विभिन्न स्थान हेतु वास्तु शास्त्र के नियम एवं निदान

Vastu shastra ke principles

खुले मकान में वास्तुनियम

कोई भी व्यक्ति जब अपने रहने का मकान बनाने के लिए जमीन खरीदने का विचार करता है तो उसे जमीन किसी भी दिशा या उप-दिशा में मिल सकती है तथा पास में रहने वाली जमीन की अवस्थता के बारे में ठीक-ठीक चुम्बकीय यंत्र से बहुत ही आराम से मालूम की जा सकती है। मकान को बनाने की योजना बनाने से पहले यह बात मालूम करना बहुत ही जरूरी हो जाता है कि जमीन किस दिशा में स्थित है। इसके बारे में अच्छी तरह से जानकारी मिल जाने के बाद ही वास्तुनियमों के अनुसार ही मकान बनवाने की योजना अपनी जरूरतों के अनुसार ही बना सकते हैं।

समूह आवासीय योजना में वास्तु के नियम

इस योजना के तहत  समिति द्वारा अलग-अलग स्थानों पर मकान बनाए जाते हैं और हमको उन मकानों को चुनने के लिए सुनहरे मौके मिलते रहते हैं। इसके साथ ही इस तरह के मकानों की योजना को बनाने में वास्तु-सिद्धान्तों का किस तरह से इस्तेमाल करना चाहिए, इसके बारे में हमें भी मालूम होना बहुत ही जरूरी है। इस तरह के मकानों को बनाने की योजना में नीची श्रेणी के मकानों की गिनती आती है जैसे-




  • कई मकानों को एक साथ मिलकर बनाना।
  • बहुत ज्यादा ऊंचे-ऊंचे मकान बनाना।
  • दो या दो से ज्यादा मकान एक ही जगह पर, जिनमें दो मकानों की एक ही दीवार होती है।

समूह आवास योजना में भूमि की जरूरत के अनुसार, व्यापारिक नजरिये से मकानों को बहुत ही जल्दी बनाया जा सकता है तथा व्यापारिक नजरिये से देखने पर ज्यादा से ज्यादा मिली हुई जमीन को इस्तेमाल में लाया जा सकता है, जिससे वास्तु-शास्त्र के नियमों का पालन नहीं हो पाता है तथा इस तरह की योजनाओं मे वास्तु-शास्त्र के नियमों का पूरी तरह से पालन करना बहुत ही मुश्किल भी होता है, इसलिए समूह आवास योजना के लिए कुछ व्यापारिक बातों पर विचार निम्नलिखित तरीके से किया जाना चाहिए जैसे-

  1. सामूहिक मकानों को बनाने के लिए भूमि को चुनने में इस बारे में ध्यान रखना बहुत ही जरूरी है कि उस भूमि के पास बारिश का पानी निकलने की जगह उत्तर-पूर्व की दिशा की तरफ होनी चाहिए।
  2. इसी प्रकार से मार्ग (सड़कें) भी उत्तर-दक्षिण दिशा और पूर्व-पश्चिम दिशा की तरफ ही होनी चाहिए।
  3. जमीन लेते समय यह कोशिश करनी चाहिए कि मकान चतुर्भुज के आकार में हो।
  4. मकानों को इस तरह से बनवाना चाहिए कि उन मकानों में सुबह के समय सूरज की रोशनी तथा सुबह की कुदरती, पवित्र एवं शुद्ध वायु का आगमन हो सके।

