मांगलिक की पहचान

Manglik Dosh Aur Uske Prabhav

वास्तु शास्त्र के मांगलिक निशान या चिन्ह

भारत को एक धर्म-प्रधान देश के नाम से भी जाना जाता है। भारतवर्ष में रहने वाले सभी निवासियों के सभी काम धार्मिक भावना से जुड़े हुए होते हैं। जीवन को संस्कारों में विभाजित करके धर्म से जोड़ा गया है। भारत के सभी व्यक्ति इस तरह के धार्मिक कामों को श्रद्धा तथा आस्था के साथ एक अनुष्ठान के रूप में अपनाते हैं। उनकी इसी तरह की आस्था भगवान को न मानने वाले व्यक्तियों की नजर में एक अंधविश्वास बन जाती है, जबकि समय के आने पर वे ही इस तरह के धार्मिक कार्यों को अपनाते हैं। वास्तु शास्त्र में अलग-अलग तरह के धार्मिक निशानों (चिन्ह) के बारे में इस्तेमाल बताया गया है तथा ये अलग-अलग निशान निम्नलिखित तरीके से होते हैं जैसे-

  • मंगल-कलश
  • हाथा-पंचांगुलक
  • मीन (मछली)
  • स्वास्तिक

ॐ शब्द

ही ब्रह्ना है।

यदिच्छोन्तो ब्रह्नाचर्य चरन्ति

तन्ते पदं संग्रहेण ब्रवीम्योगित्येतत्।

एतद्धयेवाक्षरं ब्रह्ना एतद्धयेवाक्षरं परम्।

एतद्धयेवासरं ज्ञात्वा यो यदिच्छिति तम्य तत्।

इस श्लोक का अर्थ यह है कि जिस वस्तु को प्राप्त करने के लिए व्यक्ति ब्रह्नाचर्य की साधना करता है, वह क्या है, इसके बारे में कहा जाता है कि वह सिर्फ ॐ ही है।

ॐ को ही ब्रह्ना के नाम से जाना जाता है, यह पुराण पुरुष है और जो इस ॐ नाम के रहस्य के बारे में जान लेता है, वह व्यक्ति अपनी मन की इच्छा को प्राप्त करने वाला होता है। ॐ नाम ही पूरे संसार अथवा भगवान या ईश्वर का नाम होता है। ॐ ही वाहव्य निगाह और भगवान या ईश्वर दोनों का ही सूचक होता है। ॐ नाम में बहुत ही ज्यादा ताकत होती है। ॐ नाम वेदों के मंत्रों का बीज अक्षर जाना जाता है।




ॐ नाम की महिमा वेदों, पुराणों तथा उपनिषदों में भी बताई गई है। भगवान श्री कृष्ण ने भी भागवत् गीता में भी ॐ नाम को अपना ही स्वरूप बताया है। वास्तु में ॐ नाम की जगह बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण मानी जाती है। ॐ नाम ही एक इस तरह का वाक्य या शब्द होता है जिसको देखने भर से ही मन में प्रसन्नता पैदा हो जाती है तथा मन को शांति प्रदान होती है। इसलिए वास्तु में ॐ नाम की स्थापना अच्छी जगह तथा पवित्र जगह पर जरूर ही करनी चाहिए।

ॐ शब्द के सौ से ज्यादा अर्थ या मतलब होते हैं, जिसमें से एक का मतलब देवताओं का स्वागत करना होता है।

वास्तु शास्त्र के मांगलिक निशान या चिन्ह

विनायक (गणेश) जी भगवान को प्रणव के नाम से भी पुकारा जाता है। इस तरह गणेश पुराण के अनुसार कहा गया है। उन्होंने ॐ जैसे रहस्यमय संकेत शब्द से भी संबोधित किया है। इसके बारे में यह भी कहा जाता है कि पूरे संसार तथा ब्रह्वाण्ड में सबसे पहले ॐ प्रणव शब्द या ध्वनि को सुना गया था (उत्पत्ति हुई थी)। इसी वजह से किसी भी शुभ या मांगलिक कार्यों को करने से पहले ॐ शब्द को लिखकर उसका उच्चारण तो करते ही है तथा इसके साथ ही देवी-देवताओं के आह्नान या उनकी आराधना से पहले गणेश जी भगवान की उपासना या पूजा की जाती है। मतलब यह है कि किसी भी शुभ काम को करने से पहले श्रीगणेश जी भगवान का नाम लिया जाता है जैसे-

