Vastu Shastra For Home Construction: मकान निर्मान में वास्तु दोष की जांच क्यों आवश्यक

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Vastu Shastra For Home Construction (मकान निर्माण)

मकान निर्माण से पहले वास्तु क्रिया

किसी भी मकान को बनाने के लिए सबसे पहले उचित स्थान व भूखण्ड (प्लाट) का चुनाव करना अति आवश्यक होता है। किसी भी व्यक्ति को मकान बनवाने से पहले यह निश्चित करना होता है कि मकान का निर्माण किस स्थान या मोहल्ले में करना है। वास्तुशास्त्र के अनुसार मकान निर्माण (Vastu Shastra For Home Construction) के लिए सभी स्थान या क्षेत्र अच्छे नहीं होते। इसलिए वास्तुशास्त्र के अनुसार मकान बनवाने के लिए भूखण्ड (जमीन, प्लाट) खरीदते समय उचित-अनुचित का विचार करके ही शुभ फलदायक स्थान खरीदना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति बिना सोचे-समझे मकान के लिए जमीन खरीदता है तो वह अशुभ फलदायक हो सकता है और उसमें रहने वाले परिवार या कारोबार पर बुरा असर पर सकता है। जब कोई व्यक्ति रहने के लिए या कारोबार करने के लिए मकान का निर्माण करवाता है तो उसकी यह इच्छा होती है कि वह मकान उसके लिए उन्नति एवं सुखों को देने वाला हो। इसलिए मकान खरीदते समय अपने मान एवं राशि के अनुसार मकान के लिए उच्च गुणों वाली जमीन खरीदनी चाहिए।

राशि के अनुसार मकान के लिए स्थान का चुनाव-

किसी भी व्यक्ति की राशि और नगर-मोहल्ले की राशि में निश्चित संबंध होता है। इस संबंध के आधार पर व्यक्ति अपने अनुकूल नगर-मोहल्ले वाले स्थान का चुनाव कर सकता है। ज्योतिषशास्त्र में सभी व्यक्ति के नामाक्षर के आधार पर राशि निर्धारित है।

तालिका में विभिन्न राशियों का वर्णन इस प्रकार है-

राशियां वर्णाक्षर
मेष राशि चू, चे, चो, ला, ली, लू, ले, लो, आ
वृष राशि इ, उ, ए, ओ, वा, वी, वू, वे, वो
मिथुन राशि का, की, कू, घ, ड, छ, के, की, हा
कर्क राशि ही, हू, हे, हो, डा, डी, डू, डे, डो
सिंह राशि मा, मी, मू, मे, मो, टा, टी, टू, टे
कन्या राशि टो, पा, पी, पू, ष, ण, ढ, पे, पो
तुला राशि रा, री, रू, रे, रो, ता, ती, तू, ते
वृश्चिक राशि तो, ना, नी, नू, न, नो, या, यी, यू
धनु राशि ये, यो, भा, भी, भू, धा, फा, दा, भे
मकर राशि भो, जा, जी, खी, खू, खे, खो, गा, गी
कुम्भ राशि गू, गे, गो, सा, सी, सू, सो, सू, चा
मीन राशि दी, दू, थ, झ, त्र, दे, दी, चा, ची

नगर या मोहल्ले एवं नामराशि का संबंध-

मेष वृष मिथुन कर्क सिंह कन्या तुला वृश्चिक धनु मकर कुम्भ मीन
मेष शत्रु कष्ट शुभ शुभ शुभ कष्ट शत्रुता हानि शुभ कष्ट हानि शुभ
वृष शुभ शत्रुता कष्ट शुभ शुभ शुभ कष्ट शत्रुता हानि शुभ कष्ट हानि
मिथुन हानि शुभ शत्रुता कष्ट शुभ शुभ शुभ कष्ट शत्रुता कष्ट शुभ शुभ
कर्क कष्ट हानि शुभ शत्रुता कष्ट शुभ शुभ शुभ कष्ट शत्रुता कष्ट हानि
सिंह शुभ कष्ट हानि शुभ शत्रुता कष्ट शुभ शुभ शुभ कष्ट शत्रुता हानि
कन्या हानि शुभ कष्ट हानि शभुता शत्रुता कष्ट शुभ शुभ शुभ कष्ट शत्रुता
तुला शत्रुता हानि शुभ कष्ट हानि शुभ शत्रुता कष्ट शुभ शुभ शुभ कष्ट
वृश्चि कष्ट शत्रुता हानि शुभ कष्ट हानि शुभ शत्रुता  कष्ट शुभ शुभ शुभ
धनु शुभ कष्ट शत्रुता हानि शुभ कष्ट हानि शुभ शत्रुता कष्ट शुभ शुभ
मकर शुभ शुभ कष्ट शत्रुता हानि शुभ कष्ट हानि शुभ शुभ कष्ट शुभ
कुम्भ शुभ शुभ शुभ कष्ट शत्रुता हानि शुभ कष्ट हानि शुभ शत्रुता कष्ट
मीन कष्ट शुभ शुभ शुभ कष्ट शत्रुता हानि शुभ कष्ट हानि शुभ शत्रुता

