वास्तु का व्यक्ति के जीवन पर प्रभाव

वास्तु का प्रभाव - Vastu Defects and Effects

वास्तु का प्रभाव

(Vastu defects And Effects)

आज के समय में मकानों को बनाने के लिए तथा उनको शुरू करवाने के लिए ज्योतिषियों का सहारा लिया जाता है। पहले के लोग इनका इस्तेमाल अपने भविष्य को जानने के लिए किया करते थे। आज के युग में लोग इस बात को मानने लगे हैं कि मकानों की दिशा, उनमें रखी जाने वाली वस्तुएं तथा उनकी आकृति भी व्यक्ति के जीवन को बना सकती है तथा जीवन को खत्म भी कर सकती है। व्यक्ति की राशि तथा जीवन के होने वाले गुण-दोष के अनुसार भवनों और बड़ी-बड़ी इमारतों का निर्माण करने की इस विद्या को वास्तुशास्त्र (Vaastu Shaastra) के नाम से जाना जाता है। किसी न किसी प्रकार से वास्तु का प्रभाव (Vastu defects and effects) मनुष्य के जीवन पर होता ही है। इसका साथ ही वास्तु-शास्त्रियों का तो यहां तक कहना है कि मकान की रूप-रेखा व्यक्ति के मस्तिष्क तथा उसकी अंदर की आत्मा पर भी अपना असर छोड़ती है। अगर किसी व्यक्ति के मकान की रूप-रेखा ठीक नहीं होगी तो उस मकान में रहने वाले सदस्य न तो ठीक तरीके से रह पाएंगे और न ही उस परिवार के सदस्यों का मस्तिष्क ठीक तरह से काम कर पाएगा।

पश्चिमी देशों में वास्तु का प्रभाव और लोकप्रियता

(The influence and popularity of Vastu in Western countries)

कहा जाता है कि कुछ सालों पहले हमारे देश में वास्तुशास्त्र में किसी की भी कोई दिलचस्पी नहीं थी, परंतु पश्चिमी देशों में वास्तुशास्त्र का बहुत ही ज्यादा रुझान बढ़ने की वजह से भारत में भी इसी तरह के वास्तुशास्त्र में दिलचस्पी बढ़ती चली गई और लोगों में वास्तु का प्रभाव जानने की इच्छा बढ़ती चली गई। लेकिन आरंभ में व्यापारिक लोग ही अपने कारखानों तथा दुकानों को बनवाने के लिए ही वास्तुशास्त्रों की सहायता लिया करते थे, परंतु कई सालों से इस वास्तुशास्त्र का रुझान इतना ज्यादा बढ़ गया है कि अब सभी व्यक्ति अपने मकानों या भवनों को बनाने के लिए आर्किटेक्ट के साथ ही साथ वास्तुशास्त्रों के साथ भी सलाह-मशविरा लेने लगे हैं। जिसकी वजह से आज के इस मंहगाई के युग में अधिकतर व्यक्ति वास्तुशास्त्र का सहारा लेने लग गये हैं, जिसके कारण वास्तुशास्त्र (Vaastu Shaastra) की लोकप्रियता दिन पर दिन बहुत ही तेजी से बढ़ती ही चली जा रही है।

वास्तु का प्रभाव

बहुत ही प्रसिद्ध अमेरिका में उपस्थित एक हिन्दु विश्वविद्यालय के प्रोफेसर का वास्तुशास्त्र के बारे में यह कहना है कि वास्तुशास्त्र सिर्फ न मानने वाली बात ही नहीं, अपितु इसका ठोस वैज्ञानिक आधार भी है। जिस तरह से मकान में बिना खिड़की और रोशनदान के न होने पर उस मकान के सदस्य रोगों से पीड़ित होते रहते हैं, ठीक उसी तरह से वास्तुशास्त्र के विपरीत बना हुआ मकान कई तरह की परेशानियों को खड़ा कर देता है तथा वास्तु का प्रभाव (Vastu defects and effects) साफ साफ दिखाई देता है। प्रसिद्ध वास्तुशास्त्रियों का यह भी मानना है कि देखा जाए तो वास्तुशास्त्र किसी तरह की कोई नई विद्या नहीं है। अगर पांच हजार साल के बाद भी वास्तुशास्त्र के सिद्धान्तों का ठीक तरह से इस्तेमाल किया जाए तो आधुनिक युग में भी कई लोगों की परेशानियों को समाप्त किया जा सकता है। प्रसिद्ध वास्तुशास्त्रियों का यह भी कहना है कि इस शास्त्र के वैज्ञानिक आधार है। वास्तु का प्रभाव को जानने की इच्छा और इसकी लोकप्रियता की वजह से पश्चिमी देशों में इस विद्या का पूरी तरह से इस्तेमाल किया जाता है। अगर देखा जाए तो हजारों साल पहले भारत में मंदिरों को बनाने के लिए इस वास्तुशास्त्र का ही इस्तेमाल किया जाता था। उस समय के कई रीति-रिवाजों को आज भी अपनाया जाता है।




