Vastu Dosh Ke Upay

वास्तुदोष को दूर करने के लिए मुख्य शोध (Vastu Dosh Ke Upay)

Table of contents:

Vastu Dosh Ke Upay: वास्तु शास्त्र के अनुसार मकान को बनाने में सुधार क्रिया बहुत जरूरी होती है, परंतु इस पर शोध की बहुत ही ज्यादा जरूरत होती है, क्योंकि उत्तर-पूर्व की दिशा में मकान में सुधार करने से व्यक्ति को बहुत ही अच्छे लाभ आदि मिलते हैं, परंतु जबकि दक्षिणी-पश्चिमी दिशा का भाग घर की स्त्रियों पर ज्यादा असर डालने वाला होता है, इस भाग को बदलने के लिए बहुत ही सावधानी की आवश्यकता होती है। वास्तु शास्त्र के जानकारों से सलाह लेकर ही इस दिशा को बदलना लाभदायक होता है। हमेशा ही किसी मकान या भवन को बनवाते समय किसी अच्छे वास्तुशास्त्र से जानकारी लेना अच्छा होता है। हमेशा प्रशासकीय कमरों को उत्तर दिशा अथवा पूर्व की दिशा में ही बनवाना चाहिए। आफिस आदि के भवन में वरिष्ठ प्रबंधक व और अन्य दूसरे प्रबंधक को हमेशा ही दक्षिण-पश्चिमी दिशा में इस प्रकार से बैठना चाहिए कि जिनसे उनका मुंह उत्तर दिशा अथवा पूर्व दिशा की तरफ हो। ऐसे आफिसरों के बैठने की कुर्सियां आने वाले व्यक्तियों की कुर्सियों से ऊंची ही होनी चाहिए तथा आने वाले व्यक्तियों का मुंह हमेशा ही दक्षिण दिशा या फिर पश्चिम दिशा की तरफ होना चाहिए।




वास्तुदोष को दूर करने के लिए बिना तोड़े-फोड़े निम्नासार बताए गए उपायों (Vastu Dosh Ke Upay) से वास्तुदोष को बहुत ही आसानी से दूर किया जा सकता है-

