रसोईघर वास्तुशास्त्र – भोजन का कमरा

रसोईघर वास्तुशास्त्र - भोजन का कमरा

रसोईघर वास्तुशास्त्र

भोजन का कमरा:

रसोईघर वास्तुशास्त्र के अनुसार भोजन का कमरा एक ऐसा स्थान होता हैं जहां पर घर के सारे सदस्य एकसाथ बैठकर भोजन करते हैं। किसी भी परिवार में भोजन का कमरा अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है क्योंकि इस स्थान पर परिवार के सभी लोग एकसाथ बैठकर भोजन करते हैं। वास्तुशास्त्र के अनुसार भोजन का कमरा ऐसा होना चाहिए कि उसमें हमेशा प्रकाश एवं हवा आती रहे। भोजन का कमरा अर्थात डाइनिंग रूम में टेबल वर्गाकार, आयताकार या अंडाकार रखी जा सकती है लेकिन कुर्सियां सम संख्या में होना अत्यंत शुभ माना गया है।

भोजन के कमरे (डाइनिंग रूम) का दरवाजा:

अगर भोजन के कमरे का दरवाजा उत्तर-पूर्व दिशा में हो तो इस दरवाजे से अंदर प्रवेश करते समय व्यक्ति उत्साह महसूस करता है। यदि रसोईघर वास्तुशास्त्र के अनुसार दरवाजा दक्षिण दिशा में हो तो भोजन करते समय परेशानी महसूस होती है क्योंकि कुछ विद्वानों के अनुसार यह दिशा प्रेम व शक्ति का प्रतीक होती है। इसलिए भोजन के कमरे में दरवाजा दक्षिण दिशा में नहीं बनवाना चाहिए। यदि इस दिशा में दरवाजा हो तो डाइनिंग टेबल को उत्तर दिशा में रख सकते हैं।

भोजन के कमरे में खाने का मेज (डाइनिंग रूम में डाइनिंग टेबल):

जहां तक हो डाइनिंग रूम की दीवारें ऊंची रखनी चाहिए। ऊंची दीवारें समृद्धि की सूचक होती है। डाइनिंग रूम में डाइनिंग टेबल का प्रयोग करते समय यह ध्यान रखें कि यह आकार में बड़ी हो। बड़ी टेबल संपन्नता की सूचक होती है। यदि टेबल लकड़ी की बनी हो तो बहुत अच्छी रहती है। लड़की की मेज शक्ति का संचार करने वाली होती है।

भोजन के कमरे का दरवाजा किसी दीवार की ओर खुलता हो तो इसके कारण भोजन करने वाला तनाव में रहता है। इसके निवारणार्थ दीवार पर एक दर्पण लटका देना चाहिए।

रसोईघर वास्तुशास्त्र के अनुसार घर में भोजन के कमरे का अत्यंत महत्व है। जिस प्रकार रहने के लिए मकान की आवश्यकता होती है उसी प्रकार जीवित करने के लिए भोजन की आवश्यकता होती है। अपनी आवश्यकता घर के सदस्यों एवं अपेक्षित मेहमानों की संख्या तथा उपलब्ध स्थान के अनुसार निश्चित कर लें कि आपकों कितनी बड़ी मेज बनवानी चाहिए। व्यक्तियों की संख्या के हिसाब से डाइनिंग टेबल का साइज क्या होना चाहिए।

यह सही है कि मनुष्य भोजन के बिना लम्बे समय तक जीवित नहीं रह सकता। भोजन को सलीके और तहजीब से खाना सभ्यता की निशानी है। हर संस्कृति में, हर देश में भोजन करने का तरीका और अंदाज अलग होता है। कहीं पर जमीन पर पालथी लगाकर, बैठकर भोजन किया जाता हो तो कहीं पर मेज-कुर्सी पर बैठकर। भारतवर्ष में जमीन पर बैठकर भोजन करना ज्यादा सुविधाजनक लगता है। आजकल लगभग सभी दिशाओं में भोजन मेज-कुर्सी पर ही किया जाता है।

