वास्तु के अनुसार घर (मकान) के प्रमुख स्थान

वास्तु के अनुसार घर (मकान) के प्रमुख स्थान

मकान में कुआं या ट्यूबवैल के लिए स्थान

मकान में कुआं, ट्यूबवैल, हैंडपम्प ईशान कोण में बनवाना चाहिए। अक्सर पाया गया है कि जिन मकानों में ईशान कोण के अतिरिक्त अन्य दिशाओं में कुआं, ट्यूबवैल या हैंडपम्प बनाया गया उनके स्वामियों को अनेक प्रकार से हानि उठानी पड़ी। कुआं, ट्यूबवैल या हैंडपम्प की दिशा बदलकर ईशान में बनाने पर ही उन्हें लाभ हुआ।

छत के ऊपर पानी की टंकी का स्थान-

  1. छत पर पानी के भण्डारण के लिए पानी की टंकी की स्थापना दक्षिण या पश्चिम में करना चाहिए।
  2. इस पर वास्तुविदों में मतभेद है कि दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र में पानी की टंकी रखें परंतु दक्षिण-पश्चिम में पश्चिम दिशा की ओर पानी की टंकी रखी जा सकती है परंतु ओवरहैड टैंक उत्तर-पूर्व में पूव दिशा की ओर होना चाहिए। पूर्व दिशा में भी टंकी की स्थापना न करें। इसी तरह उत्तर-पश्चिम में बिल्कुल पश्चिम दिशा के करीब टंकी को न रखें।

मकान के पास पानी के स्रोत का महत्व-

  1. मकान में उत्तर-पूर्व में उत्तर दिशा की ओर नदी या तालाब होना घर का मालिक के लिए उचित फलदायक होता है। इससे भविष्य में अच्छे परिणाम मिलते हैं। इसी तरह पूर्व दिशा में भी होता है।
  2. परंतु पश्चिम, उत्तर-पश्चिम की ओर यदि मकान के पास नदी-नाला हो तो उस मकान का अच्छा फल प्राप्त नहीं होता है।
  3. इसी तरह दक्षिण दिशा की ओर भी नदी या तालाब होने पर अशुभ फल मिलता है।
  4. यदि दक्षिण-पूर्व में दक्षिण दिशा की ओर भी नदी या तालाब हो तो इसे शुभ नहीं माना जाता है।
  5. यदि दक्षिण-पूर्व में दक्षिण दिशा की ओर भी नदी या तालाब हो तो इसे अच्छा नहीं माना जाता है।

स्नानघर या शौचालय-

  1. घर के बाहर स्नानघर दक्षिण-पश्चिम में पश्चिम दिशा की पश्चिम चारदीवारी के सहारे बनाएं।
  2. इसी तरह स्नानघर दक्षिण-पश्चिम में दक्षिण की ओर दक्षिण दीवार के साथ बनाएं।
  3. यदि स्नानघर या शौचालय को पश्चिम दिशा में बनाना हो तो पश्चिम कम्पाउंड दीवार के सहारे बनाएं।
  4. बाहरी स्नानघर और शौचालय को पूर्व में दीवार के सहारे न बनाएं।
  5. यदि पूर्व में स्नानघर या शौचालय बनाना हो तो कम्पाउंड दीवार के सहारे न बनाकर जगह छोड़कर बनाएं और मुख्य मकान से फर्श नीचा रखें।
  6. इसी तरह उत्तरी दीवार से लगाकर बाहरी स्नानघर एवं शौचालय न बनाएं और बनाना हो तो कम्पाउंड की दीवार और स्नानघर के बीच में स्थान छोड़ें और फर्श नीचा रखें।
  7. मकान के अंदर सोने के कमरे से अलग स्नानघर उत्तर दिशा में बनाया जा सकता है।
  8. इसी तरह सोने के कमरे से अलग पूर्व दिशा में स्नानघर बना चाहिए।
  9. स्नानघर को उत्तर-पूर्व दिशा में नहीं बनाना चाहिए।
  10. दक्षिण-पूर्व, उत्तर-पश्चिम दिशा एवं दक्षिण-पश्चिम में स्नानघर और शौचालय बना सकते हैं। जहां तक संभव हो स्नानघर एवं शौचालय अलग-अलग रखने का प्रयास करें। वैसे इन दोनों को आजकल एकसाथ बनाने का रिवाज है।
  11. वास्तु अनुसार मध्य में भूखण्ड में खुली जगह मकान के चारों ओर रखनी चाहिए।
  12. मकान निर्माण योजना बनाते समय चारों ओर खुली जगह रखने का प्रयास करना चाहिए।
  13. इसी तरह उत्तर दिशा में खुली जगह दक्षिण से कम रखें।
  14. दक्षिण-पश्चिम में भूखण्ड के तल की ऊंचाई अन्य दिशाओं से ऊंची होनी चाहिए।
  15. इसी तरह भूखण्ड में उत्तर-पूर्व क्षेत्र का तल सबसे नीचे होना चाहिए।
  16. पश्चिम दिशा से पूर्व दिशा के तल की ऊंचाई कम होनी चाहिए।
  17. इसी तरह उत्तर दिशा की ऊंचाई दक्षिण तल से नीची होनी चाहिए।
  18. सैप्टिक टैंक के लिए वायव्य कोण सबसे अच्छा माना जाता है।

