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प्राचीन भारत की धर्मनिरपेक्ष वास्तुकला

प्राचीन भारत की धर्मनिरपेक्ष वास्तुकला

Secular Architecture of Ancient India

It is true that there was a long time prohibition of stone architecture in houses for humans to live in ancient India. Stone was used only to build houses inhabited by gods. This is the reason why the earliest Indian architecture was considered mainly wood. But later as time passed, the kings were given permission to use stones for their palaces and other important houses, and then gradually began to be used for other architecture.

यह बात सच है कि प्राचीन भारत में मनुष्यों के रहने के लिए मकानों में पाषाण वास्तुकला का बहुत ज्यादा समय तक निषेध रहा। सिर्फ देवताओं के रहने वाले मकानों को बनाने के लिए पाषाण (पत्थर) को इस्तेमाल में लाया जाता था। यही वजह है कि सबसे पहले की भारतीय वास्तुकला मुख्य रूप से लकड़ी की ही मानी जाती थी। परंतु इसके बाद में जैसे-जैसे वक्त बीतता गया, उन राजाओं के महल तथा और दूसरे महत्वपूर्ण मकानों के लिए पत्थरों को इस्तेमाल करने के लिए आज्ञा दे दी गई और फिर इसके बाद धीरे-धीरे इसे दूसरी वास्तुकला के लिए भी इस्तेमाल किया जाने लगा।

धर्मनिरपेक्ष वास्तुकला : प्राचीन समय के आदिमानव को पेड़ों से अपने मकानों को बनाने का नमूना मिला। संस्कृत का एक शब्द ’शाला’ (भवन अथवा मकान), को माना जाता है कि यह शाखा (पेड़ की डाल) से निकला हुआ शब्द हैं क्योंकि पहले के समय में मकान अथवा छप्पर (झोपड़ी) को बनाने के लिए पेड़ों की शाखाओं को जरुरत के हिसाब से इस्तेमाल में लिया जाता था। इस बात से यह साफ होता है कि प्राचीन समय में शाला का अर्थ फूस की उस झोपड़ी या छप्पर से माना जाता था जिसका मनुष्य और उसके पशु आराम करने वाली जगह के रूप में इस्तेमाल किया करते थे। आज के युग में भी मकान के अलग-अलग कमरों को आग का कमरा, स्त्री का कमरा, गायों आदि पशुओं के लिए कमरा, हाथी का कमरा तथा रसोईघर आदि के नाम से जाना जाता है। वास्तुशास्त्र की किताब समरांगण सूत्रधार का नाम ही बहुत अभिव्यक्तिपूर्ण तथा महान है।

सम्यक् चिरानि समरानि (तथा भूतानि) अंड़गानि (एतादूशानि भवनानि शालाभवनानीत्यर्थः,) अथवा समरानि संयुक्तानि अंड़गानि येषां तानि, (भवानित्यर्थः) तेषां सूत्रधार।

अर्थात- समरांगण का मतलब इस तरह के मकान से होता है, जिसमें किसी भी तरह का कोई दोष आदि न हो या कई कमरों वाला मकान हों। समरांगण सूत्रधार वह इतिहास है, जो इस तरह के मकानों के निर्माण से संबंधित जरुरी शास्त्रों को उजागर करता है।

समरांगण सूत्रधार के अनुसार- (इसका शाब्दिक अर्थ माना जाता है मनुष्य के रहने वाले मकानों की वास्तुकला) मनुष्य के रहने वाले मकान की इकाई का परिरूप एक खुला हुआ चतुष्कोण अथवा आंगन है जो कि चारों तरफ के कमरों अथवा शालाओं से घिरा होता है और यह इकाई रहने वाले की जरुरत के अनुसार कितनी ही बार बनाई जा सकती है।

आज के आधुनिक युग में बनाये जाने वाले वह मकान, जिनमें दीवारों पर मिट्टी की चिनाई की जाती है, सामने की तरफ एक खुला आंगन होता है तथा उस आंगन के चारों तरफ कमरे भी होते हैं, लगभग पुराने समय में बनाए जाने वाले छप्परनुमा मकानों जैसे ही होते हैं।

यह बात भी सच है कि धार्मिक मकान अपनी प्रकृति तथा महत्व में बिलकुल अलग होते थे। सभी तरह के अलंकरण, सज्जात्मक तथा वास्तुकलात्मक मूल भाव सिर्फ मंदिर/देवालय वास्तुकला के लिए ही सुरक्षित माने जाते थें। विष्णु धर्मोत्तर पुराण में साफ रूप से यह भी लिखा है कि सुधा (अमृत या चूना) और पत्थर का इस्तेमाल मनुष्य के मकानों के लिए ही नहीं, बल्कि देवताओं के मकान के लिए है।

धर्मनिरपेक्ष वास्तुकला :  इसी तरह की वह विशेष वजह और निर्माण की प्रकृति है जिसके फलस्वरूप पुराने समय की वास्तुकला के धर्म निरपेक्ष नमूने हमारे समय तक बाकी नहीं रह सके, लेकिन पत्थर के बने हुए मंदिर वास्तुकला आज के समय में भी मिल जाते हैं। हिंदू लोग अपने मकानों को भड़कीली शैली में बनाने पर ध्यान नहीं देते थे लेकिन मंदिरों के बनाने के लिए वे खुले दिल से अपने साधनों तथा अपनी ताकत को पूरा का पूरा लगा देते थे।