  1. हर व्यक्ति को अपनी दुकान, फैक्ट्री, आफिस एवं कार्यालय आदि में साल में कम से कम एक बार पूजा जरूर करवानी चाहिए।
  2. अगर दुकान आदि में चोरी वगैरह होती हों, तो दुकान के मुख्य गेट या दरवाजे की चौखट में मंगल-यंत्र को स्थापित करवा कर पूजा करवाना जरूरी होता है।
  3. वास्तुदोष से मुक्ति पाने के लिए (Vastu Dosh Ke Upayमकान में पूजन होना बहुत ही जरूरी होता है, इसको करवाने से वास्तुदोष नष्ट हो जाते हैं।
  4. कभी भी सोने वाले कमरे में बैठकर मदिरा अथवा नशीली वस्तु आदि का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। इस तरह से करने से व्यापार, धन तथा स्वास्थ्य पर इसका उलटा असर पड़ता है तथा हमेशा किसी न किसी बात की कमी होती रहती है।
  5. यदि कोई व्यक्ति किसी तरह की मानसिक चिंता से पीड़ित हो, तो उस कमरे में शुद्ध तथा पवित्र घी के एक दीपक को जलाकर रख देना चाहिए तथा इसके साथ ही गुलाब की खुशबू वाली अगरबत्ती भी कमरे में जलानी चाहिए।
  6. अगर दुकान आदि में बैठने पर दिल में किसी तरह की बैचेनी महसूस हो रही हो और मन बिना वजह ही चंचल हो रहा हों, तो सफेद गणेश जी की तस्वीर या मूर्ति की अच्छी तरह से पूजा-अर्चना करके मकान तथा दुकान के मुख्य गेट या दरवाजे के आगे तथा पीछे स्थापित कर देनी चाहिए। अगर दुकान का मुख्य गेट या दरवाजा अशुभ हो अथवा वास्तुशास्त्र के आधार पर बना हुआ न हो, तो ’यमकीलन यंत्र’ का अच्छी तरह से पूजन करके दुकान में स्थापित करना चाहिए। अगर किसी सरकारी कर्मचारी के द्वारा बिना वजह परेशान किया जा रहा हो, तो सूर्य यंत्र की अच्छी तरह से पूजा करके अपनी दुकान पर स्थापित करना चाहिए।
  7. अपनी पंसद के अनुसार ही एक खुशबूदार फूलों के गुलदस्ते को हमेशा ही अपने सिरहाने की तरफ दक्षिण दिशा के कोने में लगाना चाहिए।
  8. अगर आप किसी बिना जान पहचान के दुश्मन के द्वारा बहुत ही ज्यादा कठिनाइयों में हों तो अपने बिस्तर या पलंग के नीचे एक नए धारदार चाकू को जरूर ही रखें। अगर परिवार का कोई सदस्य बीमार हो, तो चांदी के बर्तन में शुद्ध केशर वाले गंगाजल को भरकर अपने पंलग के सिरहाने पर जरूर रखना चाहिए।
  9. यदि दुकान में किसी भी तरह से काम कम हो रहा हों तो अपनी दुकान के मुख्य दरवाजे या गेट की चौखट के ऊपर प्राण-प्रतिष्ठा किए हुए श्रीयंत्र को लगवाना चाहिए।
  10. अगर बहुत ही ज्यादा परेशानी हो, तो अपने पलंग के तकिये के नीचे पांच हल्दी की गांठों को लेकर सोना चाहिए। अगर अपने दुश्मनों के द्वारा परेशानी आदि हो रही हो, तो चांदी की महली बनाकर अपने तकिये के नीचे रखकर सोना चाहिए। अगर किसी गुप्त दुश्मन के द्वारा सताया जा रहा हो, तो सात चांदी के सांप बनवाकर उनमें सुरमा डालकर पैर के नीचे रखकर सोना चाहिए।
  11. अगर किसी तरह से परेशानी हो रही हो, तो अपने पलंग के नीचे तांबे के पात्र (बर्तन) में पानी को रख करके सोना चाहिए अथवा तकिये के नीचे लाल चंदन रखकर सोना चाहिए। अगर परेशानी लगातार बढ़ती ही जा रही हो, तो सोने तथा चांदी से मिश्रित नग को तकिये के नीचे रखकर सोना चाहिए अथवा कांसी के पात्र (बर्तन) में पानी को भरकर लाल चंदन उसमे डालकर अपने सोने वाले पंलग के नीचे रखकर सोना चाहिए।
  12. इस बात का ध्यान रखना बहुत ही जरूरी है कि कभी-भी अपने सोने वाले कमरों में इस्तेमाल किये हुए बर्तन अथवा भोजन कर लेने के बाद झूठे बर्तनों को नहीं रखना चाहिए क्योंकि इस तरह से करने पर घर में रोग आदि पैदा होते हैं तथा स्त्री के स्वास्थ्य पर भी इसका उल्टा प्रभाव होता है एवं इसके साथ ही उस घर में धन-संपति की भी कमी महसूस होने लगती है।

Vastu Dosh Ke Upay: भारतीय वैधिक पद्धति में मनुष्य को तीन हिस्सों में बांटा गया है जैसे- जीव, जीवात्मा तथा शरीर। काल पुरुष में अलग-अलग शरीर के अंगों पर बारह राशियां और सात ग्रहों का साम्राज्य है, जैसे बताया गया है कि मेष राशि की सत्ता काल पुरुष के सिर पर होती है, वृष राशि की कारतत्व पुरुष के मुंह तथा गले पर होती है। सिंह राशि का साम्राज्य व्यक्ति के खाने-पीने से संबंधित होता है यानि कि उसके पाचन संस्थान पर होता है, कन्या राशि की सत्ता कमर, आंतों तथा गुर्दों आदि के अंगों पर होता है। तुला राशि का संबंध पेट, जनेन्द्रियों पर व प्रजनन अंगों पर होता है। इसी तरह से वृश्चिक राशि की सत्ता गुदा पर होती है, धनु राशि का संबंध व्यक्ति के शरीर के अंग जांघों पर होता है, मकर राशि का संबंध घुटनों से तथा कुम्भ राशि पर पैरों की पिण्डलियों पर होता है और मीन राशि का साम्राज्य पैर के पंजों पर होता है।

जिस तरह से जिन-जिन राशियों पर क्रूर ग्रहों जैसे मंगल, सूर्य और पापी ग्रहों जैसे शनि, राहु, केतु और क्षीण चंद्रमा का असर होता है, उन राशियों से संबंधित अंगों में उपद्रव होता है और शरीर के वे अंग बदसूरत, कमजोर और खराब हो जाते हैं, जिन-जिन राशियों पर पूरी तरह से चंद्रमा, शुक्र, शुभ क्षेत्रिय बुध और बृहस्पति का असर होता है उन राशियों से संबंधित अंग मजबूत, सुंदर और स्वस्थ होते हैं।

