोटे-छोटे प्रभावों के पड़ने के बारे में देखते हैं।

ब्रह्नाण्ड की तुलना में व्यक्ति एक पिडं अंड है और इसी के फलस्वरूप व्यक्ति के सुख-दुख अथवा उसके जीवन के उतार-चढ़ाव उन बदलावों के अनुसार होते हैं, जो धरती तथा आकाश में घटित होते हैं, सूरज के चारों तरफ अपनी कक्षा में यात्रा करते समय धरती सूरज के गुरुत्वाकर्षण के कार्य में रुकावटें डालती है तथा ये रुकावटें लहरों के रूप में फैलती रहती है। इसी तरह के असर और दूसरे ग्रहों तथा चंद्र के द्वारा भी पैदा होते हैं जिनको कि मनुष्य की आंखें नहीं देख पाती है। इन ग्रहों का असर जब सूरज जैसे बहुत ही बड़े पिंड़ पर हो सकता है, तब मानव के बहुत मुलायम यांत्रिक और छोटी सी आकृति वाले प्राणी पर पड़ने वाले असर की तेजी के बारे में खुद ही अंदाजा लगाया जा सकता है।

इसी तरह सभी के जीवन पर, चाहे वह गतिशील हो या अचल, सूरज, ग्रहों और नक्षत्रों का प्रभाव होता है तथा ज्योतिष शास्त्र (Hindu Astrology)  से हमें यह भी ज्ञान प्राप्त होता है कि वे हमें कब तथा किस तरह से प्रभावित करते हैं। क्या वे अच्छे, बुरे अथवा प्रभावरहित हैं और हम किस तरह से उनको कम या ज्यादा कर सकते हैं अथवा ग्रहों की अवस्था से होने वाले गलत प्रभावों को प्राचीन ऋषियों के द्वारा निर्धारित उपचार की क्रियाओं को अपनाकर दूर किया जा सकता है।

ज्योतिष शास्त्र (Hindu Astrology) का आधार-

खगोलशास्त्र अथवा नक्षत्र विज्ञान को ज्योतिष शास्त्र (Hindu Astrology) का आधार माना जाता है। इसमें जिन वास्तविक कारकों की गिनती की जाती है, उनके नाम है- सूर्य, उसके सभी तरह के ग्रह, चंद्रमा, राशियां, नक्षत्र समूह और आकाश का दूसरा परिदृश्य, इनमें से सभी के स्वभाव अथवा उनकी गति की स्थिति को एक निश्चित कोण से जाना जा सकता है और मनुष्य, निश्चित क्षेत्रों, देशों या पूरे संसार के बारे में भविष्यवाणी की जा सकती है।

राशिचक्र और सौरमंडल-

राशिचक्र आसमान में एक काल्पनिक रास्ता होता है जो कि लगभग 18 डिग्री चौड़ा होता है, जिसके बीच में से सूर्यमार्ग निकलता है, जो सूरज, चंद्र और सभी ग्रहों की गतियों की पृष्ठभूमि को बनाता है। इनको नंगी आंखों से नहीं देखा जा सकता है, इनके बारे में मालूम सिर्फ ग्रहों की गति की जांच करने के बाद ही होता है। सूरज के रास्ते को तीस डिग्री के बारह बराबर-बराबर हिस्सों में विभाजित किया जाता है और सभी को राशिचक्र की राशि के नाम से जाना जाता है। जहां तक ज्योतिष का संबंध है तो इसके आधार पर सौरमंडल का अधिपति (स्वामी) सूरज को माना जाता है। इससे सूरज के अलावा चंद्र, धरती, मंगल, बुध, गुरु अथवा बृहस्पति, शुक्र तथा शनि एवं जो छाया को डालने वाले बिंदु राहु ग्रह और केतु ग्रह शामिल है। यूरेनियम, नेपच्यून और प्लूटों, इन तीनों ही ग्रहों के बारे में यह भी जाना जाता है कि इन ग्रहों का व्यक्ति के कार्य करने की गति पर किसी भी तरह का कोई असर नहीं पड़ता है।

