वास्तु शास्त्र का परिचय

What is Vastu Shastra?

वास्तु शास्त्र क्या है? (What is Vastu Shastra?)

मानव को अपने जीवन में जितनी आवश्यकता पेट भरने के लिए खाने-पानी की होती है उतनी ही आवश्यकता उसे रहने के लिए आवास अर्थात मकान की भी होती है। आवास प्रत्येक व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकताओं में से एक है। सभी लोगों के मन में यह इच्छा होती है कि उसका भी अपना मकान हों जिसमें वह अपने परिवार के साथ रहकर सुखी जीवन व्यतीत कर सके। मकान को ठीक प्रकार से बनाने के लिए हमें यदि वास्तु का ज्ञान हो तो वह सोने पे सुहागा  होता है। वास्तु के बारे में जानने के लिए हमें सबसे पहले यह जानना पड़ेगा कि वास्तु शास्त्र क्या है (What is Vastu Shastra?)।

प्रत्येक व्यक्ति का एक ही सपना होता है कि उसका अपना मकान हर प्रकार से अच्छा एवं सुखों को देने वाला हो। लेकिन जो मकान या भवन हम अपनी इच्छा से बनवाते हैं उसका निर्माण (Building construction) शास्त्रीय विधि से कराना चाहिए। भवन निर्माण कराते समय वास्तु शास्त्र के नियमों का पालन करना आवश्यक होता है। वास्तु नियमों का पालन किए बिना बनाया गया भवन या मकान उतना लाभप्रद नहीं होता जिसकी इच्छा मनुष्य करता है और वास्तु नियमों के विपरीत बनाए गए भवन या मकान में रहने से व्यक्ति को अनेकों प्रकार की परेशानियों एवं दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ता है। इसलिए हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों ने अपने अथक परिश्रम और अनुभव के आधार पर वास्तु विज्ञान की रचना की थी। इसमें उन्होंने प्रत्येक मनुष्य को निवास स्थान पर विभिन्न नियम पालन करने का निर्देश किया था ताकि प्रकृति और मनुष्य का आपसी सामंजस्य स्थापित किया जा सके क्योंकि यदि प्रकृति और मनुष्य के सामंजस्य में अंसुतलन होगा तो मनुष्य को विभिन्न प्रकार के कष्टों एवं परेशानियों का सामना करना होगा। मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्य स्थापित करने की कला को ही वास्तु शास्त्र (Vastu Shastra) कहते हैं।




पृथ्वी और उसके विशिष्ट आयाम (The earth and its extent)

परमात्मा की बनाई सृष्टि में हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण है हमारा सौरमण्डल (Solar System)। हमारे सौरमण्डल का केंद्र सूर्य तथा सूर्य के चारों ओर परिभ्रमण स्वरूप इस पर क्या स्थायी व सार्वकालिक प्रभाव पड़े यह सब तो निरंतर अनुसंधान द्वारा जानकारी में आते रहेंगे।

किसी भी वस्तु के बारे में जानने एवं समझने की प्रवृत्ति मानव में जन्म से ही रही है और इस प्रवृत्ति का परिणाम है कि आज दुनिया में अनेक अविष्कार एवं चीजों की खोज हुई है। यह मानव जिज्ञासा का ही आधार है कि वह पाषाण युग से परमाणु युग तक का सफर कर रहा है। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि सत्रहवीं शताब्दी से लेकर आज तक जितनी भी खोज हुई है वे मानव जीवन के लिए विशेष महत्वपूर्ण हैं। लेकिन यह सब वैदिक ग्रंथों में वर्णित तथ्यों की मात्र पुष्टि ही करते प्रतीत होते हैं। उदाहरण के लिए कुछ काल पूर्ण तक पश्चिमी सभ्यता पृथ्वी को थाली के आकार का मानती थी और उसके अनुसार सूर्य पृथ्वी का चक्कर लगाता है। इनके मध्य आकर्षण, पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण, चुम्बकत्व व उनके आकर्षण अनाकर्षण, दिशा-निर्धारण, गतियों के विषय में आधुनिक विज्ञान आश्वस्त नहीं था। अणुओं, परमाणुओं के संयोजन-वियोजन के विषय में तो बहुत बाद में जाना। आकर्षण, गुरुत्वाकर्षण, चुम्बकत्व तथा गतियां, इन सबकी परंपरा कितनी निर्भरता या अंतर्निहित प्रभावित करने की क्षमता है यह तो आज भी जानने की आवश्यकता है।

