वैदिक वास्तु शास्त्र

Vedic Vastu Shastra in hindi

ऋग्वेद में वैदिक वास्तु शास्त्र (Vedic Vastu Shastra) का ज्ञान

ऋग्वेद को भारतीय साहित्य में सबसे ज्यादा पुराना ग्रंथ माना जाता है। उसमें स्थापत्य संबंधी अलग-अलग तरह की जानकारी मिलती है। उनसे यह मालूम हो जाता है कि ईसवी पूर्व द्वितीय सहस्राब्दी पहले भारतीय लोगों को मकान बनाने के बारे में बहुत ही अच्छी तरह की जानकारी थी तथा उनको वैदिक वास्तु शास्त्र (Vedic Vastu Shastra) के बारे भी अच्छा ज्ञान था। ऋग्वेद के अलावा यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद में तथा परवर्ती वैदिक साहित्य में इस तरह के उल्लेख देखने को मिल जाते हैं, जो कि स्थापत्य के अलग-अलग अंगों पर रोशनी ड़ालते हैं। अधिकतर ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में मकान बनाने के बारे में जो रूप मिलते हैं, उसके रीति-रिवाज भारत में बराबर चलते रहें।

वैदिक काल में मकानों के तीन मुख्य भाग थे। पहला भाग मकान का मुख्य गेट या दरवाजा था, जिसमें सामने का आंगन भी शामिल था। दूसरा भाग बैठक को माना जाता था, जिसके नाम सभा तथा बाद में आस्थान मंडप मिलते हैं। यहीं बैठक आने-जाने वाले मेहमानों के स्वागत के लिए इस्तेमाल की जाती थी। तीसरा भाग पत्नी सदन कहलाता था, जिसको अन्तःपुर भी कहा जाता था। आर्य लोग अग्नि आधान के लिए मकान में एक कमरा अथवा आच्छादित जगह को अग्निशाला के रूप में रखते थे। विहित श्रोत के कामों के लिए यह बहुत ही ज्यादा जरूरी समझा जाता था। बड़े प्रासादों में इस शुद्ध तथा पवित्र स्थान को भगवान या देवों की जगह माना जाता था। वैदिक काल के बाद भी इसका इस्तेमाल पूजा के कमरे के रूप में किया जाता रहा है। इससे यह पता चलता है कि वैदिक काल में भी  वैदिक वास्तु शास्त्र (Vedic Vastu Shastra) का ज्ञान लोगों को था।

वैदिक साहित्य से वैदिक वास्तु (Vedic Vastu Shastra) के बारे में यह पता चलता है कि वैदिक काल में मकान बनाने के कार्य में सादगी तथा सुरुचि थी। व्यक्तियों का जीवन बहुत ही सादा होता था। इसलिए रहने वाले मकानों में आडम्बर अथवा बिना वजह के दिखावे को जरूरी नहीं समझा जाता था। सौन्द्रर्य ब्रोध वैदिक आर्यों में मौजूद था, इसके बारे में ऋग्वेद तथा परवर्ती वैदिक साहित्य से मालूम हो जाता है।




ऋग्वेद (7, 33, 13) में मान तथा वशिष्ठ नामक दो ऋषियों की घड़े से उत्पत्ति की कथा के बारे में कहा गया है। अगस्त्य ऋषि की उत्पत्ति घड़े से हुई बताई गई है। बाद के वास्तु-शास्त्रकारों ने अगस्त्य ऋषि को वास्तु-विधा का गुरू माना है। मान का मतलब मापना या मापन होता है।

ऋग्वेद के अंदर कई जगहों पर वास्तोस्पति नामक देवता के बारे में कहा गया है। मकान को बनाने से पहले इस देवता का आवहान करना बहुत ही जरुरी होता है। एक जगह (8, 17, 14) पर वास्तोस्पति तथा इंद्र देवता को तथा अन्यत्र (5, 14, 8) वास्तोस्पति तथा त्वष्ट्रा को एक चतुर कारीगर का नाम दिया गया है।

किसी भी मकान को बनाते समय अधिकतर बांसों का तथा और दूसरी लकड़ियों का भी इस्तेमाल किया जाता था। ये वस्तुएं बहुत ही आसानी से नहीं मिल पाती थी। आच्छादन के लिए लकड़ी के अलावा घास-फूस तथा पत्तों का भी इस्तेमाल किया जाता था। इसके बाद फिर धीरे-धीरे ईंटों को मकान बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। ऋग्वेद में अश्वमयी तथा आयसी दुर्गों (किलों) के बारे में भी जानकारी मिलती है। इससे यह मालूम होता है कि दुर्गों के बनाने के लिए पत्थर तथा धातु के इस्तेमाल करने के बारे में ऋग्वेद के आर्यों को पहले से ही था।