डाइनिंग टेबल का टॉप सनमाइका आदि डेकोरेटिव लेमिनेट का ही बनवाएं। इसे साफ करने में सुविधा रहती है। डेकोरेटिव लेमिनेट भी चमकदार की बजाय बगैर चमक का ही लें तो उचित रहेगा। इस पर लकीरें नहीं पड़तीं। लेमिनेट के अलावा शीशे की टॉप वाली मेज भी बनाई जा सकती है।

डाइनिंग टेबल का निचला भाग इस प्रकार होना चाहिए कि बैठने वाले के पैर आसानी से मेज के नीचे जा सकें। इसके लिए मेज के बीचो-बीच बड़ा सा पाया बनाना उचित रहेगा।

डाइनिंग टेबल से मिलती-जुलती ही डाइनिंग कुर्सियां बनवानी चाहिए। कुर्सियां अपहोल्सट्री अर्थात गद्देदार हों तो बैठने में आरामदेह रहती हैं। अगर बड़ी मेज हो तो दो कुर्सियां बांहों वाली अर्थात आर्म चेयर्स हो सकती हैं तथा बाकी की बगैर बांहों की बनवाएं। डाइनिंग चेयर्स के बारे में विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि इनका सिरहाना सीधा होता है न कि अन्य किसी कुर्सी की तरह पीछे को झुका हुआ। इस दृष्टि से अन्य कार्यों के लिए प्रयोग की जाने वाली कुर्सियां डाइनिंग के लिए ठीक नहीं रहती। कुर्सियों पर अपहोल्सट्री के लिए इस तरह के कपड़े का प्रयोग करें जो पानी आदि गिरने से खराब न हो। डाइनिंग चेयर्स के लिए लैदर फोम उचित रहता है।

डाइनिंग टेबल तथा चेयर्स की उचित ऊंचाई भी आवश्यक है। खाने के लिए मेज की सुविधाजनक ऊंचाई 28 से 30 इंच मानी गई है। कुर्सी की सीट की ऊंचाई 17 या 18 इंच सुविधाजनक तथा आरामदेह रहती है। डाइनिंग टेबल के आस-पास चलने-फिरने व खाना परोसने वाले के लिए उचित जगह होनी चाहिए।

डाइनिंग टेबल पर रखा जाने वाला सामान:

डाइनिंग टेबल पर क्रॉकरी कैसी रखनी चाहिए यह बहुत महत्वपूर्ण बात है। आमतौर पर टेबल पर सामान्य आकार की क्रॉकरी रखना अच्छा होता है। इसके अतिरिक्त कटावदार क्रिस्टल के ग्लास रखने से भी लाभ मिलता है। षटकोण के आकार की कटेरियां, प्लेटें डाइनिंग टेबल पर रखना उत्तम माना जाता है। टेबल की मैट्स का आकार टेबल के अनुसार होना चाहिए तथा रंग टेबल के रंग से मेल खाता हुआ होना चाहिए। वास्तुशास्त्रियों के अनुसार यदि टेबल पश्चिम दिशा में हो तो मैट्स का रंग हरा होना चाहिए क्योंकि पश्चिम दिशा पारिवारिक संबंधों को प्रगाढ़ करने में सहायक होती है। यदि नैपकिन सफेद रंग के हों तो उनमें छल्ले होने चाहिए जो रंगीन हों।

डाइनिंग रूम एवं रसोईघर के बीच वास्तुनियम:

रसोईघर वास्तुशास्त्र के अनुसार डाइनिंग रूम में मेज व कुर्सियों के अलावा एक वाल यूनिट या साइड बोर्ड भी हो तो क्रॉकरी आदि रखने में आसानी हो जाती है। डाइनिंग रूम तथा रसोईघर के बीच की दीवार पर एक वाल यूनिट या दीवार के स्थान पर रूम डिवाइडर इस तरह बनवा लें जिसमें सर्विस विंडो हो तथा क्रॉकरी एवं अन्य सामान रखने के लिए शेल्फ तथा दराजें भी हों। शेल्फों तथा दराजों में क्रॉकरी छोटे बरतन, नमकदानी, नेपकिन छुरी-कांटा, चाक आदि रखने में सुविधा रहती है। रूम डिवाइडर इस प्रकार बनाया जा सकता है कि रसोई व डाइनिंग रूम दोनों तरफ से प्रयोग हो सके।