पृथ्वी एक ऐसे चुम्बकीय पिण्ड के रूप में कार्य कर रही है जो चुम्बकीय प्रभाव को उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव की ओर प्रवाहित कर रहा है साथ ही गुरूत्वाकर्षण से भी पृथ्वी का कोई भी भाग मुक्त नहीं है। जिसका व्यापक प्रभाव प्राणी व अप्राणी जगत पर पड़ रहा है। पृथ्वी का अपनी धुरी पर 23,1/2 डिग्री अंशों पर झुका रहना, घूर्णन गति के साथ दीर्घवृताकार कक्ष में सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाना, सूर्य का उत्तरायण व दक्षिणायन होना। यह सब मानव सृष्टि से युक्त पृथ्वी को विशिष्टता प्रदान करता है। इस सृष्टि के कुछ नियमों का पता निम्न मंत्र से चलता है।

त्वं सोम पितृभिः संविदानोऽनुद्यावा पृथिवी आततंथ।

Twam Som Pitribhih Sanvidanoanudhava Prithivi Atatanth”

अर्थात चन्द्र लोक पृथ्वी के चारों ओर अपने निश्चित परिपथ पर घूमता है तथा कभी-कभी सूर्य व पृथ्वी के बीच में भी आ जाता है। सूर्य स्वयं प्रकाश युक्त तथा पृथ्वी स्वयं प्रकाश रहित लोक है लेकिन सूर्य व अन्य लोक अपनी-अपनी कक्षा में सदैव भ्रमण करते हैं।

भारतीय ऋषियों (Indian sages) ने वेद ज्ञान के आधार पर मानव जीवन के कल्याण के लिए शोध एवं चिंतन द्वारा चारों उपवेद- ऋग्वेद से आयुर्वेद, अथर्ववेद से धनुर्वेद, अथर्ववेद से अर्थवेद तथा सामवेद से गंधर्ववेद की रचना की। वैदिक वांगमय की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि जो भी मानव जीवन के कल्याण के लिए कार्य किया जाता है उसे धर्म का अंग बनाकर जीवन शैली (Lifestyle) में ढाल दिया। चारों उपवेद के बाद जो सर्वाधिक उपयोगी ग्रंथ ऋषियों ने रचा और जन-जन की जीवन शैली का अंग बना दिया वह वास्तु शास्त्र है। इसके बाद मनुस्मृति व छः दर्शन- संख्या, न्याय, योग, वैषेशिक, उत्तर मीमांसा व पूर्व मीमांसा लोक कल्याण के लिए ग्रंथ मानव सृजन की पराकाष्ठा ही हैं।

वास्तु शास्त्र से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति

(Getting religion, artha, kam, moksha by vaastu shaastra)

वास्तु शास्त्र ज्ञान-विज्ञान (Vastu Shastra Science) व क्रियात्मक कार्य की वह विद्या है जो मानव को सुख शांति व समृद्धता प्रदान करने के साथ-साथ, जीवत्मा के चारों पुरूषार्थ धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त करने में सहयोग प्रदान करती है।

धर्म- धारियति इति धर्मः अर्थात जीवन के किसी भी क्षेत्र में जो भी अच्छा धारण करने योग्य है वह धर्म है।

अर्थ- धर्मानुसार अर्थ की प्राप्ति ही मनुष्य का लक्ष्य होना चाहिए।

काम- धर्म का अनुसरण करते हुए अर्थ की प्राप्ति के बाद अपनी कामनाओं की पूर्ति करना ही काम है।

मोक्ष- जब मनुष्य धर्मानुसार अर्थ व काम की प्राप्ति कर लेता है तब उसे परम शांति मोक्ष प्राप्त करने का हर संभव प्रयत्न करना चाहिए।

चतुर्वर्ग फल प्राप्तिस्सललोकश्च भवेद ध्रुवम्।

शिल्यशास्त्र परिज्ञानान्मर्त्योऽपि सुरतां ब्रजेत।।

Chaturvarga Phala Praptislalokshwa Bhaved Dhruwam.

