Super 30 Vastu Tips – वास्तु के अनुसार दरवाजे, स्तंभ और पेड़ का माहत्व

प्रवेश द्वार की सजावट

सिंह द्वार और मुख्य द्वारगृह स्वामी की राशि के अनुसार, मुख्य द्वार बनाने की अपेक्षा अनुकूल स्थिति को देखकर उसे बनाना कहीं उचित है क्योंकि मकान की संरचना उस विशेष व्यक्ति की मौत के बाद भी रहती है और अन्य लोग उसमें निवास करते रहते हैं। द्वार की शुभ स्थितियां और उसका प्रभाव निम्न है-

  • उत्तर, उत्तर-पूर्व में सिंह द्वार या मुख्यद्वार होना शुभ माना गया है। इस दिशा में द्वार होने पर आर्थिक लाभ मिलता है।
  • पूर्व, उत्तर-पूर्व की दिशा में सिंह द्वार या मुख्यद्वार होना ज्ञान में वृद्धि का सूचक है।
  • दक्षिण, दक्षिण-पूर्व दिशा में सिंह द्वार होने से सामान्य लाभ मिलता है। यदि दूसरा द्वार उत्तर-पूर्व में लगाया जाए तो लाभदायक होता है।
  • पश्चिम उत्तर-पश्चिम दिशा में ये द्वार होना सफलता का सूचक माना गया है।
  • उत्तर, उत्तर-पश्चिम दिशा में दरवाजा होना अशुभ होता है। इस दिशा में दरवाजा होने से मन में अस्थिरता उत्पन्न होती है।
  • पूर्व, दक्षिण-पूर्व दिशा में सिंह द्वार या मुख्यद्वार होने पर अशुभ फल मिलता है। इस दिशा में द्वार होना विपरीत प्रभाव डालने का कारण बनता है।
  • दक्षिण, दक्षिण-पश्चिम दिशा में सिंह द्वार या मुख्यद्वार होने से परिवार वालों को आर्थिक हानि तथा महिलाओं को स्वास्थ्य हानि होती है
  • पश्चिम, दक्षिण-पश्चिम दिशा में ये दोनों द्वार होने पर मकान के मालिक को आर्थिक हानि होती है।

द्वारों की संख्या- द्वारों की संख्या सम होनी चाहिए विषम नहीं जैसे 2, 4, 6, 8, 12 आदि। द्वारों की 10 संख्या शुभ नहीं मानी जाती क्योंकि इसका अंत शून्य में होता है। लेकिन यह गृहस्वामियों पर कोई अधिक गंभीर प्रभाव नहीं डाल सकता है फिर भी इस संख्या से बचना ही उचित है। खिड़कियों और रोशनदानों की संख्या भी सम होनी चाहिए। दरवाजे और खिड़कियां दीवार से मिली हुई नहीं होनी चाहिए। वे एक दूसरे से 3 से 4 इंच दूर होनी चाहिए। कमरे के दरवाजे तथा खिड़कियां एक-दूसरे से विपरीत दिशा में होनी चाहिए तथा उन्हें उचित स्थान पर लगाना चाहिए। आमने-सामने बने दरवाजों और खिड़कियों की चौड़ाई एक समान होनी चाहिए।

शहतीरों और स्तम्भों की संख्या- एक मकान में शहतीर और स्तम्भ की संख्या भी सम होनी चाहिए। उत्तर-पूर्व कोने के स्तम्भ गोलाकार, षड्भुजाकार, अष्टभुजाकार या बहुभुजाकार नहीं होना चाहिए। जब वास्तुशास्त्र के उद्देश्य से स्तम्भों को खुला रखा जाए तो भी उनकी संख्या सम होनी चाहिए।

वृक्षों की संख्या- मकान के बाहर पार्क आदि बनवाना चाहिए जिसमें नारियल, आम आदि का पेड़ लगना चाहिए। लेकिन ध्यान रखें कि इनकी संख्या सम हो।

