SC/ST ACT में बलाव के विरोध में आठ लोगों की मौत हो गई – 2 अप्रैल 2018

SC/ST Act - भारत बंद

नई दिल्ली: SC/ST ACT में तत्काल गिरफ्तारी पर सुप्रीम कोर्ट के रोक के खिलाफ हुए प्रदर्शन में पूरे भारत में 8 लोगों की जान चली गई तथा कई लोग गंभीर रूप से घायल हो गयें। बता दें कि एक्ट में बदलाव को लेकर दलित संगठनों ने 2 अप्रेल को भारत बंद का ऐलान किया था। इस ऐलान के बाद कई जगह पर हिंसक झड़प और आग जनी की खबरें मिली।

सबसें हिंसक माहौल तो मध्यप्रदेश के भिंड, ग्वालियर और मुरैना में देखने को मिली, वहा पर 6 लोगों की जान चली गई। उत्तरप्रदेश और राजस्थान में भी 1 -1 लोगों की जान चली गई। पंजाब में तो सेना को अलर्ट मोड़ पर रखा गया था। भारत के कई शहरों में तो पुलिस और प्रदर्शनकारियों को बीच झड़पे भी देखने को मिली। प्रदर्शनकारियों ने कई सरकारी संपत्तियों को आग के हवाले कर दिया गया तथा इसके साथ ही भारतीय रेल के सेवा को भी बाधित कर दिया।

प्रदर्शनकारियों का ऐसा करना कभी उचित नहीं हो सकता क्योंकि इससे देश का नुकसान होने के साथ साथ उनका भी कोई भला नहीं हुआ। इससे तो अच्छा होता कि वो शांतिपूर्ण ढ़ग से आन्दोलन करते और अपनी बात को सरकार के सामने रखते या अपनी दलील को कोर्ट में पेश करतें। हिंसा से कभी भी न्याय नहीं मिल सकता है। आंदोलनकारियों को ये समझना चाहिए था कि सुप्रीम कोर्ट नें SC/ST ACT में केवल संसोधन किया था उसे बदला या बंद नहीं किया था।

अप प्रदर्शनकारियों से क्यों न पूछा जाये कि जिस चीज का नुकसान हुआ है और जिसकी जान चली गई है उसका जिम्मेदार कौन। क्योंकि सरकार तो हो नहीं सकती क्योंकि सरकार तो तुम्हारे पक्ष में दिख रही है तभी तो उसने पूर्ण विचार के लिए कोर्ट में याचिका दे दी। क्या जिनकों चोटे आई और जिनका नुकसान हुआ उनकी भरपाई आप लोग करेंगे, नहीं न तो फिर आपकों दंगा फसाद करने का हक किसने दे दिया। यह सोचें और यदि समझ में आ जाये तो आज के बाद कभी भी ऐसा कदम उठाने से पहले सौ बार सोचियेगा। क्योंकि जिनको चोटे आई और जिनका नुकसान हुआ उनमें से हो सकता है आपको कोई नजदीकी रिस्तेदार रहा होगा। SC/ST ACT बलाव के विरोध में आठ लोगों की मौत हो गई




सुप्रीम कोर्ट के रोक के खिलाफ हुए प्रदर्शन में पूरे भारत में 8 लोगों की जान चली गई तथा कई लोग गंभीर रूप से घायल हो गयें। बता दें कि एक्ट में बदलाव को लेकर दलित संगठनों ने 2 अप्रेल को भारत बंद का ऐलान किया था। इस ऐलान के बाद कई जगह पर हिंसक झड़प और आग जनी की खबरें मिली।

सबसें हिंसक माहौल तो मध्यप्रदेश के भिंड, ग्वालियर और मुरैना में देखने को मिली, वहा पर 6 लोगों की जान चली गई। उत्तरप्रदेश और राजस्थान में भी 1 -1 लोगों की जान चली गई। पंजाब में तो सेना को अलर्ट मोड़ पर रखा गया था। भारत के कई शहरों में तो पुलिस और प्रदर्शनकारियों को बीच झड़पे भी देखने को मिली। प्रदर्शनकारियों ने कई सरकारी संपत्तियों को आग के हवाले कर दिया गया तथा इसके साथ ही भारतीय रेल के सेवा को भी बाधित कर दिया।

प्रदर्शनकारियों का ऐसा करना कभी उचित नहीं हो सकता क्योंकि इससे देश का नुकसान होने के साथ साथ उनका भी कोई भला नहीं हुआ। इससे तो अच्छा होता कि वो शांतिपूर्ण ढ़ग से आन्दोलन करते और अपनी बात को सरकार के सामने रखते या अपनी दलील को कोर्ट में पेश करतें। हिंसा से कभी भी न्याय नहीं मिल सकता है। आंदोलनकारियों को ये समझना चाहिए था कि सुप्रीम कोर्ट नें एस एक्ट में केवल संसोधन किया था उसे बदला या बंद नहीं किया था।

अप प्रदर्शनकारियों से क्यों न पूछा जाये कि जिस चीज का नुकसान हुआ है और जिसकी जान चली गई है उसका जिम्मेदार कौन। क्योंकि सरकार तो हो नहीं सकती क्योंकि सरकार तो तुम्हारे पक्ष में दिख रही है तभी तो उसने पूर्ण विचार के लिए कोर्ट में याचिका दे दी। क्या जिनकों चोटे आई और जिनका नुकसान हुआ उनकी भरपाई आप लोग करेंगे, नहीं न तो फिर आपकों दंगा फसाद करने का हक किसने दे दिया। यह सोचें और यदि समझ में आ जाये तो आज के बाद कभी भी ऐसा कदम उठाने से पहले सौ बार सोचियेगा। क्योंकि जिनको चोटे आई और जिनका नुकसान हुआ उनमें से हो सकता है आपको कोई नजदीकी रिस्तेदार रहे होंगे।

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