        Shilyashastra Parigyananmatyorapi Suranta Brajet

अर्थात शिल्पशास्त्र (Craft) के सम्पूर्ण ज्ञान से मानव के चारों परम पुरूषार्थ धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। यह ध्रुव की तरह अटल सत्य है।




वेद में आदर्श भवन की आवश्यकताएं

वास्तु शास्त्र जीवन के प्रत्येक क्षेत्र की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति एवं उसके नियम व मर्यादाएं निर्धारित करता है। वेदों में निर्देशित किया है कि मनुष्य की क्या आवश्यताएं हैं और भवन का निर्माण किस प्रकार का हो। अथर्ववेद में लिखा है-

हविर्धानमग्निशालं पत्नीनां सदनं सदः।

सदो देवानामसि देवि शाले।।

Havirdhanamagnishalam Patninam Sadanam Sadah.

Sado devanamasi Devi Shale

अर्थात आदर्श भवन में हवन करने के पदार्थ एवं हवन करने का स्थान होना चाहिए। स्त्रियों के रहने का स्थान भी रखना चाहिए जिससे उनकी मर्यादा बनी रहे। पुरूषों के रहने का स्थान, बैठने का स्थान, मेल-मिलाप एवं व्यवहार का स्थान तथा सभागार होना चाहिए। स्नान, भोजन, पूजा घर का भी अलग-अलग कक्ष होना चाहिए। इस प्रकार दिव्य व आरामदायकशाला होनी चाहिए।

अथर्ववेद (Atharvaveda) में वैदिक गृह निर्माण के निर्देश के मंत्र वास्तुशास्त्र की आधार शिला हैं।

वास्तु के मूलभूत सिद्धांत- यजुर्वेद में बताया गया है कि-

किं वा वपनं महत्।।

Kim Va Vapanam Mahatta

 

अर्थात कौन सा क्षेत्र बड़ा है तथा किस क्षेत्र में स्थूल पदार्थ रखने का स्थान है।

इसके उत्तर में अगले मंत्र में कहा गया है किः-

भूमिरावपनं महत्।।

“Bhumiravapanam mahatt”

अर्थात पृथ्वी साकार वस्तुओं को रखने का स्थान है तथा बीज बोने का बड़ा खेत या निर्माण स्थान है।

मूलरूप से वास्तु व प्रकृति स्थूल होने से एक ही है तथा प्रकृति सत, रज व तम तीनों गुणों के संघात से बनी है। प्रलयावस्था के बाद जब असृजन की स्थिति होती है तब सत-रज व तम साम्यावस्था में होते हैं। सृजन की स्थिति में इन तीनों गुणों में क्रियाएं होने से प्रकृति के पंचमहाभूत क्रमशः आकाश, वायु, अग्नि, जल व पृथ्वी का निर्माण मूल तत्वों के रूप में होता है। इन्हीं पंचमहाभूतों से सृष्टि की अन्य सृजनाओं का निर्माण हुआ।

वास्तु का मूलभूत सिद्धांत है कि प्रकृति के स्थूल व सूक्ष्म प्रभावों को मानव मात्र के अनुकूल उपयोग में लेना। कोई भी निर्माण कार्य इस प्रकार हो कि प्रकृति के स्थूल व सूक्ष्म प्रभाव उसको उपयोग करने वाले की दैहिक, भौतिक व आध्यात्मिक उन्नति में सहायक बनें अर्थात जो भी निर्माण कार्य हो पंच तत्वों के अनुकूल हो, उनके प्रतिकूल न हो जिससे मानव मात्र की सहज ही विचार शक्ति व कार्य शक्ति संतुलित रूप से कार्य करेगी। अन्यथा विचार व कार्य शक्तियों में असंतुलन हो कर मनुष्य के प्रत्येक क्षेत्र में विषमताएं व जटिलताएं उत्पन्न हो जाएगी क्योंकि मनुष्य शरीर भी एक परमात्माकृत वास्तु ही है। मानव शरीर भी पंच तत्वों से निर्मित एक विलक्षण व अदभुत रचना है जिसमें परमात्मा मे असीम क्षमताओं को स्थान दिया और मानव ने इन्हीं क्षमताओं का उपयोग करते हुए किया वास्तु शास्त्र का निर्माण।