राशियों की तरह ही व्यक्ति के शरीर के अंगों का संबंध भी ग्रहों से होता है जैसे- सूर्य राशि का संबंध सिर से होता है, चंद्रमा राशि का संबंध गले तथा छाती से होता है, मंगल राशि का संबंध कमर (पीठ) व पेट से होता है। बुध राशि का संबंध हाथों और पैरों से होता है. बृहस्पति राशि का संबंध कमर के क्षेत्र व जांघों से होता है, शुक्र राशि गुप्त इंद्रियों से संबंध रखता है और शनि राशि का संबंध पैरों की पिण्डियों पर निर्भर करता है तथा राहु-केतु राशि के बारें में सभी ज्योतिषी कुछ भी नहीं बताते हैं। ज्योतिषी इन दोनों का राहु-शनि, केतु-मंगल राशि को मानते हैं और इन्हें छाया ग्रह के रूप में भी मानते हैं तथा कुछ ज्योतिषी इन्हे शनिवतशहो तथा कुंजवन केतु कहकर दूर हो जाते हैं। बताए गए कारकतत्वों के साथ-साथ ग्रहों को कुछ और भी कालपुरुष विषयक कारकतत्व सौंपे गए हैं जैसे- सूर्य काल की पुरुष आत्मा है और उसका मन चंद्रमा है। मंगल पौरुष है, उसकी आवाज का प्रतीक बुध है, उसके ज्ञान का प्रतीक बृहस्पति है, शुक्र उसकी कामवासना का सूचक है तथा शनि उसके दुःखों का कारक है।

वर्षफल, गोचर, महादशा और दशा भुक्ति या प्रत्यन्तर में जब क्रूर ग्रहों, आर्य, मंगल, क्षीण चंद्र और पापी ग्रहों शनि, राहु, केतु के असर में कोई राशि आ जाती है तो इसके पड़ने वाले गलत असर की वजह से शरीर से अंगों में रोग उत्पन्न हो जाते हैं, इससे घर में लड़ाई-झगड़े होने लगते हैं, इस तरह के रोगों का इलाज हो सकता है लेकिन इसमें चंद्रमा की शरारत नहीं होनी चाहिए। चंद्रमा जब पापी अथवा क्रूर ग्रहों के प्रभाव में आता है, तब दो तरह के रोग जैसे गले और छाती का रोग अथवा असैव उत्पन्न हो जाते हैं। असैव दैविक पीड़ा को कहा जाता है। दैविक पीड़ा उसी अवस्था में होती है जब क्रूर राहु-केतु का प्रभाव कष्टेश और चंद्रमा पर होता है। दैविक पीड़ा के द्वारा व्यक्ति को मृत आत्माओं, पिशाचों, गृहदोष, कुल देवताओं के द्वारा प्रदत्त पीड़ा को भुगतना पड़ता है। ये परलौकिक शक्तियां बहुत ही ज्यादा परेशान करके कष्ट देती है।

जन्म-कुंडली में इस तरह के रोगों के होने का संबंध क्षीण चंद्र, चंद्राधिष्ठित राशि, चंद्र राशि और कर्क राशि पर राहु-केतु के पड़ने वाले असर से जाना जाता है। सामान्यतः तांत्रिक लोग इस तरह की होने वाली पीड़ाओं के बारे में नहीं बताते हैं क्योंकि इसमें असर के बारे में बताने से ही व्यक्ति को पीड़ित करने वाली पैशातचिक शक्तियां तांत्रिक को भी परेशान करने लगती है। राहु और केतु सूर्य के जितने ज्यादा पास में होंगे उतने ही ज्यादा खतरनाक और कठिनाइयों को पैदा करने वाले होंगे। क्षीण चंद्रमा के साथ भी इसी तरह का नियम है। जब राहु-केतु चंद्रमा से किसी तरह का संबंध बनाते हैं तब इनमें सज्जनता आती है और शुभ आत्माएं व्यक्ति की जिंदगी में सहायता प्रदान करती है, चाहे इसके लिए चंद्रमा व राहु एक ही राशि में हों अथवा राहु कर्क राशि में हों अथवा राहु चारों भाव में क्यों न हों। इस तरह के योग में चंद्र-राहु पर शनि-मंगल का असर नहीं पड़ना चाहिए।      कई बार यह दोष इतना रहस्य वाला होता है कि साधारण तांत्रिक भी इन दोषों के बारे में नहीं जान पाते और इस तरह की अवस्था के होने पर आठवें भाव में बैठा ग्रह इस बात के बारे में साफ बता देता है कि परेशानी होने की वजह क्या है।