हो सके तो कॉमन दीवारों पर मकान को नहीं बनवाना चाहिए, क्योंकि इस प्रकार के मकानों में वास्तु के नियमों का ठीक तरह से पालन नहीं हो पाता है। जिस तरह से तस्वीर में दिखाया गया है। इस तस्वीर को देखने से इस बात के बारे में पता चलता है कि मकान नं 2, जो कि पूर्व की दिशा में स्थित है, वास्तुशास्त्र के अंदर आता है, लेकिन मकान नं 1, जो पश्चिम दिशा में स्थित है, यह मकान वास्तु के नियमों के अंदर नहीं माना जाता है, क्योंकि इस एक नं मकान में सुबह के समय में सूरज की रोशनी तथा कुदरत की शुद्ध वायु का प्रवेश नहीं हो सकेगा। इसके उल्टा दोपहर के समय में सूरज की रोशनी जो कि शरीर के स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक होती है तथा यह सूरज की रोशनी मकान में प्रवेश कर जाएगी। इसलिए इन मकानों को निम्ननासार भी बनाया जा सकता है। जिससे कि वास्तु के नियमों का पालन भी हो सकता है तथा सुबह के समय में कुदरती सूरज की रोशनी का इस्तेमाल भी हो सकता है तथा कुदरत की शुद्ध हवा का प्रवेश भी हो सकता है, जिस तरह से तस्वीर के माध्यम से दिखाया गया है। इसलिए इस तरह के मकानों को बनाते समय सदा ही वास्तु के नियमों का पालन करना बहुत ही जरूरी है।

ऊंची इमारतों को बनाने के लिए वास्तुशास्त्र के नियम

ऊंची-ऊंची इमारतों को बनवाते समय वास्तुशास्त्र के सिद्धान्तों को अपनाना इतना ज्यादा आसान काम नहीं होता जितना कि खुले मकानों को बनाने में होता है, क्योंकि इस तरह की जगह एक ही स्थान पर होती है और कॉमन सुविधाएं एक-दूसरे फ्लैट्स से मिलती हुई होती है, जैसे कि- सेनेटरी की फिटिंग, पानी की पाइप लाइन की फिटिंग आदि जिससे शौचालय एवं नहाने की जगह व रसोई घर की जगह की अवस्था एक ही जगह पर निश्चित करनी पड़ती है। इसलिए निम्नलिखित बातों को अपने ध्यान में रखकर ही कुछ सीमा तक वास्तु के नियमों को अपनाने में मदद प्राप्त की जा सकती है-