एक मुख्य द्वार- यदि केवल एक ही मुख्यद्वार हो तो उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख्यद्वार बनवाना वास्तुशास्त्र के अनुसार सबसे अच्छा होता है। यह द्वार बीच में नहीं होना चाहिए बल्कि किसी उचित स्थान पर ही होना चाहिए। दक्षिण में एक ही मुख्य द्वार होना बिल्कुल शुभ नहीं होता और पूर्व तथा उत्तर में दूसरा द्वार बनाने की व्यवस्था अवश्य करनी चाहिए। यद्यपि पश्चिम में एक द्वार का होना अशुभ नहीं होता तथा पूर्व में दूसरे द्वार की व्यवस्था कर लेनी चाहिए।

दो द्वार- जब मकान में दो द्वार लगाने हों तो उनका जोड़ इस प्रकार बनाना चाहिए उत्तर में मुख्य द्वार और पूर्व में उपद्वार, पूर्व में मुख्यद्वार और दक्षिण में उपद्वार, पूर्व में मुख्यद्वार तथा पश्चिम में उपद्वार, पूर्व में मुख्यद्वार और उत्तर में उपद्वार, दक्षिण में मुख्यद्वार और उत्तर में उपद्वार, दक्षिण में मुख्यद्वार और पूर्व में उपद्वार होना चाहिए लेकिन इसे निम्नलिखित रूप में नहीं होना चाहिए-

दक्षिण में मुख्यद्वार और पश्चिम में उपद्वार, पश्चिम में मुख्यद्वार और उत्तर में उपद्वार, पश्चिम में मुख्यद्वार और दक्षिण में उपद्वार नहीं होना चाहिए। अतः वास्तुशास्त्र के अनुसार हमेशा उचित स्थान पर ही मुख्य द्वार बनवाना चाहिए।

तीन द्वार- जब मकान में तीन द्वार लगाने हों तो निम्नलिखित नियमों का ध्यान रखना चाहिए-

  1. पूर्व और उत्तर दिशा को छोड़कर अन्य तीन दिशाओं में तीन द्वार लगाना शुभ नहीं माना जाता है।
  2. दक्षिण या पश्चिम को छोड़कर अन्य तीन दिशाओं में दरवाजे या द्वार लगाना शुभ होता है।

चार द्वार- चारों दिशाओं में एक-एक द्वार शुभ होता है। द्वार की अच्छी या शुभ स्थिति के अतिरिक्त इस तथ्य का ध्यान रखना आवश्यक होता है कि मकान के अहाते के अंदर द्वारवेध के ठीक सामने कोई द्वार जैसे वृक्ष, खंभा, कुआं, दीवार, जल धारा या नहर, मंदिर, मकान के भागों का कोई मिलन या संधि स्थल, लट्ठा या पोल किसी भी दशा में नहीं होना चाहिए। इस विषय से संबंधित नियम के अनुसार यदि द्वार वेध मकान की ऊंचाई से दुगनी दूरी पर हो तो उसे वेध नहीं माना जाता।

द्वार में चारों फ्रेम लगवाना उचित होता है क्योंकि इससे फ्रेम केवल मजबूत ही नहीं होता बल्कि छोटे-छोटे कीड़े-मकोड़ों, सांपों आदि को घर के अंदर नहीं आने देता है। द्वार से संबंधित प्राचीन रीति-रिवाजों तथा धार्मिक अनुष्ठानों का प्रचलन उनकी वैज्ञानिक उपयोगी के कारण था। इस तथ्य को सरलता से समझा जा सकता है। हल्दी के चूर्ण, कुमकुम आदि को दरवाजों के फ्रेम में लगाने से विभिन्न प्रकार की बीमारियों को फैलाने वाले कीटाणु मर जाते हैं और बुरी आत्माएं डरकर भाग जाती है। अतः कम से कम मुख्य द्वार, पूजाघर और सभी बाहरी द्वारों पर दहलीज बनवाने बेहतर है। इससे अधिक अंतर नहीं पड़ता यदि दूसरे कमरों जैसे अध्ययन का कमरा, सोने का कमरा, रसोई घर, भंडारघर आदि की दहलीज नहीं बनवाना चाहिए।

