Veda Tatha Hindu Shabd ki Stuti

वास्तु शास्त्र के अनुसार बच्चों का कमरा

वेद तथा हिंदू शब्द की स्तुति

प्राचीन फारस के लोग पूरे भारत को जिस जगह पर सिंधु नदी बहती थी, हिंदू के नाम से पुकारा करते थे, इसकी वजह यह होती थी कि वे लोग ’स’ शब्द की जगह पर ’ह’ शब्द का इस्तेमाल किया करते थे। पश्चिम के लोग सिंधु नदी को ’इन्डस’ के नाम से जानते थे और इसी शब्द से इसका नाम इंडिया रखा गया। पुराणों में इस देश का उल्लेख भारतखंड, भारतवर्ष अथवा जम्बूद्वीप के रूप में भी हुआ है। वर्तमान भारत को जगाने वाले महान स्वामी विवेकानंद हिंदुओं को वेदों के अनुयायी, वैदिक या वेदांत के मानने वाले या वेंदाती कहा करते थें। स्वामी विवेकानंद ने तो यहां तक भी कहा था कि संसार के ज्यादातर धर्म कुछ निश्चित ग्रंथों का पालन करते हैं, इस तरह से वे विश्वास करते थे कि उनके उन ग्रंथों में परम पिता परमात्मा के शब्द है। यही उनके धर्म के अनुसार या आधार हैं।

पश्चिमी के आधुनिक विद्वानों के आधार पर, हिंदुओं के वेदों को सबसे प्राचीन माना जाता है। वेद व्यक्तियों के उदगार नहीं है। उनका समय अथवा काल निश्चित नहीं हुआ था तथा न कभी-भी निश्चित हो सकता है, ये बात सही है। जबकि संसार के और दूसरे तरह के सभी धर्म अपने प्रभुत्व में यह दावा करते हैं कि वह एक व्यक्तिगत भगवान अथवा कई व्यक्तियों, देवताओं अथवा भगवान के महत्वपूर्ण संदेशवाहक के द्वारा कुछ व्यक्तियों से इस संसार में प्रसारित हुए। वेदों का आधार कोई भी व्यक्ति नहीं है, लेकिन वे खुद ही एक उदाहरण है, शाश्वत होते हुए उनको परमात्मा के बारे में पूरी तरह से पता है। वे न तो कभी लिखे गए, न कभी रचे गए, वे हर समय उपस्थित थे जैसे कि यह संसार अनंत तथा शाश्वत है, शुरू तथा आखिरी से रहित है, उसी तरह से ईश्वर के बारे में ज्ञान आदि और अंत से रहित है और यह ज्ञान ही वेदों का अर्थ हैं। परमात्मा के जिस ज्ञान के भंडार को वेदांत के नाम से जाना जाता है, वह उन बहुत ही जाने-माने लोगों के द्वारा खोजा गया है, जिन्हें ऋषि या विचारों का दृष्टा के नाम से भी जाना जाता है यानी कि ये विचार उनके अपने नहीं थे, वे विचारों को देखने वाले थे। ऋषियों मंत्रदृष्टारः यानी कि ऋषि का मतलब ही मंत्र दृष्टा होता है।

भारतीय स्मृति ग्रंथों के अनुसार, भगवान या परमात्मा ने जब इस संसार को बनाया था, तो उसकी अनुभावातीत ऊर्जा सभी जगह व्यास थी। यह आध्यात्मिक ऊर्जा पवित्र कंपन शब्दब्रह्ना थी, जिसमें परमात्मा या भगवान पाया जाता है। यह शुद्ध आवाज कंपन ॐ मंत्र के रूप में प्रकट हुई, जो कि सभी वस्तुओं का आधार स्थल जाना जाता है या दूसरे शब्दों में कहा जाए तो सारी ताकतें या शक्तियां इस पवित्र तथा शुद्ध कंपन के अंदर छिपी हुई है।