  • ॐ श्रीगणेशाय नमः।
  • ॐ गं गणपतै नमः।
  • ॐ नमः शिवाय।

प्रणव नाम से ॐ शब्द को भी पुकारा जाता है, क्योंकि यह शब्द कभी-भी पुराना नहीं होता है। ॐ नाम के शब्द में हमेशा एक नवीनता का संचार होता रहता है तथा इसके साथ ही यह व्यक्ति के प्राणों को शुद्ध (पवित्र) तथा संतुष्ट करता है।

प्राणान् सर्वान् परमात्मनिप्रणाम यतीत्येतस्मात् प्रणवः।

ॐ नाम को भी जैनियों के आगमों में एक महत्वपूर्ण जगह दी गई है। वेदों में भी ओंकार को प्रणव भी माना गया है। इसलिए सभी वेदों के मंत्रों का उच्चारण करते समय ओंकार के शब्द का नाम लिया जाता है।

ॐ नाम के बारे में अलग-अलग मतावलम्बियों के अलग-अलग तरह के विचार होते हैं जैसे-

जैसे ॐ परमात्मावाचक है, मंगल स्वरूप है। जैन के मतों के आधार पर ॐ पंच परमेष्टी वाचक एक लघु संकेत है। बिंदु सहित ओंकार का ऋषि-मुनि लोग रोजाना ध्यान करते हैं। यह ओंकार शब्द इच्छित पदार्थ-दाता और मोक्षदाता है। ऐसे ओंकार शब्द को हमेशा ही नमस्कार करना चाहिए। मंगल, क्षेत्र कल्याण रूप परमात्मावाचक है। व्यक्ति चाहे वैदिक, सनातन अथवा जैन समाज का हो या फिर वह ब्राह्नाण, क्षत्रिय, वैश्य या शुद्र जाति का ही क्यों न हों, सभी तरह के अच्छे कार्यों या मांगलिक कार्यों के होने पर जैसे कि- शादी-विवाह, संस्कार, दुकान-मकान, बहीखाता आदि हों, सभी कामों के लिए ॐ शब्द को लिखकर कार्य आरम्भ किया जाता है।

सिख धर्म के अंदर भी ॐ (एक ॐ यानी कि ईश्वर पूरे संसार में एक ही होता है, परंतु सभी धर्मों में अलग-अलग भगवान को जाना जाता है।) ॐ शब्द का उच्चारण करने से इसकी ध्वनि सीधी नाभि (सूंड़ी) से निकलती है। ॐ शब्द का कार्य व्यक्ति की मानसिक परेशानी और कठिनाई को दूर भगाना होता है। ॐ शब्द के मंत्र को कष्टो आदि से मुक्ति पाने के लिए लिया जाता है। यह शब्द ध्यान करने का रास्ता है। इस शब्द का उच्चारण करने से एक तरह की नई स्फूर्ति (ताजगी) प्राप्त होती है। इससे व्यक्ति के शरीर को तंदुरुस्ती तथा मन को शांति मिलती है। ॐ शब्द की यात्रा भगवान (परमात्मा) की यात्रा होती है, क्योंकि ॐ तीन शब्द, जैसे कि ओम म-त्रिदेव- ब्रह्ना, विष्णु, महेश जाने जाते हैं। इसी तरह के तीन शब्दों का प्रतीक बना है शिव की ताकत का त्रिशूल। ॐ नाम के बिना हर तरह का धर्म अधूरा माना जाता है। ॐ शब्द भारत से यूनानी देश तथा मुसलमानों के देश तक पहुंचते-पहुंचते आमीन में तबदील हो गया।