ऊपर बताई गई विभिन्न राशि वाले व्यक्तियों को विभिन्न राशि वाली जमीन खरीदने या उस पर निर्माण करवाने से जो परिणाम बताए गए उसका अर्थ निम्न समझना चाहिए।

शुभ- राशि के जिस खाने में शुभ लिखा हो उसका अर्थ है कि अपने नाम की राशि के अनुसार राशि वाली जमीन खरीदने से आर्थिक लाभ होगा, मान-सम्मान बढ़ेगा तथा मंगलकार्य की शुरुआत होगी।

कष्ट- जिस खाने में कष्ट लिखा हो उसका अर्थ है व्यक्ति को मानसिक कष्ट होगा। उसके परिवार में आपसी मतभेद होगा, अहंकार बना रहेगा, स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ेगा तथा किसी भी चीज का त्याग करना पड़गा।

हानि- आर्थिक हानि, परिवार में लड़ाई-झगड़ा हो सकता है तथा स्वास्थ्य खराब रह सकता है।

शत्रुता- तालिका के जिस खाने में शत्रुता लिखा हो उसका अर्थ है कि उस राशि वाले के खिलाफ उसका कोई शत्रु गुप्त षड्यंत्र कर रहा है। ऐसे व्यक्ति को शत्रुवृद्धि, कोर्ट-कचहरी आदि का सामना करना पड़ता है।

व्यक्ति को जन्म राशि से ही यह संबंध ज्ञात करना चाहिए। आज बहुत से स्त्री-पुरुष ऐसे हैं जिन्हें अपने जन्म नाम का पता नहीं है और अनेक बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो ज्योतिष को नहीं मानते। यदि जन्म नाम का पता न हो या एक से अधिक नाम हों तो जिस नाम से पुकारने से सोता हुआ व्यक्ति जाग जाए उस नाम की राशि से संबंध का ज्ञान करना चाहिए।

यदि किसी व्यक्ति के लिए शहर या नगर शुभ न हो तो व्यक्ति को नामराशि और मोहल्ले की राशि के साथ विचार करके देखना चाहिए कि वे आपस में शुभ हैं या नहीं। यदि मोहल्ला शुभ हो तो मकान निर्माण (Vastu Shastra For Home Construction) कर लेना चाहिए। यदि दोनों ही शुभ हों तो ऐसा योग सबसे अच्छा होता है।

काकिणी फल विचार-

मकान निर्माण के लिए नगर या मौहल्ले का चुनाव करने की एक अन्य विधि है। इस विधि में सबसे पहले नगर या मोहल्ले एवं व्यक्ति के नाम एवं वर्ग का पता किया जाता है।

वर्गचक्र-

क्रम वर्ग वर्ग का अक्षर वर्गेश वर्ग संख्या वर्ग की दिशा
1. अवर्ग अ, इ, उ, ऐ, ए, ओ, औ गरुड़ 1 पूर्व
2. कवर्ग क, ख, ग, घ, ड माजरी 2 आग्नेय
3. चवर्ग च, छ, ज, झ, ञ सिंह 3 दक्षिण
4. टवर्ग ट, ठ, ड, ढ, ण श्वान 4 नैऋत्य कोण
5. तवर्ग त, थ, ध, द, न सर्प 5 पश्चिम
6. पवर्ग प, फ, ब, भ, म मूषक 6 वायव्य कोण
7. यवर्ग य, र, ल, व मृग 7 उत्तर
8. शवर्ग श, ष, स, ह मेष 8 ईशान

नगर या मोहल्ले की कांकिणी संख्या ज्ञात करने के लिए उसके बाकी में 2 से गुणा करके, व्यक्ति का वर्गांक जोड़कर 8 से भाग देने पर जो शेष बचे उसे नगर या मोहल्ले की कांकिणी संख्या जानना चाहिए। इसी तरह से व्यक्ति की कांकिणी संख्या ज्ञात करने के लिए व्यक्ति का वर्गांक पता करके उसमें 2 से गुणा करके, नगर या मोहल्ले का वर्गांक जोड़कर उसे 8 से भाग दें जो शेष रहें, वह व्यक्ति की कांकिणी संख्या होगी।

अगर नगर से व्यक्ति की कांकिणी संख्या अधिक हो तो वह नगर या मोहल्ला व्यक्ति के लिए लाभदायक होगा। अगर नगर से व्यक्ति की कांकिणी संख्या कम हो तो वह नगर व्यक्ति के लिए हानिकारक होगा। यदि दोनों ही संख्या बराबर हो तो न लाभ होगा और न ही हानि। व्यक्ति की कांकिणी संख्या नगर की कांकिणी संख्या से जिस अनुपात में अधिक होगी उसी अनुपात में वह नगर लाभदायक होगा।

पहली स्थिति को छोड़कर शेष दोनों स्थितियों में उस नगर या मोहल्ले में मकान का निर्माण (Vastu Shastra For Home Construction) कराया जा सकता है।

