मकान के लिए रंगों का महत्व

मकान के लिए रंगों का महत्व

Importance of Colors in Home Design

रंगशास्त्र

जिस प्रकार सामाजिक निर्माण के लिए वास्तुशास्त्र का अपना महत्व है उसी प्रकार रंगशास्त्र का भी अपना अलग महत्व है। रंगशास्त्र भी वास्तुशास्त्र के समान एक स्वतंत्र शास्त्र है। वास्तुशास्त्र में रंग का बेहद महत्व है। रंगों से मानव मस्तिष्क पर बेहद प्रभाव पड़ता है। रंगों का संबंध प्रकृति तथा पंचतत्वों से होता है और पंचतत्वों का अपना एक खास रंग होता है। वास्तुशास्त्र में रंगशास्त्र का महत्व काफी ऊंचा है। वास्तुशास्त्र में जमीन की मिट्टी के रंग से लेकर दीवारों के रंग के महत्व के बारे में बताया गया है।

किसी भी स्थान पर मकान का निर्माण करवाते समय उस स्थान के मिट्टी के रंग के बारे में जाना जाता है। यदि मिट्टी सफेद रंग की हो तो इस स्थान पर मकान बनवाने से परिवार के जो व्यक्ति तत्वज्ञाता एवं बुद्धि सम्पन्न बनना चाहते है वे थोड़ी सी परेशानियों से इन्हें प्राप्त कर लेते हैं अतः तत्वज्ञाता एवं बुद्धि सम्पन्न बनने के लिए सफेद मिट्टी वाली जमीन पर घर बनाना अच्छा रहता है। लाल रंग की मिट्टी वाली जमीन शूरता के लिए अच्छी होती है। पीले रंग की जमीन व्यापरियों के लिए लाभकारी होती है। आर्थिक उन्नति के लिए यह बहुत ही लाभकारी होती है। जहां तक हो सके काली जमीन वास्तु बनाने के लिए पसंद न की जाएं। जहां तक हो सके काली जमीन वास्तु बनाने के लिए पसंद न करें।

सफेद रंग की जमीन पर वास्तु बिल्कुल सीधे और अति अल्प खर्च में तैयार हो सकती है। लाल रंग की जमीन में मजबूत तथा आकर्षक मकान बन सकता है और वह भी साधारण खर्च में। पीले रंग की जमीन पर बने मकान में रहने वाला परिवार हमेशा सुखी और समृद्ध रहते हैं। काले रंग की जमीन पर मकान बनवाना काफी खर्चीला होता है। इस स्थान पर मकान बनवाने के लिए व्यक्ति को काफी परेशानियों एवं दौड़धूप करनी पड़ती है। मकान के पूरे होने के उपरांत भी वहां रहने वाले परिवार को काफी कष्ट उठाने ही पड़ते हैं।

सफेद मिट्टी- यह मिट्टी अति अल्प समय एवं खर्च में वास्तु बनाने के लिए अति उत्तम है।

काली मिट्टी- मकान बनाने में काफी खर्च होता रहता है। यहां रहने वाले परिवार को बहुत ही कष्ट उठाने पड़ते हैं। कष्ट ही पूरे जीवनभर रहता है।

पीली मिट्टी- व्यापारी एवं उद्योगपतियों को अत्यंत उत्तम, लाभदायिनी, व्यापारी वर्ग का वास्तु के लिए अत्यंत लाभदायक।

कंकरीली मिट्टी यानी लाल जमीन- कम कष्ट करके पर्याप्त मात्रा में धनप्राप्ति। परिवार के लोग होशियार और कर्तव्यवान होते है। वंशवृद्धि होती हैं तथा शौर्यप्राप्ति होती है।

प्रकृति में पाए जाने वाले विभिन्न रंगों का व्यक्ति एवं वातावरण पर नकारात्मक एवं सकारात्मक प्रभाव अवश्य पड़ता है। ये न केवल व्यक्ति को प्रभावित ही करते हैं बल्कि आकर्षित भी करते हैं। इसके बारे में प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक फेबेर बिरेन का कहना है कि एक सामान्य व्यक्ति रंगों में जहां लाभदायक गुणों को तलाशता है वहीं  असामान्य व्यक्ति रंगों में हानिप्रद तत्वों को तलाशता है।