इसी के बारे में भगवान श्री कृष्ण ने भी भगवद-गीता में इस तरह से रहा है किः-

पितामहस्य जगतो माता धाताः पितामहः।
वेद्यं परित्रमोड्कार ऋक्साम यजुरेव च।।

भगवान श्री कृष्ण ने इस श्लोक के द्वारा यह कहा है कि इस पूरे संसार का करता-धरता यानी कि धारण करने वाला तथा कर्मों के फल को देने वाला पिता, माता, पितामह, जानने योग्य, पवित्र या शुद्ध ओंकार तथा ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं स्वयं ही हूं।

वेद सबसे पहले किस तरह से लिखित रूप से संकलित किये गये, इसके बारे में निम्नलिखित तरीके से कहा गया है किः-

भगवान विष्णु ने भगवान ब्रह्ना को वेदों के बारे में ज्ञान दिया, जिन्होने इसे और दूसरे ऋषियों को और आध्यात्मिक व्यक्तियों (जो वेदों को याद रखने के लिए पूरे जीवनकाल में ब्रह्नाचर्य के व्रत को धारण रखते थें) और नारद मुनि में प्रकट किया, जिन्होंने इसके बारे में दूसरों को ज्ञान दिया। यहां से मौखिक रीति-रिवाज शुरू हुए और हजारों सालों तक वेदों का इस तरह से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को देता जाता रहा और आखिरी में द्वापर युग की समाप्ति होने पर महाऋषि वेदव्यास ने इसको चार हिस्सों में बांट दिया और इसके बारे में लिखित रूप दिया, जिससे कि कलियुग यानी कि आधुनिक युग के कम ज्ञान को प्राप्त करने वाले व्यक्ति उनको बहुत ही आसानी से जान सके।

ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद, ये चार तरह के वेद माने जाते हैं। पुराणों में बताई जाने वाली प्रामाणिक कथाएं और ऐतिहासिक तथ्य पांचवें वेद कहे जाते हैं। सभी चारों वेदों, वेदांत सूत्रों, आरण्यकों, ब्रह्नाणों और उपनिषद को मुख्य रूप से उद्घाटित श्रुति माना जाता है। वैदिक साहित्य के अन्य भाग, जिनमें महाभारत, भगवदगीता, रामायण तथा सभी पुराण सम्मिलित है, स्मरण के नाम से जाने जाते हैं। जो व्यक्ति सुनने और स्मरण के द्वारा निर्देशित मार्ग का पालन करता है, उसको आर्य का नाम दिया गया है।

कुछ और दूसरे वैदिक साहित्य निम्नलिखित तरीके से जाने जाते हैं जैसे-

आयुर्वेदः– पवित्र या शुद्ध औषधियों का मुख्य विज्ञान, जिसको कि महाऋषि धन्वन्तरि ने सिखलाया।
धनुर्वदः– महाऋषि भृगु के द्वारा सिखलाया सैन्य अथवा युद्ध विज्ञान।
अर्थशास्त्रः– शासन व राजनीति विज्ञान।
गंधर्ववेदः– संगीत, नृत्य तथा नाटक आदि की कला।
स्थापत्सवेदः– वास्तुकला का विज्ञान। रथ कला, विमानकला, नौकाकला, दुर्गकला, नगरकला, मूर्तिकला आदि।
मनुस्मृतिः– वैदिक विधि (कानून) ग्रंथ जो मनु के धर्मशूत्र पर आधारित है।
• पारशास्त्र, कामशास्त्र आदि।

संस्कृत और वैदिक भाषा-

यह वेदों से साफ है कि भारत की बोली या भाषा का प्राचीन पवित्र और साहित्य का रूप संस्कृत को ही माना जाता है। यह भाषाविदों के लिए महान रूचि की भाषा होती है, क्योंकि आधुनिक का विकास करने में पश्चिमी विद्वानों को संस्कृत के ज्ञान से बहुत ज्यादा उत्साह मिला है।