अगर ड्राइंगरूम के साथ ही डाइनिंग रूम हो तो दोनों के बीच में रूम डिवाइडर काफी उपयोगी रहता है तथा सुंदर भी लगता है। ड्राइंग तथा डाइनिंग रूम के बीच का डिवाइडर छत तक बनाने की बजाए सात फुट तक बनाना ही काफी है। डिवाइडर की बजाए ड्राइंगरूम तथा डाइनिंग रूम के बीच में पर्दे से भी काम चल सकता है।

रसोईघर से खाने के कमरे में खाना तथा बर्तन ले जाने के लिए एक छोटी सी ट्रॉली कास्टर्स पर बनवानी चाहिए। ट्रॉली का रंग मेज कुर्सी तथा वॉल यूनिट में एक ही रंग व डिजाइन की सनमाइका प्रयोग करें।

डाइनिंग रूम में प्रकाश की व्यवस्था:

रसोईघर वास्तुशास्त्र के अनुसार खाने के कमरे में प्रकाश की व्यवस्था पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए। खाने की मेज लटके हुए बड़े शेड के लेम्प ठीक रहते हैं। कमरे में हल्का व सौम्य प्रकाश रहने से टेबल आकर्षण का केंद्र बन जाती है जो जरूरी भी है। शेष कमरे में एकसार हल्की रोशनी के लिए कम वाट के बल्ब दीवारों पर ब्रेकेट पर या पर्दों की पेलमेट में लगाए जा सकते हैं। प्रकाश तथा रंगों की व्यवस्था के बारे में अलग से विस्तृत रूप से समझाया गया है।

डाइनिंग रूम में किसी भी दीवार पर बड़े शीशे न लगाएं। इसमें नजर आने वाला प्रतिबिम्ब भोजन करने वाले को विचलित करता है और अकारण ही व्यक्ति अपने हाव-भाव पर ध्यान देने लगता है। डाइनिंग रूम परिवार के सदस्यों के एक साथ मिलकर बैठने का एक मात्र स्थान होता है। अतः यहां कोई भी सजावटी वस्तु ऐसी नहीं होनी चाहिए कि परिवार के सदस्यों का ध्यान एक-दूसरे से हटकर उसकी तरफ जाए।

रेफ्रिजरेटर यदि रसोई की बजाए डाइनिंग रूम में रख रहे हों तो उसे ऐसी जगह रखें जहां रसोईघर से पहुंचने में आसानी रहे तथा गृहिणी के रसोई से फ्रिज तक के आवागमन से डाइनिंग टेबल का प्रयोग कर रहे व्यक्तियों को किसी प्रकार की असुविधा न हो। फ्रिज को डाइनिंग तथा रसोईघर के बीच की दीवार से लगाकर अग्नि कोण की ओर रखना चाहिए। फ्रिज को डाइनिंग तथा रसोईघर के बीच की दीवार से लगाकर अग्नि कोण की ओर ही रखना चाहिए।

डाइनिंग रूम के एक कोने या कमरे के बाहर निकलते ही पास में ही सुविधाजनक स्थान पर हाथ-मुंह धोने के लिए वाशबेसिन भी लगा होना चाहिए। यदि किचन तथा डाइनिंग के बीच में रूम डिवाइडर बनवा रहे हों तो उसके एक कोने में ही बेसिन लगवाया जा सकता है। वाशबेसिन के नीचे के भाग को केबिनेट में ही छुपाया जा सकता है।

वास्तव में डाइनिंग रूम की सजावट में चकाचौंध की बजाए सादगी होनी चाहिए। कोई भी सजावटी वस्तु इतनी आकर्षक नहीं होनी चाहिए कि खाना खाने वाले व्यक्ति का ध्यान बांट सके। दीवार पर कोई बड़ी सी पेटिंग या म्यूरल अवश्य लगाया जा सकता है लेकिन उस पर स्पॉट लाइट लगाकर उसे आकर्षण का केन्द्र न बनाएं। डाइनिंग रूम के पर्दे भी कमरे के रंग से मिलते-जुलते रंग के सुंदर डिजाइन के होने चाहिए। खिड़कियों में दो दरवाजे यानी शीशे के साथ-साथ जाली भी होनी चाहिए ताकि मच्छर-मक्खी आदि अंदर न आ पाए।

