मकान को बनाने के लिए वास्तु टिप्स और सुझाव

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मकान के कार्य को शुरू करने संबंधी कुछ वास्तु टिप्स और सुझाव

किसी भी तरह के मकान को बनाने से पहले कुछ तरह की पूजा-पाठ को करना जरूरी माना जाता है, जो कि इस तरह से हैं जैसे-

शंकुस्थापना- शंकुस्थापना वह तकनीकी क्रिया मानी जाती है, जिसके द्वारा उत्तर-दक्षिण दिशा और पूर्व-पश्चिम की दिशाओं की जानकारी प्राप्त की जाती है। इसको पूर्वाभिमुखीकरण नियम भी कह सकते हैं। इससे पहले मकान को बनाने की जगह को साफ कराने के साथ ही जमीन का स्तर भी ठीक करवाना चाहिए। निर्माण करने वाली जगह के उत्तर-पूर्व दिशा के कोने में वास्तुपूजा और गणेश जी भगवान की पूजा करनी चाहिए। इसके बाद ही उस जमीन पर मकान को बनाने के लिए खुदाई के काम को और पत्थर की पूजा (पत्थर की प्रतिष्ठा पूजा के साथ ही कर दी जाती है) का समारोह आदि किया जा सकता है।

मकान को बनाने के लिए जमीन की खुदाई का काम उत्तर-पूर्व दिशा के कोने से शुरू करना जरूरी माना गया है। इसे उत्तर-पूर्व दिशा से दक्षिण-पूर्व दिशा को और दक्षिण-पूर्व दिशा से दक्षिण-पश्चिम दिशा की तरफ करना अच्छा होता है। इसके साथ ही इस तरह के काम को उत्तर-पूर्व की दिशा से उत्तर-पश्चिम दिशा को तथा उत्तर-पश्चिम दिशा से दक्षिण-पश्चिम दिशा की तरफ से किया जा सकता है। खुदाई करते समय किसी भी वक्त उत्तर-पूर्व दिशा को छोड़कर अन्य कोई भी जगह या स्थान नीचा नहीं होना चाहिए।

मकान को बनाने के लिए खंभे आदि को बनाना, 1,4,8 का कंकरीट आधार डालना, शिलान्यास के लिए उसके आकार की जगह को बनाना आदि बनाने का काम सिर्फ दक्षिण-पश्चिम कोने से ही शुरू करना चाहिए और उसके बाद इसको उल्टी दिशा की तरफ से आगे बढना चाहिए तथा किसी भी समय उत्तर-पूर्व के क्षेत्र को दक्षिण-पश्चिम के क्षेत्र से ऊंचा नहीं रखना चाहिए।

अगर मकान पुराना हो तथा उसको गिराना हो, तो उस काम को उत्तर-पूर्व के कोने से शुरू करना चाहिए, उत्तर-पूर्व दिशा का स्तर दूसरे क्षेत्रों से हमेशा ही थोड़ा नीचा ही होना चाहिए। पुराने मकानों की सामग्री की गुणवत्ता की गारंटी ली जा सके तो उसका इस्तेमाल नए मकानों को बनाने के लिए किया जा सकता है।

मकान को बनाने के समय तक कम से कम वास्तु (मकान) पूजा को तीन बार करवाना चाहिए-

  • सबसे पहले तो मकान को बनाने की शुरूआत करने से पहले।
  • दूसरी बार जब मकान का मुख्य गेट या दरवाजा लगाया जा रहा हो।
  • आखिरी में जब गृहप्रवेश किया जाना हों।

अलग-अलग राशियों में सूर्य की अवस्था के अनुसार ही जमीन की खुदाई करने का काम भी अलग-अलग कोनों से करना चाहिए जैसे-