नक्षत्र तथा तारे-

नक्षत्रों का मानव जीवन पर प्रभाव

सूरज का रास्ता 27 नक्षत्र समूहों या तारक बिंदुओं से अंकित है, इनमें से सभी 13.1/3 डिग्री की दूरी पर हैं। राशियों और तारों का समूह दोनों एक ही बिंदु से गिने जाते हैं, जैसे कि- मेष राशि की शून्य डिग्री देशांतर रेखा यानी कि मेष राशि की शुरुआती बिंदू अश्विनी नक्षत्र समूहों का भी पहला बिंदु जाना जाता है।

ज्योतिष शास्त्र (Hindu Astrology) के अनुसार राशिचक्र की सभी राशियों की अपनी विशेषताएं मानी जाती है जैसे-

क्रम संख्या राशि (हिंदी) अंग्रेजी में उसका विस्तार मेष की 0 डिग्री से
1. मेष एरीज 0 से 30
2. वृषभ ताउरस 30 से 60
3. मिथुन जेमिनी 60 से 90
4. कर्क केंसर 90 से 120
5. सिंह लियो 120 से 150
6. कन्या वर्गों 150 से 180
7. तुला लिब्रा 180 से 210
8. वृश्चिक स्कार्पिओ 210 से 240
9. धनु सेजिटेरियस 240 से 270
10. मकर केप्रीकान 270 से 300
11. कुंभ एक्वेरियस 300 से 330
12. मीन पैसीज 330 से 360

भारतीय ज्योतिष शास्त्र (Hindu Astrology) में ग्रहों का इस्तेमाल आकाशीय पिंडों अथवा बिंदुओं के रूप में किया जाता है और उनमें आकर्षण का गुण भी होता है। ये ग्रह इस तरह से है-

क्रम संख्या ग्रह- (हिंदी) अंग्रेजी में
1. रवि (सूर्य) सन
2. चंद्र (सोम) मून
3. कुज (मंगल) मार्स
4. बुध मरकरी
5. गुरु (बृहस्पति) जूपिटर
6. शुक्र वीनस
7. शनि सेटर्न
8. राहु ड्रेगन्स हेड
9. केतु डेगन्स टेल

चंद्रमा धरती के चारों तरफ अपनी कक्षा में ज्यादा से ज्यादा सताईस दिन में एक चक्कर लगाता है, इन दिनों के नाम इस तरह से है जैसे- अश्विनी, भरणी, रोहिणी, आर्द्रा, कृत्तिका, मृगशिरा, पुष्य, मघा, आशलेषा, हुब्बा (पुर्वा फाल्गुनी), उत्तरा फाल्गुनी, चित्रा, हस्त, विशाखा, स्वाति, ज्येष्ठा, अनुराधा, उत्तराषाढ़ा, पूर्वाषाढ़ा, शतभिषा, धनिष्ठा, श्रवण, उत्तराभाद्रपद, पूर्वाभाद्रपद तथा रेवती। उत्तराषाढ़ा और श्रवण के मध्य अभिजित अठाईसवां नक्षत्र है, पर इसे ज्यादा महत्व नही दिया जाता है।

jyotish shastra in Hindi

हजारों सालों पहले मनुष्य को इस बारे में किसी भी तरह का ज्ञान नहीं था कि यह धरती या पृथ्वी गोल है अथवा चौकोर। कई सौ सालों पहले ही मनुष्य ने इसके बारे में यह जाना कि यह पृथ्वी गोल है, लेकिन उनको यह नहीं मालूम था कि वह ब्राह्नाण्ड का केंद्र है या सूरज का चक्कर लगाने वाले ग्रहों की तरह एक ग्रह। परंतु अब वह मनुष्य यह जानता है कि सूरज एक नक्षत्र है और ग्रहों के चक्कर लगाने वाले पिंड चंद्रमा को जाना जाता है।