शौचालय ईशान कोण में न बनाएं-

घर बनवाते समय यह ध्यान रखना बहुत जरूरी है कि शौचालय को किस स्थान पर बनाया जाए। ईशान कोण में कभी भी शौचालय नहीं बनवाना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से उस मकान में रहने वाले की सुख-शांति में बाधा पहुंचती है। उस घर में सभी कुछ होते हुए भी अधूरा सा लगता है। यदि बना-बनाया मकान खरीदा हो और उसमें शौचालय ईशान कोण में हो तो इसे तुरंत बदल देना चाहिए। जहां तक संभव हो इसका प्रयोग कम से कम करें। इसके साथ ही मकान के ईशान कोण में शिकार करते हुए शेर का चित्र या दर्पण लगाएं।

खिड़कियों का स्थान-

मकान में ज्यादातर द्वार के सामने खिड़कियां होनी चाहिए जिससे चुम्बकीय चक्र पूर्ण हो सके। ऐसा करने से मकान में सुख-शांति रहती है। खिड़कियों का निर्माण संधि भाग में नहीं करना चाहिए। पश्चिम, पूर्वी और उत्तरी दीवारों पर खिडकियों का निर्माण शुभ माना जाता है।

मीटर बोर्ड, मेन स्विच एवं विद्युत का कमरा-

अग्नि या विद्युत शक्ति, मीटर बोर्ड, मेन स्विच, विद्युत कमरा आदि मकान के आग्नेय कोण में लगवाने चाहिए। आग्नेय कोण इसके लिए हमेशा अच्छा माना जाता है।

सोपान या सीढ़ी-

मकान में सीढ़ियां वास्तुनियमों के अनुरूप बनानी चाहिए। सीढ़ियों के द्वारा पूर्व या दक्षिण दिशा में होना शुभ माना गया है। सीढ़ियां मकान के पीछे दक्षिणी व पश्चिम भाग के दाईं ओर हों तो उत्तम है। यदि सीढ़ियां घुमावदार बनानी हों तो उनका घुमाव हमेशा पूर्व से दक्षिण, दक्षिण से पश्चिम, पश्चिम से उत्तर और उत्तर से पूर्व की ओर होना चाहिए। कहने का तात्पर्य यह है कि चढ़ते समय सीढ़ियां हमेशा बाएं से दाईं ओर मुड़नी चाहिए। अब चाहे घुमाव कितने भी हों सीढ़िया हमेशा विषम संख्या में बनानी चाहिए। सीढ़ियों की संख्या ऐसी हो कि उसे 3 से भाग दें तो 2 शेष रहें, जैसे 5, 11, 17, 23, 29 आदि की संख्या। सीढ़ियों के नीचे एवं ऊपर द्वार रखने चाहिए। नीचे के दरवाजे से ऊपर का दरवाजा बारह भाग कम होना चाहिए। यदि किसी पुराने घर में सीढ़ियां उत्तर-पूर्व दिशा में बनी हों तो उसके वास्तुदोष को समाप्त करने के लिए दक्षिण-पश्चिम दिशा में एक कमरा बनाना चाहिए।