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इन सबके अतिरिक्त किसी अच्छे ज्योतिषाचार्य से अथवा किसी अच्छे पंडित से सलाह-मशवरा करके ही इसके बारे में किसी फैसले पर पहुंचना चाहिए।इसी तरह से मकान के मुख्य गेट या दरवाजे को लगवाने और मकान में प्रवेश करने के लिए एक अच्छे दिन को निश्चित करना जरुरी माना जाता है। मकान के हर तरह से पूरा बन जाने के बाद ही व्यक्ति को मकान के अंदर प्रवेश करना चाहिए और मकान के पूरा न होने तक उसमें प्रवेश नहीं करना चाहिए। पहली भूस्तर मंजिल (ग्रांउड फ्लोर) के पूरी तरह से बन जाने के बाद भी यदि दूसरी मंजिल पूरी नहीं बन पाई हो, तो गृहप्रवेश निकाली गई तारीख में नहीं करना चाहिए जब तक की मकान पूरी तरह से बन करके तैयार न हो जाए।

इन सब तरह के कार्यों को पूरा करने के लिए ज्योतिष के किसी अच्छे जानकार पंडित की मदद से पंचाग, जन्मपत्री, खगोलशास्त्र आदि के बारे में जानकारी करके किसी अच्छे मुहूर्त को चुनना चाहिए। समारोह उत्तरायण (सोलह जनवरी से पंद्रह जुलाई तक) शुभ महीना, अच्छा वार, अच्छी तारीख और किसी अच्छे मुहूर्त में ही करना चाहिए।

  • वैशाख।
  • श्रावण।
  • मार्गशीर्ष।
  • पौष।
  • फाल्गुन, आदि हिन्दु केलेन्डर के बताए गए महीनों के अंदर ही मकान बनाने के कार्य को शुरू करना चाहिए।

इसके साथ ही मकान के मुख्य गेट या दरवाजे को भी बताए जा रहे महीनों की समय सीमा में लगाया जा सकता है जैसे-

  • उत्तर दिशा में दरवाजे को श्रावण (अगस्त) या कार्तिक का महीना (नवम्बर) में शुक्ल पक्ष में लगाया जा सकता है।
  • पूर्व दिशा में मकान के मुख्य गेट या दरवाजे को कार्तिक महीने (नवम्बर) में और माघ महीनें (फरवरी) के शुक्ल पक्ष में लगा सकते हैं।
  • पश्चिम दिशा में मकान के मुख्य गेट या दरवाजे को लगाना हो, तो उसे वैशाख का महीना (मई) तथा श्रावण का महीना (अगस्त) के शुक्ल पक्ष में लगा सकते हैं।
  • इसी तरह से दक्षिण दिशा में अगर मकान के मुख्य दरवाजे या गेट को लगवाना हो, तो इसके लिए वैशाख का महीना (मई) तथा माघ का महीना (फरवरी) में शुक्ल पक्ष में लगाना शुभ माना जाता है।

मकान को बनाने के काम को शुरू करने के लिए सोमवार, बुधवार, वीरवार (बृहस्पतिवार) तथा शुक्रवार के दिन को बहुत ज्यादा अच्छा तथा शुभ माना जाता है।

मकान को बनाने के लिए शुक्ष नक्षत्र जैसे कि- मृग, रोहिणी, अनुराधा, शिरा, रेवती, उत्तराषाढ़ा, घनिष्ठा, शतभिषा, उत्तरा, श्रवण, उत्तराभाद्र आदि के नक्षत्र को बहुत ही शुभ माना जाता है।

मकान को बनाने के लिए शुभ तथा अच्छा लग्न वृषभ, सिंह, कुंभ तथा वृश्चिक को माना जाता है।

मकान को बनाने के कार्य के लिए शुभ तिथि (दिन), द्वितीय, पंचमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी (ग्यारस) तथा त्रयोदशी मानी जाती है।

अन्य जरूरी बातें-

मकान के उत्सव से पहले मकान के अंदर किसी भी तरह के खाने को नहीं बनाना चाहिए यानी कि नए मकान के अंदर किसी भी तरह का कोई चूल्हे अथवा स्टोव आदि को नहीं जलाना चाहिए। किसी भी सदस्य के द्वारा मकान या नए घर के अंदर नहाने वाले कमरे का अथवा शौचालय आदि का इस्तेमाल (ये सभी काम को करने के लिए किसी दूसरे के मकान का इस्तेमाल कर सकते हैं) गृह-प्रवेश से पहले ऐसा नहीं करना चाहिए।