वास्तुशास्त्र का अर्थ

(Meaning of Vaastu shaastra)

सामान्यतः वास्तु शास्त्र क्या है यह जानने के लिए सबसे पहले यह जनना होगा कि वास्तु का अर्थ क्या है और (मकान) निर्माण (Building Construction) में इसका क्या उपयोग है। वस्तुतः वास्तु शब्द ‘वस्तु’ से बना है। वस्तु का अर्थ ‘जो है’ अथवा ‘जिसकी सत्ता है’ वही वस्तु है एवं वस्तु से संबंधित शास्त्र को ही वास्तु शास्त्र कहा जाता है।

वास्तुशास्त्र के अंतर्गत सम्पूर्ण राष्ट्र एवं नगरों की निर्माण योजना से लेकर छोटे से छोटे भवनों को और उसमें रखी जाने वाली वस्तुओं तक की योजना सम्मिलित हैं परंतु सामान्यतः इसे भवन निर्माण करने की कला से जोड़ दिया जाता है।

एक अन्य मत के अनुसार ‘वास्तु’ ‘वस’ शब्द से बना है। ‘वस’ का अर्थ है वास करना। ‘वास्तु’ मात्र भवन निर्माण कला से ही संबंधित नहीं है। अपितु इसका क्षेत्र अत्यंत विशाल एवं विस्तृत है। वास्तुशास्त्र कोई आधुनिक विषय नहीं है बल्कि इसका महत्व युगों-युगों से अपनाया जा रहा है।

वास्तु का वर्त्तमान समय में चलन केवल मानव आवास तक ही सीमित रह गया है परंतु वास्तु शास्त्र का उद्देश्य या क्षेत्र जो कि स्थापत्य भी कहलाता है, का विस्तार मंदिरों के निर्माण, मूर्ति, नहरों, सड़कों, आवास योजनाओं आदि का निर्माण करना ही नहीं बल्कि उससे कहीं आगे है। अतः हम यह कह सकते हैं कि वास्तुशास्त्र के सिद्धांतों के अलावा अन्य कोई विद्या यह निश्चित नहीं कर सकती कि भवन का निर्माण सही हुआ है या नहीं।




यदि कोई भी निर्माण कार्य वास्तु नियमों के विपरीत हुआ है तो वहां काम करने वाले, निवास करने वाले व्यक्तियों को व्यर्थ परेशानियों एवं मानसिक अशांति का सामना करना पड़ता है। इसके विपरीत भवन निर्माण में वास्तुनियमों का पालन प्रयोग किया जाए तो सभी दैविक शक्ति उन स्थानों पर कार्य करने वालों या निवास करने वालों को शुभ फल प्रदान करती है। प्राचीन समय में भवन निर्माण मात्र एक कला ही है वरना एक पवित्र एवं धार्मिक संस्कार तथा जीवन तत्व माना जाता था।

भारतीय वास्तु में सूर्य का महत्व

(Importance of the sun in Indian ‘Vaastu’)

भारत में सूर्य को सर्वाधिक महत्व दिया गया है। भारतीय धार्मिक प्रावधानों में वैदिक काल से ही सूर्य की पूजा एवं उपासना करने का विधान चला आ रहा है। प्राचीन काल से ही सुबह उठाकर सूर्य की आराधना करने की परंपरा चली आ रही है। वास्तु शास्त्र के सिद्धांतों का निर्धारण सूर्य की स्थिति और ब्रह्माण्ड पर उसके पड़ने वाले प्रभाव को ध्यान में रखकर ही किया गया है। वास्तु सिद्धांतों में सूर्य के प्रकाश और उसके ताप का महत्वपूर्ण स्थान है।