अन्न भण्डारघर के नियम-

  1. अन्न भण्डारघर मकान में उत्तर या उत्तर पश्चिम दिशा में बनवाना चाहिए।
  2. उत्तर-पश्चिम में बनाए गए भण्डारघर में अन्न आदि की कभी कमी नहीं होती है।
  3. अन्न भण्डारघर में सामान रखने के लिए स्लैब आदि दक्षिणी या पश्चिम दीवार पर बनानी चाहिए।
  4. अन्न भण्डारघर का दरवाजा नैऋत्य कोण में नहीं बनाना चाहिए इसे अन्य किसी दिशा-विदिशा में बनाया जा सकता है।
  5. कभी भी भण्डारघर में अन्न का कंटेनर खाली नहीं रखना चाहिए। यदि अन्न के प्रयोग से कोई कंटेनर खाली होने भी लगे तो उसमें थोड़ा-बहुत अन्न अवश्य रखना चाहिए।
  6. वर्षों तक के लिए इकट्ठा किए गए अन्न का भण्डाअन्न भण्डारघररण दक्षिण या पश्चिम दीवार के पास करवाना चाहिए।
  7. प्रतिदिन भोजन के लिए प्रयोग होने वाले अन्न आदि को उत्तर-पश्चिम में रखवाने की व्यवस्था करवानी चाहिए।
  8. भण्डार घर के ईशान कोण में हमेशा पानी से भरा एक बर्तन रखना चाहिए। यह बर्तन कभी भी पानी से खाली नहीं होना चाहिए।
  9. भण्डारघर में पूर्व दिशा की दीवार पर लक्ष्मी-नारायण की तस्वीर लगवाना शुभ होता है।
  10. भण्डार घर में तेल, घी, मक्खन, मिट्टी का तेल एवं गैस सिलेण्डर आदि आग्नेय कोण में रखवाना चाहिए।
  11. यदि डाइनिंग टेबल लगाने के लिए घर पर स्थान न हो तो ऐसी स्थिति में भण्डार घर में डाइनिंग टेबल लगवायी जा सकती है।

वास्तुशास्त्र में कबाड़घर के लिए नियम-  आमतौर पर घरों में अनेक ऐसी वस्तुएं होती है जिनका उपयोग अक्सर नहीं किया जाता। ऐसी वस्तुओं को इधर-उधर रखने से मकान के वास्तु में परिवर्तन हो सकता है। इसलिए वास्तुशास्त्र में कबाड़घर के लिए मकान में स्थान दिया है।

  1. वास्तु शास्त्र के मतानुसार कबाड़घर मकान के बाहर नैऋत्य कोण में बनाना चाहिए। यदि ऐसा करना संभव न हो तो मकान के अंदर ही नैऋत्य कोण में कबाड़घर बनवाया जा सकता है।
  2. कबाड़घर की लम्बाई और चौड़ाई न्यूनतम होनी चाहिए।
  3. कबाड़घर का दरवाजा आग्नेय, ईशान या दक्षिण दिशा की ओर न बनवाएं।
  4. कबाड़घर का दरवाजा एक पल्ले का एवं टिन का बना होना चाहिए तथा मकान के अन्य सभी द्वारों से आकार में छोटा होना चाहिए।
  5. कबाड़घर में पानी नहीं रखना चाहिए।
  6. कबाड़घर के फर्श व दीवारों में सीलन नहीं होनी चाहिए।
  7. कबाड़घर के नीचे तहखाना नहीं होना चाहिए अर्थात बेसमेंट न बनवाएं।
  8. कबाड़ के लिए बनाए गए कमरे को किसी के रहने, सोने या किराए पर नहीं देना चाहिए। ऐसा करने से परिवार का मुख्य हमेशा परेशान रहता है।
  9. इस कबाड़घर के दरवाजे के पास कोई गपशप, बातचीत आदि नहीं करनी चाहिए न ही जोर से हंसना चाहिए और न ही गुस्सा या ऊंची आवाज में बातचीत करनी चाहिए। यह घर की खुशियों के लिए अशुभ माना जाता है।