  1. मकान के लिए जमीन को चुनते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि जमीन दक्षिण-पश्चिम की दिशा में समान कोण में ही हो, जैसे 90 अंश की, जिससे की एक दम चौरस (चौकोर) या आयत के आकार का एक बहुत ही अच्छा मकान बन सके।
  2. इस तरह की कालोनियों में उत्तर-पूर्व दिशा या दक्षिण-पूर्व की दिशा में रास्ते को बनवाना चाहिए एवं कालोनियों के लिए दो तरफ से जाने का रास्ता या मेन गेट होना चाहिए, जिसमें एक गेट पूर्व की दिशा में खुलता हों तथा दूसरा गेट उत्तर की दिशा में खुलता हो।
  3. पहली मंजिल के मकानों से ऊपर वाली मंजिल की ऊंचाई कम ही होनी चाहिए, लेकिन ऊंची इमारतों के मकानों में सभी मंजिलों को कम ऊंचा नहीं किया जा सकता है, इसलिए सबसे आखिरी की मंजिल की ऊंचाई को थोड़ा कम रखा जा सकता है।
  4. मकान की ढलान उत्तर-पूर्व की दिशा में होनी चाहिए तथा दक्षिण-पश्चिम दिशा के क्षेत्र के तल (फर्श) की ऊंचाई ज्यादा होनी चाहिए।
  5. मकान को बनाते समय इसके चारों तरफ की खुली जगह को छोड़ देना चाहिए तथा दक्षिण-पश्चिम दिशा में कम खुली जगह छोड़नी चाहिए।
  6. मकान की ऊपर की मंजिलों को इस तरह से बनवाना चाहिए कि सुबह के समय में सूर्य की रोशनी मकान की सभी मंजिलों के अंदर पडें तथा प्राकृतिक शुद्ध हवा भी उन मकानों के अंदर आती जाती रहनी चाहिए।
  7. मकान को बनवाने की शुरुआत करने से पहले कुआं तथा ट्यूबवैल हमेशा ही उत्तर-पूर्व की दिशा में बनवाना बहुत ही अच्छा माना जाता है।
  8. मकान की छत पर पानी की टंकी को वायव्य दिशा में ही लगवाना चाहिए।
  9. जहां तक हो सके ज्यादा से ज्यादा मकानों की बॉलकानी पूर्व दिशा व उत्तर दिशा में ही बनवाना उचित होता है और इन्हे दक्षिण-पश्चिम दिशा में न बनवाएं।
  10. सामूहिक मकानों में स्टोर आदि को दक्षिण-पश्चिम दिशा की तरफ ही बनवाना चाहिए।
  11. जहां तक हो सके सामुहिक मकानों में ऊपर जाने की सीढ़ियों को दक्षिण दिशा या पश्चिम दिशा में ही बनवाना चाहिए या यह संभव न हो, तो सीढ़ियों को दक्षिणी-पश्चिमी दिशा के क्षेत्र में बना सकते हैं, लेकिन सीढ़ियों को उत्तर-पूर्व की दिशा में नहीं बनवाना चाहिए।
  12. मकान का मुख्य गेट पूर्व-उत्तर, उत्तर-पूर्व और उत्तर-पश्चिम दिशा की तरफ ही बनाना लाभदायक होता है।
  13. रसोईघर को हमेशा ही दक्षिण-पूर्व या उत्तर-पश्चिम दिशा में बनवाना शुभ होता माना जाता है।
  14. नए मकान में पानी की टंकी या जमीन के अंदर पानी की टंकी को दक्षिण-पश्चिम दिशा में नहीं बनवाना चाहिए।
  15. मकान में छोटे-बड़े वाहनों को रखने के लिए पार्किंग का स्थान हमेशा ही उत्तर-पूर्व में बनवाना अच्छा माना जाता है।
  16. पार्क को बनाने के लिए उत्तर-पूर्व की दिशा में खुला स्थान बहुत ही अच्छा माना जाता है।
  17. मकान में ट्यूबवैल उत्तर-पूर्व की दिशा में बनवाना अच्छा माना जाता है।
  18. मकान की उत्तर-दक्षिण दिशा में बड़े पेड़ लगाए जा सकते हैं।
  19. मकान की जमीन को आस-पास की जमीन से थोड़ा ऊंचा रखना ही अच्छा माना जाता है।
  20. ऊंची-ऊंची मंजिलों के कमरों में सोने की जगह को भी वास्तु के नियमों के अनुसार ही रखने की कोशिश करनी चाहिए।
  21. मकान के पूर्व की दिशा में खुले स्थान को पश्चिम की दिशा से थोड़ा ज्यादा रखना उचित होता है।
  22. इसी तरह से उत्तर दिशा एवं उत्तर-पूर्व की दिशा में खुला स्थान दक्षिण दिशा एवं दक्षिण-पश्चिम की दिशा में ज्यादा रखने की कोशिश करनी चाहिए।

औद्योगिक संस्थान में वास्तु के नियम

औद्योगिक संस्थानों को बनाने के लिए वास्तु-शास्त्र के सिद्धान्तों को उसी तरीके से अपनाना चाहिए, जिस तरीके से आवासीय मकानों के लिए अपनाया जाता है। इसलिए यह भी जांच करना जरूरी हो जाता है कि क्या औद्योगिक संस्थानों के लिए जमीन वास्तु-शास्त्र के अनुसार है या नहीं, जमीन का तल (फर्श) ढलान, अंदर-बाहर वास्तु के अनुसार है या नहीं है जैसे-

