भवनों के लिए वास्तुकला

वास्तुकला

पुराने ग्रंथों के अनुसार वास्तुकला की पांच तरह की अलग-अलग शाखाएं मानी जाती है जो कि इस तरह से होती हैं-
• कुलीन वंशीय व्यक्ति और राजकुमारों के वैभवशाली मकान, जैसे कि- महल आदि।
• साधारण व्यक्तियों के लिए रहने वाले मकान।
• देवताओं के रहने के लिए मकान, जैसे कि- मंदिर आदि।
• सार्वजनिक भवन जैसे कि- आराम करने के लिए मकान, पुस्तकालय, सिनेमाहाल आदि।
• आम लोगों के लिए सुविधाएं, जैसे कि- नहाने के लिए तरणताल, तालाब, छोटे तालाब तथा कुएं आदि।

वास्तुकला का समपूर्ण ज्ञान-

हमारे विज्ञान रूपी ताकतवर मकान के पांच मुख्य खंभों (स्तभों), जिसके बारे में पहले भी बताया जा चुका है जो कि इस तरह से हैः-
• शंकुस्थापना- पूर्वाभिमुखीकरण के नियम (सिद्धांत)।
• वास्तु-पद विन्यास- वास्तुपुरुष मंडल।
• हस्तलक्षण- आनुपातिक माप।
• आयादि सद्वर्ग- वैदिक वास्तुशिल्प के छः सिद्धान्त (नियम)।
• पताकादि-सदछंद- मकान का परिदृश्य।

वास्तुपूजा, बलिदान, हलकर्षण, अंकुरारोपण तथा शिलान्यास, इन वास्तुकला के कार्यों को पांच भागों में बांटा गया है।

वैसे देखा जाए तो वास्तुपूजा तथा बलिदान वास्तुकला में धार्मिक अनुष्ठान की क्रियाएं मानी जाती है पर भारत में वे मुख्य रूप से वास्तुकला के दर्शन से मिलती-जुलती है, जहां मकान के बनाने का काम सिर्फ जमीन का एक खाली खंड ही नहीं होता है, बल्कि यह दिव्य जीवन का एक रूपांतरित अस्तिस्व कहलाता है। यह एक तरह की युक्ति ही है, जिसमें जमीन अभिव्यक्त संसार रूप की सीमा तक ही बदलती है। इसके बारे में नारद मुनि ने भी ये कहा है कि वास्तु का व्यावहारिक इस्तेमाल अपनी प्रकृति में यांत्रिक है और वास्तुपुरुष मंडल को एक यंत्र कहा है। वास्तुपूजा मकान के उत्तर-पूर्व दिशा के भाग में एक शुभ दिन में एक तरह के अच्छे मुहूर्त में ही की जानी चाहिए। समरांगण सूत्रधार के अध्याय नं पांच, भाग एक में बलिदान के बारे में भी इस तरह से लिखा गया है कि भेंट देकर देवताओं, आत्माओं तथा दुष्ट आत्माओं से उस जगह को छोड़ने के लिए पूजा या प्रार्थना आदि भी की जाती है। है। इस तरह से भी यह संतुलित तथा शुद्ध या पवित्र हो जाता है। अपने पहले के अंशों से खाली हो जाने के बाद यह ग्रहण करने की ताकत और नए को अपनाने की ताकत को बनाए रखते हैं।



इसके बाद बनाने वाली जगह की जमीन की सतह को एक सा अथवा समान तरीके से बनाया जा सकता है। इस तरह से इसको हलाकर्षण के नाम से जाना जा सकता है। पुराने या प्राचीन ग्रंथों में चुनी हुए बनाने वाली जगह को बैल और हल की मदद से जोतने के बारे में कहा जाता है, क्योंकि जब यह भूमि या जमीन अच्छी तरह से जुत जाती है तो यह जमीन अपने पहले के समय (भूतकाल) से आजाद होकर अच्छी तरह से शुद्ध तथा पवित्र हो जाती है तथा वास्तुकला के अनुसार अच्छे नक्षत्रों में जमीन को नई जिंदगी मिल जाती है और उत्पादन का नया चक्र शुरू हो जाता है। इस तरह से कुदरत की लय अपरिवर्तित ही रहती है।