 नए मकान में प्रवेश करने के लिए मकान की अच्छी तरह से सफाई आदि करवाकर उसको अच्छी तरह से सजा देना चाहिए, हो सके तो सुंदर दिखाई देने के लिए मकान के मुख्य दरवाजे या गेट को केले के पौधे, आम की पत्तियों तथा खुशबूदार फूलों आदि से सजावट करनी चाहिए। गृहप्रवेश करने वाले से पहले की रात को वास्तुशांति यानी कि वास्तुपूजा, वास्तुहोम, बलिदान (अथवा वास्तुबलि), मकान की सुरक्षा, सुदर्शनहोम आदि को करना चाहिए। इससे पहले गाय और बछड़े का प्रवेश कराकर तथा शुद्ध पानी या जल से पूरे मकान को पवित्र कर लेना चाहिए। मकान में प्रवेश करने वाले दिन एक सफेद रंग के कपड़े से (जिस कपड़े को हल्दी से सुखा लिया गया हो) मकान के मुख्य गेट या दरवाजे को ढक देना चाहिए और दरवाजे की पूजा-पाठ करनी चाहिए।           मकान के अंदर प्रवेश करने के बाद पूजा-पाठ करने वाले कमरे में देवता की मूर्ति की प्रतिष्ठा तथा इन सबके अतिरिक्त और अन्य कार्यवाही तथा अनुष्ठान जैसे कि दूध का उबालना, गण-होम, नौग्रह होम, सत्यनारायण भगवान की पूजा-पाठ करना, मेहमानों और काम को करने वाले सदस्यों को अच्छा खाना खिलाना, मकान को बनाने का काम करने वाले कारीगरों को किसी भी तरह का पुरस्कार आदि देना जैसे सभी तरह के कार्य को पूरा करना चाहिए। गृहप्रवेश हो जाने के बाद अपने पूरे मकान को अच्छी तरह से रोशनी से जगमगाना चाहिए और उसी दिन से ही परिवार के सदस्यों को उस मकान में रहने की शुरुआत कर देनी चाहिए। कुछ व्यक्ति गृहप्रवेश हो जाने के बाद भी नए मकान में ताला लगाकर के अपने मुख्य जगह (अपने पुराने मकान) में रहने के लिए वापस चले जाते हैं जोकि किसी भी तरह से अच्छा नहीं माना जाता है। अगर किसी वजह से वे नए मकान में नहीं रह सकते हैं तो मकान के अंदर गृहप्रवेश नहीं करना चाहिए यानी कि उन व्यक्तियों को नए मकान में रहने के विचार को त्याग देना चाहिए।

मकान में प्रवेश करने के बाद मकान के मालिक को पहले की ही तरह रोजाना पूजा-पाठ करना चाहिए। पूजा करने के कमरे में अथवा अन्य दूसरी जगह पर प्रतिष्ठित मूर्ति का मुंह पश्चिम दिशा, पूर्व दिशा और उत्तर दिशा की तरफ ही करें तथा पूजा-पाठ करने वाले व्यक्ति का मुंह क्रम अनुसार पूर्व दिशा, पश्चिम दिशा अथवा दक्षिण दिशा की तरफ ही होना चाहिए यानी कि जब ही वह पूजा-पाठ करे तो उसका मुंह बताई गई दिशा की तरफ ही होना चाहिए। रोजाना की पूजा में धार्मिक ग्रंथों में दिए गए निम्नलिखित सिद्धान्तों का भी पालन करना जरुरी होता है जैसे-