कोषागार-

  1. कोषागार हमेशा मकान की उत्तर दिशा में बनवाना चाहिए।
  2. तिजोरी ईशान कोण में नहीं रखनी चाहिए क्योंकि इससे धन की हानि होती है। आग्नेय कोण में तिजोरी होने से घर में अनावश्यक खर्च बढ़ता है।
  3. नैऋत्य कोण में तिजोरी होने से कुछ समय के लिए तो धन के संग्रह में वृद्धि सी प्रतीत होती है परंतु जल्दी यह धन किसी दुष्कर्म या चोरी आदि के कारण नष्ट हो जाता है।
  4. तिजोरी दक्षिण-पूर्व व दक्षिण-पश्चिम कोनों को छोड़कर दक्षिण में इस प्रकार होनी चाहिए कि तिजोरी का दरवाजा उत्तर की ओर खुले और यह दीवार से दो या तीन इंच दूर हो।

पूजाघर-

  1. पूजाघर मकान के ईशाण कोण, उत्तर या पूर्व दिशा में बनवाना चाहिए।
  2. पूजाघर कभी भी सोने वाले कमरे में नहीं बनवाना चाहिए।
  3. पूजाघर में प्रकाश के लिए लैम्प दक्षिण-पूर्व में होना चाहिए।
  4. पूजाघर का फर्श सफेद या हल्के पीले रंग का होना चाहिए। पूजाघर की दीवारों का रंग सफेद, हल्का पीला या हल्का नीला होना चाहिए।
  5. पूजाघर में किसी प्राचीन मंदिर से लाई मूर्ति नहीं रखनी चाहिए।
  6. पूजाघर में हवन कुण्ड आग्नेय कोण में होना चाहिए।
  7. ज्ञान प्राप्ति के लिए पूजाघर में उत्तर दिशा में बैठकर उत्तर की ओर मुख करके पूजा करनी चाहिए।
  8. धन प्राप्ति के लिए पूजाघर में पूर्व दिशा में पूर्व की ओर मुख करके पूजा करनी चाहिए।
  9. पूजाघर में ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, सूर्य एवं कार्तिक का मुख हमेशा पूर्व या पश्चिम की ओर होना चाहिए। गणेश, कुबेर एवं दुर्गा का मुख हमेशा दक्षिण की ओर होना चाहिए। हनुमान जी का मुख नैऋत्य कोण में होना चाहिए। पूजाघर में मूर्तियां एक-दूसरे की ओर मुख की हुई नहीं रखनी चाहिए। देवी-देवताओं के चित्र या मूर्तियां उत्तरी और दक्षिण दीवार के निकट कभी नहीं होनी चाहिए।
  10. पूजाघर में महाभारत के चित्र, पशु-पक्षी के चित्र एवं वास्तुपुरुष का कोई प्रतिचित्र नहीं रखना चाहिए।
  11. पूजाघर में मूर्तियां कभी भी ठीक दरवाजे के सामने नहीं रखनी चाहिए।
  12. पूजाघर में धन एवं कीमती सामान कभी नहीं छुपाना चाहिए।
  13. पूजाघर को हमेशा शुद्ध एवं पवित्र रखें। इसमें कोई भी अपवित्र वस्तु नहीं रखनी चाहिए।
  14. झाडू व कूड़ेदान आदि भी मकान के ईशान कोण में एवं पूजाघर के निकट नहीं रखने चाहिए।
  15. पूजाघर को साफ करने व घर के अन्य कमरों को साफ करने का झाड़ू व पोंछा अलग-अलग होना चाहिए।

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