वास्तु शास्त्र के सिद्धांतों को इस प्रकार बनाया गया है कि प्राकृतिक स्रोतों द्वारा उपलब्ध ऊर्जा का सदुपयोग किया जा सके, वास्तु शास्त्र में प्रकृति से सामंजस्य स्थापित करने का पूर्ण प्रयास किया गया है ताकि इनके अनुरूप भवन बनाकर उसमें रहने वालों को उत्तम स्वास्थ्य, सुख एवं शांति प्राप्त हो सके।

पृथ्वी पर सूर्य को सभी ग्रहों में सर्वाधिक महत्ता दी जाती है क्योंकि सूर्य के प्रकाश से ही पृथ्वी पर मनुष्य एवं वनस्पतियों का जीवन चक्र प्रभावित होता है। सूर्य ही समस्त संसार को प्रकाश एवं ऊष्णता प्रदान करता है। सूर्य की गर्मी से ही पृथ्वी पर जीवन संभव है। सूर्य का प्रभाव एवं ताप का प्रभाव व्यक्ति के जीवन को क्षण प्रतिक्षण प्रभावित करता है। सूर्य से ऊर्जा प्राप्त करने की दृष्टि से दिशाओं का भी विशेष महत्व होता है।

वास्तु सिद्धांतों के अनुसार भवन का निर्माण इस प्रकार करना चाहिए कि जिससे सूर्य की जीवनदायक किरणों के प्रभाव में कोई भी बाधा न उत्पन्न हो। वास्तुशास्त्र का मुख्य नियम यह है कि भवन का दक्षिण वाला हिस्सा उत्तर वाले की अपेक्षा ऊंचा होना चाहिए। इसी संदर्भ में दूसरा नियम यह है कि पूर्वी भाग पश्चिमी भाग से नीचा रहना चाहिए। इसी तरह पूर्व एवं उत्तर पूर्व की दिशा में अधिक खुली जगह होनी चाहिए ताकि प्रातः सूर्य की किरणों का प्रभाव भवन पर पड़े और उसमें रहने वालों को उसका लाभ मिल सके।

वास्तु एवं चुम्वकीय क्षेत्र

(Vaastu and magnetic field)

वास्तु का दूसरा प्रभावशाली कारक चुम्बकीय क्षेत्र (Magnetic field) है। पृथ्वी पर चुम्बकीय क्षेत्र उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव की ओर प्रवाहित होता है। मनुष्य का शरीर भी चुम्बकीय उत्तरी ध्रुव की तरह कार्य करता है। इसलिए वास्तुशास्त्र में इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि चुम्बकीय तरंगों के प्रभाव में किसी भी प्रकार की बाधा न उत्पन्न हो क्योंकि यदि मनुष्य की शारीरिक ऊर्जा और निवास स्थान में प्रवाहित होने वाली चुम्बकीय तरंगों का संतुलन ठीक नहीं होगा तो इसका परिणाम विपरीत रूप से मनुष्य पर पड़ेगा जिससे उसे अनेक प्रकार की समस्याएं उत्पन्न होगीं।

उत्तरी-पश्चिमी चुम्बकीय ध्रुव की स्थिति भूखंड के सामने की दीवार या मार्ग से समानांतर या लम्बवत ही होनी चाहिए और इधर-उधर नहीं होनी चाहिए। भूखंड का उत्तरी-दक्षिणी चुम्बकीय ध्रुव 90 डिग्री अंश से अधिक नहीं रहना चाहिए अन्यथा उत्तरी-दक्षिणी चुम्बकीय ध्रुव में बाधा उत्पन्न होगी यानि ऊर्जा का चक्र पूरा नहीं होगा जिसका अशुभ फल वहां निवास करने वाले प्रत्येक प्राणी को भुगतना होगा। इसीलिए चुम्बकीय तरंगों के निर्बाध प्रवाह के लिए वास्तुशास्त्र का मुख्य नियम यह है कि सोते समय सिर दक्षिण एवं पैर उत्तर दिशा की ओर रहने चाहिए। यदि सिर उत्तर दिशा में करके सोया जाए तो व्यक्ति अनिद्रा, तनाव आदि समस्याओं का शिकार हो सकता है।

वास्तु और प्रकृति

(Vaastu and nature)