दरवाजे के लिए दो शटर रखने की बजाए एक शटर रखना चाहिए। सभी बाहरी दरवाजों की बेहतर मजबूती और सुरक्षा के लिए उनका बाहर की ओर खुलना उचित होता है। कलात्मकता की दृष्टि और अच्छे कुशलता के लिए मुख्य दरवाजे को घर के अंदर की ओर खुलना चाहिए और वह भी बाएं और दाहिनी ओर नहीं।

द्वारों के संबंध में अन्य नियम-

  1. द्वार को मकान के अगले भाग के बीच में नहीं रखना चाहिए। दरवाजे को कभी बीच में नहीं रखना चाहिए। यदि दरवाजा इस भाग में बनाया जाता हो तो पूरे कुल का नाश हो जाता है।
  2. ऊपर मंजिल के द्वारों को नीचे की मंजिल के द्वारों के अनुरूप होना चाहिए।
  3. मकान के लिए बने दरवाजे के पल्ले को पांच से अधिक भागों में बनाना उचित नहीं माना गया है। अतः मकान दरवाजे में चार पल्ले के अतिरिक्त एक पल्ला उसमें हवा के आने-जाने के लिए लगाया जा सकता है।
  4. आमने-सामने के दो भिन्न-भिन्न मकानों के मुख्यद्वारों को एक-दूसरे के ठीक सामने नहीं होना चाहिए।

दरवाजे के पल्ले के वास्तुशास्त्र में भिन्न मान दिए गए हैं-

  • चौखट के ऊपर वाले भाग को वास्तुशास्त्र में देवी का नाम दिया गया है।
  • दरवाजे के बीच के भाग को नंदिनी कहा जाता है।
  • वास्तु शास्त्र में चौखट के नीचे के भाग को सुंदरी कहा गया है।
  • चौखट के बाएं भाग को प्रियानना कहा जाता है।
  • चौखट के दाहिने भाग को भद्रा कहा जाता है।
  • यदि सामान्य नियम यह है कि दरवाजों की ऊंचाई उनकी चौड़ाई से दोगुनी होनी चाहिए तथा विश्वकर्मा प्रकाश तथा वृहत संहिता जैसे प्राचीन ग्रंथों में आवासीय मकानों के अनुसार द्वारों की ऊंचाई उनकी चौड़ाई से तीन गुनी अधिक होनी चाहिए।
  • वास्तुशास्त्र में बताया गया है कि यदि परिवार में सौभाग्य एवं संपन्नता पाना हो तो मकान में चारों दिशाओं में द्वार बनवाना चाहिए। वास्तुशास्त्र में मकान के चारों द्वारों को निम्न दिशाओं में लगाने का वर्णन किया है-
  • वास्तुशास्त्र के अनुसार पूर्व दिशा का स्वामी इंद्र देवता है और इस दिशा में प्रवेश द्वार बनाना अच्छा माना गया है। विद्वानों के अनुसार इस दिशा में द्वार बनाने से इस मकान में रहने वाले परिवार की सभी इच्छाएं पूरी होती है।
  • वास्तुशास्त्र में लिखा है कि दक्षिण दिशा में द्वार बनाना अशुभ है क्योंकि इससे धन की हानि होती है। यदि दक्षिण दिशा में प्रवेश द्वार बन गया हो तो उसके वास्तुदोष को अपपिहार्य परिस्थितियों में गंधर्व पूजा करके कुछ हद तक दूर किया जा सकता है।
  • मकान में पश्चिम दिशा में द्वार का होना शुभ माना गया है। इस दिशा में द्वार होने पर उस मकान में रहने वाले जिस भी क्षेत्र में अपना कदम बढ़ाते हैं उस क्षेत्र में उन्हें सफलता मिलती है।
  • उत्तर दिशा में द्वार होना भी शुभ होता है। इस दिशा में द्वार होने पर उस मकान में रहने वाले आर्थिक एवं सुखों से सम्पन्न रहते हैं। इस दिशा में द्वार होना नाम, प्रसिद्ध एवं यशदायक होता है।

वास्तुशास्त्र में चार प्रकार के मकानों के बारे में बताया गया है जिसका अपना महत्व एवं अर्थ है-