भूमि चयन व परीक्षण-

नगर या मोहल्ले का चुनाव करने के बाद जमीन (प्लाट) का चुनाव करना चाहिए। भूमि या भूखण्ड के चुनाव में निम्न बातों का ध्यान रखना होता है। वास्तुग्रंथों के अनुसार भूमि परीक्षण की मुख्य विधियां निम्न हैं-

  1. मकान निर्माण (Vastu Shastra For Home Construction) में भूमि परीक्षण के लिए मकान के मालिक को शुभ दिन, शुभ मुहूर्त में वास्तुदेव की पूजा करने के बाद ही उत्तर दिशा की ओर डेढ़ फुट गहरा गड्ढा खोदना चाहिए और फिर इस मिट्टी को निकालकर उसी मिट्टी से गड्ढे को भर देना चाहिए। यदि गड्ढा भरने के बाद मिट्टी शेष बचे तो भूमि श्रेष्ठ, शेष न बचे तो भूमि मध्यम और मिट्टी कम रह जाए तो भूमि निकृष्ट समझनी चाहिए। इस प्रकार की भूमि पर निर्माण वर्जित है।
  2. उत्तर दिशा की ओर डेढ़ फुट गहरा गड्ढा खोदकर उसकी मिट्टी निकालकर उस गड्ढे में मुख तक पानी भर दें तथा उत्तर दिशा की ओर सौ कदम जाकर वापिस आए। वापिस आने पर यदि गड्ढा पूरा भरा हो तो भूमि श्रेष्ठ समझनी चाहिए। यदि गड्ढा आधा या कुछ अधिक भरा हो तो भूमि मध्यम समझना चाहिए यदि पानी सूख गया हो तो भूमि निकृष्ट होती है। ऐसी भूमि पर निर्माण करना वर्जित है।
  3. भूमि में गड्ढा खोदने पर यदि शंख, मणि, मूंगा आदि शुभ वस्तु निकले तो भूमि शुभ है और यदि भूसा, कंकड़, हड्डी, बाल, राख आदि निकलें तो भूमि अशुभ होती है।
  4. भूमि की गुणवता पर विचार करने के लिए वास्तुग्रंथों में इसे चार भागों में विभाजित किया है- ब्राह्मणी, क्षत्रित, वेश्या और शूद्र भूमि। मकान निर्माण (Vastu Shastra For Home Construction) करवाने में भूमि की श्रेणी की पहचान रंग, भूमि पर उगी वनस्पति, गंध व रसों के स्वाद के आधार पर हो जाती है।

ब्राह्मणी भूमि सब प्रकार का सुख देने वाली, क्षत्रिया भूमि राज्य, वर्चस्व एवं पराक्रम बढ़ाने वाली होती है। वेश्या भूमि धन-धान्य व ऐश्वर्य में वृद्धि करने वाली होती है तथा शूद्र भूमि निवास के लिए उचित नहीं होती।

भूमि के पृष्ठानुसार भूमि की जांच-

भूमि का मध्य भाग पृष्ठ भाग कहलाता है। इस आधार पर भूमि को चार भागों में बांटा गया है-

  1. गज पृष्ठ भूमि।
  2. कूर्म पृष्ठ भूमि।
  3. दैत्य पृष्ठ भूमि।
  4. नाग पृष्ठ भूमि।

गज पृष्ठ भूमि-

दक्षिण, पश्चिम, नैऋत्य और वायव्य कोण में ऊंची तथा ईशान कोण में नीची भूमि गज पृष्ठ भूमि कहलाती है। इस प्रकार की भूमि आर्थिक रूप से उन्नत्ति दायक होती है। इस प्रकार की भूमि पर बने मकान में रहने वाले व्यक्ति का स्वास्थ्य अच्छा रहता है तथा आयु लम्बी होती है।

कूर्ण पृष्ठ भूमि-

जो भूमि चारों ओर से नीची हो तथा मध्य में ऊंची हो तो उसे कूर्म पृष्ठ भूमि कहते हैं। इस प्रकार की भूमि पर कारोबार या निवास के लिए निर्माण (Vastu Shastra For Home Construction) करवाना उत्साह वृद्धि एवं सुखों को देने वाला होता है। ऐसी भूमि धन-धान्य आदि से परिपूर्ण होती है।

दैत्य पृष्ठ भूमि-

जिस भूमि का ईशान कोण, आग्नेय कोण तथा पूर्व दिशा वाला स्थान ऊंचा हो तथा पश्चिम दिशा नीची हो तो उसे दैत्य पृष्ठ भूमि कहते हैं। ऐसी भूमि धन-धान्य और पारिवारिक सुख शांति का नाश करने वाली होती है।

नाग पृष्ठ भूमि-

जो भूमि पूर्व-पश्चिम दिशा में लम्बी तथा उत्तर-दक्षिण दिशा में ऊंची एवं बीच में नीची हो उसे नाग पृष्ठ भूमि कहते हैं।

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