मंगल कलश

पानी से भरा हुआ, पत्र-फूलों से सजा हुआ कलश वैदिक (पुराने) समय से ही सुमंगल, समृद्धि एवं सम्पन्नता का सूचक माना जाता है। इस संसार की उत्पत्ति पानी से ही हुई है। इसलिए पानी यहां पर संसार (ब्रह्नाण्ड) की उत्पत्ति का प्रतीक माना जाता है, आम को एक हमेशा भरे-पूरे वृक्ष के नाम से भी जाना जाता है। उस आम के पत्ते को लगाने से मंगल कलश की पूर्ति हो जाती है। आम की पत्तियां सृजन के बाद जीवन की निरंतता की बोधक होती हैं। किसी के भी मर जाने पर उसके जीवन के समाप्त हो जाने की प्रतीकात्मक घड़े को फोड़ दिया जाता है। मकान को भी मंगल घड़े की संज्ञा दी गई है। किसी भी तरह के धार्मिक अनुष्ठान के अंदर भी सबसे पहले इस मंगल कलश की पूजा-अर्चना की जाती है। यही वजह है कि मकान के बन जाने के बाद मंगल कलश की पूजा तथा उसकी स्थापना मांगलिक कार्यों के रूप में की जाती है।

हाथा-पंचांगुलक

किसी भी अच्छे मौकों पर जैसे- नए मकान में प्रवेश करते समय, शादी-विवाह तथा संतान के जन्म लेने के मौके पर हल्दी व चावल की पीठ से दाहिने हाथ के पंजे को लगाने का रीति-रिवाज है। पांच की संख्या का सूचक, पंततत्व का प्रतीक है, जिससे इस संसार की रचना हुई है। मरने वाले किसी भी इंसान के शरीर का दाह-संस्कार करने के बाद भी यह पांचों की पांचों अंगुलियां समाप्त नहीं होती है जो कि समूल तत्वों की निरंतरता का सूचक है। हाथॐ मंगल को कर्मों का प्रतीक माना जाता है। देवताओं की अभय मुद्रा का भी यही प्रतीक है, बौद्ध धर्म में तो अलग-अलग मन की दिशाओं को भगवान बौद्ध के हाथों के इशारों से ही संकेत किया गया है। इसलिए पंचांगुलक भारतीय दर्शन का प्रतीक मानते हुए, मांगलिक चिन्ह माना गया है, जिसे वास्तु में मांगलिक चिन्ह के रूप में, समृद्धि की भावना से प्रतिष्ठापित किये जाने का रीति-रिवाज है।

मीन (मछली)

वास्तु शास्त्र में मछली (मीन) को हमेशा ही सच्चे प्यार का प्रतीक माना गया है। किसी भी यात्रा पर जाने से पहले तथा अपने मकान से बाहर जाने से पहले अगर मछली के दर्शन कर लिए जाए, तो व्यक्ति को हर किसी काम में हमेशा कामयाबी का बहुत ही अच्छा लाभ प्राप्त होता है। हमारे आज के समाज में दशहरा के दिन मछली के दर्शन करने का रीति-रिवाज है। इसी तरह से मकान के मुख्य गेट या दरवाजे पर मछली की अच्छी सी तस्वीर को बनवाने का भी रीति-रिवाज चला आ रहा है। उसके पीछे यही भावना होती है कि अच्छे मांगलिक कार्यों पर अगर मछली के दर्शन न हो सके तो मछली की तस्वीर को देखा जा सकता है। पुराने मत के अनुसार, मछली को भगवान विष्णु का पहला अवतार कहा जाता है तथा प्रलय के समय इसी मछली ने नाव के रूप मे मनुष्य तथा संसार की सुरक्षा की थी। कामदेव की पताका का प्रतीक भी यही मछली जानी जाती है, इसलिए स्त्रियों के कानों के लिए मछली के कुंडलों के पहनने का रीति-रिवाज आज के समय भी लागू है। इसी तरह की विशेषताओं से मीन युग्म के मकान में अच्छे मांगलिक कार्यों के लिए इस निशान के रूप में इसकी तस्वीर का रीति-रिवाज है।

स्वास्तिक-

स्वास्तिक संस्कृत की भाषा का अव्यय पद होता है। इस शब्द को व्याकरण कौमुदी में 54वें क्रय पर अव्यय पदों में गिनाया जाता है।