अंकुरारोपण का मतलब होता है, यह उनकी याद में आखिरी भेंट मानी जाती है जो उस जगह को छोड़ कर चले जाते है और नई जमीन में यह पहली भेंट जानी जाती है जो जहां पर बीज के उगने का मतलब होता है एक काम का पूरा हो जाना।

शिलान्यास एक तकनीकी और इसके साथ ही अनुष्ठानिक पक्ष है। यह सभी मिलते-जुलते अनुष्ठानों के साथ नींव के पत्थर रखने का समारोह होता है। मकान की पूजा करने के समय जिस पत्थर को पहले से ही उत्तर-पूर्व की दिशा में गाढ़ा गया था, उस पत्थर को निकालकर मकान की नींव के लिए बनाई गई खाइयों में दक्षिण-पश्चिम दिशा के कोने में रख दिया जाता है।

वास्तुशिल्पी, इंजीनियर (अभियंता), बढ़इयों, राजगिरों और श्रमिकों तथा मकान को बनाने से मिलते-जुलते अन्य व्यक्तियों को सम्मान देना छठा और आखिरी धार्मिक अनुष्ठान माना जाता है, क्योंकि उनकी प्रसन्नता तथा संतोष में ही उस वास्तुशिल्प के काम को पूरा करने की कला उसके अंदर छिपी होती थी।

दिशाएं तथा उनके अधिपति देवताः- संसार की आठों दिशाओं के आठ अधिपति (स्वामी) माने जाते हैं। इन देवताओं का उस स्थान पर रहने वालों पर असर (प्रभाव) पडता है, जो कि इस तरह से माना जाता हैः-

वास्तुकला के अनुसार वास्तुपुरुष मंडल में एक, चार, सोलह, पच्चीस, छत्तीस, उनच्चास, चौसठ, इक्यासी अथवा सौ वर्ग भी हो सकते हैं। व्यक्ति के मकान के लिए चौंसठ भागों के मंडल का परिरूप और नगर के बनाने की योजना के लिए इक्यासी भागों के एक मंडल को बनाना सबसे अच्छा माना जाता है।



जैसे कि वास्तुपुरुष मंडल में उत्तर दिशा को धन के देवता कुबेर की, पूर्व तरफ की दिशा को रोशनी के देवता सूरज की, दक्षिण तरफ की दिशा को मौत (मृत्यु) के भगवान यमराज की, पश्चिम तरफ की दिशा को हवा (वायु) के भगवान (देवता) की और बीच के भाग को संसार के देवता ब्रह्ना का प्रतीक जाना जाता है, इसलिए मकान की रूपरेखा (डिजाइन) को बनाते समय अलग-अलग तरह के कमरों की अवस्था के बारे में निम्नलिखित तरीके से बताया गया है जैसे किः-

  • मकान में पूर्व दिशा की तरफ हमेशा ही नहाने के लिए स्नानागार बनाने चाहिए।
  • इसी तरह से पूर्व दिशा की तरफ तथा दक्षिण-पूर्व की दिशा की तरफ हमेशा ही तेल तथा घी आदि के लिए भंडार कक्ष होने चाहिए।
  • दक्षिण-पूर्व दिशा की तरफ या आग्नेय कोण की तरफ मकान में रसोईघर बनवाना चाहिए।
  • सोने का कमरा तथा आराम करने वाला कमरा हमेशा ही दक्षिण दिशा की तरफ ही होना चाहिए।
  • शौचालय तथा पेशाबघर को मकान की दक्षिण दिशा तथा दक्षिण-पश्चिम दिशा की तरफ ही बनवाने चाहिए।
  • मकान को बनवाने पर मकान के अंदर दक्षिण-पश्चिम दिशा की तरफ कपड़ों को रखने वाला कमरा, कपड़ों को बदलने वाला कमरा, श्रृंगार करने वाला कमरा, उपकरण तथा औजारों आदि को रखने वाला कमरा होना चाहिए।
  • मकान की दक्षिण-पश्चिम दिशा तथा पश्चिम दिशा के बीच में पढ़ाई-लिखाई करने वाला कमरा होना चाहिए।
  • खाना खाने वाले कमरों को हमेशा ही पश्चिम दिशा की तरफ बनवाना अच्छा माना जाता है।
  • पश्चिम दिशा और उत्तर-पश्चिम दिशा के बीच की तरफ शौचालय को बनवाना चाहिए।
  • उत्तर-पश्चिम दिशा की तरफ अनाज आदि को रखने वाला कमरा बनवाना अति अच्छा माना जाता है।
  • हमेशा ही मकान में पूजा-अर्चना करने वाला कमरा तथा दरवाजा मंडप को उत्तर-पूर्व की दिशा में ही बनवाना अच्छा होता है।
  • ध्यान करने वाले कमरे को मकान के उत्तर-पूर्व की दिशा और पूर्व दिशा के बीच में बनवाना चाहिए।
  • केंद्रीय भाग में आंगन अथवा पारिवारिक कामों के लिए सामान्य जगह होनी चाहिए।

