युग तथा वैदिक धर्म

युग तथा वैदिक धर्म के बारे में जानकारियां।

संसार के सभी युगों का उनके क्रम के अनुसार ही निम्नलिखित तरह से उल्लेख किया गया है जैसे-

कृतयुग (सतयुग)-

शुद्धता तथा शांति का काल या समय, यह युग लगभग 1,728000 सालों तक रहा। इस युग में व्यक्तियों की उम्र लंबी मानी जाती थी और आत्म-साक्षात्कार की क्रिया नारायण (भगवान) पर ध्यान लगाने की थी (सागर को नाराह भी कहा जाता है, क्योंकि उनको मनुष्य के द्वारा पैदा किया गया था और वह उनके पहले रहने का स्थान आयन था, इसलिए उनको नारायण नाम दिया गया था)।

त्रेतायुग-

त्रेता का काल या युग लगभग 1,296000 सालों तक रहा था। इस युग में व्यक्तियों के आध्यात्मिक स्वभाव और उनकी उम्र में पहले से भी कमी आई चुकी थी। इस युग में आत्मसाक्षात्कार की क्रिया कर्मों के कांड के आधार पर त्याग करनी थी।

द्वापरयुग-

द्वापरयुग लगभग 8,64000 सालों तक चला। इस युग में मनुष्य आत्मसाक्षात्कार के लिए निर्धारित की गई क्रिया के आधार पर मंदिरों में प्रचलित पूजा करता थे लेकिन उसका व्यवहार अब तक धार्मिक कार्यों में और भी ज्यादा कम होता चला गया था।


कलयुग-

जो वर्तमान में चल रहा है उसे ही कलयुग कहा जाता है। यह युग सिर्फ 4,32000 सालों तक ही चल पाएगा। इसकी शुरुवात लगभग 5000 सालों पहले हुई थी। इस युग में लोगों की उम्र कम होती है। वे आध्यात्मिक विषयों या साक्षात्कार के प्रति किसी भी तरह का कोई लगाव नहीं रखते हैं, इसी वजह से वेदों को चार हिस्सों (भागों) में बांटा गया है तथा इनको लिखित रूप भी दिया गया तथा पढ़े-लिखे व्यक्तियों को सौंपा गया, जिन्होने उसके बारे में ज्ञान अपने अलग-अलग शिष्यों को दिया। इस तरह से अलग-अलग वेदों की मिलती-जुलती शाखा बनाई गई।

पुराने इतिहासकारों के मतानुसार ईसा-मसीह से 2000 साल पहले, आर्य रूस के किसी दक्षिण के भाग से अपने वैदिक धर्म के अनुष्ठानों और अपनी परम्परा के साथ ही भारत देश में आए थे। जो अब पहले की तरह प्रामाणिकता नहीं रखता है, क्योंकि सिंधु घाटी की सभ्यता (जिस पर आर्यों ने हमला कर दिया था, इस तरह का माना जाता है) 3500 से 2500 ईसा पूर्व वहां पर बसी। वहां के दो मुख्य नगर हड़प्पा तथा मोहनजोदडों में पाए जाने वाले पुरातत्व शास्त्रों से यह मालूम चलता है कि हिंदूधर्म में इसके बाद में विकसित होने वाले कई तरह के पहलू शुरू की सिंधु घाटी सभ्यता के अंग माने जाते हैं। सिंधु घाटी में ध्यान की मुद्रा में बैठते हुए योगियों, भगवान शिव से संबंधित मूर्तियों जैसी वस्तुओं के अलावा यह प्रमाण भी मिलता है कि वहां के रोजाना के जीवन में मंदिर पूजा मुख्य भूमिका मानी जाती थी। इसी तरह से वेदों में भी उस समय के व्यक्तियों के लिए महानतम आध्यात्मिक प्रगति के तरीके निर्धारित किए गए थें।

अलग-अलग तरह की भाषाओं को बोलने वाली जातियों के बारे में अथर्ववेद में बताया गया है तथा वैदिक धर्म दूसरे रास्तों को भी स्वीकार करता है। तभी तो वैदिक धर्म ने दूसरे धर्मों को समाप्त करने की न कभी कोशिश की है और न ही करेगा। अपने दृष्टिकोण में वह बहुत ज्यादा सांसारिक व्यापक है। वैदिक संस्कृति के आज तक जीवित रहने का प्रतीक इस तरह से हैं- सर्वे भवंतु सुखिनः यानी कि संसार के सभी व्यक्तियों को सुख की प्राप्ति हों। इस तरह की प्रार्थना आज भी गाई जाती है। वेदों का सबसे ज्यादा प्रिय नियम विश्व-स्तर पर भिन्नता में एकता है।

हमारी धरती मां के प्रति संसार बहुत ही ज्यादा ऋणी है। जमीन के किसी भी देश की एक भी जाति इस तरह की नहीं है, जिनके प्रति संसार इतना ऋणी हो, जितना कि धैर्य रखने वाला हिंदू विनम्र हिंदू के प्रति यानी कि प्राचीन भारतीय के प्रति। प्राचीन और आधुनिक समय में राष्ट्रीय जीवन के बढ़ते हुए ज्वार के द्वारा महान सत्य तथा ताकत (शक्ति) के जिन बीजों को बोए गए वे हमेशा ही युद्ध में बहुत ही भयानक शोर मचाने वाले तुरहियों के माध्यम से दूसरी जमीनों पर गिरे। सभी तरह के विचार रक्तरंजित होने पर ही आगे बढ़ पाया। दूसरे देशों ने भी मुख्य रूप से यही ज्ञान दिया, लेकिन भारत ने हजारों सालों तक भी शांति बनाए रखी।

वैदिक धर्म में शिक्षा तथा रीति-रिवाज

हमारे वैदिक धर्म ने इस बात के बारे में सिखाया है और हमारा जो व्यवहार है, उसी के आधार पर हमको अपनी तरक्की (विकास) करनी चाहिए। दूसरों देशों (विदेशों) के द्वारा थोपी गई काम करने की नीति को अपनाने की कोशिश करना बेकार है, इस तरह का होना नामुमकिन है। हमें दूसरी जातियों की संस्थाओं अथवा उनके प्रथाओं की बारे में निंदा नहीं करनी चाहिए। वे उनके लिए अच्छी बात है और इस तरह की निंदा करना हमें शोभा नहीं देता है। जो वस्तु एक मनुष्य के लिए ठीक है, वह दूसरे व्यक्ति के लिए जहर हो सकती है। इस तरह की यह पहली शिक्षा है जिसके बारे में हमें ज्ञान लेना है। उन्होने जो आधुनिक व्यवस्था प्राप्त की है उसकी पृष्ठ भूमि में दूसरे विज्ञान, दूसरी संस्थाएं तथा दूसरी परंम्पराएं आती है। हम स्वाभाविक तौर से अपनी मानसिक प्रवृत्ति का पालन कर सकते हैं, जिसके पीछे के हमारे रीति-रिवाज और हजारों सालों के किए हुए पहले के कर्म होते हैं। हमें अपने पहले के बनाए हुए रास्तों पर चलना होगा तथा उसी तरह के कार्य आदि करने होगें।

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(This content has been written by Super Thirty India Group)

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