Sat. Jun 6th, 2020

वास्तु शास्त्र

वास्तु शास्त्र का इफेक्ट मकान पर कितना पड़ता है

वास्तु शास्त्र का इफेक्ट मकान पर कितना पड़ता है, इसको इस श्लोक के माध्यम से समझा जा सकता है-

हलायुध कोष में भी कहा गया है किः

वास्तु संक्षेपतो वक्ष्ये गृहादो विघ्ननाशनम्।

ईशानकोणादारभ्य ह्योकाशीतिपदे त्यजेत्।।

     इसका मतलब है यह है कि वास्तु शास्त्र संक्षेप में ईशान कोण आदि की दिशाओं से शुरू होकर मकान को बनाने की वह कला है जो घर (Home) में रहने वालों को कुदरती रूकावट या बाधा, उत्पातों व उपद्रवों से बचाती है।

अमर कोष में इस तरह से कहा गया है किः-

गृहरचनाविछिन्न भूमे।

यानी कि मकान को बनाने की रूपरेखा या घर के निर्माण के योग्य अविछिन्न जमीन को ही वास्तु शास्त्र के नाम से जानते हैं।



इसी तरह से नारद संहिता में भी बताया गया है कि मकान में रहने वाले मकान के मालिक को घर सभी रूप से शुभ फलदायक, सुख-समृद्धि देने वाला, ऐश्वर्य, लक्ष्मी व धन को बढाने वाला, पुत्र तथा पौत्र आदि प्रदान करने वाला हो, इसका विचार वास्तुशास्त्र के अंदर (अंतर्गत) किया जाता है।

वस्तु नामक शब्द से वास्तु शब्द का जन्म हुआ है। वस्तु का मतलब है, जो है या जिसकी सत्ता है। वस्तुओं से मिलते-जुलते शास्त्र ही वास्तुशास्त्र है। वस्तु शब्द से धरती, घर व घर में रखी जाने वाली वस्तुओं का ज्ञान होता है। वास्तु शास्त्र को केवल घर बनाने से मिलते-जुलते शास्त्र को मान लेना गलत होता है। वास्तु शास्त्र तो पूरे देश, प्रदेश, नगर, उपनगर को बनाने के उपाय से लेकर छोटे-छोटे मकान तथा उसमें रखी जाने वाली वस्तुओं से मिलते-जुलते नियमों के बारे में बताता है।

वास्तु से संबंधित कुछ अन्य जानकारियां

वास्तुशास्त्र में शून्य की विशेषता

अगर आप किसी को यह कहते हैं कि उसका दिमाग तो बिल्कुल खाली है, जो आप यह शब्द कहते हों, तो हो सकता है कि आप जो कहना चाहते हैं उसका उल्टा कह रहे हों।

भारतीय रीति-रिवाज के बारे में अलग-अलग धाराओं के आधार पर शून्य के कई मतलब माने जाते हैं। अगर किसी बीमार व्यक्ति की इस बात को मान भी लिया जाए तो शून्य के विचारों से दूर के अनुभव को भी माना जा सकता है।

संस्कृत का मूल शब्द शून्य खालीपन, आसमान, सूनेपन तथा अनुपस्थिति के बारे में बताता है। भारत में शून्य की अवधारणा बहुत पुरानी है तथा इसके दर्शन, गणित और योग विज्ञान में अलग-अलग रूप में होते हैं।

मध्य एशिया के विद्धान अल खारिजमी (नौवीं शताब्दी) और अल बरूनी (ग्यारहवीं शताब्दी) तथा आधुनिक विद्वानों के कामों से यह बात साबित हो गई है कि नौ अंक तथा एक शून्य की दशमलव पद्धति भारतीयों ने निकाली थी। परंतु चीनी विद्वानों का यह कहना था कि चीनी भाषा का शब्द ’लिंग’ अथवा ’शून्य’ पहले खाली जगह के रूप में प्रयोग किया जाता था। प्राचीन चीन में पुरानी किताबों की प्रूफ रींडिग करते समय गायब हो चुके शब्दों को खाली स्थान के रूप में दिखाया जाता था। इस स्थान को बाद में गोलाकार के रूप में दिखाया गया और तेरहवी शताब्दी तक इस तरह का करना बहुत ही ज्यादा मशहूर हो गया। चीन में भारतीय अंक पद्धति आठवीं शताब्दी में पहुंची थी, जिसमें कि शून्य को बिंदू के रूप में दिखाया जाता था। बौद्ध दर्शन शास्त्री नागार्जुन की कृतियों में शून्य की दार्थनिक स्वरूप की अवधारणा मजबूत हुई थी।

शून्य बहुआयामी है। शून्य के कुछ आयामों में मोर के पंखों की तरह के कई रंग भी होते हैं। विद्वतजन के अनुसार शून्य की सभी परतों को पीछे छोड़कर आगे बढ़ा जा सकता है, क्योंकि इसकी सभी परतें सचल होती है। जाने-माने गणित के ज्ञाता और वेदान्त के विद्वान ने गणित और दर्शन की रीति-रिवाज में शून्य की अवधारणा की तुलना करते हैं कि गणितज्ञों ने दर्शन से शून्य को लिया। गणित के भाग में शून्य के बारे में 200 शताब्दी ईसा पूर्व के पिंगल चंद्रहस्त में मिल जाता है।

बहुत ही प्रसिद्ध कला के इतिहासकार और लेखक के आधार पर वास्तुशास्त्र के अनुसार बने भारत के प्राचीन मंदिरों में शून्य की अवधारणा को बहुत की अच्छे तरीके से प्रयोग किया जाता है। खजुराहों के कंदरीप महादेव मंदिर के बारे में बताते हुए कहा गया है कि शून्य असलियत में गर्भगृह के अंदर शून्य केंद्र था। मंदिर का लिंग वह केंद्र है, जहां से सभी तरह की छवियां निकलती हैं।

वास्तुशास्त्र और उसकी जानकारियां (Information about Vastu Shastra)

  1. वास्तु शास्त्र का इतिहास
  2. वास्तु शास्त्र का परिचय
  3. वास्तु शास्त्र का साहित्य
  4. सरल वास्तु शास्त्र
  5. वैदिक वास्तु शास्त्र
  6. वास्तुशास्त्र का विज्ञान से संबंध
  7. वास्तु शास्त्र के प्रमुख सिद्धान्त
  8. वास्तु शास्त्र के आधारभूत नियम
  9. वास्तुशास्त्र के सम्पूर्ण नियम और जानकारियां

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