इसके बारे में यह भी कहा जाता है कि हमारी धरती सूर्य का चक्कर लगाते हुए अंतरिक्ष में घूमती रहती है। सूर्य को मिलाकर सूर्य का यह परिवार सौरमंडल के नाम से जाना जाता है। इसकी उत्पत्ति कम से कम पांच अरब साल पहले हुई थी। इसमें नौ ग्रहों को शामिल किया जाता है और 33 चंद्रमा, जिनके कि बारे में हम जानते हैं। इसमें से कई हजार छोट-छोटे ग्रह और ग्रहिकाएं भी शामिल हो जाती है। सौरमंडल के बीच में उपस्थित सूरज सबसे बड़ा पिंड होता है। यह चमकती हुई गैस का बहुत बडा गोला होता है और इस गोले का व्यास 1, 392000 किलोमीटर (865000 मील) है और धरती का केवल 13000 किलोमीटर (8000 मील)। सूरज की सतह या तल पीली व गर्म होती है और उसकी गर्मी 6000 डिग्री सी (सेलिसियस) है। इससे अतंरिक्ष में जो तेज रोशनी और ताप निकलता है, उसकी वजह से इसके सबसे पास के ग्रह बुध में जीवन का पनपना बहुत ही मुश्किल है।       इसी तरह से अधिकतम दूरी पर स्थित ग्रहों पर भी जीवन का पनपना आसान नहीं है, क्योंकि वे इतनी दूरी पर होते हैं कि वे सर्दी से जम जाते हैं और जहां तक हम जानते हैं, जीवन सिर्फ पृथ्वी या धरती पर ही होता है। जिस रास्ते से ग्रह सूरज के चक्कर काटते हैं, उस रास्ते को कक्षा अथवा परिक्रमा का रास्ता भी माना जाता है। कक्षाएं चौकोर गोले की तरह अथवा अंडाकार की तरह होती है। उनमें से ज्यादातर कक्षाएं गोल आकार की ही होती है। प्लूटों की कक्षाओं को छोड़कर वे लगभग एक ही स्तर पर टिकी होती है या वे ज्यादा झुकी हुई नहीं होती है। ज्यादातर ग्रहों के चारों तरफ उनके चंद्रमाओं की कक्षाएं होती है।

Hindu Astrology और विज्ञान दोनों ने बुध ग्रह को सूर्य के सबसे पास बताया है, जो कि सूर्य से लगभग 57,900,000 किलोमीटर की दूरी पर होता है, इसके बाद शुक्र ग्रह सूर्य के पास होता है जो कि लगभग 108,200,000 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। धरती अथवा पृथ्वी सूर्य से 149,598,000 किलोमीटर की दूरी पर, मंगल (कुज) ग्रह सूर्य से 227,900,000 किलोमीटर की दूरी पर, बृहस्पति (गुरु) ग्रह 778,300,000 किलोमीटर की दूरी पर, शनि ग्रह 1,427,000,000 किलोमीटर की दूरी पर, यूरेनस ग्रह 2869,600,000 किलोमीटर की दूरी पर, नेपच्यून ग्रह 4,496,600,000 किलोमीटर की दूरी पर, प्लूटो ग्रह की सूर्य से 5,900,000,000 किलोमीटर की दूरी पर होते हैं। कुल मिलाकर नौ ग्रह जहां तक चंद्रमाओं की संख्या के बारे में प्रश्न है, बुध ग्रह और शुक्र ग्रह के कोई चंद्रमा नहीं, धरती का एक, मंगल ग्रह के दो, बृहस्पति के 13, शनि ग्रह के दस (छल्ले), यूरेनस ग्रह के पांच, नेपच्यून ग्रह के दो चंद्रमा माने जाते हैं। धरती या पृथ्वी की अपनी कक्षा के चक्कर लगाने की गति 20.27 किलोमीटर प्रति सेकेंड होते हैं तथा साल की लंबाई 365.25 दिन और दिन की समय अवधि चौबीस घंटे, छप्पन मिनट, चार सेकेंड होती है।

सूर्य का ज्यादातर हिस्सा हाइड्रोजन गैस के रूप में होता है जो धीरे-धीरे ऊर्जा को छोड़ते हुए हीलियम में बदलती रहती है। सबसे अंदर के चार ग्रह ज्यादातर चट्टान और धातुओं से बने होते हैं। उनमें हाइड्रोजन और हीलियम की मात्रा बहुत ही कम होती है। ये गैसें सम्पूर्ण सौरमंडल से सबसे साधारण पदार्थ हैं। दूसरे ग्रहों की अपेक्षा में धरती, जो कि सूरज के बाद से तीसरा ग्रह होता है, ऑक्सीजन तथा पानी की बहुत ज्यादा मात्रा होती है। इसके अलावा नाइट्रोजन, कार्बन, हीलियम आदि भी होते हैं। इसकी परत का तापमान जीवन का विकास होने देने के योग्य है, चाहे वह बर्फ से ढके हुए ध्रुव प्रदेश हो अथवा सबसे गर्म स्थान रेगिस्तान। धरती का तीन-चौथाई हिस्सा (भाग) पानी का माना जाता है तथा इसका एक चौथाई भाग स्थल (जमीन, भूमि)। धरती की सबसे प्राचीन जानने वाली सभ्यताएं नदियों के तटों पर पाई जाती है, सागर के तटों पर नहीं पाई जाती।