भारतीय बातें, संस्कृति और पवित्र तथा अच्छे साहित्य का सबसे पुराना दस्तावेज प्रलेख वेद है, जो सदाचारिता के द्वारा मुक्ति अथवा पूरी तरह से मुक्ति को प्राप्त करने का रास्ता दिखाते हैं और इस तरह से उनके संदेश तथा शिक्षाएं देश, धर्म और युग की सभी संभव सीमाओं से दूर होती है। वे अपने अर्थ और उपयोगिता में विश्वव्यापी है। वे पूरी मानवता तथा हर युग के लिए है। बहुत ही महान जर्मन के विचारक बहुत ही उत्साह से कहते हैं कि मेरी मान्यता है कि मानव का अध्ययन करने में संसार के वेदों के समान महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं होता है। इस तरह का मानना है कि सभी तरह से वह व्यक्ति जो अपने को योग्य बनाना चाहता है, अपने पूर्वजों और अपने इतिहास के बारे में जानना चाहता है या अपना बौद्धिक विकास करना चाहता है, इतिहास के बारे में जानना चाहता है कि उसके लिए वैदिक साहित्य का अध्ययन करना बहुत ही जरुरी है। भारत, आज तक धर्म, विधि-विधान, परंपराएं और कानूनों में वेदों से ऊंचा किसी भी तरह की सत्ता को नहीं मानता है। वैदिक साहित्य में जो कुछ है वह अपनी उज्जवलता में सबसे अलग और अनूठा होता है, ठीक उसी तरह से जैसे पूरी मानवता की प्रगति के लिए दिव्य आलोक विकीर्ण करता ध्रुव तारा।

जिस तरह से वेद चार तरह के होते हैं, लेकिन पारंपरिक रूप से उन्हें त्रयी अथवा त्रय विद्या यानी कि तीन तरह के ज्ञान के नाम से जान सकते हैं, क्योंकि वे ज्ञान, भक्ति और कर्म पर विचार करते हैं तथा गद्य, पद्य तथा गीतों में होता ह। ऋग्वेद के अंदर ज्ञान के रास्ते, यजु्र्वेद में कर्म के रास्ते और सामवेद में भक्ति के रास्ते पर बहुत ही ज्यादा जोर दिया गया है। अथर्ववेद इन तीनों के मिश्रित तरीके का प्रतिनिधित्व करता है। इसलिए वेदों के निरपवाद रूप से त्रयम् ब्रह्ना सनातम् के नाम से भी जाना जाता है। ऐसा इस तरह का होना जरुरी भी हैं क्योंकि चौथा वेद अथर्ववेद अपेक्षयता बहुत ही बाद का है। ये चारों वेद मिलकर भारतीय धार्मिक, दार्शनिक तथा सांस्कृतिक व्यवस्था और अनुपालनों की नींव को बनाते हैं। भारतीय सभ्यता और संस्कृति सहस्त्रों सालों से पड़ने वाले समय के मजबूत थपेड़ों का मुकाबला करते हुए भी इसलिए जीवित रही हैं, क्योंकि वह वेदों के ज्ञान की पाषाण जैसी बहुत ही मजबूत नींव पर टिकी हुई है।

वेदों में कई बार यह भी निश्चित तरीके से घोषणा की गई है कि सच्चाई एक है, साधु व्यक्ति उसे अलग-अलग नामों से पुकारते हैं, भगवान तथा संसार को बनाने वाले परमात्मा भी एक है, लेकिन उसके आयाम कई है। वेदों के अलग-अलग देवता एक ही सच्चाई की अलग-अलग अभिव्यक्तियां हैं। देवताओं की यह तथाकथित बहुसंख्या वेदों की मुख्य शिक्षा को साफ तरीके से प्रतिबिंबित करती हैं, सभी रास्ते एक ही लक्ष्य की तरफ ले जाते हैं। सच्चाई या सत्य एक ही है और सभी उसको तलाश रहे हैं। व्यक्तिगत, व्यवहार, समय, जगह, नाम आदि तथाकथित अंतर को पैदा करते हैं। यह संसार उस भगवान (परमात्मा) के अंश के बारे में कहा गया है किः-

क्या था, क्या है और क्या होगा,
सब कुछ तो सिर्फ ॐ है।
तीनों कालों की सीमाएं से परे भी,
जो कुछ है, वह केवल ॐ शब्द है।।

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