एक से लेकर दस शाला तक ये सभी मकान अपनी मुख्य श्रेणियों में और इसके बाद उनकी असंख्या उपमुख्य श्रेणियों में बांटे जाते थें, जिनकी कुल संख्या चौदह लाख थी।

पुराने समय के भारतीयों की प्रस्तुतीकरण करने का अपना एक अलग ही रिवाज था, जीवन की सभी अभिव्यक्तियों की एक धार्मिक पवित्रता थी और इसके लिए रहने, नहाने, खाना खाने, आराम करने, सोने, मकानों को बनवाने, किसी भी तरह का कोई व्यापार करने, धार्मिक अथवा धर्मनिरपेक्ष काम को करने की क्रियाएं एक धार्मिक संस्कार के जैसी ही बनाई जाती थी। यह उनके लिए एक भरोसा करने से ज्यादा धर्म के नियमों के अनुसार था, जिसने उन्हें जीवन की ऐसी नियमावली के अधीन रखा था।

डिजाइन के दिए गए महत्व के अलावा मकान में इस्तेमाल किये जाने वाली सामग्री और मकान को बनाने की विधियों पर भी बहुत ज्यादा बल दिया जाता था। इससे इस बारे में मालूम चलता है कि उस समय में मकानों का तकनीकी पक्ष कितना ज्यादा उन्नतिशील होता था। राजगीरी (मकान बनाने वाले मिस्त्री) की कम से कम बीस महत्वपूर्ण विशेषताओं के बारे में नाम लेकर बताया गया है, दोषपूर्ण राजगीरी के तकनीकी नामों को दिया गया है और मकान बनाने की विधि का बहुत ही साफ तरीके से वर्णन भी किया गया है।

शुभ समय में वन में जाकर अच्छे पेड़ों या वृक्षों से अच्छी तरीके  से लकड़ियों को लाने की विधियां तथा उससे मिलते-जुलते विषयों को ’दारु आहरण’ का नाम भी दिया गया था, इनके बारे में प्राचीन ग्रंथों जैसे कि- विश्वकर्मा प्रकाश, मत्स्य पुराण, वृहत् संहिता में भी बताया गया है तथा इससे मिलते-जुलते अन्य विस्तृत विवरण द्वारों (दरवाजों या गेट) के भाग में भी बताया गया है।

परिवार के सुख उसकी अलग-अलग व्यवस्थाओं तथा उनकी जीवन शैली में छुपे हुए होते हैं। इसका अनुमान हम उस व्यवस्था से लगा सकते हैं, जिसके आधार पर पुराने भारतीय लोग अपने मकानों को रखा करते थे। एक मकान के निम्नलिखित मुख्य भाग होते थे जो इस तरह से हैं-

1.महानसभक्तशाला अथवा रसोईघर
2.द्वारकोष्ठमकान का मुख्य दरवाजा
3.दर्पणग्रहसंजने-संवरने का कमरा
4.धाराग्रह
5.उद्यानबाग-बगीचे
6.जलोद्यानजलमेष अथवा जल का मैदान
7.क्रीड़ागारखेलने-कूदने के लिए मैदान
8.विहार भूमिआमोद-प्रमोद की जगह
9.अमेध्यभूमिपेशाबघर, शौचालय आदि

धर्मनिरपेक्ष वास्तुकला : पुराने समय में बरामदे, द्वारमंडप (मुख्य दरवाजा) आदि के अलावा कई सरंचनाएं भी होती थी, जो कि मकान की सुंदरता को और भी ज्यादा बढ़ाती थी और पूरी तरह से रोशनी तथा हवा (वायु) के आने पर जीवन को बहुत ही आराम मिलता था। सभी मकानों में सीढ़ियां हुआ करती थी, जिसको सोपान के नाम से भी जाना जाता था, वे सीढ़ियां ईंटों की बनी होती थी, जब यह सीढ़ियां लकड़ी की बनाई जाती थी, तो इनको निःश्रेणी भी कहा जाता था। दीवार में बनी हुई खिड़कियों को वातायान के नाम से भी जाना जाता था, उसे आलोकांक भी कहते थे जिसका मतलब रोशनी देने वाला मार्ग होता है। पुराने समय में सभी कमरों की छतों में एक छेद भी होता था, जिसे उलूक के नाम से जाना जाता था। मकानों में बॉलकानी (छज्जे) भी होती थी जिन्हें वितदरिक निर्यह आदि के नाम से पुकारा जाता था, जिसकी वजह से मकान की सुंदरता में बढ़ोतरी होती थी।  सभी मकानों में पानी निकलने की भी उत्तम व्यवस्था थी, इसको जलनिर्गम अथवा उदकब्रम भी कहा जाता था। समरांगण सूत्रधार ने चार तरह के खंभों के बारे में वर्णन किया है, जैसे कि- पद्मक, घट-पल्लवक (दोनों की आकृति आठ फलक की तरह होती है और ये दोनों एक दूसरे से बहुत ज्यादा मिलते-जुलते होते हैं) कुबेर (यह 16 फलक का होता है) और श्रीधर (अंडा के आकार की तरह)। इनके साथ ही उन अलग-अलग पूरक भागों, बाहरी फैलाव, प्रस्तारों और गठनों के बारे में बताया गया है, जिनका इस्तेमाल मकान को बनाने के लिए किया जाता था। हमारे पुराने समय के मकानों की वास्तुकला में उस समय प्रचलित इन सभी तत्वों की एक झलक इस संक्षिप्त वर्णन में भी मिल जाती है।

वास्तुशास्त्र और धर्मशास्त्र (Vastu Shastra and Theology)

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