  1. उत्संग- जहां मकानों और निर्माण स्थल के द्वार समान दिशा में हैं।
  2. हीनबाहु- जब निर्माण स्थल पर प्रवेश करते समय मकान दाहिनी ओर पड़ता है।
  3. पूर्णबाहु- जब निर्माण स्थल में प्रवेश करते हुए मकान बाईं ओर पड़ता है।
  4. प्रत्यक्ष- जब मकान का द्वार मकान के पिछले की ओर होता है।

इस तरह वास्तुशास्त्र के अनुसार पहला और तीसरी स्थिति का द्वार शुभ एवं सौभाग्यदायक होता है तथा दूसरे व चौथे स्थिति का द्वार अशुभ होता है।

मकान में दरवाजों की स्थिति-

  • यदि मकान के पास स्थित सड़क उत्तर दिशा में हो तो मकान का दरवाजा उत्तर दिशा में तथा उत्तर पूर्व से दक्षिण, दक्षिण-पूर्व में नहीं बनाना चाहिए। इस दिशा में दरवाजे बनाना अशुभ माना गया है। यदि सड़क मकान के दक्षिण दिशा में हो तो एक द्वार दक्षिण दिशा में तथा दूसरा द्वार उत्तर, तथा उत्तर-पश्चिम दिशा में नहीं बनवाना चाहिए क्योंकि यह वास्तुदोष उत्पन्न करता है।
  • यदि मकान में सड़क दक्षिण दिशा में हो तो वास्तुशास्त्र के नियमानुसार मकान का दरवाजा दक्षिण से उत्तर तथा उत्तर-पूर्व की ओर बनवाना चाहिए। इस तरह द्वार बनाना अत्यंत शुभ माना गय़ा है। यदि मकान में सड़क पूर्व दिशा में हो तो मकान का दरवाजा पूर्व दिशा से उत्तर-पूर्व की ओर तथा पश्चिम दिशा से उत्तर-पश्चिम की ओर बनाना चाहिए। यह शुभफलदायक होता है।
  • यदि सड़क मकान के पश्चिम दिशा में हो तो मकान का मुख्यद्वार पश्चिम दिशा में होना अशुभ माना गया है। यदि मुख्यद्वार पश्चिम दक्षिण-पश्चिम में हो और उपद्वार पूर्व दक्षिण-पूर्व की ओर हो तो वास्तुदोष उत्पन्न होता है जिससे मकान में रहने वाले परिवार पर बुरा असर होता है।
  • यदि सड़क पश्चिम दिशा में हो और दक्षिण दक्षिण-पूर्व से पश्चिम दक्षिण-पश्चिम में द्वार हो तो भी वास्तुदोष उत्पन्न होता है। अतः इस दिशा में द्वार नहीं बनवाना चाहिए तथा वास्तुशास्त्र के अनुसार उसी दिशा में द्वार बनाएं जिससे वास्तुदोष उत्पन्न न हो।
  • यदि सड़क दक्षिण दिशा में हो और वह पूर्व से पश्चिम की ओर जा रही हो तो दरवाजे उत्तर से दक्षिण तथा पूर्व दिशा में उत्तर-पूर्व से पश्चिम में उत्तर-पश्चिम को शुभ होता है। पूर्व दिशा में दक्षिण-पूर्व से दक्षिण दक्षिण-पश्चिम को नहीं बनवाना चाहिए। यह अशुभ होता है।
  • यदि मकान के सामने सड़क पूर्व दिशा तथा उत्तर दिशा में हो तो द्वार पूर्व से पश्चिम की ओर उत्तर दिशा में उत्तर-पूर्व की ओर तथा दक्षिण दिशा में दक्षिण-पूर्व की ओर बनवाना चाहिए। यह शुभ होता है। पूर्व दिशा में द्वार बीच में न बनवाकर आग्नेय कोण की ओर बनवाना चाहिए। यदि सड़क उत्तर दिशा में तथा पूर्व दिशा में हो तो द्वार उत्तर से दक्षिण की ओर और पूर्व से पश्चिम की ओर बनवाना शुभ होता है। दरवाजे मकान में बीच में न बनवाकर एक ओर बनवाना चाहिए।
  • यदि मकान की उत्तर व पूर्व दिशा में सड़क हो तो दरवाजा उत्तर दिशा में उत्तर-पश्चिम की ओर तथा पूर्व दिशा में दक्षिण-पूर्व की ओर बनाना नहीं चाहिए। यह वास्तुदोष उत्पन्न करता है जिससे मकान में रहने वाले सदस्य परेशान रहते हैं। यदि सड़क उत्तर-पूर्व दिशा में ही हो तो दरवाजा उत्तर से दक्षिण की ओर तथा पूर्व से उत्तर दिशा की ओर तथा पश्चिम से उत्तर-पश्चिम दिशा की ओर होना शुभ माना गया है।
  • यदि उत्तर दिशा में सड़क हो तो मकान में दरवाजे उत्तर से दक्षिण दिशा में दक्षिण से पूरव दिशा की ओर बवनाना अशुभ होता है। यदि उत्तर दिशा में सड़क हो तो उत्तर से दक्षिण तथा दक्षिण से पश्चिम दिशा में दरवाजे बनाना वास्तुदोष उत्पन्न करने वाला होता है।
  • पश्चिम दिशा में सड़क वाले मकान में दरवाजे पश्चिम दिशा में उत्तर से पश्चिम दिशा की ओर तथा पूरव दिशा में दक्षिण से पूरव दिशा की ओर नहीं बनवाना चाहिए। उत्तर दिशा में सड़क वाले मकान में पूरव दिशा में उत्तर से पूरव की ओर तथा दरवाजा पश्चिम दिशा में दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर होना चाहिए।