ग्राम (गांव)-

इस तरह का शब्द ऋग्वेद तथा अन्य वैदिक साहित्य में बहुत ज्यादा मिल जाता है। ग्राम इस समय गांव का सूचक है। कुछ वैदिक गांव काफी दूर-दूर तक बसे हुए थे तथा रास्तों या सड़कों के द्वारा एक दूसरे से मिलते-जुलते थे। ग्राम अधिकतर खुले हुए जाने जाते हैं। गांव को बनाते समय या बसाते समय पवित्र पानी या जल और हवा (वायु) का बहुत ही ध्यान रखा जाता था। बड़े गांवों को महान गांव के नाम से जाना जाता था। हेवेल के अनुसार ये गांव आयताकार होते हैं तथा उनके चारों तरफ एक-एक गेट या दरवाजा भी होता था। कुछ विद्वानों का यह भी अनुमान है कि वैदिक गांवों के चारों तरफ एक लकड़ी की बाड़ बनाई जाती थी, जिस तरह से इसके बाद जैन बौद्ध के मंदिरों के चारों तरफ पाई जाती है। इस बाड़ के चारों तरफ एक या इससे ज्यादा द्वार भी पहले बनाए जाते थे। इन जानकारियों से सिद्ध हो जाता है कि उस समय के लोग वैदिक वास्तु कला (Vedic Vastu Shastra) में निपुण थे।

पुर-

इस शब्द का इस्तेमाल ऋग्वेद तथा परवर्ती वैदिक साहित्य में कई जगहों पर मिल जाता है। परवर्ती संस्कृत साहित्य में यह शब्द नगर के अर्थ में इस्तेमाल हुआ है। वैदिक साहित्य (Vedic Vastu) में पुर का इस्तेमाल दुर्ग अथवा प्रकार के लिए भी किया जाता था। ऋग्वेद में पुरों पर घेरा डालने तथा उनके विनष्ट करने के बारे में भी बताया गया है। इस तरह से यह महसूस होता है कि उस काल या समय में पुरों की संख्या बहुत ही ज्यादा रही होगी। शुरू में ये पुर मिट्टी के बनाएं जाते रहे होंगे।

यह भी जाना जाता है कि बताए गए दुर्ग अथवा गढ़ गांव के अंदर होते होंगे या फिर उसके आस-पास ही। पुरों के अंदर किसी भी तरह की बस्ती का ठीक तरह से मालूम नहीं चलता है। इन पुरों को बनाने के लिए बाढ़ तथा बाहरी हमलों से सुरक्षा के निमित्त भी होता था। पुरों के लिए एक जगह पर विशेषण के रूप में शारदी शब्द का इस्तेमाल होता था। ठंड़ के मौसम में बाहरी हमलों से पुर की सुरक्षा के लिए इनका विशेष रूप से इस्तेमाल किया जाता था।

ऋग्वेद में दीवारों वाले पुरों के बारे में भी बताया गया है। कई पुर देखने में आकार में बड़े पाए जाते थें। एक पुर के बारे में बताया गया है कि ऋग्वेद में उसे चौड़ा अथवा फैला हुआ भी कहा गया है। ऋग्वेद में पत्थरों के बने हुए पुरों के बारे में भी बताया गया है जो कि वैदिक वास्तु शास्त्र (Vedic Vastu Shastra) की ओर संकेत देता है। कुछ में धातु का भी इस्तेमाल होता था। बलुचिस्तान, सिंध तथा पंजाब में हड़प्पा-पूर्व दिशा तथा हड़प्पा युगीन कई इमारतें पाई गई है, जिनसे पत्थरों के इस्तेमाल का साफ तरीके से मालूम हुआ है। एक पर तो पशुओं से युक्त (गोमती) पुर के बारे में बताया गया है।

भारत में कई पुराने नगर तथा स्थलों पर किए गए उत्खन्नों से नगरों की सुरक्षा दीवारें सामने आई है। मध्य प्रदेश के सागर जिले में एरण नामक बहुत ही प्रसिद्ध ऐतिहासिक जगह पर खुदाई करने से लगभग 1900 ई. पू, में वहां प्राकारयुक्त नगर के बसने के बारे में भी प्रमाण मिले हैं। उस नगर को तीन तरफ से घेरती हुई सुरक्षा वाली दीवार काली पीली मजबूत मिट्टी की बनाई गई थी। चौथी तरफ बगैर नदी सुरक्षा पंक्ति का काम देती थी। प्राचीनतम सुरक्षा-दीवार लगभग तीन मीटर चौडी़ थी, बाद में उस दीवार की चौड़ाई 46.97 मीटर नापी गई। दीवार की ऊंचाई 6.41 मीटर पाई गई। इस दीवार से 16.47 मीटर की दूरी पर एक खाई थी, जिसमें बगैर नदी का पानी हमेशा भरा रहता था। इस खाई की चौड़ाई 36.60 मीटर तथा इसकी गहराई 5.49 मीटर नापी गई।