इस ब्रह्माण्ड (The universe) की रचना पंचतत्वों से हुई है। यह पांच तत्व क्रमशः पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु और आकाश है। ये पांचों तत्व ही प्रकृति हैं। इनका वास्तविक संतुलन ही प्राकृतिक संतुलन कहलाता है। प्राकृतिक असंतुलन के कारण ही ऋतुओं के आगमन और समयावधि में परिवर्तन होता रहता है। गर्मियों में भीषणत्तम गर्मी, सर्दियों में अत्युधिक सर्दी एवं वर्षा में अतिवष्टि यह सब इन्हीं पंचतत्वों के असंतुलन का ही परिणाम है।

भवन-निर्माण (Building construction) में इन्हीं पांच तत्वों का उचित संतुलन ही उसमें निवास करने वाले मनुष्य के जीवन में सुख एवं मानसिक शांति की वृद्धि करता है। यदि भवन-निर्माण में इन पांच तत्वों का संतुलन उचित प्रकार से नहीं किया गया होगा तो निश्चित ही ऐसे भवन में निवास करने वाले मनुष्यों का जीवन अशांत एवं समस्याओं से युक्त होगा।

इसे इस प्रकार भी समझा जा सकता है कि जैसे मनुष्य का शरीर भी इन्हीं पांच तत्वों से मिलकर बना है। जब मनुष्य अनेक प्रकार के रोग से ग्रस्त हो जाता है तो मकान का वातावरण भी रोगग्रस्त हो जाता है और उसका प्रभाव उस मकान में निवास करने वाले मनुष्यों पर पड़ता है जिससे उनके व्यक्तिगत जीवन में अनेकों प्रकार की परेशानियां उत्पन्न हो जाती है।

जिस प्रकार शरीर में रोग उत्पन्न हो जाने पर उसके उपचार के लिए दवाइयों, ऑप्रेशन चिकित्सा आदि की सहायता ली जाती है, ठीक उसी प्रकार भवन के दूषित वातावरण को शुद्ध करने के लिए और पांच तत्वों का उचित संतुलन बनाने के लिए वास्तुदोष निवारण कराना आवश्यक हो जाता है।



वास्तु से हमारा तात्पर्य है, नियमों का पालन करना। नियमों का पूर्णतया पालन करने से मनुष्य भाग्य के विपरीत समस्त सुख-समृद्धि प्राप्त कर सकता है क्योंकि मनुष्य के भाग्य में परमात्मा ने जो कुछ भी लिखा है वह तो उसे भोगना ही पड़ता है परंतु वास्तु के नियमों का पालन करने से भाग्य के दोषों को काफी हद तक कम किया जा सकता है क्योंकि यदि भाग्य निर्बल है और वास्तुदोष भी है तो सफलता मिलनी असंभव है। यदि वास्तुदोष (Vastu defect) दूर कर लिया जाए तो प्रयास काफी सफल हो सकते हैं जबकि भाग्य नहीं बदला जा सकता है अतः मनुष्य को वास्तु नियमों का पालन अवश्य ही करना चाहिए।

वास्तु शास्त्र की सम्पूर्ण जानकारियां

  1. जीवन और वास्तुशास्त्र का संबंध
  2. जाने घर का सम्पूर्ण वास्तु शास्त्र
  3. घर, ऑफिस, धन, शिक्षा, स्वास्थ्य, संबंध और शादी के लिए हिंदी में वास्तु शास्त्र टिप्स हिंदी में
  4. वास्तु शास्त्र के आधारभूत नियम
  5. वास्तु शास्त्र के प्रमुख सिद्धान्त
  6. अंक एवं यंत्र वास्तु शास्त्र
  7. विभिन्न स्थान हेतु वास्तु शास्त्र के नियम एवं निदान
  8. वास्तु का व्यक्ति के जीवन पर प्रभाव
  9. हिन्दू पंचांग अथार्त हिन्दू कैलेंडर क्या है?
  10. युग तथा वैदिक धर्म
  11. भारतीय ज्योतिष शास्त्र
  12. भवनों के लिए वास्तुकला

(This content has been written by Super Thirty India Group)

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