प्राकृतिक वस्तु - Prakritik Vastu

प्राकृतिक वस्तु

VAASTU (NATURE)

यह संसार पांच मूल तथा सारभूत तत्वों से बना हुआ है, जिनको पांच महाभूत  या प्राकृतिक वस्तु के नाम से जाना जाता है, वे इस तरह से हैं जैसे-

  1. आकाश (अंतरिक्ष, आसमान)।
  2. वायु (हवा)।
  3. अग्नि (आग)।
  4. जल (पानी)।
  5. पृथ्वी अथवा जमीन या धरती।

इस धरती पर रहने वाले सभी तरह के प्राणी और हमारे द्वारा बनाने वाले मकान (इमारतें) भी इन्ही तत्वों (प्राकृतिक वस्तु) आदि से बनाए गए हैं। इन प्राकृतिक वस्तु तत्वों के बगैर इस धरती पर कोई भी प्राणी जिंदा नहीं रह सकता है। इन ताकतों की आपस में निर्भरता और आंतरिक प्रक्रिया, जो एक-दूसरों से विरोध करने वाली तथा अपकर्षक स्वभाव को रखने वाली होती है तथा उसके बीच में एक न दिखाई देने वाला समीकरण का काम भी करती है, मानव के दिमाग से यह बात बहुत ही दूर है। व्यक्ति अपने कामों को करने तथा अपने रहने की जगह को अपनी इच्छा के अनुसार ही बनवा सकता है, लेकिन वह कभी भी कुदरत तथा उसकी ताकतों को, जो उसके जीवन पर प्रत्यक्ष रूप से असर (प्रभाव) डालती है, उसको काबू करने के काबिल नहीं हो सकेगा।

  1. आकाश (अंतरिक्ष)- यह धरती से बहुत ही दूर एक अंनत क्षेत्र होता है, जिससे हमारा सिर्फ सौरमंडल ही नहीं, बल्कि पूरी आकाश-गंगा उपस्थित है। इसकी प्रभावोत्पादक ताकतें हैं, जैसे- आकाश, गर्मी, गुरुत्वाकर्षण की शक्ति और उसकी लहरें, चुंबकीय क्षेत्र तथा अन्य। इसकी मुख्य विशेषता ध्वनि (शब्द) है।
  2. वायु (हवा)- धरती को लगभग 400 किलोमीटर तक उसका वायुमंडल घेरे हुए रहता है। इसमें इक्कीस प्रतिशत ऑक्सीजन (जीवन के लिए वायु या हवा), 78 प्रतिशत नाइट्रोजन, कार्बनडाइआक्साइड, हीलियम, दूसरी तरह की अन्य गैसें, धूल के कण, नमी और कुछ अंशों में वाष्प है। मनुष्यों, पशुओं, पौधों का जीवन तथा आग तक इन पर निर्भर करती है। इसकी विशेषता है शब्द (ध्वनि) और स्पर्श (छूना)।
  3. अग्नि (आग)- यह रोशनी तथा आग के ताप (गर्मी), विद्युत, ज्वालामुखी की गर्मी, बुखार अथवा ज्वलनशीलता का ताप, ऊर्जा, दिन तथा रात, मौसम या ऋतुएं और सौरमंडल के इसी तरह के अन्य पहलुओं, उत्साह, मेहनत तथा भावनात्मक ताकत का प्रतिनिधित्व करती है तथा इसकी मुख्य विशेषताएं मानी जाती है- शब्द (ध्वनि), स्पर्श तथा रूप (आकृति या आकार)।
  4. पानी या जल- बारिश, नदियां और सागर इसका प्रतिनिधित्व करते हैं। यह एक तरल ठोस (बर्फ) और गैस (भार तथा बादल) रूप में होता है। यह दो तथा एक के अनुपात में हाइड्रोजन और आक्सीजन का मिला-जुला मिश्रण है। प्रतिक्रिया में यह पूरी तरह से निष्क्रिय है। धरती के सभी तरह के जीवन तथा पौधे में पानी एक आवश्यक के अनुसार ही मात्रा में उपस्थित होता है और इसकी मुख्य विशेषताएं मानी जाती है, शब्द, स्पर्श, रूप तथा रस (स्वाद)।
  5. भूमि (धरती या पृथ्वी)- सूरज क्रम से तीसरा ग्रह है। यह एक बहुत ही बड़ा चुंबक है, जिसकी सुंदरता का केंद्र उत्तरी ध्रुव तथा दक्षिणी ध्रुव जाना जाता है। इसका चुंबकीय भाग और गुरुत्वाकर्षण शक्ति सभी जीवित और निर्जीव वस्तु पर अपना असर डालती है। यह अपनी धुरी पर 23.1/2 डिग्री पर झुकी हुई होती है, जिसकी वजह से ही उत्तरायण और दक्षिणायण होते हैं। यह अपनी धुरी पर पश्चिम दिशा से पूर्व दिशा की तरफ घूमती है, जिससे धरती पर रात तथा दिन होते हैं। सूरज के चारों तरफ एक ही चक्कर लगाने में ये पूरा एक साल (लगभग 365 दिन) का समय लेती है। धरती या पृथ्वी का तीन चौथाई भाग पानी और इसका एक चौथाई भाग जगह (स्थल) है। धरती या पृथ्वी की मुख्य विशेषताएं मानी जाती है, ध्वनि (शब्द), स्पर्श, आकार, स्वाद तथा गुण।

