वैदिक वास्तुकला के सिद्धान्त और उसकी जानकारियां

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वैदिक वास्तुकला के सिद्धान्त

मकान बनाते समय वैदिक वास्तुकला के सिद्धान्त को जानना जरूरी है। वैसे यह भारतीय भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं। वास्तु शास्त्र के सिद्धान्त बहुत ही बारीक अध्ययन और अनुभव के आधार पर बनाए गए हैं, इनमें पूजा, सूर्य, वायु ऊर्जा, चंद्रमा तथा अन्य ग्रहों का इस धरती पर बहुत ही ज्यादा विशेष असर पड़ता है।

बहुत ही प्राचीन वास्तु के उपदेशक आचार्य वैदिक ऋषि थे, वे मंत्र सृष्टा तो थे ही तथा इसके साथ वे तत्व के जानकार भी थे। बगैर आधुनिक भौतिक शास्त्रीय यंत्रों के उन्हें सूर्य की रोशनी के नियम के बारे में अविकल विवरणों की जानकारी थी। वास्तु निर्माण के लिए जो वास्तु मंडल अथवा ग्रह स्वामी की कल्पना की गई है, तथा वास्तु चक्र में जिन देवताओं को दिक-साम्मुख्य प्रतिष्ठिक किया गया है, वे सूरज की रोशनी जल के परिभाषिक सूचक थे। सूरज की पूजा करना, सूरज के गुण धार्मिक ग्रंथों के अंदर भी बताए गए हैं।




सूर्य जीवन का स्रोत क्यों

 सूरज के बारे में कहा गया है कि- भोड़सों तपन्नुदंति सर्वेषां प्राणानादायात, यानी कि इसका मतलब यह है कि सूर्य को सभी प्राणियों के जीवन का स्रोत माना जाता है। ऋग्वेद में भी इसके बारे में साफ तरीके से बताया गया है कि सूरज की रोशनी में सभी तरह की बीमारियों को समाप्त करने की बहुत ज्यादा ताकत होती है। इसलिए वास्तु शास्त्र में पूर्व दिशा को बहुत ही ज्यादा महत्व दिया गया है तथा धरती की तह को सूरज के उगने पर तथा सूरज के छिप जाने से परिकल्पित किया गया है। इसलिए वैदिक वास्तुकला में बताया गया है कि मकान को बनाने पर दिक् साम्मुख्य का स्थान सबसे ज्यादा उत्तम होता है ताकि पूर्व दिशा से उगने वाले भगवान सूरज की रोशनी मकान के सभी भागों में जा सके।

 दोपहर के समय में सूरज की रोशनी में रेडियोधर्मी किरणें रहती है, इसलिए मकान में इस रोशनी के जाने के लिए इस बात का बहुत ही ज्यादा विशेष ध्यान रखा जाता है कि दोपहर की पड़ने वाली सूरज की रोशनी शरीर पर कम असर (प्रभाव) डाले। दक्षिण पश्चिम दिशा के भाग के अनुपात में पूर्व दिशा तथा उत्तर दिशा के मकान के निर्माण की एवं सतह को नीचा रखने का विशेष मकसद सूरज की रोशनी या ऊर्जा को ज्यादा समय तक मकान में स्थित होने से हैं। सुबह के समय में सूरज की रोशनियों से अल्ट्रा वायलेट किरणों से विटामिन ’डी’ तथा ’एफ’ भी ज्यादा प्राप्त होता है।

वैदिक वास्तुकला के अनुसार मकान में पूर्व दिशा तथा उत्तर दिशा के भाग को ज्यादा खुला रखने के बारे में इसलिए कहा जाता है क्योंकि सुबह के समय में सूरज की रोशनियों को प्राप्त करने के लिए हमें मदद मिलती है। दक्षिण पश्चिम दिशा के हिस्से (भाग) में मकान को ज्यादा ऊंचा बनाने एवं मोटी दीवार के बनाने का एकमात्र मकसद यहीं है कि जब धरती सूरज के चारों तरफ चक्कर दक्षिण दिशा में लगाती है तो धरती एक महत्वपूर्ण कोणीय अवस्था में दिखाई देती है, इसलिए इस हिस्से में ज्यादा वजन के होने से संतुलन आता है तथा सूरज की गर्मी इस वाले भाग में ज्यादा होने की वजह से इसकी गर्मी या ताप से बचा जा सकता है तथा इस भाग में गर्मियों के दिनों में सर्दी तथा सर्दी के दिनों में गर्मियों का अहसास किया जा सकता है।