प्रेतबाधा- निम्नलिखित स्थितियों में व्यक्ति की जन्मकुण्डली में प्रेतबाधा होती है-

  • अगर शनि राशि और राहु राशि लग्न में हों, तो व्यक्ति पिशाच बाधा से ग्रस्त होता है।
  • अगर शनि के साथ चंद्रमा छठे भाव में हो और सातवें भाव में राहु और केतु हो, तो व्यक्ति को प्रेत बाधा होती है।
  • अगर राहु के साथ चंद्रमा लग्न में हो तो और त्रिकोण में शनि-मंगल हों, तो व्यक्ति को पिशाच बाधा का सामना करना पड़ता है।

Vastu Dosh Ke Upay: मनुष्य अपनी पूरी जिंदगी में किसी भी चीज में पूरी तरह दक्ष नहीं हो पाता है। इसके होने की मुख्य वजह यह होती है कि कोई भी व्यक्ति अपने परिवार को पालने के लिए साधन तथा परिवार की सभी तरह की परेशानियों से पीड़ित रहता है। इससे वह अपने परिवार के प्रति भी सभी कर्त्तव्यों को नहीं निभा सकता है और मुसीबतों में घिरा रहता है। वह अपने परिवार को खुश रखने के लिए किसी भी तरह की कोई भी नौकरी अथवा व्यापार आदि को भी करता रहता है जिससे कि वह धन को ज्यादा से ज्यादा कमा सके, लेकिन जितनी मेहनत वह करता है उस व्यक्ति को उसका उतना लाभ नहीं मिल पाता है। इसकी वजह यह होती है कि न जाने कब उसके सामने किस तरह की परेशानी या मुसीबत आ जाए। इसी तरह के प्रयास को करने में वह अपना मानसिक संतुलन तक गंवा देता है। उसकी भी मुख्य वजह दुकान या मकान के दोष का होना भी हो सकता है जिसके बारे में उस व्यक्ति को पूरी तरह से जानकारी नहीं होती है। कठोर मेहनत करने के बाद भी उसे व्यापार में कामयाबी नहीं मिल पाती है तथा उसके सामने कई तरह की परेशानियां जिंदगी में आती रहती है। जब धन-सम्मान के नुकसान होने की उम्मीद होती है तो उस समय न जानने वाले दुश्मन भी उसको नुकसान आदि पहुंचाते रहते हैं, जब मानसिक सुख-शांति में बढोत्तरी हो, मकान में प्रेत, भूत, पिशाच का प्रकोप नजर आने लगे, व्यापार एवं नौकरी में लगातार नुकसान होता चला जा रहा हो, तो व्यक्ति को बताए गए निम्नलिखित उपाय करने चाहिए-

Vastu Dosh Ke Upay: इस तरह के कार्य को करते समय साधक को सफेद कपड़े पहन कर लकड़ी के पट्टे (बाजोट) पर सफेद रंग के कपड़े को डालकर उस पर सिंदूर से लिखना चाहिए। हीं शब्द का पूजन फूल, सिंदूर तथा अक्षत से करें। ध्यान करें-

व्याघ्र चर्म परीधानां, मुण्डमाला विभूषिताम्।

रक्तवर्तुल चीमाक्षीं, जिह्वया लोलयाSसुशन।।

चर्वयन्तीं महाकालीं, करल-रात्रिमिवापराम।

शोभयन्ती जगत सर्वं ससुरासुर पर्वतम्।।

     ।।ॐ ह्वों ह्वीं ह्वौं कात्यायनीये ह्वौं ह्वीं ह्वों फट्।। इस मंत्र का ग्यारह दिन तक रोजाना के समय पांच माला का जप करना चाहिए। इस साधना को सप्ताह के तीसरे दिन यानी कि बुधवार अथवा शनिवार के दिन से शुरू करना चाहिए। यह साधना रात के समय में करने वाली होती है। इस साधना को करते समय किसी भी तरह की रूकावट पैदा नहीं होनी चाहिए। इसके लिए आप सभी तरह की पूरी की पूरी रूकावटों या बाधाओं को दूर करने की इच्छा के साथ ही साधना को पूरा करना चाहिए। साधना को करते समय मन में पक्का विश्वास एवं भावना तथा पक्की इच्छा शक्ति का होना जरूरी है।