किसी समय रंगों का उपयोग सौभाग्यवृद्धि करने के साथ-साथ दुरात्माओं से मुक्ति पाने के लिए भी किया जाता था। प्राचीन काल में चीन में हरे रंग को लकड़ी व बसंत ऋतु का प्रतीक माना जाता था। पीला रंग सूर्य का तो नारंगी रंग धरती पर पड़ने वाली सूर्य की किरणों का प्रतीक था। सफेद रंग धातु का तथा शरद ऋतु के समापन काल का प्रतीक माना जाता था। नीला रंग जल का प्रतीक माना जाता था।

वस्तुतः रंगों से व्यक्ति को भावनात्मक वातावरण की प्राप्ति होती है जैसे कुछ रंग मन के भावावेग को नष्ट कर देते हैं तो कुछ रंग व्यक्ति को आवेशित या उत्तेजित कर देते हैं। चीन की एक जेल में जब आक्रामक कैदियों को गुलाबी रंग की बैरकों में रखा गया तो वे कैदी शांत स्वभाव के हो गए। इससे सिद्ध होता है कि रंगों का चयन करते समय भी सावधानी रहता है।

फेंग शुई के सिद्धांतानुसार रंग परावर्तित प्रकाश को नियंत्रित करने में सहायक होते हैं अर्थात रंग व प्रकाश के संतुलन से सकारात्मक परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं। रंगों में भी कुछ विशेषताएं होती हैं। कुछ रंग ऐसे होते हैं जो प्रकाश की जैसी व्यवस्थित होती है उसी के अनुरूप अपनी आभा को भी बदल लेते हैं।

यदि प्रकाश तेज होगा तो रंगों में भी भड़कीलापन आ जाएगा लेकिन प्रकाश अल्प या मध्यम होगा तो रंगों में भड़कीलापन नहीं आ पाएगा। इससे स्पष्ट होता है कि रंगों का उपयोग करते समय पारिवारिक सदस्यों के तत्वों का भी विचार करना चाहिए तथा उसी के अनुसार कमरों में रंग कराना चाहिए। उदाहरण के लिए यदि परिवार के किसी सदस्य का तत्व अग्नि है तो ऐसे व्यक्ति के लिए काला या नीला रंग अनुकूल होता है क्योंकि नीला रंग जल तत्व प्रधान होता है और काला रंग भी जल तत्व प्रधान होता है, जबकि अग्नि व जल में शत्रुता रहती है। इसलिए ऐसे रंग वाले कमरे में रहने वाले व्यक्ति का जीवन प्रभावित होता है।

छत पर हमेशा हल्का रंग ही कराना चाहिए क्योंकि गहरा रंग ऊर्जा को दबा देता है जिसके परिणाम स्वरुप उस घर में रहने वाले व्यक्तियों पर सौभाग्य संपदा की दृष्टि से विपरीत प्रभाव पड़ता है। बेडरूम में वही रंग कराना चाहिए जो व्यक्ति के मन को अच्छा लगता है। फिर भी गुलाबी, क्रीमी या अन्य हल्के रंग कराए जा सकते हैं। हल्के रंग हमेशा सौम्य होते हैं लेकिन बैडरूम में लाल या भड़कीले रंग जो आंखों को चुभते हों कभी नहीं कराने चाहिए।

रसोईघर में पृथ्वी तत्व से जुड़े रंग करवाने चाहिए जैसे पीला, नारंगी, हरा आदि। लेकिन जल तत्व से जुड़े नीले रंग का उपयोग रसोईघर के लिए नहीं करना चाहिए। यह रंग व्यक्ति को शांत स्वभावी व अंतर्मुखी बनाता है। इसलिए कमरों में इसका उपयोग नहीं करना चाहिए। हां स्नान घर में इस रंग का उपयोग किया जा सकता है। सजावटी सामान भी इस रंग के लिए उपयोगी होते हैं।

छोटे कमरों में यदि हल्के रंग किए जाए तो वे बड़े प्रतीत होते हैं लेकिन यदि बड़े कक्षों में नीले-पीले या लाल रंग कराया जाए तो बड़े कमरे भी छोटे प्रतीत होते हैं।

रंग विश्लेषण:

लाल रंग- लाल रंग उत्तेजना व कर्मठता के साथ ही मंगल सूचक भी होता है। यह सौभाग्य को भी इंगित करता है। नई दुल्हन सौभाग्य के आकर्षण के लिए लाल रंग की साड़ी पहनती हैं। यह रंग प्रसिद्धि एवं समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। लाल रंग आत्मविश्वास जगाने के साथ ही क्रोध भी उत्पन्न करता है। यह उत्तेजक, प्रेरक, ऊर्जादायी रंग भी है। इस रंग का तत्व अग्नि है। अतः इस रंग का उपयोग करते समय सावधानी बरतने की भी आवश्यकता है।