दक्षिण, पश्चिम मकान के भाग में पूर्व-उत्तर के अनुपात में छोटे तथा कम दरवाजे खिड़कियों को रखने के लिए कहा जाता है। वैदिक वास्तुकला के वैज्ञानिक आधार यह होता है कि गर्मियों के दिनों में इस भाग के कमरों में ठण्डक तथा सर्दियों में गर्मी का अहसास किया जा सकें।

दक्षिण-पूर्व (आग्नेय) दिशा में हमेशा ही रसोईघर को बनाने के लिए वास्तु शास्त्र में बार-बार कहा जाता है। इस भाग में पूर्व दिशा से सुबह के समय में विटामिन वाली सूरज की रोशनी का प्रवेश होता है तथा दक्षिण दिशा से अच्छी तथा शुद्ध हवा (वायु) आती है, क्योंकि धरती (पृथ्वी) सूरज का चक्कर दक्षिण दिशा की तरफ से लगाती है। इसलिए इस दिशा की अवस्था इस तरह से होती है कि मकान के इस हिस्से को अल्ट्रावायलेट किरणें, जो विटामिन ’डी’ तथा ’एफ’ वाली होती है, इससे ज्यादा समय तक ये विटामिन मिलते हैं। इससे रसोईघर में रखे जाने वाले खाद्य पदार्थ बहुत ही पवित्र रहते हैं।

उत्तर-पूर्व दिशा (ईशान दिशा) में हमेशा ही पूजा करने वाला कमरा अथवा आराधना करने के लिए कमरा बनाया जा सकता है। पूजा करते समय हमारे शरीर पर ज्यादा कपड़े नहीं होने चाहिए, जिससे कि सुबह के समय में सूरज की रोशनियों के माध्यम से हमारे शरीर को विटामिन ’डी’ स्वाभिक अवस्था में मिलते रहते हैं। उत्तर दिशा के भाग से धरती के चुम्बकीय ऊर्जा का अनुकूलन प्रभावशाली हमें प्राप्त होता है तथा इस भाग को सबसे ज्यादा शुद्ध या पवित्र माना जाता है, क्योंकि इस भाग में अंतरिक्ष से हमें बहुत ही ज्यादा अलौकिक ताकत प्राप्त होती है। यही वजह है कि मंदिरों के मुख्य गेट या दरवाजे भी इसी तरफ की दिशाओं में बनाए जाते हैं।

वैदिक वास्तुकला के जानकारों के आधार पर बायो इलेक्ट्रो मेग्नेटिक फील्ड वायुमंडल में बीस तरह का पाया जाता है। इनमें से मानव के शरीर के लिए चार तरह की बी. ई, एम, एफ, को ज्यादा लाभदायक बताया गया है। वास्तु में चुम्बकीय भाग को कुबेर (धन) की जगह को जाना जाता है, इसलिए यह जाना जाता है कि जब किसी व्यापारिक बातों एवं उसके परामर्श में हिस्सा लेना होता है तो यह उसके लिए सबसे अच्छा सुझाव होता है कि उत्तरी दिशा की तरफ व्यक्ति को अपना मुंह करके बैठना चाहिए। इसके पीछे वैज्ञानिक छिपी हुई गुप्त बात यह है कि उत्तरी भाग से जो चुम्बकीय ताकत हमें मिलती है, उससे हमारे दिमाग या मस्तिष्क की कोशिकाएं बहुत ही जल्दी सावधान हो जाती है और व्यक्ति की याददाश्त में और भी ज्यादा बढ़ोतरी कर देती है। वास्तुशास्त्र में यह भी कहा गया है कि उत्तरी दिशा की तरफ बैठने पर अपनी बैंक की चैक बुक को भी दाहिने तरफ रखना चाहिए।

वास्तु शास्त्र की सम्पूर्ण जानकारियां

  1. जीवन और वास्तुशास्त्र का संबंध
  2. जाने घर का सम्पूर्ण वास्तु शास्त्र
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  8. वास्तु का व्यक्ति के जीवन पर प्रभाव
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  10. युग तथा वैदिक धर्म
  11. भारतीय ज्योतिष शास्त्र
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