संसारीय व्यवस्था के साथ व्यक्ति के रिश्ते एक स्थापित और मानव तथ्य जाने जाते हैं तथा मकान से मिलते-जुलते सभी भारतीय रीति-रिवाज एवं धार्मिक अनुष्ठान इस तरह के तथ्य के बारे में संकेत करते हैं।

वास्तुकला में अलग-अलग कमरों का विन्यास अथवा अवस्था- नहाने वाले कमरे, रसोईघर, सोने वाला कमरा या आराम करने वाला कमरा, खाना खाने वाला कमरा, अनाज रखने वाला कमरा तथा पूजा-अर्चना करने वाला कमरा आदि की सही अवस्था के बारे में नीचे बताए जा रहे श्लोक में निम्नलिखित तरीके से बताया जा रहा है जैसे किः-

स्नानागारं दिशि प्राच्यां आग्नेय्यां च महानसम्।
याम्यायां शयनागारं नैऋत्यां वस्त्रमन्दिरम्।
वारुण्यां भोजनगृहं वायव्यां पशुमन्दिरम्।
भण्डारं वेश्मोत्तरास्यां ऐशान्यां देवतालयम्।।
एनान्युक्तानि शस्तानि स्वस्वये स्वस्वदिक्ष्वपि।

बताए गए श्लोक का यह मतलब होता है कि मकान में नहाने वाले कमरे को हमेशा ही पूर्व दिशा की तरफ बनवाना चाहिए। दक्षिण-पूर्व यानी कि आग्नेय कोण को रसोईघर के लिए छोड़ना चाहिए। सोने या आराम करने के कमरे को अगर दक्षिण दिशा की तरफ बनवाया जाए तो बहुत ही ज्यादा लाभदायक माना जाता है, उसी तरह से दक्षिण-पश्चिम दिशा की तरफ कपड़ों को रखने वाला कमरा और मेकअप करने का कमरा या श्रृंगार करने वाला कमरा होना चाहिए। पश्चिम दिशा की तरफ खाना खाने वाला कमरा तथा उत्तर-पश्चिम दिशा की तरफ पशुओं या गायों आदि के अनाज आदि का कमरा होना चाहिए। धन आदि को रखने के लिए उत्तर दिशा का कमरा शुभ माना जाता है, इसी तरह से ही उत्तर-पूर्व की दिशा में पूजा-पाठ करने का कमरा बनवाना चाहिए। इस तरह से अगर व्यक्ति अपने मकान में बताए गए सभी कमरों को ठीक तरह से बनवा लेता है तो उस व्यक्ति को हर तरह से सुख-समृद्धि मिल जाती है।

अगर ऊपर बताए गए सिद्धान्तों का बहुत ही सख्ती से पालन किया जाए तो मकान के बनने वाले ढांचे में सही तरह से हवा के आने जाने के लिए आवागमन लगा रहेगा, बहुत ही ज्यादा अच्छी संख्या में सूरज की रोशनी आती रहेगी और उस मकान में रहने वाले व्यक्ति की भी अपनी निजी गोपनीयता बनी रहेगी। दक्षिण दिशा और पश्चिम दिशा की दीवारें सूरज की पड़ने वाली बहुत ही तेज किरणों को सहने के लिए न सिर्फ पूरी तरह से चौड़ी होनी चाहिए बल्कि आंगन में वायु के आने जाने के लिए उनमें अच्छे तरीके से खुली जगह अथवा द्वार या गेट भी होना चाहिए। पश्चिम दिशा और दक्षिण दिशा में ज्यादा पेड़-पौधों को अगर लगा दिया जाए तो इससे बहुत ही ज्यादा लाभ प्राप्त होता है।