  • पूजा करने से पहले व्यक्ति को अच्छी तरह से स्नान करने के बाद शरीर को पवित्र करके तथा साफ-सुथरे कपड़ों को धारण (पहनकर) करने के बाद ही पूजा-पाठ करना चाहिए। पूजा-पाठ के कमरे में हाथ-पैरों को धोए बगैर नहीं जाना चाहिए। पूजा-पाठ करने वाले व्यक्ति को अपने पैरों को एक-दूसरे से रगड़ने के बाद अच्छी तरह से साफ करने की तुलना में बाएं हाथ से पैरों को साफ करना चाहिए तथा दाएं हाथ का इस्तेमाल पैरों पर पानी डालने के लिए करना चाहिए।
  • कभी-भी पूजा-पाठ करने वाले कमरे में पीतल के पात्रों (बर्तनों) का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। पूजा-पाठ करने में हमेशा ही तांबे के बर्तनों का इस्तेमाल करना वास्तुशास्त्र में अच्छा बताया गया है, उस समय तो यह और भी अच्छा माना जाता है जब पानी का इस्तेमाल करना पड़ता है। तुलसी तथा फूल आदि को भी तांबे की प्लेट में इकट्ठा करना अच्छा माना जाता है।
  • पूजा-पाठ के कमरे में तेल के दीपक या तेल से मिलते-जुलते काम को करना हो तो इसके लिए पीतल के बर्तनों का इस्तेमाल किया जा सकता है। चांदी अथवा सोने की वस्तुओं का इस्तेमाल किसी भी कार्य के लिए किया जा सकता है, लेकिन लोहा, स्टेनलैस स्टील और अरंडी के तेल का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
  • पूजा-पाठ करने के लिए इस्तेमाल में आने वाला पानी कुएं अथवा बोरबेल से लिया जाए तो वह सबसे अच्छा माना जाता है। पूजा-पाठ के लिए इस्तेमाल में आने वाला पानी बहुत ही ज्यादा साफ होना चाहिए तथा उस पानी के अंदर उंगली के नाखूनों को नहीं डुबोना चाहिए। इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि कटोरी या प्याले में लिए जाने वाले पानी से बाहर के व्यक्ति का पैर नहीं छूना चाहिए।
  • भगवान अथवा परमात्मा की मूर्ति के सामने चढाए जाने वाले सभी तरह के फूलों को शुद्ध पानी से साफ करने के बाद ही चढाना चाहिए। एक ही थाली या प्लेट में तुलसी के साथ दूसरे तरह के फूलों को कदापि नहीं रखना चाहिए। तुलसी के पत्तों को पानी से साफ नहीं करना चाहिए। तुलसी के पत्तों को शाम के समय में तथा रात के समय में भी नहीं तोड़ना चाहिए, परंतु सुबह के समय में तुलसी के पत्तों पर सूरज की रोशनी के पड़ने से पहले ही उसको तोड़ सकते हैं। चुराए गए फूलों का इस्तेमाल पूजा-पाठ के लिए कभी-भी नहीं करना चाहिए।
  • सभी तरह के फूलों अथवा किसी भी तरह के फूलों का इस्तेमाल करने की बजाय सिर्फ चुने हुए और अच्छे खुशबू देने वाले फूलों का इस्तेमाल करना अच्छा होता है। गले हुए, खराब अथवा क्षतिग्रस्त फूलों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
  • नारायण भगवान की पूजा के लिए लाल फूल (केवल गुलाब, कमल आदि सुगंधित फूलों को छोड़ करके) का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। दुर्गा मां की पूजा करने के लिए एक महत्वपूर्ण तरह के लाल फूलों (जैसे कि- जवा कुसुम, गुड़हल आदि) का इस्तेमाल अन्य दूसरे फूलों के साथ कर सकते हैं।
  • वैसे तो भारत में अलग-अलग तरह के व्यक्ति अपने-अपने देवी-देवताओं की पूजा अलग-अलग तरह के रीति-रिवाज के अनुसार ही करते हैं, परंतु फिर भी तुलसी, शंख, घंटी, गंध (चंदन की लकडी़ का लेप) के बगैर पूजा को अधिकतर आधी-अधूरी समझा जाता है। धूप, आरती, दीप, पूजा, आग आदि को भी अपनी मुंह की फूंक को मार कर नहीं बुझाना चाहिए।