वास्तुशास्त्र और वैदिक काल

(Vaastu Shastra and Vedic period)

ज्योतिष तथा आयुर्वेद के बाद वास्तुशास्त्र ही इस तरह की विद्या है, जो कि वैदिक काल की देन मानी गई है। यह संसार उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुवों के बीच में बसा हुआ है। इन ध्रुवों के बीच चुंबकीय किरणे निकलती रहती है। यह किरणें मानव के जीवन पर असर ड़ालती है। अगर इन किरणों (तरंगों) के उल्टी दिशा में कोई व्यक्ति सोता है तो उसके दिमाग पर इन किरणों (तरंगों) का नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। वास्तुशास्त्रियों का यह भी कहना है कि किरणों (तरंगों) की उत्तर दिशा से दक्षिण दिशा की तरफ पूरी तरह से असर पड़ता है, इसलिए मकानों की रूप-रेखा को इस तरह से बनाना चाहिए कि उस मकान पर वास्तुशास्त्र का किसी भी तरह से कोई असर न पड़ने पाएं।

वास्तुशास्त्रियों का तो यहां तक कहना है कि इसी तरह से मजबूत तर्कों की वजह से ही बाहर के देशों में वास्तुशास्त्र बहुत ही ज्यादा महशूर है। कोरिया तथा चीन के देशों में यह फेंगसुई के नाम से बहुत ज्यादा जाना जाता है। बाहर के देशों में तो आजकल ये हालात है कि वित्तीय संस्थान, उन औद्योगिक इकाइयों अथवा परियोजनाओं को उधार नहीं देती है, जिनकी इमारतों के नक्शे को किसी वास्तुशास्त्र ने अपनी रजामंदी न दी हो। इन देशों के व्यक्तियों पर वास्तु का प्रभाव इतना अधिक है कि वहां तो कमरों में फर्नीचर भी वास्तुशास्त्रियों के अनुसार ही रखा जाता है। बाहर के देशों की तरह ही भारत में आधुनिक विचारों वाले मनुष्य भी अब वास्तुशास्त्र को मानने लगे हैं।

वास्तुशास्त्रियों का यह भी कहना है कि अगर किसी के भवन या मकान का उत्तर दिशा और पूर्वी दिशा का भाग बंद हो जाता है तो उससे ऊर्जा की धारा प्रवाह नहीं बहती है। इसी प्रकार से भवन का उत्तर-पूर्वी दिशा का भाग सदा ही नीचा होना चाहिए, जिससे कि ऊर्जा के प्रवाह (बहने) में रूकावट पैदा न हो सके। भवन तथा मकान के चारों कोने 90 डिग्री के कोण की ही तरह बनाए जाए तो वह मकान एक अच्छे मकान के रूप में माना जाता है। इसी प्रकार से उत्तर-पूर्वी दिशा का कोना, दक्षिण-पूर्व दिशा के कोने से बड़ा नहीं होना चाहिए। सड़क के समाप्त होने पर बने मकान तथा उसमें रहने वाले व्यक्तियों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। जिस किसी भी भवन या मकान के दक्षिणी दिशा के भाग में गहरा गड्ढा होता है, उस घर में रहने वाली महिलाओं के स्वास्थ्य पर वास्तु का प्रभाव बहुत बुरा होता है जिसके कारण उनका स्वास्थ्य खराब होने लगता है।

वास्तुशास्त्र का एक बहुत ही विशेष नियम इस तरह का भी है कि व्यक्ति की ऊर्जा लगातार चार्ज होती रहें, जिसकी वजह से वह व्यक्ति सदा ही मुसीबतों से दूर रह सकें।

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  1. अंक एवं यंत्र वास्तु शास्त्र
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