इन पांचों तत्वों तथा व्यक्ति एवं उसके रहने वाली जगह तथा काम करने की जगहों के बीच बाहरी, आंतरिक और बहुत गहरा संबंध रहता है। इन पांच ताकतों (शक्तियों) की असर डालने की क्षमता समझकर व्यक्ति को अपने मकान की सही तरह से रूपरेखा बनाकर अपनी दशा में सुधार लाना चाहिए। मकानों को जिस जगह पर बनाया जाता है तथा उनकी जो दशा और प्रबंध होता है, उसका उनमें रहने वाले सदस्यों पर सही तरीके से असर पड़ता है तथा प्राचीन ग्रंथ वास्तुशिल्पशास्त्र पीढ़ियों दर पीढ़ियों के द्वारा अनुभव किये गए इसी ज्ञान के सापत्व से पूर्ण है।

समरांगण सूत्रधार में लेखक वास्तुशिल्पशास्त्र के बारे में रोशनी डालने की जरुरत का बखान निम्नलिखित तरीके से करता है जैसे-

सुखं धनानि बुद्धिश्र्च संततिः सर्वदा नृणाम्।

प्रियान्येषां च संसिद्धिः सर्वं स्यात शुभ लक्षणम्।।

यात्रा निन्दित लक्ष्मात्र ताधितेषां विघात कृत्।

अथ सर्वमुपादेयं यद्भवेत् शुभलक्षणम्।।

देशः पुरनिवासश्र्च सभावीस्मसनानी च।

यद्यदीदृशमन्याश्च तथा श्रेयस्करं मतम्।।

वास्तुशास्त्रादृतेतस्य न स्याल्लक्षणनिर्णयः।

तस्मात् लोकस्य कृप्या शास्त्रमेतद्धरीयते।।

     इस श्लोक का मतलब यह है कि सही तरीके से बने हुए सुखद मकान में अच्छे स्वास्थ्य, धन-संपत्ति, दिमाग, संतान तथा शांति का निवास रहता है और उस मकान के मालिक को कृतज्ञता से ऋण से मुक्ति मिल जाती है। वास्तुशास्त्र के सिद्धान्तों की उपेक्षा का फल बिना वजह की यात्राओं, बदनामी, प्रसिद्धि का नुकसान, दुख तथा हताशा के रूप में प्राप्त होता है। बनाए गए सिद्धान्तों के विपरीत बनाए जाने वाले मकान के लक्षणों के बारे में सही तरीके से नहीं बताया जा सकता है। सभी मकानों, गांवों, कस्बों तथा नगरों को वास्तुशास्त्र के अनुसार ही बनाना चाहिए। इसीलिए वास्तुशिल्पशास्त्र को संसार के कल्याण, संतोष और ज्यादा सुंदर बनाने के लिए प्रकाश में लाया गया है।

विश्वकर्मा-वास्तुशास्त्र में उसके बारे में निम्नलिखित बखान किया गया है जैसे-

शास्त्रेनानेन सर्वस्य लोकस्य परमं सुखम्।

चतुर्वर्ग फलप्राप्तिः सुलोकश्च भवेदध्रुवम्।।

शिल्पशास्त्रपरिज्ञाना मृत्योSपि सुजेतांव्रजेत्।

परमानंदजनकं देवानामिद् मीरितम्।।

शिल्पं विना नही जगतिषु लोकेषु विद्यते।

जगदविना न शिल्पांच वर्तते वासवप्रभो।।

इसका यह मतलब होता है कि वास्तुशास्त्र की वजह से सारा संसार अच्छे स्वास्थ्य, सुख और सही तरह की संपन्नता को प्राप्त करता है। इस शास्त्र के द्वारा व्यक्ति दिव्य शक्ति को प्राप्त करता है। शिल्पशास्त्र के बारे में जानकारी और इस संसार की विद्यमानता आपस में मिलती-जुलती है। वास्तुशास्त्र के अनुयायी सिर्फ सांसारिक सुख ही नहीं, परंतु दिव्य आंनद भी महसूस करते हैं।

पंचभूत और बनाने की जगह- वास्तुशास्त्र को मुख्य रूप से सही तरह के मकान को बनाने की कला के नाम से जाना जाता है, जिससे कि व्यक्ति अपने को इस तरीके से रख सके, ताकि वह पंचभूतों और धरती को चारों तरफ से आवृत्त किये जा हुए, चुंबकीय क्षेत्रों का ज्यादा से ज्यादा लाभ उठा सके। तत्वों के वैज्ञानिक इस्तेमाल से पूरी तरह से संतुलित माहौल को बनाया जा सकता है, जो कि अच्छे स्वास्थ्य, संपत्ति तथा संपन्नता को पाने के लिए पक्का करता है। आधुनिक वैज्ञानिक उन ऊर्जा की जगहों के बारे में जानते हैं कि कोई भी आकार धरती और ब्रह्नांडीय ऊर्जा का सकेंद्रण अथवा विकेंद्रण करता है जो व्यक्ति के लिए लाभदायक होता या हानिकारक। हमारे प्राचीन ग्रंथों से यह मालूम होता है कि हमारे ऋषियों को इन ऊर्जा की जगह को अपनी इच्छा के विपरीत शक्ति को पाने के लिए बारीकी से तथा निश्चित तरह से मालूम था। इसीलिए वास्तुशास्त्र को मकान को बनाने की जगह का चुनाव करने के लिए जरूरी विचारणीय विषय बताया गया है, क्योंकि मकान का निर्माण स्थल एक अचल रूप का प्रतिनिधित्व करता है, वह अपने आकार, मात्रा, दिशा, अनुपात और बाहर की तरफ खुलने वाली जगहों की अवस्था आदि के अनुसार ही सकारात्मक या ऋणात्मक ऊर्जा को फैला देगा।

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