  1. औद्योगिक संस्थान के लिए जिस जमीन को चुना जाए, अगर उसमें रास्ता पूर्व दिशा में, उत्तर दिशा में या उत्तर-पूर्व की दिशा में हो तो ऐसी जमीन अच्छी मानी जाती है।
  2. औद्योगिक संस्थान का मुख्य गेट या दरवाजा हमेशा ही उत्तर-पूर्व दिशा में या पूर्व दिशा में या फिर उत्तर-पश्चिम दिशा में ही रखना उचित माना जाता है।
  3. औद्योगिक संस्थान के सुरक्षा कर्मचारियों (चौकीदारों) की जगह को हमेशा ही उत्तर-पश्चिम दिशा या फिर उत्तर दिशा में ही बनवाना चाहिए।
  4. औद्योगिक संस्थानों की पूर्व दिशा एवं उत्तर दिशा में कम ऊंचाई वाले बगीचे और पार्क बनाने चाहिए जिससे कि आने वाली सूरज की रोशनी में रुकावट पैदा न हो सके।
  5. औद्योगिक संस्थानों में दक्षिण दिशा एवं पश्चिम दिशा में ज्यादा ऊंचे पेड़ों या वृक्षों को लगाना बहुत ही अच्छा माना जाता है।
  6. औद्योगिक संस्थानों में दक्षिणी-पश्चिमी दिशा के भाग को ऊंचा ही बनवाना चाहिए।
  7. औद्योगिक संस्थानों में भारी वस्तुओं के सामान को रखने के लिए स्टोर रूम को हमेशा ही दक्षिण-पश्चिम दिशा के क्षेत्र में बनाना अच्छा माना जाता है।
  8. उत्तर-पश्चिम दिशा का क्षेत्र वाहनों को खड़ा करने के लिए सबसे अच्छा जाना जाता है।
  9. औद्योगिक संस्थान के प्रशासनिक भवन को फैक्टरी के भवन से नीचे बीच में उत्तर दिशा में या पूर्व दिशा में बनवाना चाहिए।
  10. औद्योगिक संस्थान के लिए बिजली के जनरेटर का कमरा हमेशा दक्षिण दिशा में बनाना चाहिए। इसे दक्षिण-पूर्व की दिशा में भी बना सकते हैं।
  11. कुआं या ट्यूबवैल को उत्तर-पूर्व की दिशा में बनवाएं, लेकिन इनको दीवार और गेट या दरवाजे से कुछ दूरी पर ही रखना चाहिए।
  12. औद्योगिक संस्थान के कर्मचारियों या मजदूरों के रहने के लिए मकानों को दक्षिण-पूर्व की दिशा में या उत्तर-पश्चिमी दिशा में दीवार से कुछ दूरी बनाकर ही बनवाना चाहिए।
  13. शौचालय को कभी भी उत्तर-पूर्व दिशा में एवं दक्षिण-पश्चिम दिशा में न बनवाएं तो अच्छा ही होगा।
  14. औद्योगिक संस्थान की भारी मशीनों को दक्षिण दिशा, पश्चिमी दिशा या दक्षिण-पश्चिमी दिशा में ही लगानी चाहिए।
  15. औद्योगिक संस्थान में लगाने वाली वस्तुओं को दक्षिण दिशा में, पश्चिम दिशा में या दक्षिण-पश्चिम दिशा में रखने की जगह बनानी चाहिए।
  16. औद्योगिक संस्थानों के तैयार हो चुके माल को हमेशा ही उत्तर-पूर्व की दिशा में रखा जाए तो बहुत ही शुभ (लाभदायक) होता है तथा ट्यूबवैल या कुएं को भी इसी दिशा में ही बनवाना चाहिए एवं मंदिर तथा पानी के बाहर निकलने की निकासी भी उत्तर-पूर्व की दिशा से हो तो बहुत ही अच्छा माना जाता है।
  17. औद्योगिक संस्थान में ओवरहैड़ टैंक को उत्तर-पश्चिम की दिशा में रखना अच्छा समझा जाता है।
  18. कारखानों में भट्टी तथा बायलर जैसे आग संबंधी सभी तरह के कार्यों को हमेशा ही दक्षिण-पूर्व की दिशा में रखना बहुत ही उचित माना जाता है।
  19. जमीन की उत्तर-पूर्व दिशा में ज्यादा खुली जगह पर दरवाजें तथा खिड़कियां आदि को लगवाना चाहिए।
  20. जो माल फैक्ट्री में पूरी तरह से तैयार न हुआ हो, इस तरह के अधूरे माल को हमेशा ही पश्चिमी दिशा के क्षेत्र में ही रखना चाहिए।
  21. पूरी तरह से तैयार माल को हमेशा ही उत्तर-पश्चिमी दिशा की तरफ ही रखना चाहिए।
  22. कच्चे माल को तैयार करने के लिए जो भी उपकरण लगाए गए हों, उसे इस तरह से रखे कि उस का मुख दक्षिण-पश्चिम दिशा की तरफ हों और उससे तैयार माल उत्तर-पूर्व की दिशा से निकल सके।