वास्तुकला के सिद्धान्तों का पालन सिर्फ मंदिरों और रहने वाले मकानों के लिए ही लागू नहीं होते हैं बल्कि फ्लैट्स, आफिसों, कार्यालय, उद्योगों, रंगमंच के गृहों, होटलों और होस्टलों आदि के मकान के लिए भी किया जाना अच्छा माना जाता है।

वैसे देखा जाए तो काफी पुराने और नए मंदिर वास्तुशास्त्र के अनुसार ही बनाए जाते हैं, पर उनमें से कईयों में इस शास्त्र का कम ही ध्यान रखा जाता है और उसका पड़ने वाला नुकसानदायक असर (प्रभाव) सभी व्यक्तियों में दिखाई देता है, क्योंकि मंदिर वास्तुकला हमारा विषय नहीं है इसलिए हम उस तरह के विषय के बारे में किसी भी तरह के विचारों को नहीं करेंगे।

मकान में नौग्रहों की अवस्था- जब वास्तुशास्त्र के सिद्धान्तों के अनुसार मकान को बनाया जाएगा, उस समय उसके साथ ही मकान में नौ तरह के ग्रह भी उपस्थित हो जाते हैं और उस मकान में रहने वाले व्यक्ति पर ये नौ तरह के ग्रह अपना अच्छे असर या प्रभाव ड़ाल सकते हैं।



वास्तुकला के अनुसार सूरज ग्रह की जगह पूजा अथवा पाठ या प्रार्थना करने वाले कमरे में होती है जैसे कि ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) में, चंद्रमा ग्रह का स्नानागार वाले कमरे में यानी कि पूर्व दिशा में, मंगल (कुंज-मंगल) ग्रह का हमेशा ही दक्षिण-पश्चिम दिशा (आग्नेय कोण) में स्थित रसोईघर में, सामने के बरामदे अथवा बीच के बड़े कमरे में बुध ग्रह का स्थान जाना जाता है, जहां पर पड़ने-लिखने तथा अध्ययन और व्यापार आदि जैसे काम को किया जाता है, उत्तर दिशा में स्थित धन का कमरा तथा जहां पर आध्यात्मिक अथवा अन्य तरह के अध्ययन आदि किए जाते हैं, वहां बृहस्पति ग्रह अथवा गुरू ग्रह की जगह होती है, यह ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) के दाएं और बाएं किनारों पर हो सकता है, शुक्र ग्रह की जगह दक्षिण दिशा, दक्षिण-पश्चिम दिशा और पश्चिम दिशा के किनारों पर निर्मित रहने, खाना खाने के कमरे, मेकअप रूम या कमरा, आराम करने के कमरा अथवा सोने के कमरे में होता है। शनि ग्रह की जगह पश्चिम दिशा या उत्तर-पश्चिम दिशा की तरफ बने बिना रोशनी के कमरे या गायों के कमरों में होती है, मुख्य द्वार की दाहिनी तरफ राहु ग्रह का और बाई तरफ केतु ग्रह की जगह होती है तथा राहु ग्रह और केतु ग्रह मकानों के चारों तरफ हमेशा ही उसकी रक्षा करते रहते हैं।

वास्तुकला के अनुसार मकान का मुख्य गेट या दरवाजा, द्वार-मंडप, शौचालयों आदि और यहां तक कि रसोईघर भी मुख्य रूप से इस तरह के तथ्य पर ही आधारित है कि मुख्य गेट या दरवाजा एवं निर्माण करने वाली जगह का मुंह किस दिशा की तरफ है।

इन सबके अलावा पांच महाभूतों (जो कि इस संसार और यहां की जीवित इकाइयों को बनाते हैं) में से कम से कम तीन जैसे किः धरती या पृथ्वी, आग या अग्नि और जल या पानी का प्राचीन धर्मग्रंथों के अनुसार भी ध्यान रखा जाए, तो अन्य दो वायु या हवा और आकाश (अंतरिक्ष) की जगह इस तरह से निर्मित स्थिति में पूरी सीमा तक अपने को ठीक तरह से बना लेते हैं।