हरा रंग- यह रंग शांति का सूचक है। बसंत ऋतु के प्रतिनिधि इस रंग को लम्बी आयु का प्रतीक माना जाता है। यह विकास को सूचित करता है।

कमरे में इस रंग का उपयोग करने से व्यक्ति शांति का अनुभव करता है तथा तनाव व चिंता आदि से मुक्त रहता है।

पीला रंग- यह रंग सकारात्मकता का प्रतीक है। प्राणों का संचरण भी इससे होता है। यही कारण है कि सूर्य का रंग पीला है क्योंकि सूर्य सृष्टि के जीवों में प्राणों का संचार करता है। यह प्रेरणा, खुशी व उज्जवलता का भी प्रतीक रंग है। यह पृथ्वी तत्व से जुड़ा रंग है जैसे अध्ययन-अध्यापन या रचनात्मकता आदि।

यह रंग जहां लाभप्रद है वहीं हानिकारक भी है क्योंकि इसके अधिक इस्तेमाल से सिर रोग होने का खतरा रहता है। आनंदप्रद रंग होने के कारण इसका उपयोग मनोरंजन के कमरे में बहुतायत से किया जाता है।

नीला रंग- यह सुरक्षा व आशावादिता का सूचक रंग है। यह रंग सत्यता, वैचारिकता, जागरुकाता के साथ-साथ अंतर्मुखी रंग के रूप में जाना जाता है। यह जल तत्व का रंग है। ऐसे कमरे में जहां आध्यात्मिक चिंतन-मनन, ध्यानादि किया जाता हो वहां नीला रंग कराना उचित होता है। चूंकि यह जल तत्व प्रधान रंग है इसलिए इसका उपयोग स्नान घर, शौचालय आदि में किया जा सकता है।

नारंगी या संतरई रंग- इस रंग को सामाजिक का दर्पण कहा जाता है। पृथ्वी जल से जुड़ा यह रंग शांत व संकोची स्वभाव का प्रतीक भी है।

बैंगनी- उच्च आदर्श व आध्यात्मिकता का प्रतीक यह रंग अनेक रंगों का सम्मिश्रण होता है। इसमें लाल रंग जहां ऊर्जा का बोध कराता है वहीं नीला रंग आशावादिता का बोध कराता है। बैंगनी रंग में मिश्रित लाल व नीले रंग आश्चर्यकारी भाव पैदा करते हैं। इसका उपयोग ऐसे कमरे में करना चाहिए जहां आध्यात्मिक, योग क्रिया आदि की जाती हैं। मनोरंजन कमरे के लिए यह रंग उपयुक्त नहीं माना जाता है। यह रंग रहस्यवादिता रचनात्मकता व आध्यात्मिकता को प्रोत्साहित करने वाला रंग है।

काला रंग- पश्चिमी देशों में काले रंग को अशुभ एवं नकारात्मक शक्ति का प्रतीक माना जाता है जबकि चीन में इस रंग को धन-सम्पत्ति से संबंधित रंग मानते हैं। इस रंग को सकारात्मक रंग माना जाता है। यह समस्या समाधान में ऊर्जा व दृढ़ विश्वास का भी काम करता है। इसलिए कमरे में इस रंग का उपयोग दृढ़ विश्वासी व्यक्ति को ही करना चाहिए।

कहा जाता है कि जब सभी रंग परस्पर मिल जाते हैं तब काला रंग बनता है जो काली रात का सूचक होता है। काला व सफेद रंग घर की अपेक्षा कार्यालय में अधिक उपयोगी व लाभकारी माना जाता है। काले रंग को धुंधला रंग भी कहते हैं।

काले रंग को बैठक, गलियारे या स्नानघर में करवाना शुभ होता है लेकिन इस रंग का उपयोग जितना कम हो उतना ही बेहतर होता है।

सफेद रंग- यह रंग पवित्रता का प्रतीक है। यह रंगहीन स्थिति को सूचित करता है। कुछ देशों में सफेद रंग पवित्रता व निष्कपटता का सूचक माना जाता है। पूर्वी देशों में सफेद रंग को अंतिम संस्कार का प्रतीक माना जाता है। मार्शल आर्ट में सफेद रंग की पट्टी बांधने वाले व्यक्ति को निष्कपट माना जाता है।