व्यावसायिक प्रतिष्ठान के लिए वास्तु के नियम

किसी भी तरह के व्यावसायिक जगह को विकसित करने के लिए सबसे पहले उसके लिए जमीन का चुनाव करना बहुत ही जरूरी हो जाता है और यदि उस मिली हुई जमीन में वास्तु के सिद्धान्तों को अपनाने के लिए जगह हों तो उसमें सुधार का विकास कर लेना चाहिए। अगर जमीन उत्तर-पूर्व के दिशा के क्षेत्र में बढ़ी हुई हो, तो यह तो बहुत ही अच्छा होता है। अपनी तरफ से हो सके तो कोशिश इस तरह से करनी चाहिए कि दुकानों के मुख्य गेट उत्तर दिशा या फिर पूर्व की दिशा में हो। गाड़ियों को खड़ी करने के लिए पार्किंग अच्छी जगह पर हो तथा पार्किंग के सामने की तरफ पार्क आदि हो सके तो इस तरफ ही बनवा सकते हैं। अगर ली हुई जमीन में बेसमेन्ट में पार्किंग की व्यव्स्था ठीक तरह से न हो सके, तो इसके सामने ज्यादा जगह को पार्किंग के लिए छोड़ देना चाहिए। अगर दक्षिण-उत्तर दिशा की तरफ दुकानें आदि को बनाना हों, तो उसके सामने की जगह को कुछ कम छोड़ना चाहिए तथा उत्तर-पूर्व की दिशा की दीवारों से सटा करके दुकानों को नहीं बनाना चाहिए, इनके पीछे की तरफ भी कुछ जगह को छोड़ देना चाहिए। इस प्रकार के व्यावसायिक जगहों पर कुएं या ट्यूबवैल आदि को उत्तर-पूर्व की दिशा में ही लगवाना अच्छा जाना जाता है। मशीन आदि वस्तुओं को दक्षिण दिशा या दक्षिण-पश्चिम दिशा में ही रखना चाहिए। अगर वर्कशाप है तो स्टोर का सामान आदि को हमेशा ही पश्चिम दिशा में या दक्षिण-पश्चिम दिशा की तरफ ही रखना चाहिए। अगर मेजनाइन बनाना है तो दुकान के दक्षिण दिशा या पश्चिम दिशा में ही बनाना उचित होता है। दुकान के उत्तर-पूर्व की दिशा के कोने को खाली तथा पूरी तरह से शुद्ध तथा पवित्र रखना चाहिए। इस जगह पर पूजा करने के लिए तस्वीर एवं शुद्ध जल को रखना अच्छा होता है। इस जगह पर स्टोर आदि का सामान कभी-भी इकट्ठा नहीं रखना चाहिए।

