30/10/2020

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Vastu Dosh Nivaran

औद्योगिक वास्तुशास्त्र

किसी उद्योग (कम्पनी) को लगाकर उसे सही तरह से चलाना बहुत ही कठिन काम है। कई कारखानों के निर्माण में वास्तु नियमों का पालन न करने से वह बंद हो गए हैं। कारखानें के निर्माण में वास्तुदोष होने की स्थिति में कई बाधाएं उत्पन्न हो सकती है। औद्योगिक इकाइयों के लिए भी सामान्य वास्तु सिद्धांत (औद्योगिक वास्तुशास्त्र) वही है जो किसी व्यावसायिक मकान में प्रयोग किये जाते हैं।

उद्योग (कारखाने) के लिए वास्तुनिर्देश-

  1. उद्योग की भूमि के चारों ओर दीवार रखनी चाहिए। पूर्व व उत्तर दिशा की चार-दीवारी दक्षिण व पश्चिम दिशा की अपेक्षा नीची होनी चाहिए। साथ ही दक्षिण तथा पश्चिम की चारदीवारी पूर्व व उत्तर की चारदीवार से मोटी भी होनी चाहिए।
  2. भूमि का आकार चारो ओर से बराबर होना अच्छा होता है। जमीन की ईशान दिशा कटी हुई नहीं होनी चाहिए नहीं तो खतरनाक संकट उत्पन्न हो सकते हैं। ईशान दिशा में न भारी सामान रखें और न भारी निर्माण करें। वायव्य भाग बंद न करें। हमेशा नैऋत्य दिशा 90 डिग्री की ही रखना सही होता है।
  3. तैयार माल को रखने की अधिक सही जगह वायव्य दिशा होती है। यहां माल रखने से वह जल्द ही बिक जाता है। इसके अलावा निर्मित माल को पूर्व, उत्तर या आग्नेय दिशा में भी रखते हैं। ईशान दिशा, नैऋत्य दिशा व केंद्रीय भाग में तैयार माल कभी नहीं रखना चाहिए।
  4. कारखाने में पानी ईशान दिशा में रखना चाहिए। वैसे इसे उत्तर या पूर्व दिशा में भी रख सकते हैं लेकिन वहां कुआ जरूर होना चाहिए। यदि ओवर हेड टैंक बनाना हो तो ईशान दिशा में न बनाएं। उसे नैऋत्य दिशा में बनाना चाहिए। भूमिगत टैंक दक्षिण, पश्चिम या वायव्य दिशा में नहीं बनाना चाहिए।
  5. कारखानों में मशीनों की स्थापना दक्षिणी भाग में ही करनी चाहिए। हल्की मशीने उत्तरी भाग में भी रखी जा सकती है। भूमिगत मशीनें पूर्वी या उत्तरी भाग में स्थापित करें। कोई भी मशीन ईशान दिशा में कभी नहीं रखनी चाहिए।
  6. बड़ी गाड़ियों के आने-जाने के लिए दो जगहों पर द्वार बनाने चाहिए। निकलने के लिए द्वार उत्तर या पश्चिम में सही होता है।
  7. गाड़ियों के लिए पार्किंग की जगह उत्तरी या पूर्वी दिशा में करनी चाहिए लेकिन पार्किंग की व्यवस्था कम्पाउंड वाल से लगाकर न करें।
  8. कच्चेमाल का भंडारण उत्तरी दिशा में अच्छा होता है। इसे ईशान दिशा, केंद्र व वायव्य दिशा में नहीं रखना चाहिए।
  9. कारखाने में कारीगरों को इस तरह खड़ा करना चाहिए कि उनका मुंह उत्तर या पूर्व की ओर रहे। बीम के नीचे कारीगरों को कभी खड़ा न करें। इनके रहने की जगह आग्नेय या ईशान दिशा में होनी चाहिए। इसे मकान की दीवार से हटाकर बनवाना चाहिए।
  10. यदि प्रशासनिक कार्यालय को पूर्व या उत्तर दिशा में बनवा पाना संभव न हो तो नैऋत्य में भी रखा जा सकता है। इसमें बैठने वाले अधिकारी को भी उत्तर व पूर्व दिशा में मुख करके बैठना चाहिए।
  11. ट्रांसफार्मर, बायलर, जैनेरेटर, बिजली का खम्भा आदि पूर्वी आग्नेय दिशा में स्थापित करना चाहिए।
  12. हमेशा सामान्य वास्तु सिद्धांतों (औद्योगिक वास्तुशास्त्र) के अनुरूप उत्तरी व पूर्वी भाग ज्यादा खाली रखें तथा दक्षिणी व पश्चिमी भाग में खाली जगह कम रखनी चाहिए।
  13. अगर ईशान दिशा में गेट हो तो दक्षिण भाग में और उत्तरी दिशा में हो तो पश्चिमी भाग में चौकीदार का कमरा बनवाना चाहिए।
  14. नैऋत्य दिशा में फर्श जमीन से ज्यादा ऊंचा तथा उत्तर, पूर्व व ईशान दिशा में अपेक्षाकृत नीचे होना चाहिए।
  15. कारखाने का प्रशासनिक कार्यालय पूर्व या उत्तर दिशा में रखना चाहिए।
  16. कारखाने का मुख्यद्वार नैऋत्य दिशा में कभी नहीं होना चाहिए।
  17. कारखाने का प्रवेशद्वार पूर्व, उत्तर व ईशान दिशा में रखना चाहिए।
  18. तोलने वाली भारी मशीन पश्चिमी या दक्षिणी दीवार के पास रखनी चाहिए।
  19. शौचालय वायव्य या आग्नेय दिशा में बनाना चाहिए। इसे कंपाउंड वाल से लगाकर न बनवाएं।
  20. कच्चेमाल का उत्पादन दक्षिण-पश्चिम दिशा से शुरू करके उत्तर-पूर्व की ओर से उसे निकाले।
  21. पूर्व या उत्तर में लॉन या छोटे पौधे लगाने चाहिए।
  22. जमीन के दक्षिणी-पश्चिमी भाग को ऊंचा रखना चाहिए।
  23. भूमि के दक्षिणी व पश्चिमी भाग में बड़े-बड़े पेड़ लगाने चाहिए।
  24. कोई भी उद्योग अनेक मजदूरों की रोजी रोटी का साधन होता है।

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