सूर्य को खुद ही एक तारे के नाम से जाना जाता है। यह करोड़ों तारों में से एक तारा होता है। तारों के मंडल या नक्षत्र मंडल को आकाश गंगा के नाम से भी जानते हैं और यह बहुत ज्यादा बड़ा होता है। अंतरिक्ष में ज्ञात यह दूसरी सबसे बड़ी आकाश गंगा होती है। सबसे बड़ी ज्ञात आकाश गंगा को एंड्रोमेड़ा के नाम से भी जाना जाता है। सूर्य अपने परिवार के ग्रहों के साथ धीरे-धीरे आकाश गंगा के केद्र के तारों तरफ घूमता है। इसे एक यात्रा (चक्कर) को पूरा करने में दो सौ पच्चीस साल लग जाते हैं।

जिस तरह से सभी ग्रह सूर्य के चारों तरफ अपनी कक्षा में चक्कर लगाते हैं और वे अपनी कक्षा में सूर्य के गुरुत्वाकर्षण बल की वजह से बने रहते हैं। उसी तरह से चंद्रमा भी पृथ्वी या धरती का चक्कर लगाता रहता है। चंद्रमा की कक्षा गोल आकार की न हो करके अंडे के आकार की तरह होती है। चंद्रमा में भी बहुत ज्यादा ताकत होती है, जो कि धरती को प्रभावित करती है। इसके परिणामस्वरूप समुद्र के पानी में हर दिन ज्वार आता रहता है। धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति चंद्रमा से ज्यादा ताकतवर मानी जाती है। (चंद्रमा का व्यास 3475 किलोमीटर है तथा यह धरती से लगभग पांच लाख हजार किलोमीटर दूर है) क्योंकि वह उससे ज्यादा बड़ी और वजनदार होती है। सूरज की गुरुत्वाकर्षण शक्ति उससे कही ज्यादा ताकतवर है तथा वह सभी ग्रहों को अपने चारों तरफ अंडाकार रास्ते में रखती है।

ज्योतिष शास्त्र (Hindu Astrology) में यह भी बताया गया है कि ग्रहों की तरह ही चंद्रमा में भी अपनी खुद की रोशनी नहीं होती है। चंद्रमा सूरज से मिलने वाली रोशनी को प्रतिबिंबित करता है। सूर्य के द्वारा हर समय अर्ध चंद्रमा रोशनी बखेरता रहता है। परंतु धरती से चंद्रमा के परिक्रमा के रास्तों की अलग-अलग अवस्थाओं में उसकी रोशनी वाले हिस्से का अलग-अलग रूप दिखाई देता है। कभी-कभी धरती के सामने पड़ने वाले चंद्रमा का पूरा का पूरा हिस्सा (भाग) सूरज की रोशनी को प्रतिबिंबित करता दिखाई देता है। इसको पूर्ण चंद्रमा के नाम से जानते हैं। दूसरे समयों पर चंद्रमा की सिर्फ एक बहुत ही बारीक आधी रेखा चमकती हुई दिखाई देती है, इस तरह की चमकती हुई आधी रेखा को अर्ध चंद्रमाकार के नाम से जानते हैं। धरती से दिखाई देने वाले चंद्रमा के अलग-अलग रूपों को चंद्रमा की कलाओं के नाम से जाना जाता है। चंद्रमा साढ़े उन्नतीस दिन में अपनी सभी तरह की कलाओं को पूरा कर लेता है (इस तरह की अवधि को चंद्रमास के नाम से जानते हैं) ये इतने निश्चित और नियमित रूप से होता है कि उनका इस्तेमाल समय की गिनती करने से हो जाता है। Hindu Astrology को पढ़ने पर पता चलता है कि जब चंद्रमा लगभग सूर्य तथा धरती के बीच में होता है तो तब उसकी दूसरी तरफ की सतह पर सूरज की रोशनी पड़ती है, लेकिन वह पृथ्वी से नहीं देखा जा सकता क्योंकि उस समय चंद्रमा छुप जाता है और इसको नवचंद्र के नाम से जानते हैं।     भारतीय कलेंडर के आधार पर नवचंद्र से पूर्ण चंद्र तक के विकास की समय अवधि को शुक्ल पक्ष तथा पूरे चंद्र से नवचंद्र तक की समय सीमा को कृष्ण पक्ष के नाम से जानते हैं। चंद्रमा अपनी कक्षा में धरती के चारों तरफ पूरा चक्कर लगाने के बाद साढे उन्नतीस दिनों से थोड़ा कम ही समय लेता है जो कि साढ़े सताईस दिन का होता है। वह अपनी धुरी पर चक्कर लगाने पर 27.33 दिन का समय लेता है। जब चंद्रमा अपनी कक्षा के चारों तरफ एक चक्कर पूरा करता है, पृथ्वी इस समय में सूर्य के चारों तरफ स्थित कक्षा में कुछ दूरी को पूरा कर लेती है यानी कि सूर्य तथा धरती की रेखा आगे की तरफ बढ़ जाती है।

