मनुष्य का मन

मनुष्य का मन

मनुष्य का मन बहुत ही महान है, इसके सोचने की शक्ति का कोई अंत नहीं। मन का ही परिणाम है जो आज विश्व और हमारे शरीर को कई भागों में बाटा गया है तथा इसको कई नामों से जाना जाता है।

आज की दुनिया कितनी बड़ी है, जिस संसार का नाम हम बड़े आराम से लेते हैं उस संसार की ओर यदि नजर उठाकर देखें तो दूर-दूर तक फैले इस संसार की कोई सीमा ही नजर नहीं आती। संसार एक है, मगर इसके अंदर बसे हुए देश अनेक हैं। यह पूरी धरती एक ही थी, भगवान भी एक ही था, फिर इन सबको टुकड़ों में बांटने वाला कौन था?

इसका जवाब है मनुष्य, वह मनुष्य ही था जिसने ईश्वर की बनाई धरती को और खुद ईश्वर को भी स्वार्थ और लालच के लिए अनेक टुकड़ों में बांटकर रख दिया।

लेकिन इतने पर भी मनुष्य का मन नहीं भरा। उसने देशों का बंटवारा करके उन्हे भी राज्यों में बदल दिया। इस पर भी उसका मन शांत नहीं हुआ तो उसने राज्यों के भी टुकड़े करके उन्हें जिलों में बांट दिया गया। इसके बाद हर जिले के अंदर भी छोटे-छोटे गांव-कस्बे बनाकर उन्हें भी बांटा गया।

लेकिन मनुष्य की आग अभी भी शांत कहां होने वाली थी उसने गांवों में अपने-अपने घर अलग-अलग बना लिए। मगर कहते हैं कि मनुष्य को जितना तेज दिमाग दिया गया है उसका उपयोग भी वह गलत जगह करने लगा। हद तो तब हो गई जब एक ही घर में रहने वाले लोगों ने अपने-अपने कमरे अलग-अलग बनवा लिए। यहां तक की घर एक ही होता है लेकिन घर में रसोईयां कई हो जाती है।

मनुष्य की इसी मनोवृत्ति का ही यह परिणाम था कि वह अपने घर को बांटते-बांटते अपने शरीर के अंगों को भी अलग-अलग दृष्टि से देखने लगा। मनुष्य की इसी मनोवृत्ति ने मनोवैज्ञानिकों को अलग ढंग से सोचने पर विवश किया।

मानव शरीर पर सबसे अधिक रिसर्च करने वाले अमेरिकी एन्थ्रोपोलोजिस्ट एडवर डी. टी. हाल. का नाम इस समय सबसे अधिक प्रसिद्ध माना जाता है। उनके विषय में सब विद्वानों का मत है कि वे मानव शारीरिक ज्ञान के आधुनिक युग के विशेषज्ञ माने जाते हैं।

उन्होंने मानव शरीर और उसके अंगों के बारे में अपने अनुभवों एवं रिसर्च द्वारा जो मत पेश किए हैं, उन्हें मानव जाति कभी नहीं भूल सकती। लेकिन मनुष्य की इस मनोवृत्ति को समझ पाना आसान नहीं था।

एडवर डी. टी. हाल ने हमें मानव जाति के अंदर के उन विचारों को अंगों द्वारा अध्ययन करने का जो उपहार दिया है, उसी के प्रकाश में यह सीख पाए हैं कि इंसान के अंदर की भावनाएं बिल्कुल आकाश पर बिखरे हुए तारों की तरह है।

जिस आकाश का हर तारा अपने अंदर एक संसार को बसाए हुए हैं। मानव मस्तिष्क (मनुष्य का मन) के विचार उसमें हवा की भांति चलते रहते हैं। डॉक्टर एडवर डी. टी. हाल की यह खोज किसी आविष्कार से कम नहीं है। उनकी खोज के अनुसार-मानव शरीर को चार अलग-अलग क्षेत्रों में बांटा गया है।

पहला क्षेत्र– इस क्षेत्र को दूसरों से मेलजोल के रूप में देखा जाता है जिसका कुल क्षेत्रफल 15 से 46 सेंटीमीटर के करीब होता है। इसका कार्य इसी क्षेत्र में अधिक रहता है। इस क्षेत्र का दूसरे क्षेत्रों से जो अंतर है, उसके प्रकाश में हम देखते हैं कि व्यक्ति ऐसे लोगों से प्यार या मेल-मिलाप बढ़ाता है, जिसमें उसकी प्रेमिका, मित्र और सगे-संबंधी आते हैं।

दूसरा क्षेत्र– दूसरा क्षेत्र निजी क्षेत्र कहलाता है। इसका कुल क्षेत्रफल 46 सेंटीमीटर से 122 सेंटीमीटर तक होता है। इस क्षेत्र के कार्य में आम पार्टियां, कार्यालय में होने वाली पार्टी, सामाजिक कार्य एवं मित्रों से मेलजोल का संबंध बना रहता है। जितने भी आम मेलजोल के द्वार है इसी क्षेत्र से खुलते हैं।

तीसरा क्षेत्र- इस क्षेत्र को सामाजिक कार्यों से घिरा हुआ क्षेत्र कहते हैं। इसका क्षेत्रफल 1.22 से 3.6 मीटर तक का होता है। इस क्षेत्र में घरेलू कामकाज के विषय में अधिक कार्य चलता है। उदाहरण के लिए जैसे-आपके घर में कोई पल्सतर आदि का, फर्नीचर बनाने का या बिजली का कार्य चल रहा है।

चौथा क्षेत्र- यह क्षेत्र करीब 36 मीटर का होता है, जैसे हम बहुत से लोगों के बीच में खड़े होकर उन्हें संबोधित कर रहे हों या कोई नेता किसी सभा में भीड़ को संबोधित करता है।

डॉक्टर एडवर डी. टी. हाल के विचारों में हर मनुष्य के शरीर के अंदर यही भार क्षेत्र होते हैं, जिनकी भाषा उसकी बॉडी लेंगुएज द्वारा बाहर निकलती है। यदि हम किसी मनुष्य की भाषा को पढ़ना चाहते हैं तो हमारे लिए उसके शरीर के इन क्षेत्रों का ज्ञान होना जरूरी है।

मनुष्य का मन/ Super Thirty Team

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