व्यापारिक कामों में चिंता आदि की अधिक बढ़ोत्तरी के हो जाने पर-

अगर आप किसी तरह की व्यापारिक परिस्थितियों की वजह से बहुत ही ज्यादा चिंता से पीड़ित रहने लगे हों तो इस चिंता को आप बहुत ही आसान से उपाय को अपनाकर दूर कर सकते हैं जैसे- थोड़े से आटे को लेकर उसका एक दीपक पांच मुंह के आकार का बना ले और उसमें पांच रुई की बत्ती को लगा दें तब इस दीपक के सामने फूलों को फैला करके दीपक को उस पर रखकर बताए जा रहे मंत्र का कम से कम 61 बार दो दिन तक उच्चारण करना चाहिए।

     ॐ हां हीं हौ हः फट् स्वाहा।। पांच दिन के बाद इन फूलों को नदी या किसी तालाब आदि में प्रवाहित कर देना चाहिए।

सुख-सौभाग्य, धन-संपति तथा यश में किसी तरह की कमी के आ जाने पर-

नवरात्रों के चौथे दिन ’कूष्माण्डा’ की साधना को पूरा करना चाहिए। ’कूष्माण्डा’ के प्रयोग को पूरा करने वाले साधक की जिंदगी में धन-संपति, यश, सुख-सौभाग्य को पाने के लिए सबसे अच्छा उपाय होता है। साधना करने वाले साधक को पीले रंग का कपड़ा जमीन पर बिछाकर तथा उस पर बैठ करके कूष्माण्डा का ध्यान करना चाहिए।

सुरा सम्पूर्णक्लश रुधिरप्लुतमेव च।

दुधाना हस्तपद्माभ्या कूष्माण्डेति नमो नमः।।

     इसके बाद अच्छी तरह से तथा साफ तरीके से संक्षिप्त पूजा-अर्चना करके नैवेध आदि को चढ़ा करके, इसके बाद 108 सफेद फूलों से मंत्रों का जाप करना चाहिए।

।। ॐ क्रीं कूष्माण्डे क्रीं ॐ।।

     साधना के पूरा हो जाने के बाद मां भगवती की आरती करने के बाद प्रसाद आदि को बांट देना चाहिए।

यदि आपके व्यापार को किसी के द्वारा बांध दिया गया हो तो-

अगर आप किसी तरह से पूरी लग्न तथा मेहनत करने के बाद भी अपने काम से लाभ प्राप्त नहीं कर पा रहे हो, तो यह जान लीजिए कि आपके व्यापार पर किसी अंजान दुश्मन के द्वारा टोना-टोटका आदि कर दिया गया है। इसके बाद आप काले रंग के कपड़ों को पहनकर अपने काम करने वाले स्थान या व्यापार करने वाली जगह पर ही किसी बर्तन (पात्र) में पानी को भरकर जरूर ही रख दें तथा उसके बाद उसी बर्तन के पास में लाल रंग के फूल को चढ़ा दें तथा इसके बाद एक तेल का दीपक भी जला दें, फिर इसके बाद उसके पास ही लगातार रोजाना पांच दिन तक ।। ॐ क्रौं क्रौं व्यापार बंधं मोचये ॐ फट्।। इस तरह के मंत्र का जाप इकत्तीस बार करें तथा मंत्र का जाप करने के बाद पानी को पूरे व्यापारिक प्रतिष्ठान पर छिड़क दें।

घर पर पूरी तरह से शांति न मिल पाने पर-

यदि आप अपने घर में सुख-शांति महसूस नहीं कर पाते हों तो इसके लिए आप पांच सीपी लेकर उन सीपियों को सिंदूर से रंग दें। सभी सीपियों के सामने 75 बार ।। ॐ श्रीं शं लं षं ॐ ।। के मंत्र का जाप करना चाहिए। इस मंत्र के खत्म हो जाने पर सीपी को अपने घर के अंदर ही रख दे। इस तरह से करने से घर में पूर्ण रूप से सुख-शांति आने लगती है।

