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वास्तु पुरुष की उत्पत्ति तथा उसका सत्कार

वास्तु पुरुष की उत्पत्ति तथा उसका सत्कार

Origin and Hospitality of Vastu Purush

One of the Gurus of Vastushastra was known as Vishwakarma, he has told about the origin of Vastu Purusha in his authentic book titled Vishwakarma Prakash.

वास्तुशास्त्र के आदि गुरू में से एक गुरू को विश्वकर्मा के नाम से जाना जाता था, उन्होने अपने प्रमाणिक ग्रंथ जिसका नाम विश्वकर्मा प्रकाश है, में वास्तु पुरुष की उत्पत्ति के बारे में बताया है किः-

तमेव वास्तु पुरुषं ब्रह्ना समसृजत्प्रभुः।

कृष्णपक्षे तृतीयामां मासि भाद्रपदे तथा।।

त्रेतायुग में ब्रह्ना जी ने भाद्रपद, कृष्ण पक्ष की तृतीया को एक विशालकाल पुरुष की रचना की जिसको देखकर सभी देवता डर गए, तब सभी देवताओं ने ब्रह्ना जी से सलाह लेकर उसे नीचे की तरफ गिरा दिया और उसके ऊपर बैठ गए तथा फिर उस वास्तु पुरुष ने ब्रह्ना जी से कहा कि मैं इन सारे देवताओं का क्या करूं। ब्रह्ना जी ने कहा कि तुम इसी तरह से रहो, अब से सभी मकानों (Houses) को बनाने के लिए पूर्व दिशा की तरफ मुख्य गेट या दरवाजे की स्थापना तथा मकान के अंदर जाते वक्त हर पुरुष तेरी पूजा किया करेंगे। यदि उन्होंने इस आदर का पालन नहीं किया तो उस समय तुमको उन पर गुस्सा करने का पूरा अधिकार होगा तथा वे पुरुष गरीबी झेलते हुए समय से पहले ही मृत्यु (death) को प्राप्त हो जाएगा।

इसलिए मकान (House) को बनाने से पहले, दरवाजे की स्थापना करना तथा मकान के मुख्य द्वार पर वास्तु की पूजा करवाना बहुत ही जरूरी होता है। इसके अलावा जब भी मांगलिक कार्य (Manglik Kary) होते हैं तो उस समय भी मकान के स्वामी के नाम से आग जलाने वाले हवन कुंड (Havan Kund) में पांच या ग्यारह बार अवश्य ही आहुतियों को डा

वास्तु पुरुष

लना चाहिए।

मकान के पुरुष की जमीन में अवस्थिति-

वास्तु पुरुष अधोमुख होता है। उसकी शिखा ईशान कोण में तथा दोनों पांवों के तलवे एक दूसरे के पास नैऋत्य कोण में होते हैं। दायां हाथ तथा पैर का जोड़ आग्नेय कोण की तरफ तथा बायां हाथ एवं बायां पैर का जोड़ वायव्य कोण की तरफ होना चाहिए। जिस तरह से दिखाई गई तस्वीर में बताया गया है तथा इसके चारों तरफ बत्तीस तरह के देवताओं के रहने का स्थान होता है।

विदिशा जमीन में मकान के पुरुष की अवस्थिति-

विदिशा जमीन वह होती है जहां पर दिशा कोण की तरफ एक स्थान से दूसरी जगह पर जाती रहती है। कुछ जमीन ठीक दिशा में नहीं होती है, दिशा कोने की तरफ होने से उन किनारों पर दिशाएं (उत्तर, पूर्व, दक्षिण तथा पश्चिम) की तरफ आ जाती है तथा उनकी भुजाओं का कोण (ईशान, आग्नेय, वायव्य तथा नैऋत्य) की तरफ आ जाते हैं। परंतु इससे मकान के पुरुष की अवस्था नहीं बदलती है। मकान के पुरुष की शिखा ईशान कोण (Shikha Eshan Kon) की तरफ ही होगी, दोनों पांवों के तलुवे एक दूसरे को छूते हुए नैऋत्य कोण में ही दिखाई देंगे। परंतु विदिशा जमीन में मकान के पुरुष की सिर से लेकर पैर तक की लंबाई 30 प्रतिशत कम हो जाने से, उसकी सौम्यता (सुन्दरता या सज्जनता) समाप्त हो जाती है। वास्तु पुरुष मंडल (Vastu Purush Mandal) में दिशाओं से प्रभावित होने वाला क्षेत्र जमीन के कोणों की तरफ एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाता रहेगा और दिशाओं से प्रभावित होने वाली जगह भी सीमित हो जाएगी।