मध्य प्रदेश के अंतर्गत आने वाले खरगोन जिला में 1952 से 1957 तक खुदाई कराई गई। इनकी खुदाई करवाने पर ताम्राश्मयुगीन सभ्यता के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिली थी । यह सभ्यता वहां नर्मदा के दोनों तटों पर लगभग 1000 ई. पूर्व से 1500 ई. पूर्व तक विकसित होती रही। इस सभ्यता के लोग झोपड़ीनुमा मिट्टी के बने मकानों में निवास करते थे। इन मकानों के आकार चौकोर, गोल अथवा आयताकार होते थे। उनकी छत्ते बिल्कुल ही साफ होती थी। दीवारें तथा छतें भी घास की मिली हुई सख्त मिट्टी की बनी हुई होती थी। इन छतों को रोकने के लिए बांसों को इस्तेमाल में लाया जाता था। दीवारों को सफेद मिट्टी अथवा चूने से पोत दिया जाता था। इन मकानों के फर्शों को बनाने के लिए चूना और पीली मिट्टी का प्रयोग किया जाता था तथा मकानों में चूल्हों पर भी चूने की पुताई की जाती थी।




मकान (ग्रह)-

ऋग्वेद में ग्रह शब्द को रहने के निवास या फिर घर के अर्थ में प्रयोग किया गया है। अथर्ववेद तथा पंड़ितों के ग्रन्थों में भी इसी तरह के शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। दम, पस्त्या तथा हर्म्य शब्दों का भी इस्तेमाल मकान तथा उससे मिलते-जुलते पारिवारिक संपत्ति के अर्थ से हुआ है।

पुराने समय में कुछ मकानों में भी बहुत से कमरे होते थे। मकानों की सुरक्षा के लिए उन कमरों को बंद किया जाता था। मकानों या घरों को साफ तथा सुंदर बनाने का विचार वैदिक काल से मिलता था जो कि Vedic Vastu का प्रमाण है। अथर्ववेद में एक जगह पर मकान की उपमा अंलकृत हथिनी से की गई है। हथिनी की पीठ की तरह ही पुराने मकानों की छतें लुढकमा मानी जाती थी। इन मकानों के अंदर तथा बाहर की दीवारों पर अलग-अलग तरह की बहुत सुंदर तस्वीरों को सजाया जाता था।

ऋग्वेद में रहने वाले मकानों की जगह तथा उनके अलग-अलग उपांगों के लिए लगभग तीस शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। ’छरदी’ शब्द का इस्तेमाल कई जगहों पर मिलता है, जिसका मतलब मकान की छत से ही होता है।

पुराने समय में कुछ मकान इतने बड़े बनाए जाते थे कि उनमें रहने वाले बड़े मिले-जुले परिवार के व्यक्ति रह सकते थे। कई मकान कई मंजिलों के भी बने होते थे। मुख्य मकान से जुड़ा अथवा उसके पास के पशुओं के लिए एक बाड़ा (पशुओं के रहने की जगह) भी होता था। कभी-कभी मकान के चौड़े-आंगन में घरेलू पशुओं की भी जगह होती थी। मकान का एक हिस्सा (भाग) अग्नि (आग) के लिए सुरक्षित रखा जाता था। अथर्ववेद में पत्नीनां सदन के बारे में भी बताया गया है, जिससे मकानों में स्त्रियों के विशेष कमरों का बोध होता है।

पुराने समय में मकानों को बनाने के लिए अधिकतर मिट्टी, पत्थर, लकड़ी तथा बांसों का भी इस्तेमाल किया जाता था। मकानों की नींव बहुत ही मजबूत बनाई जाती थी। दीवारों के ऊपर सबसे पहले साफ तथा कोरे बांस को टेढ़ा-मेढ़ा बिछा दिया जाता था। फिर उनके ऊपर कांटे लगे हुए या चीरे हुए बांसों को रखा जाता था। इसके बाद रस्सियों से उन बांसों को कसकर बांध दिया जाता था, जिससे वे छत पर भी बिछाने पर किसी तरह से हिल नहीं सकें। इन बांसों की बिछावन को आयाम के नाम से भी जाना जाता था। इन बिछावन पर तृण तथा पत्तों की सतह को बिछाया जाता है। इन सतहों को वर्हण भी कहा जाता था। इस तरह की बिछावन के ऊपर बांस की खपच्चियों की सतह को लगाया जाता था। उनको भी बहुत ही मजबूती से बांधते थे। इस तरह से बांस की बनाई हुई छत तैयार हो जाती थी। मकानों की बड़ी छतों को संभालने के लिए नीचे की तरफ मोटी थूनियां अथवा बल्लियों (लकड़ी) को लगाया जाता था।

सरपत, कांस आदि की नांव या पतवार से छाए गए मकान आज तक भारत के अलग-अलग हिस्सों (भागों) में बनाए जाते हैं।

Vedic Vastu Shastra in English

वास्तु शास्त्र की सम्पूर्ण जानकारियां

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  4. वास्तु शास्त्र के आधारभूत नियम
  5. वास्तु शास्त्र के प्रमुख सिद्धान्त
  6. अंक एवं यंत्र वास्तु शास्त्र
  7. विभिन्न स्थान हेतु वास्तु शास्त्र के नियम एवं निदान
  8. वास्तु का व्यक्ति के जीवन पर प्रभाव
  9. हिन्दू पंचांग अथार्त हिन्दू कैलेंडर क्या है?
  10. युग तथा वैदिक धर्म
  11. भारतीय ज्योतिष शास्त्र
  12. भवनों के लिए वास्तुकला

(This content has been written by Super Thirty India Group)

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