अगर व्यापार में आश्चर्य तरीके से बढोतरी न हो पा रही हो तब-

अगर आप पूरी तरह से अपने व्यापार में सम्मान तथा तेजी से बढ़ोतरी करना चाहते हो, तो इस तरह से प्रयोग को पूरा करने की कोशिश करें। साफ-सुथरे तथा नए कपड़ों को पहनकर पीपल के तीन पत्तों की पूजा करें तथा इसके बाद उन पत्तों के पास ।। ॐ श्रीं श्रीं व्यापार वृद्धि ॐ ।। इस मंत्र का कम से कम 151 बार जाप करना चाहिए। जप के खत्म हो जाने के बाद उन पत्तों को आप अपने ही व्यापार करने की जगह पर लगा दे।

गृह सुख में पूरी तरह से सुख-शांति में बढ़ोतरी करने के लिए-

दुर्गा मां के नवरात्रों में पाचंवें दिन मां भगवती जगदम्बा के स्कन्द देवी के स्वरूप की साधना पूरी होती है। गृहस्थ सुख में कमी हों अथवा घर में ज्यादातर लड़ाई-झगड़े आदि होते रहते हों या फिर घर के सभी सदस्यों के बीच में कड़वाहट और बैर की भावना पैदा हो गई हो, तो इन सबको खत्म करने के लिए तथा आपस में बराबर प्रेम की भावना को बढ़ाने के लिए तथा सुख-शांति के लिए इस तरह के प्रयोग को पूरा किया जाता है। इसके लिए अपने सामने लकड़ी के पट्टे को रख करके इसके ऊपर एक पीले रंग के कपड़े को बिछा करके उस पर सिंदूर से ॐ शब्द को लिखे तथा इसके बाद मां जगदम्बा के स्कन्द देवी के रूप का अपने मन में ध्यान करें तथा इसके बाद उसे अपने हाथ की मुट्ठी में बंद करके कम से कम 51 बार मंत्र का जाप करना चाहिए।

मकान को बनाते समय आने वाली रुकावटों को दूर करना-

बहुत से व्यक्ति कई सालों से अपने मकान को बनवाने के चक्कर में लगे रहते हैं लेकिन उनका मकान फिर भी तैयार नहीं हो पाता है क्योंकि हर बार उनके सामने किसी न किसी तरह की रुकावट आकर खड़ी हो जाती है। मकान निर्माण करवाने के बीच में आने वाली बाधाओं आदि को दूर करने के लिए निम्नलिखित प्रयोग को आजमाना चाहिए- ’हिलवान’ को किसी बर्तन (पात्र) में रखकर उस पर सिंदूर से ॐ शब्द को लिख करके स्थापित कर दें। इसके बाद उस बर्तन पर 51 पीले रंग के फूलों को चढ़ाते हुए इस मंत्र का उच्चारण करना चाहिए ।। ॐ क्रों वास्तुगर्भ दोषनाशाय फट्।।

हर व्यक्ति की कोई न कोई राशि जरुर होती है और हर राशि का एक स्वामी ग्रह भी होता है। जब कोई ग्रह व्यक्ति की कुण्डली में अशुभ स्थान में आकर बैठ जाता है तो व्यक्ति पर इसका उल्टा असर डालकर व्यक्ति को परेशानी, मुसीबत आदि देता है। जीवन में सुख-दुख, लाभ-हानि आदि इन्ही ग्रहों के आधार पर ही होते हैं। इन ग्रहों को शांत करने के लिए उपासना या साधना आदि को करना बहुत ही जरूरी होता है। व्यक्ति की जन्म कुण्डली के अनुसार ही जब किसी तरह का कोई ग्रह खराब स्थान में बैठकर इसका उल्टा असर डाल करके दुख आदि देता हैं तो मुसीबतों आदि को भोगने के लिए व्यक्ति को मजबूर होना पड़ता है। व्यक्ति अगर खुद से संबंधित ग्रह का उपाय ग्रह के मंत्रों के द्वारा भी कर सकता है। जप को करने से ग्रहों के असर पर भी कमी आती है और वे शुभ फल देने लगते हैं। नीचे बताए गए संबंधित ग्रहों से सबंधित मंत्र, बीज मंत्र, जप करके की संख्या आदि के बारे में विस्तार से बताया जा रहा है (Vastu Dosh Ke Upay)-