वेस्मेंट या (तलघर) का फर्श (सेलर फ्लोर)-

  • पश्चिम दिशा में सड़क वाले मकान में पश्चिम दिशा में दक्षिण-पश्चिम की ओर तथा पूर्व दिशा में उत्तर-पूर्व की ओर दरवाजा बनाना वास्तुदोष पैदा करने वाला होता है। पश्चिम दिशा वाले मकान में दरवाजा पश्चिम से पूर्व दिशा की ओर उत्तर-पूर्व दिशा में दरवाजे बनाना शुभ माना गया है।
  • यदि मकान पश्चिम दिशा की ओर हो तो पश्चिम से पूर्व दिशा की ओर दरवाजा बनाना शुभ होता है। यदि यह वास्तुनियम के अनुसार उचित स्थान पर हो। यदि दक्षिण दिशा में सड़क हो तो बेसमेंट का दरवाजा दक्षिण दिशा में दक्षिण-पूर्व की ओर तथा उत्तर दिशा में उत्तर-पूर्व की ओर होना अशुभ होता है।
  • उत्तर दिशा में सड़क वाले मकान में दरवाजा उत्तर दिशा में उत्तर-पूर्व में होना चाहिए और दूसरा द्वार उसके सामने होना चाहिए। इसके अतिरिक्त एक सिंह द्वार उत्तर दिशा में उत्तर-पूर्व में होना चाहिए। पूर्व दिशा में सड़क वाले मकान का मुख्यद्वार पूर्व दिशा में उत्तर-पूर्व में होना चाहिए और दूसरे मकान का द्वार ठीक उसके सामने होना चाहिए। एक सिंह द्वार पूर्व दिशा में उत्तर-पूर्व में होना चाहिए।
  • यदि सड़क दक्षिण दिशा में हो तो मुख्यद्वार दक्षिण दिशा में दक्षिण-पूरव की ओर बनवाना चाहिए और दूसरा द्वार ठीक उसके सामने बनवाना चाहिए। इसके अतिरिक्त एक अन्य सिंह द्वार भी बनवाना चाहिए जो दक्षिण दिशा में दक्षिण-पूर्व की ओर हो। यदि सड़क पश्चिम दिशा में हो तो मुख्यद्वार पश्चिम दिशा में उत्तर-पश्चिम की ओर बनवाना चाहिए तथा दूसरा द्वार उसके सामने बनवाना चाहिए। इसके अतिरिक्त एक अन्य बड़ा द्वार पश्चिम दिशा में उत्तर-पश्चिम की ओर बनवाना चाहिए।

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