  • पूजा-पाठ करते समय बिना वजह की बातों को करना, शरीर को छूना, बालों, पैरों, सिर तथा नाक आदि को हाथ से नहीं छूना चाहिए। पूजा-पाठ करते समय बच्चों के साथ खेलना अथवा ज्यादा गुस्सा आदि भी नहीं करना चाहिए।
  • पूजा-पाठ करते समय कभी-भी मूर्ति के ऊपर बाएं हाथ से जल (पानी) को नहीं डालना चाहिए तथा बर्तनों (पात्रों) प्लेटों आदि को उठाते समय एवं नीचे रखते समय भी ज्यादा आवाज नहीं करनी चाहिए।
  • भगवान अथवा देवता की मूर्ति को चढ़ाए जाने वाली वस्तु के भोग को लगाने से पहले उसको नाक से सूंघना अथवा मुंह से चखना नहीं चाहिए। इसके साथ ही भगवान की मूर्ति के सामने दंडवत् प्रणाम करने के बाद अपने वस्त्रों को साफ (झाड़ना) नहीं करना चाहिए।
  • पूजा-पाठ करते समय व्यक्ति को अपना पूरा ध्यान भगवान की भक्ति में ही लगाना चाहिए और भगवान से कुछ भी मांगने के लिए पूजा-अर्चना नहीं करनी चाहिए।
  • रंगोली बनाने के लिए सफेद पत्थर अथवा ऐसे ही अन्य पदार्थ से बनाए गए पाऊडर अथवा चूर्ण का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, इसके लिए सिर्फ चावल के आटे का ही इस्तेमाल करना अच्छा माना जाता है।
  • अपने मकान या घर के अंदर कभी-भी कबूतरों आदि को नहीं पालना चाहिए, बल्कि हो सके, तो घर में मैना, तोता, मुर्गा, बतख, हंस आदि पक्षियों को पालना लाभदायक होता है। घर के अंदर पशुओं में कस्तूरी-बिल्ली, चीता, नेवला (नकुल) आदि जैसे जीवों को पाला जा सकता है।
  • मकान के अंदर लगे हुए बर्रों के छत्तों को समाप्त कर देना चाहिए, लेकिन इनको इस तरह से समाप्त करना चाहिए कि उसके अंदर के कीड़े की मृत्यु नहीं होनी चाहिए।
  • इस बात के बारे में यह जानना बहुत ही जरूरी है कि पुराने भारतीयों के रोजाना के जीवन काल और धार्मिक उत्सवों में तांबे के पात्रों (बर्तनों) और प्लेटों आदि का बहुत ही ज्यादा इस्तेमाल किया जाता था। इसकी वैज्ञानिक वजह तांबे का औषधीय महत्व होता है क्योंकिः-तांबे के पात्रों (बर्तनों) के अंदर बहुत ही जल्दी दाग आदि पैदा हो जाते है और इन पात्रों को क्षार अथवा तेजाब की वस्तु से थोड़े-थोड़े दिनों के अंदर साफ करते रहना चाहिए। इस तरह से उनको साफ करते रहने से वे साफ बने रहते हैं तथा उनमें किसी भी तरह के दाग भी उत्पन्न नहीं हो पाते हैं।
  • पुराने धर्मग्रंथों के अनुसार दूसरी महत्वपूर्ण तथा याद रखने वाली बात यह है कि दीपक अथवा आग को मुंह से फूंक मारकर कभी-भी नहीं बुझाना चाहिए। इसलिए पश्चिमी परंपरा का पालन करने वाले जो भारतीय अपने जन्म दिन पर जलती हुई मोमबत्तियों को फूंक मारकर बुझा देते हैं, वे भारतीय इस तरह का गलत काम करते हैं। हिंदू पंचांग के आधार पर इस महत्वपूर्ण दिन (जन्म दिवस) को अपनी राशि तथा अपने नक्षत्रों के अनुसार ही मनाना कहीं ज्यादा अच्छा, लाभदायक कहें तो अच्छा माना जाता है।

वास्तु शास्त्र की सम्पूर्ण जानकारियां

  1. जीवन और वास्तुशास्त्र का संबंध
  2. जाने घर का सम्पूर्ण वास्तु शास्त्र
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  4. वास्तु शास्त्र के आधारभूत नियम
  5. वास्तु शास्त्र के प्रमुख सिद्धान्त
  6. अंक एवं यंत्र वास्तु शास्त्र
  7. विभिन्न स्थान हेतु वास्तु शास्त्र के नियम एवं निदान
  8. वास्तु का व्यक्ति के जीवन पर प्रभाव
  9. हिन्दू पंचांग अथार्त हिन्दू कैलेंडर क्या है?
  10. युग तथा वैदिक धर्म
  11. भारतीय ज्योतिष शास्त्र
  12. भवनों के लिए वास्तुकला

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