शारीरिक अंगों पर बाहरी प्रभाव

बॉडी लेंगुएज

आपने यह तो बहुत सुना होगा कि इंसान की सोच जैसी होती है वह वैसा ही बन जाता है अर्थात उसके मन के विचारों का उसके शरीर पर भी प्रभाव (Outer influence on the body organs) पड़ता है लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा है कि आपके शरीर पर मन के विचारों के साथ-साथ बाहरी मौसम का भी उतना भी प्रभाव पड़ता है।

आमतौर पर हम ऐसी छोटी-छोटी बातें महसूस नहीं करते लेकिन यही छोटी बातें हमारी बॉडी लेंगुएज का एक पन्ना होती है। आपने देखा होगा कि सर्दी के मौसम में बाहर सड़कों पर बैठे लोग सर्दी के मारे ठिठुरते हुए अपनी दोनों बाजुओं को मोड़ते हुए अपनी बगलों में दबाकर अकड़े से बैठे होते हैं। उनके मुंह से धुंआ-भी निकल रहा होता है।

उनकी यह हालत देखकर कोई भी राह चलता फौरन समझ लेता है कि उन्हें सर्दी लग रही है। हालांकि वे मुंह से कुछ नहीं बोलते। लेकिन उनकी बॉडी लेंगुएज को पढ़कर यह पता चल जाता है कि उन्हें सर्दी लग रही है। यही तो है हमारी बॉडी लेंगुएज का कमाल। नहीं तो हम उन्हें ठिठुरते हुए देखकर यह क्यों नहीं सोचते कि उन्हें गर्मी लग रही है।

यह हमारी बुद्धि ही तो है, जो यह फैसला करने में एक पल भी नहीं लगाती कि सामने वाला आदमी क्या महसूस कर रहा है? उसकी बॉडी लेंगुएज को समझ लेना ही एक-दूसरे के शरीर का ज्ञान प्राप्त करना है। हमारी नजर और मस्तिष्क मिलकर ही उसके मन में से आने वाले संकेतों की भाषा जान लेते हैं।

जरा सोचिए कि इस संसार में लाखों बच्चे हर रोज जन्म लेते हैं वे बोलना तो दूर की बात है अपनी इच्छा से हिल भी नहीं सकते, उनका पालन-पोषण कैसे होता है?

यदि आप इस बारे में जरा भी सोचने की कोशिश करें तो आप यह बातें फौरन समझ जाएंगे कि बच्चे के शरीर की भी एक भाषा है। वह जुबान से तो कुछ नहीं बोलता, मगर उसके शरीर के इशारे ही उसकी बात को उसकी इच्छा को व्यक्त करते हैं, जिसे साधारण से साधारण लोग भी समझ जाते हैं।

बच्चा रो रहा है तो उसे भूख लगी है। दूध पीते ही बच्चे रोना बंद कर देता है। बच्चा आपकी भाषा तो समझता नहीं फिर भी वह मां के द्वारा थपकी देने पर क्यों सो जाता है? वह कैसे समझ लेता है कि उसे सुलाया जा रहा है?

यह सिर्फ इसलिए होता है क्योंकि वह बच्चा इतना छोटा होते हुए भी मां-बाप की थपकी की भाषा को समझता है।

आप बच्चे को पालने में डाल देते हैं और पालने में डालकर हिलाते रहते हैं। वह पालने के हिलने से सो जाता है।

वह आपकी थपकी की भाषा को समझ रहा है। आप भी उसे रोते हुए देखकर यह समझ लेते हैं कि उसे भूख लगी है। यहां तक भी देखा गया है कि एक मां बच्चे को पेशाब करने और मल विसर्जन के इशारे को भी समझती है, जबकि बच्चा मुंह से कुछ नहीं बोलता। यही तो है बॉडी लेंगुएज का कमाल।

मानव शरीर के अंदर ही हर प्रकार की भाषा छुपी हुई है, उसके मन से जो आवाज उठती है, मस्तिष्क उस आवाज के बारे में कल्पना करता है तो उसके हिसाब से हमारे शरीर के अंग काम करने लगते हैं।

कोई कलाकार अगर अपनी कल्पना के सहारे अपनी किसी नई रचना को कागज पर उतारना चाहता है तो पहले उसे उस कल्पना को मस्तिष्क में ही उतारना पड़ेगा। फिर उसके हाथ और कलम दोनों मिलकर उसे किसी कागज पर उतारेंगे।

यह तो दोनों ओर की मूक भाषा का ही कमाल है, जिसे केवल अंगों ने ही जन्म दिया है। बहुत से लोग इस बॉडी लेंगुएज के ज्ञान से भले ही वंचित हों, मगर फिर भी वे इसे समझते हैं क्योंकि बॉडी लेंगुएज का ज्ञान प्राकृतिक है और यह प्रकृति की ओर से मानव जाति को दिया गया अनमोल उपहार है।

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