रेस्टोरेन्ट तथा होटल के लिए वास्तु के नियम

किसी भी होटल तथा रेस्टोरेन्ट को बनाने के लिए उसके अंदर दो हिस्से होते है, जैसे- पहले भाग को भोजन बनाने के लिए तथा खाना खिलाने के लिए इस्तेमाल में लिया जाता है और दूसरे भाग को आने वाले यात्रियों को ठहराने के लिए प्रयोग में लाया जाता है। इनमें भी आवासीय वास्तु के नियम भी लागू किए जाते हैं। भोजन को बनाने के लिए दक्षिण-पूर्वी दिशा का इस्तेमाल करना अच्छा होता है। होटल की बॉलकनी के लिए उत्तर-पूर्व की दिशा को प्रयोग में लाएं, लेकिन शौचालय एवं रहने वाली जगहों को उत्तर-पूर्व की दिशा में न बनाएं तो अच्छा होगा। होटल का रसोईघर दक्षिण दिशा या पश्चिम दिशा में ही बनाना चाहिए। होटल के दक्षिण-पूर्व की दिशा में जनरेटर, बिजली के मीटर आदि को लगवाना अच्छा माना जाता है, लेकिन हाल के बीच में किसी भी तरह की दीवार पर इन चीजों को न लगवाएं। वास्तु नियमों के अंदर आने वाले होटल के मुख्य गेट को पूर्व या उत्तर-पूर्व की दिशा में ही बनवाएं और अगर होटल के मुख्य गेट को पश्चिम की दीवार की तरफ रखना हो, तो इसको दक्षिण-पूर्व की दिशा में बना सकते हैं। मेजनाइन वाली मंजिल को पश्चिम दिशा या फिर दक्षिण दिशा की दीवार के सहारे ही बनवा सकते हैं। होटल के बनने वाले नकदी वाले काउंटर को हमेशा दक्षिण-पश्चिम दिशा में ही बनवाना उचित समझा जाता है। अगर होटल तथा रेस्टोरेन्ट में नहाने के लिए स्वीमिंग पूल भी बनाना है तो वह होटल तथा रेस्टोरेन्ट के उत्तर-पूर्व दिशा के क्षेत्र में बनाएं तो वह बहुत ही उत्तम जाना जाता है।

सिनेमाहाल को बनाने के लिए वास्तु के नियम

व्यापार संस्थान किसी भी तरह का हो, पंरतु उसको बनाने के लिए जब तक वास्तु के नियमों को नहीं अपनाया जाता है, जब तक वह ठीक नहीं होता है। जिस तरह से रहने के लिए मकानों को बनाने में वास्तुशास्त्र के नियमों की आवश्यकता होती है। उसी तरह से ही सिनेमाहाल को बनाने के लिए वास्तु के नियमों का पालन करना भी उतना ही जरूरी हो जाता है, क्योंकि कई बार व्यापार की नजर से भी यह देखा गया है कि सिनेमाघर को पूरा बनने में बहुत ही ज्यादा समय लग जाता है और सिनेमाघर के बन जाने के बाद उसको चलाने के लिए भी कई तरह की रुकावटों का सामना करना पड़ता है। कई तो सिनेमाघर इस तरह के होते हैं जिनको कुछ ही दिन चलाने के बाद आखिरी में बंद करना पड़ता है और इन सिनेमाघरों पर इतना ज्यादा भार पड़ जाता है कि कई बार इनको दूसरों को किराये पर भी देना पड़ जाता है तथा कई बार तो इन सिनेमाघरों को बेचने तक की नौबत आ जाती है। इसलिए सिनेमाहाल को बनाने के लिए वास्तु के नियमों का पालन करने में कुछ विशेष बातों को ध्यान में रखा जाए तो यह सिनेमाहाल चल सकता है। इस तरह से ही नहीं, बल्कि सिनेमाहाल के बनने के बाद भी कभी आगे भी जब किसी नए तरह के मकान को बनवाना हो, तो उसको बनवाने के लिए किसी वास्तु के जानने वाले से एक बार सलाह-मशविरा कर लेना चाहिए।

सिनेमाहाल को बनवाने के लिए जिस तरह की भी जमीन को खरीदें, सबसे पहले उसे वास्तु के नियमों को ध्यान में रखकर ही खरीदें तथा अगर वास्तु के नियमों के अंदर यह जगह नहीं आती है तो उसे वास्तु के नियमों में करके ही उस जमीन को स्थाई तरीके से बनवाना चाहिए।

सिनेमाहाल की जगह दक्षिण-पश्चिम दिशा के कोने में 90 डिग्री के अंदर होना बहुत ही जरूरी होता है। इसी तरह से उत्तर-पश्चिम दिशा का हिस्सा भी वास्तु के अनुसार ही रहना चाहिए जैसे कि पहले के वास्तु के नियमों में बताया जा चुका है।

सिनेमाहाल के आगे की जगह ज्यादा खुली होनी चाहिए, दक्षिणी दिशा व पश्चिमी दिशा में कम से कम खुली जगह होनी चाहिए।