  1. शनि ग्रह के लिए मंत्रः-

ॐ श नो दैवारभीष्प्य आर्पा

भवन्तु पीतयं श योरभि स्त्रवन्तु नः।

शनैश्चराय नमः।

इस शनि ग्रह का बीज मंत्रः-

ॐ प्रां प्रीं प्रौ सः शनैश्चराय नमः।

इस जप को शाम के समय में कम से कम 23,000 बार करना चाहिए।

  1. मंगल ग्रह के लिए मंत्रः-

ॐ अग्निमू्र्द्धा दिवः ककुत्पतिः पृधिच्याअयम्।

अपा रेतासि जिन्वति। भोमाय नमः।।

मंगल ग्रह का बीज मंत्रः-

ॐ का क्री को सः भोमायः नम।।

इस मंत्र को दोनों समय सुबह तथा शाम के समय में कम से कम 1000 बार करना चाहिए।

  1. शुक्र ग्रह के लिए मंत्रः-

ॐ अन्नात्परिश्रुतोरस ब्रह्नाणा व्यपिबत् क्षत्र पयः सामं प्रजापति।

ऋतेन सत्य मिन्द्रिय विपान शुक्र मन्धस इन्द्रस्येन्द्रियमिभद्र पयोमृत मधु। शुक्राय नमः।

शुक्र ग्रह के लिए बीज मंत्रः-

ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः।

     इस मंत्र का सुबह के समय सूरज के निकलने पर कम से कम 6000 बार जप करना चाहिए।

  1. सूर्य ग्रह के लिए मंत्रः-

ॐ कृष्णेन राजसा वर्तमानी निवेशयन्नमृत मत्यं च।

हिरण्ययेन सविता रथनादेवी याति भुवनानि पश्चत्।।

सूर्य ग्रह के लिए बीज मंत्रः-

ॐ हां हीं ही सः सूर्योय नमः।

इस मंत्र का जप 7000 बार सुबह के समय में सूर्य निकलने के बाद करना चाहिए।

  1. बुध ग्रह के लिए मंत्रः-

ॐ उदर्बुध्यस्वाग्नि प्रति जागृहित्वामिष्टापूर्ते ससृतेथामयं च अस्मिनहरुथे अध्युतरस्मिन विश्वेदेवा येजमानश्च सदित। बंधाय नमः।।

बुध ग्रह के लिए बीज मंत्रः-

ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः।

इस मंत्र का जप 19000 बार दिन में पांच बार कम से कम करना चाहिए।

  1. गुरु ग्रह के लिए मंत्रः-

ॐ बृहस्पति अति यदयो अर्हाद दिधुमदविभाति क्रतुभज्जनेषु।

यदीच्चच्छवस ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं घेहि चित्रम्। बृहस्पतये नमः।

गुरु ग्रह के लिए बीज मंत्रः-

ॐ ग्रां ग्री ग्रौ सः गुरवे नमः।

इस मंत्र का जप शाम के समय 19000 बार करना चाहिए।

  1. चंद्रमा ग्रह के लिए मंत्रः-

ॐ उम देवा असपत्न सुवध्वंमहते क्षाय ज्येर्ष्ठयाय महते जानराज्यायेन्द्रस्पेन्द्रियाय।

इमम्मुष्य पुत्रममुष्यै पुत्र मस्यै विशएष बीमी राजा सोमोस्माक ब्राह्नाणानां राजा। सोमाय नमः।

चंद्रमा ग्रह के लिए बीज मंत्रः-

ॐ श्री श्री श्री सः चंन्द्राय नमः।

इस मंत्र का जाप भी शाम के समय में 11000 बार करना चाहिए।

  1. केतु ग्रह के लिए मंत्रः-

ॐ केतु कृण्वन्नेकेतदे पेशो मयां अपेशसे।

समुषट्टभर जायथाः केतवे नमः।

केतु ग्रह का बीज मंत्रः-

ॐ स्वां स्त्री स्त्रौ सः केतवे नमः।

इस मंत्र का जप रात के समय में कम से कम 19000 बार करने से लाभ प्राप्त होता है।

  1. राहु ग्रह का मंत्रः-

ॐ कयाः नश्चित्र आ भुवदूती सदालवृधः सखी कयाशश्चिष्ठया कृता।

राहवे नमः।

राहु ग्रह का बीज मंत्रः-

ॐ भ्रां भ्री भ्रौ राहवे नमः।

इस मंत्र का जप भी व्यक्ति को रात के समय 18000 बार करने से लाभ प्राप्त होता है।

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