कोणों (ईशान, आग्नेय, नैऋत्य तथा वायव्य) से प्रभावित होने वाली जगह का ज्यादा फैलाव हो जाएगा। जिससे कि मकान की रूपरेखा में कुछ परेशानियां आ सकती है, क्योंकि कम जगह के होने की वजह से होने वाला कार्य तथा रसोईघर (kitchen), पूजा करने का कमरा, ड्रैसिंग का कमरा, औजार या मशीन आदि के रखने की जगह ज्यादा मिल जाएगी। परंतु सोने या आराम करने वाला कमरा, खाना-खाने वाला कमरा, पढ़ाई-लिखाई तथा अध्ययन करने का कमरा, मेहमानों का कमरा आदि के लिए मकान के पुरुष मंडल में बहुत ही कम जगह मिल पाएगी। इसलिए विदिशा जमीन पर मकान की रूपरेखा किसी अच्छे अनुभवी वास्तुशास्त्री (Vastushastri) से बनवानी चाहिए। दिखाई गई तस्वीर में विदिशा जमीन पर वास्तु पुरुष मंडल को दिखाया जा रहा है।वास्तु पुरुष

वास्तु पुरुष की उत्पत्ति की अवधारणा-

वैदिक साहित्य (Vedik Sahitya) के लेखक तथा रचयेता ने सभी विज्ञान सम्मत तथा प्रकृति के अनुसार किसी भी तरह के कामों को धर्म से जोड़कर जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग बना दिया है और भारतीय संस्कृति (Bhariya Sanskriti) इसी तरह की विशिष्टता की वजह से आदि काल से चली आ रही है। मकान के पुरुष के बारे में कई तरह के प्रमाण व दो-तीन तरह ही अवधारणाएं भी बहुत ही प्रसिद्ध हैं।

सभी तरह के आस्तिक वैज्ञानिक (Believer scientist) पूरी तरह से इस बात को भले ही न अपनाएं, परंतु विचार करने योग्य है तो इसको जरूर ही मानेंगे। इसको इस तरह से कहा जा सकता है कि ऐसी कोई न कोई सत्ता तो जरूर है जो कि पूरे के पूरे संसार में काम कर रही है तथा उसको अपने वश में भी कर रही है, वह जो है वो ईश्वर के नाम से जाना जाता है। एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन (famous scientist Albert Einstein) ने मनुष्य, विषय तथा दिमाग, इन तीनों की सत्ता को स्वीकार करके इसके बारे में व्याख्या भी की है। इसलिए भगवान जो दिमाग है, वह सारे संसार को बनाने वाला तथा संसार को अपने काबू में रखने वाला होता है। एक इस तरह की वस्तु जो दिखाई न देती हो तथा जिसके रहते हुए मनुष्य अथवा इस संसार में रहने वाला प्राणी जगत जिंदा जाना जाता है, वह जीवात्मा के नाम से जाने जाते हैं।

इस वैज्ञानिक ने सिर्फ मनुष्य को मानकर इसे पुरुष माना। इसी तरह से एक ऐसी वस्तु जिससे यह देखने लायक संसार बना तथा बार-बार बनता रहा तथा बार-बार नष्ट होता रहा। जिसे भारतीय दर्शन प्रकृति मानता है, उसे ही वैज्ञानिक विषय के नाम से जानते हैं तथा वैज्ञानिक से इस विषय के बारे में यह भी कहा है कि प्रकृति के द्वारा बनाई हुई वस्तु को किसी भी तरह से नष्ट नहीं किया जा सकता है। ठीक उसी तरह से ऐसा लगता है कि वैदिक वाड्गय (Vedic court) की पुष्टि भी इस महान वैज्ञानिक ने ही की है। यानी कि भगवान ही दिमाग है, जीवात्मा ही पुरुष या मनुष्य है तथा प्रकृति ही विषय है। भारतीय दर्शन भगवान, जीवात्मा व प्रकृति को सदा रहने वाले मानते हैं। परंतु इनके गुण धर्मों में अलग-अलग है। भगवान के सच्चिदानंद नाम से इन तीन हमेशा रहने वाली ताकतों या शक्तियों के बारे में बखान निम्नलिखित तरह से किया जा सकता है, जैसे-