बहुत ही पुराने या प्राचीन श्लोकों में से एक में नौ ग्रहों के महत्व के बारे में निम्नलिखित रूप से बताया गया है जो कि इस तरह से है जैसे किः-
आरोग्यम् प्रददातु नो दिनकरः
चंद्रो यशो निर्मलम्
भूतिः भूतिसुतः सुधांशुतनयः
प्रज्ञां गुरुगौरवम्।
कान्यः कोमलवाग्विलासमतुलम्
मान्दो मुदं सर्वदा
राहुर्बाहुबलं विरोधशमनम्
केतुः कुलस्योन्नतिम्।।
इसका मतलब यह है कि सूर्य भगवान अच्छे स्वास्थ्य को देने वाले माने जाते हैं, चंद्रमा ग्रह अपनी शुद्धता की वजह से कीर्ति को देने वाला माना जाता है। मंगल ग्रह सभी तरह की धन-संपत्ति, बुद्धि या दिमाग, बहुत ही अच्छा व्यवहार या चरित्र और गुरू सम्मान को देने वाला होता है। शुक्र ग्रह वाक्पटुता को, शनि ग्रह प्रसन्नता को, राहु ग्रह जीत या अजेय तथा मान-सम्मान को तथा केतु ग्रह पूरे परिवार की पीढ़ी को संपन्नता देने वाले माने जाते हैं।

वास्तुकला के अनुसार अच्छे तथा बुरे लक्षणः- मकान को बनाते समय वास्तुकला के अनुसार तीन तरह के बहुत ही महत्वपूर्ण अवसर माने जाते हैं जैसे कि- मकान की शुरुआत, मुख्य गेट या दरवाजे को लगवाना, मकान के अंदर प्रवेश करना। जब मकान का मालिक मकान के बनाने वाली जगह की तरफ जा रहा होता है, तो उस समय होने वाले संकेतों से अच्छे तथा बुरे (शुभ अथवा अशुभ) लक्षण के बारे में ज्ञात किया जा सकता है जो कि इस तरह से है जैसे किः-

शुभ लक्षणः- मकान बनने वाली जगह की तरफ अगर मकान का मालिक जा रहा होता है, तो उस समय अगर सामने की तरफ से गाय, सुमंगली लड़कियां आती हुई दिखाई दे जाए, फल, संगीत, दही, फूल, सिंदूर लगाने हुए का कोई तस्वीर या दृश्य आदि का दिखाई दे, शीशा (दर्पण) चंद्रमा का उगना, खाना, दूध का भरा हुआ पात्र या बर्तन, जल या पानी, मरने वाले व्यक्ति की आखिर यात्रा का जुलूस पर बिना आग के ले जाते हुए दिखाई देना, गरुड़ का हवा में चक्रकार की तरह उड़ना अथवा दाई तरफ उड़ना, कोऔं का दाई तरफ उड़ना, लोमड़ी का बाई तरफ भागना, नंगा बालक, कपड़ों को धोने वाला धोबी, लाल साड़ी पहने हुए कोई स्त्री और हाथी, अगर ये सब चीजे दिखाई देती हों, तो बहुत ही लाभदायक माना जाता है।

अशुभ लक्षणः- इसी तरह से आग जलाने की लकड़ी को ले जाते हुए देखना, कोई नया पात्र या बर्तन, अंधा, लंगड़ा, रोगी व्यक्ति, लड़ाई-झगड़ा करते हुए, साधु या सन्यासी, सूखी हुई घास, हड्डियां, अग्नि या आग, बिल्ली, भिखारी, शराबी, बाई तरफ गोल-गोल घूमते हुए और रोते हुए पशु, खरगोश, सांप, गरूड़ का दाई तरफ मुड़ना, चींटियों का अलग-अलग होकर चलना, कुत्तों को आपस में लड़ाई करते हुए देखना, भैंस अथवा भैंसे, विधवाएं, मछली पकड़ने वाले मछुआरों का जाल, डंडे को हाथ में पकड़े हुए व्यक्ति जैसे इस तरह से अगर बनने वाले मकान की तरफ जाते हुए व्यक्ति को ये सब चीजे दिखाई दे जाती है तो इसको नुकसानदायक माना जाता है।

इसी तरह से अगर बनने वाले मकान की तरफ जाने से पहले पूजा के कमरे में रखे हुए तेल का दीपक अगर बुझ जाता हो, तो इसको हर तरीके से बहुत ही नुकसानदायक तथा बुरा लक्षण समझा जाता है।



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