Sun. Jun 7th, 2020

वास्तुशास्त्र का साहित्य

वास्तुशास्त्र का साहित्य

वास्तुशास्त्र का साहित्य और सम्पूर्ण ज्ञान

वास्तुशास्त्र का साहित्य: भारत के प्राचीन ऋषि-मुनियों तथा कई विद्वानों ने व्यक्ति की मूलभूत जरूरतों, उनके रहने के रहने की जगह के बारे में बहुत ही बारीकी से जांच की है। इन्हीं के अध्ययन व विश्लेषणों का परिणाम वास्तुशास्त्र है। वास्तुशास्त्र पर कई प्रामाणिक प्राचीन ग्रंथ मिलते हैं जैसे-

  1. स्कन्द पुराणः- नगर योजना से संबंधित नियमों के बारे में इस स्कंद पुराण में बताया गया है।
  2. अग्नि पुराणः- रहने वाले मकानों से मिलते-जुलते नियमों के बारे में भी अग्नि पुराण में बताया गया है।
  3. वायु पुराणः- अधिक ऊंचाई पर बनाए जाने वाले मंदिरों से मिलते-जुलते सिद्धान्तों की चर्चा वायु पुराण में की गई है।
  4. गरुड़ पुराणः- गरुड़ पुराण में रहने वाले मकानों व मंदिरों से संबंधित नियमों के बारे में बताया गया है।
  5. नारद पुराणः- नारद पुराण में जल भरने वाली जगह, कुओं, झील तथा मंदिरों से मिलते-जुलते नियमों के बारे में पता चलता है।
  6. मत्स्य पुराणः- पत्थरों पर नक्काशी, समारोह स्थल, खंभों से संबंधित नियमों की चर्चा मत्स्य पुराण में की गई है।

शास्त्रीय ग्रंथों के अलावा भी वास्तु विषयक के बारे में जानकारी वैदिक साहित्य, रामायण, अष्टाध्यायी अर्थशास्त्र, महाभारत, जैन तथा बौद्ध ग्रंथ, वृहत्संहिता आदि में जगह-जगह पर मिल जाती है।

वास्तु शास्त्र के अन्य मुख्य ग्रन्थ निम्नलिखित तरह से हैं जैसे-

विश्वकर्मा प्रकाश, समरांगण सूत्रधार, वास्तु रत्नावली, शिल्प संग्रह, विश्वकर्मीय शिल्प, मयमत, चित्र लक्षण, राजवल्लभ, मानसार, वास्तु संदेश, रूपमंडन, मुहूर्तमार्तंड, हलायुध कोष, बृहद्वास्तुमाला समरांगण वास्तु शास्त्र आदि। इस सभी तरह के ग्रंथों में ग्रहों के बहुत ही सुंदर नियमों के बारे में बताया गया है, लेकिन समरांगण सूत्रधार नाम के ग्रंथ की एक खास विशेषता यह भी बताई गई है कि इससे बनने वाले मकान, जिनमें कि वास्तुदोष पाए जाते हैं, का वास्तु दोष को दूर करने के लिए बगैर मकान को तोड़े-फोड़े बिना ही, अलग-अलग तरीके को अपनाकर किया जा सकता है। आज के समय में लोग मन की इच्छा के होते हुए भी वास्तुशास्त्र की जानकारी रखने वाले को बुलाने या उससे किसी भी तरह की सलाह-मशवरा करने से डर लगने लगता है। इसकी वजह भी वहीं होती है कि अगर वास्तु शास्त्र का जानकार आता है और उसने मकान के अंदर इतनी ज्यादा तोड़-फोड़ के लिए कह दिया तो बिना वजह का खर्चा व मुसीबतों को झेलना पड़ सकता है।

समरांगण सूत्रधार के दूसरे अध्याय के चौवालीसवें श्लोक में इस तरह से बताया है-

शास्त्रं कर्म तथा प्रज्ञाशीलं च क्रिययान्वितम्।

लक्ष्यलक्षणयुक्तार्थन्शास्त्रनिष्ठो नरो भवेत्।।

इसका यह मतलब है कि स्थपित को शास्त्रज्ञ तथा व्यावहारिक कार्यों में चतुर होना चाहिए। उसका प्रज्ञावान व शीलवान होना बहुत ही जरुरी होना चाहिए। लक्षणों के अनुसार मकान या ग्रह के सम्यक् ज्ञान इन सबके बाद अपेक्षित होते हैं।

वास्तुशास्त्र और उसकी जानकारियां (Information about Vastu Shastra)

  1. वास्तु शास्त्र क्या है?
  2. वास्तु शास्त्र का इतिहास
  3. वास्तु शास्त्र का परिचय
  4. सरल वास्तु शास्त्र
  5. वैदिक वास्तु शास्त्र
  6. वास्तुशास्त्र का विज्ञान से संबंध
  7. वास्तु शास्त्र के प्रमुख सिद्धान्त
  8. वास्तु शास्त्र के आधारभूत नियम
  9. वास्तुशास्त्र के सम्पूर्ण नियम और जानकारियां

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