सिनेमाहाल की जमीन या तो आयताकार होनी चाहिए या फिर वर्गाकार की तरह होनी चाहिए। सिनेमाहाल की जमीन में बहुत ज्यादा कोने निकले हुए नहीं दिखाई देने चाहिए।

सिनेमाहाल की जमीन के उत्तर-पूर्व का कोना कम नहीं होना चाहिए तथा अगर यह भाग जमीन का बढ़ा हुआ है तो यह लाभदायक माना जाता है।

उत्तर दिशा एवं उत्तर-पूर्व की दिशा को सिनेमाहाल की कैन्टीन तथा साईकल खड़ी करने की जगह आदि के लिए इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। कैन्टीन को सदा ही दक्षिण-पूर्व की दिशा में ही बनाना अच्छा माना जाता है।

सिनेमाहाल में पानी के निकलने की ढलान अगर उत्तर दिशा तथा पूर्व दिशा की तरफ हो, तो यह बहुत ही अच्छा होता है।

सिनेमाहाल के मालिक तथा उसके प्रबंधक को सदा ही उत्तर दिशा या पूर्व दिशा की तरह मुख करके बैठना चाहिए। कैश संबंधी बाक्सेज या अलमारी को दाहिनी हाथ की दिशा की तरफ बनवाना अच्छा माना जाता है।

सिनेमाहाल का मुख्य गेट तथा दरवाजा वास्तु-सिद्धान्त के अनुसार ही हो, तो अच्छा समझा जाता है।

अगर सिनेमाहाल में लगी हुई दुकानों आदि को बनवाना हो, तो इस तरह कि कोशिश करनी चाहिए कि ये दुकानें उत्तर दिशा या पूर्व दिशा की तरफ खुले तो बहुत ही लाभदायक होती है।

सिनेमाहाल में पानी पीने की व्यवस्था को उत्तर दिशा और पूर्व दिशा की तरफ बनवाना अच्छा माना जाता है।

सिनेमाहाल में उत्तर-पूर्व की दिशा की जगह को पूजा आदि करने के लिए इस्तेमाल करना चाहिए।

सिनेमाहाल को बनवाते समय बिजली आदि के मेन स्विच तथा जनरेटर आदि की जगह को दक्षिण-पूर्व की दिशा में चुनना चाहिए।

सिनेमाहाल में बॉलकानी बनवाते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उसकी व्यवस्था आदि दक्षिणी दिशा या पश्चिमी दिशा की तरफ ही बनवाना अति उत्तम माना जाता है।

सिनेमाहाल में ऊपर की मंजिल पर जाने के लिए जीने या सीढ़ियों का रास्ता हमेशा ही पश्चिम दिशा की तरफ से ही दक्षिण दिशा की तरफ ही रखना चाहिए तथा उनका पूरा वजन इन्ही दिशाओं की तरफ हो, तो यह बहुत ही अच्छा माना जाता है।

सिनेमाहाल में पिक्चर दिखाने वाले पर्दे को दक्षिण दिशा की तरफ होना चाहिए तथा पिक्चर चलाने वाले प्रोजेक्टर को हमेशा ही उत्तर दिशा की तरफ ही रखना अच्छा समझा जाता है।

वास्तु शास्त्र की सम्पूर्ण जानकारियां

  1. जीवन और वास्तुशास्त्र का संबंध
  2. जाने घर का सम्पूर्ण वास्तु शास्त्र
  3. घर, ऑफिस, धन, शिक्षा, स्वास्थ्य, संबंध और शादी के लिए वास्तु शास्त्र टिप्स
  4. वास्तु शास्त्र के आधारभूत नियम
  5. वास्तु शास्त्र के प्रमुख सिद्धान्त
  6. अंक एवं यंत्र वास्तु शास्त्र
  7. वास्तु का व्यक्ति के जीवन पर प्रभाव
  8. हिन्दू पंचांग अथार्त हिन्दू कैलेंडर क्या है?
  9. युग तथा वैदिक धर्म
  10. भारतीय ज्योतिष शास्त्र
  11. भवनों के लिए वास्तुकला

(This content has been written by Super Thirty India Group)

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