सच्चिदानंद, सत्-चित्-आन्नद-

  • सत्- सत् का मतलब होता है सत्य यानी कि जिसका अस्तित्व हो। अस्तित्व है प्रकृति का, जीवात्मा का पुरुष तथा भगवान का दिमाग और ये तीनों की तीनों वस्तुएं (शक्तियां) बहुत ही पुराने समय से चली आ रही हैं।
  • चित्- चित् का मतलब होता है चेतन स्वरूप, ऊपर बताई गई तीनों वस्तुओं (शक्तियों) में भगवान (दिमाग) व जीवात्मा (पुरुष या मनुष्य) ही चेतन स्वरूप जाने जाते हैं। प्रकृति (विषय) में चेतनता का गुण नहीं होता है यह तो परमात्मा के द्वारा बनाए गए सिद्धान्तों व उपनियमों के अनुसार ही खुद ही कार्य करती रहती है। जिस तरह से प्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने यह भी कहा है कि प्रकृति को न तो पैदा ही किया जा सकता है और न ही प्रकृति को समाप्त किया जा सकता है, परंतु यह अपने खुद के आकार को बदलती रहती है।
  • आनंदः- इस शब्द का मतलब होता है भगवान का हमेशा ही आनंद में लीन रहना। आनंद का गुण सिर्फ भगवान में है, जीवात्मा में नहीं। बहुत ज्यादा गुणों में भगवान व जीवात्मा में समानता भी है और असमानता भी।

ऊपर बताए गए तीनों अनादि शक्तियों का निरूपण वास्तुशास्त्र के बारे में करने पर भगवान को सबसे ऊंची सत्ता जाना जाता है, जीवात्मा को मकान में रहने वाले मकान का मालिक समझना चाहिए तथा प्रकृति यानी कि वास्तु जमीन को मानें तो प्रकृति के सिद्धान्तों तथा उपनियम में बंधा हुआ लगातार मकान के मालिक पर असर (प्रभाव) डाल रहा है और यह असर वास्तु पुरुष (Vastu Purush) डाल रहा है। असलियत में तो कुदरत खुद ही एक शक्ति या ताकत होती है, जैसे कि पूरे संसार अथवा धरती पर काम कर रही है, ठीक उन्हीं तरह के गुण धर्म के साथ जमीन पर काम कर रहे हैं जैसी व्यापकता भगवान की है, वैसी ही व्यापकता प्रकृति की है, इसलिए कुदरत जमीन पर भी उसी तरह से काम कर रही है। कुदरत के सिद्धान्तों व उपनियमों के संचालन में एक जीवंतता होने की वजह से मकान के व्यक्ति की अवधारणा की गई है।

मनुष्य के शरीर रूपी मंदिर में जिस तरह से जीवात्मा रहती है, उसी तरह से मकान रूपी मंदिर में परमात्मा का बनाया हुआ Vastu Purush रहता है। मकान के वास्तु पुरुष के आधार को प्राप्त करके देवताओं ने रहने योग्य वास्तु प्रस्तुत करता है। जिससे यानी कि मकान के मालिक जीवन के चारों परम पुरुषार्थ की प्राप्ति करें। जीवन में हमेशा प्यार, सुख, शांति तथा समृद्धि को प्राप्त करें। वास्तु के सिद्धान्तों के अनुसार बना मकान, मकान के मालिक को सभी तरह के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अच्छा माहौल (वातावरण) प्रदान करता है।

वास्तुशास्त्र और उसकी अन्य जानकारियां (Vastu Shastra and its other information)

  1. जीवन और वास्तुशास्त्र का संबंध
  2. वास्तु का व्यक्ति के जीवन पर प्रभाव
  3. व्यावसायिक सफलता के लिए वास्तु शास्त्र
  4. घरेलू उद्योग व औद्योगिक संरचनाएं समाज की उन्नति के लिये क्यों आवश्यक है?
  5. वास्तु पुरुष की विशेषताएं

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