सूर्यग्रहण जब होता है वह सिर्फ नवग्रह अमावस्या के मौके पर ही होता है, जबकि चंद्रमा की अंधकारयुक्त सतह धरती की तरफ तथा सूर्य से प्रकाशित सतह दूसरी तरफ से होती है। उसके उल्टा जिस समय चंद्रग्रहण लगता है, उस अवसर पर (पूरा चंद्र) पूर्णमासी होती है, तब धरती ठीक चंद्रमा तथा सूर्य के बीच में होती है।

यह विषय ज्योतिष शास्त्र (Hindu Astrology)  के ज्ञान के लिए प्रांसगिक है। ये दोनों मिलकर प्राचीन वास्तु शिल्प शास्त्र के मूल नियमों के विकास पर प्रभाव ड़ालते हैं।

लेकिन हिंदुओं की ब्रह्नांडीय धारणा के आधार पर, सारा का सारा संसार विष्णु भगवान का शरीर माना गया है।

विष्णु सहस्त्रनाम के एक श्लोक में इसका बहुत ही साधारण तरीके से वर्णन किया गया है जो कि इस तरह से हैः-

  1. विष्णु भगवान के चरणों को धरती कहा गया है।
  2. विष्णु भगवान की नाभि को आसमान का नाम दिया गया है।
  3. वायु को विष्णु भगवान की सांस के नाम से जाना जाता है।
  4. इसी तरह से विष्णु भगवान की आंखों को सूर्य और चंद्रमा कहा गया है।
  5. दिशाबिंदु को विष्णु भगवान का कान माना जाता है।
  6. विष्णु भगवान के सिर को स्वर्ग का नाम दिया गया है।
  7. आग को विष्णु भगवान का मुंह माना जाता है।
  8. सागर को विष्णु भगवान का मकान कहा जाता है।
  9. उसी प्रकार से पेट को देवों, राक्षसों, गंधर्वों, पुरुषों-स्त्रियों, पक्षियों, पशुओं आदि का संसार माना गया है।

वास्तु शास्त्र की सम्पूर्ण जानकारियां

  1. जीवन और वास्तुशास्त्र का संबंध
  2. जाने घर का सम्पूर्ण वास्तु शास्त्र
  3. घर, ऑफिस, धन, शिक्षा, स्वास्थ्य, संबंध और शादी के लिए वास्तु शास्त्र टिप्स
  4. वास्तु शास्त्र के आधारभूत नियम
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  6. अंक एवं यंत्र वास्तु शास्त्र
  7. विभिन्न स्थान हेतु वास्तु शास्त्र के नियम एवं निदान
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  9. हिन्दू पंचांग अथार्त हिन्दू कैलेंडर क्या है?
  10. युग तथा वैदिक धर्म
  11. भवनों के लिए वास्तुकला

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