सफेद रंग प्रकाश से संबंधित होने के कारण आंतरिक ऊर्जा को आकर्षित करने वाला भी माना जाता है। सफेद रंग का संबंध धातु से होता है।

सुनहरा रंग- यह रंग जहां धन का प्रतीक है वही आत्मसम्मान का भी सूचक है। सुनहरा रंग पीले व लाल रंग का सम्मिश्रण होता है। इसमें लाल रंग सौभाग्य व संपदा का सूचक हो तो पीला रंग आशावादिता का प्रतीक है।

रंग का चुनाव करने में पा-कुआ का महत्व

घर के विभिन्न भागों में रंगों के उपयोग के बारे में पा-कुआ दर्पण विशेष महत्व रखता है। इस कार्य के लिए पा-कुआ की मदद लेने के लिए पृथ्वी को केंद्र मानकर पंच तत्व चक्र पर पा-कुआ रखा जाता है। इससे रंगों का मेल मिलाप का पता चल जाता है।

पा-कुआ द्वारा रंग समझना-

श्रेत्र रंग
संपदा लाल, हरा, नीला, बैंगनी
प्रसिद्धि हरा, पीला, लाल
विवाह लाल, सफेद, गुलाबी
परिवार हरा, नीला, लाल
संतति सफेद, सुनहरा
विवेक या ज्ञान सफेद, काला, हरा
व्यापार काला, सफेद, हरा
सलाहकार सफेद, काला

सफेद मिट्टी की गंध:

सफेद मिट्टी की गंध से काफी धनलाभ होता है। अपने मन की प्रसन्नता के लिए हम हमेशा सुगंध को काम में लाते हैं। हम इस बात में प्रयत्नशील रहते हैं कि यह खुशबू हमारे तथा बाकी लोगों तक पहुंच जाए। देवपूजा में एक-दो खुशबूदार फूल रहने से पूजार्थी प्रसन्नचित और आनंद से पूजा कर सकता है। पूजा का स्थान भी पवित्र लगता है। वातावरण में एक अजीव प्रसन्नता छा जाती है विश्वास होता है कि हम पावित्र्य के सन्निद्ध उपस्थित हैं। मतलब यही है कि भगवान को खुश रखने के लिए हमें सुगंध की आवश्यकता महसूस होती है। साथ-साथ बाकी के लोग भी इसका फायदा उठा सकते हैं एवं आनंद का अनुभव कर सकते हैं। नहाते समय हम अच्छे सुवासिक साबुन का इस्तेमाल करते हैं। घर के बाहर जाते समय अच्छे से अच्छे पाउडर का इस्तेमाल करते हैं। इत्र या सेंट भी काम में लाते हैं। यह सारा प्रयास केवल इसलिए हैं कि जिनके साथ हमारा संपर्क होने वाला है, काम के सिलसिले में जिनके साथ हम रहने वाले हैं, वे प्रसन्नचित हों। पूरा वातावरण उत्सापूर्ण बना रहे और अपने निर्धारित काम में सफलता प्राप्त हो।       यह भी देखा जाता है कि शाम के समय बहुत सी स्त्रियां अपने बालों में खुशबूदार फूलों के गजरे डलवा लेती हैं या संध्या समय देवता के सामने एकाध खुशबूदार अगरबत्ती जलाई जाती है। शादी जैसे मांगलिक कार्यों के सिलसिले में इत्र आदि का प्रयोग कर सारे वातावरण को खुशबूमय एवं प्रसन्नचित किया जाता है। इसका तात्यर्य यह है कि खुशबू प्रसन्नता की जन्मदात्री है, खुशबू से देवता भी प्रसन्न होते हैं। यहां तक कि मानवीय मन, चित्तवृत्ति प्रसन्न हो उठती हैं। यही तत्व निवास स्थान की जमीन या मिट्टी के बारे में लागू हैं। सिर्फ अपनी ही आयु काल में नहीं, आगे आगे वाली पीढ़ियां जहां अपना जीवन व्यतीत करने वाली हैं वहां के वातावरण को प्रसन्नचित रखने के लिए सुगंध की आवश्यकता है। खुशबू के प्राकृतिक खजाने की जरूरत है और वह पूरी करने का सामर्थ्य उस मिट्टी में है जहां हम अपना मकान बनाना चाहते हैं या बना चुके हैं।

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