Wed. Jun 3rd, 2020

UNESCO ने भी माना हमारी इस ‘परंपरा’ का लोहा

कुंभ मेला

भारत ने हमेशा से ही अपनी परंपराओं से पूरी दुनिया को आकर्षित किया है। अब एक बार फिर यूनेस्को ने भारत की एक धार्मिक परंपरा को अपनी मान्यता दी है। बता दें कि यूनेस्को ने कुंभ मेले (Kumbh Mela) को “अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर” सूची में शामिल किया है। यूनेस्को ने अपने ट्विटर अकाउंट पर इसकी जानकारी दी है।

Cultural Heritage

प्रबंधन से दुनिया हैरान

कुंभ मेला अपनी धार्मिक मान्यताओं के लिए तो प्रसिद्ध है ही, इसके अलावा इस मेले में आने वाली भीड़ का प्रबंधन भी किसी आश्चर्य से कम नहीं है। बता दें कि पिछली बार कुंभ मेला साल 2013 में इलाहाबाद में आयोजित हुआ था, जिसमें करीब 10 करोड़ लोगों ने गंगा के पवित्र जल में डुबकी लगायी थी। इतनी बड़ी भीड़ का प्रशासन ने जिस तरह से बिना किसी सख्ती के प्रबंधन किया, यह देखकर दौरे पर आए अमेरिका के अधिकारी भी हैरान रह गए थे। यही वजह है कि अमेरिका ने उस वक्त उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को कुंभ मेले में भीड़ प्रबंधन पर लेक्चर देने के लिए हावर्ड विश्वविद्यालय में आमंत्रित किया था।

हिंदुओं की आस्था का केन्द्र ‘कुंभ मेला’

पौराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान अमृतकलश से कुछ बूंदे छलक कर धरती पर 4 जगह प्रयाग, नासिक, उज्जैन और हरिद्वार में गिरी। अमृत गिरने के कारण बारी-बारी से हर जगह 12 साल बाद कुंभ का मेला लगता है। जिसमें हर साल करोड़ों लोग शामिल होते हैं।

भारत की अन्य धरोहरें

कुंभ मेला भारत की कोई पहली सांस्कृतिक या धार्मिक धरोहर नहीं है, जिसे यूनेस्को ने मान्यता दी है। इससे पहले साल 2010 में ओडिशा, बंगाल, झारखंड का छउ नृत्य, राजस्थान के कालबेलिया नृत्य और केरल के मुडियाट्टू नृत्य को भी यूनेस्को ने अपनी अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल किया था। इसके बाद साल 2012 में लद्दाख के बौद्ध मंत्रोच्चार, साल 2013 में मणिपुर का संकीर्तन, साल 2014 में पंजाब का पीतल और तांबा बर्तन का काम, साल 2016 में योग और नवरोज को भी यूनेस्को ने सांस्कृतिक धरोहर में शामिल किया था।

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