स्वास्तिक शब्द दो शब्दों को मिलाकर बना है, पहला सु तथा दूसरा अस्ति।

स्वास्तिक का मतलब होता है कल्याण, मंगल, अच्छा तथा शुभ आदि के रूप में माना जाता है। ॐ शब्द की तरह ही कुछ व्यक्ति स्वास्तिक शब्द को लिखकर अच्छे काम की शुरुआत करते हैं, तो कुछ व्यक्ति ॐ शब्द तथा स्वास्तिक का निशान अर्थात दोनों का ही इस्तेमाल करते हैं। पूरे भारतवर्ष की तरह ही जर्मनी में भी स्वास्तिक के निशान को राजकीय सम्मान मिला हुआ है। जैनियों के आगमों में ॐ शब्द और स्वास्तिक के निशान को महत्वपूर्ण जगह दी हुई है। वेदों में भी ओंकार को प्रणव माना जाता है तथा स्वास्तिक के शब्द की भी वेदों में पुनरावृत्ति है जैसे कि स्वास्ति न इन्द्रः आदि।

ॐ तथा स्वास्तिक

कहते हैं कि ॐ शब्द तथा स्वास्तिक के निशान में बहुत ही ज्यादा गहरा रिश्ता होता है। ॐ शब्द अगर भारतवर्ष में जानवरों या प्राणियों की अंतरात्मा की आवाज है तो स्वास्तिक शब्द उनकी अस्मिता है।

स्वास्तिक कर्मयोग का परिचायक जाना जाता है। अगर एक नजर से देखा जाए तो स्वास्तिक शब्द सुदर्शन चक्र से भी अच्छा तथा उत्तम है क्योंकि चक्र दुश्मनों का संहार करता है, लेकिन स्वास्तिक का कार्य अच्छे कामों को बनाना होता है।

स्वास्तिक में अलग-अलग चार दिशाएं होती है यानी कि स्वास्तिक का काम तरक्की करना है तथा व्यक्ति को हर दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहन (प्रेरणा) करना होता है।

क्रॉस

क्रॉस के निशान को क्रिस्चियन समाज बहुत ही ज्यादा अच्छा तथा शुभ मानता है तथा इसके प्रति अपना विश्वास तथा समर्पण व्यक्त करता है।

इसलिए कहते हैं कि अगर क्रिस्चियन समाज के लोग अपने मकान के मुख्य गेट या दरवाजे पर इस क्रॉस के निशान को बना दे तो उनके लिए तो ऐसा लगता है जैसे कि उनका घर किसी स्वर्ग से कम नहीं हैं।

जिस तरह से क्रिस्चियन समाज क्रॉस के निशान को शुभ समझता है उसी तरह से ही सिक्ख समाज भी इस निशान को बहुत ही ज्यादा अच्छा तथा शुभ मानते हैं।

कहा जाता है कि यह मांगलिक निशान राष्ट्रीय एकता का प्रतीक समझा जाता है। जिस तरह से सभी व्यक्ति या लोग ॐ शब्द का नाम करते हैं, उसी तरह से सिक्ख समाज के लोग भी इस निशान को मगंल निशान मानते हैं। इस निशान का एक मतलब यह भी होता है कि ॐ शब्द एक ही है। इसलिए अगर इस मागंलिक निशान को सिक्ख व्यक्ति अपने मकान या भवन के मुख्य गेट या दरवाजे के ऊपर बनवाता है तो वह अपने आप को अवश्य ही बहुत ही ज्यादा सुख-समृद्धि तथा शांति को प्राप्त करने वाला समझता है।

जिस तरह से क्रिस्चियन समाज क्रॉस के निशान को तथा सिक्ख समाज इस तरह के निशान को बहुत ही शुभ मानते हैं। उसी तरह से मुस्लिम समाज भी इस मांगलिक निशान को बहुत ही ज्यादा अच्छा तथा लाभदायक मानते हैं।

अगर मुस्लिम समाज अपने मकान या भवन के मुख्य गेट या दरवाजे पर तथा अन्य पवित्र जगह पर इस तरह का निशान या 786 शब्द लिख देते हैं तो वह जगह तथा मकान सुख-समृद्धि दायक हो जाता है।

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