रसोईघर वास्तुशास्त्र की मान्यता के अनुसार भोजन करने की प्रक्रिया के साथ-साथ आध्यात्मिक, धार्मिक, मानसिक एवं पवित्र मान्यताएं जुड़ी होती हैं। इसलिए खाना खाने का स्थान साफ-सुथरा व पवित्र होने के साथ-साथ सुंदर, उपयोगी व आरामदेह भी होना चाहिए। ध्यान रहे खाने को सुस्वाद बनाने में स्वच्छ एवं सुंदर वातावरण का भी काफी हाथ होता है। स्वस्थ शरीर के लिए अच्छा खाना जरूरी होता है और अच्छे खाने के लिए अच्छा वातावरण भी उतना ही जरूरी होता है।

रसोईघर वास्तुशास्त्र के अनुसार भोजन के कमरे में डाइनिंग टेबिल हमेशा पूर्व-पश्चिम दिशा में रखें तथा डाइनिंग टेबिल को कभी भी बीम के नीचे न रखें। डाइनिंग रूम अर्थात खाने का कमरा चाहे ड्राइंगरूम के सात ही हो या अलग से इसका प्रमुख अंग है डाइनिंग टेबल। रसोईघर वास्तुशास्त्र के अनुसार खाने के मेज पर केंद्रित प्रकाश पड़ना आवश्यक है परंतु वह तेज नहीं होनी चाहिए। इसलिए डाइनिंग टेबल पर सौम्य प्रकाश वाला बल्ब लगाना चाहिए। डाइनिंग टेबल पर सौम्य प्रकाश का होने से भोजन करने वाले सच्चा लगता है एवं सुख की अनुभूत कर पाता है। डाइनिंग टेबल पर प्रकाश के लिए छत से लटकने वाली हैंगिग लाइट लगाएं। दो या तीन शेड वाली लाइट लटकाएं एवं इच्छानुसार एक या अधिक जलाकर मनचाही रोशनी करें। डिनर का प्रयोग डाइनिंग टेबल की लाइट्स के लिए उचित रहता है।

अधिकतर रसोईघर में प्रकाश के नाम पर एक चालीस वाट का बल्ब लगाकर पर्याप्त मान लिया जाता है। गृहिणी का अधिकांश समय रसोईघर में ही व्यतीत होता है। रसोईघर में ही अक्सर दाल-चावल आदि को चुनने, बीनने व छानने पड़ते हैं जो कम प्रकाश में ठीक से करना संभव नहीं होता। दाल में एक कंकर भी पूरे खाने का मजा किरकिरा कर देता है। फिर कम प्रकाश में कार्य करने से गृहिणी की नेत्र ज्योति क्षीण होने का भी खतरा रहता है। रसोईघर वास्तुशास्त्र कहता है कि पूरे रसोईघर में एक सा प्रकाश हो इसलिए एक ट्यूबलाइट या बल्ब तो एक दीवार पर लगाना आवश्यक होता है। इसके अतिरिक्त वर्किंग काउंटर के ऊपर वाली दीवार पर भी प्रकाश का स्रोत होना चाहिए जिसका सीधा प्रकाश वर्किंग काउंटर पर पड़े।

छत पर प्रकाश स्रोत लगाने से काम करने वाले की छाया काउंटर पर पड़ेगी अतः छत पर लगाने की बजाए काउंटर वाली दीवार पर या काउंटर वाली दीवार पर बने शेल्फ के नीचे इस तरह बल्ब या ट्यूबलाइट लगाएं कि आंखों पर रोशनी न पड़कर काउंटर पर ही पूरी रोशनी पड़े।

बल्ब की अपेक्षा ट्यूबलाइट का प्रकाश ज्यादा तेज, सफेद एवं उजला होता है। बल्ब की अपेक्षा इसमें बिजली का खर्चा भी कम होता है।

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