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व्यावसायिक सफलता के लिए वास्तु शास्त्र

व्यावसायिक सफलता के लिए वास्तु शास्त्र

Business Achitecture

Summery: Just as the rules and principles of Vastu Shastra have to be followed for the construction of a house, similarly the rules and principles of Vastu Shastra have to be followed in the construction of a building for commercial success (व्यावसायिक सफलता). Just as building a house according to Vastu Shastra makes the whole family happy and happy and the members living in it experience mental peace, similarly according to Vastu Shastra, the business flourishes by building commercial houses. And continues to grow day by day.

व्यावसायिक वास्तु शास्त्र

जिस प्रकार मकान के निर्माण के लिए वास्तु शास्त्र के नियमों एवं सिद्धांतों का पालन करना पड़ता है उसी प्रकार से व्यावसायिक सफलता के लिए भवन के निर्माण में भी वास्तु शास्त्र के नियमों एवं सिद्धांतों का पालन करना पड़ता है। जिस प्रकार वास्तु शास्त्र के अनुसार मकान का निर्माण करने से पूरा परिवार सुखी एवं प्रसन्न रहता है और उसमें निवास करने वाले सदस्यों को मानसिक शांति का अनुभव होता है, उसी प्रकार Vastu Shastra के अनुसार व्यवसायिक मकानों का निर्माण करने से व्यवसाय अच्छी तरह फलता-फूलता है और दिन-प्रतिदिन बढ़ता चला जाता है। इसलिए ज्योतिष-शास्त्रियों ने वास्तु शास्त्र के अनुसार Business के मकानों का निर्माण करने बारे में बताया है। इसके अतिरिक्त जिस चीज का व्यवसाय हो उस चीज को किस दिशा रखना चाहिए, जिस कमरे में समान रखा जाना है उसका मुख किस ओर होना चाहिए तथा मुख्य कमरे का मुख किस ओर होना चाहिए इन सभी का निर्धारण करना चाहिए। इस प्रकार वास्तु शास्त्र के अनुसार व्यवसाय का अनुष्टान करके मकान बनाने, कमरे के दरबाजे को उचित दिशा में रखने एवं सामानों को उचित दिशा में रखने से व्यक्ति का व्यवसाय निश्चित रूप से उन्नति करता है उसे व्यावसायिक सफलता मिलती है। मनुष्य के जीवन में उसकी जीविका को सफल बनाने वाले तत्वों का महत्व सबसे ज्यादा है। इन्ही तत्वों पर व्यवसायी का भविष्य और वर्तमान निर्भर करता है। अतः प्रत्येक व्यक्ति को अपनी दुकान, दफ्तर या अन्य व्यावसायिक स्थानों को ठीक प्रकार से सोच-विचार कर Vastu Shastra के अनुसार बनवाना चाहिए। ऐसा करने से व्यक्ति द्वारा किए परिश्रम का उचित लाभ मिलता है।

मर्शियल कॉम्पलेक्स के लिए वास्तु शास्त्र का निर्देश-

  • व्यावसायिक सफलता के लिए कमर्शियल कॉम्पलेक्स बनाते समय एक बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि पूरे कॉम्पलेक्स में नल के द्वारा जिस पानी की टंकी से पानी पहुंचाया जा रहा है वह टंकी किस दिशा में होना चाहिए। हम जानते हैं कि पंचतत्वों से बने पृथ्वी के जिस स्थान पर इसका निर्माण कार्य होता है वहां पांचों तत्वों में संतुलन रखना आवश्यक होता है। चूंकि पानी भी उन पांचों तत्वों में से एक है इसलिए पानी की टंकी को पूर्वी या उत्तरी ईशान कोण में रखने से Complex का स्थान संतुलित रहेगा और इस संतुलनता के प्रभाव से व्यवसाय में उचित लाभ मिलेगा।
  • Commercial Complex के लिए सबसे पहले भूखण्ड का चयन बहुत जरूरी है और यदि उपलब्ध भूखण्ड में वास्तु के सिद्धांत अपनाने की गुंजाइश हो तो भूखंड में सुधारकर निर्माण कराना चाहिए। भूखण्ड यदि उत्तर-पूर्व क्षेत्र में बढ़ा हो तो अच्छा होता है। जहां तक हो कोशिश ये होनी चाहिए कि दुकानों के द्वार उत्तर या पूर्व दिशा में रहें।
  • वास्तु  शास्त्र के अनुसार Complex का निर्माण कराते समय ध्यान रखें कि यदि कॉम्पलेक्स का मुख दक्षिण एवं उत्तर दिशा की ओर हो तो कॉम्पलेक्स के सामने की ओर कम ही स्थान छोड़ें। कभी भी उत्तर-पूर्व की सीमा से सटाकर कॉम्पलेक्स का निर्माण न करें तथा उसके पीछे भी स्थान छोड़ें। कॉम्पलेक्स में पार्किग के लिए भूमिगत स्थान का उपयोग करें अर्थात अंडरग्राऊंड पार्किग की व्यवस्था करें। यदि सामने अधिक खाली स्थान हो तो पार्क का निर्माण कर सकते हैं लेकिन ध्यान रखें कि इसका मुख उत्तर-पूर्व दिशा में ही होना चाहिए। यदि भूमिगत पार्किंग की व्यवस्था संभव न हो तो उत्तर-पूर्व दिशा में अधिक स्थान पार्किग के लिए छोड़ना चाहिए। Complex का निर्माण करते समय वास्तु शास्त्र के नियमों का पालने करने से शुभ फल मिलता है और प्रसिद्धि भी प्राप्त होती है।
  • व्यावसायिक सफलता पाने के लिए वास्तु शास्त्र पर अध्ययन करने से यह बात साफ होता है कॉम्पलेक्स के निर्माण में भी वही सिद्धांत एवं नियम लागू होते हैं जो भवन(मकान) में होते हैं।

व्यावसायिक प्रतिष्ठान (दुकान या ऑफिस) के लिए वास्तु शास्त्र के नियम एवं सिद्धांत-

    • यदि कोई व्यक्ति दुकान का निर्माण करवाता है तो उसे अपनी दुकान के सामान को वास्तु शास्त्र के अनुसार रखना चाहिए। वास्तुशास्त्र के अनुसार दुकान के सेफों को दक्षिण-पश्चिम दिशा में रखना चाहिए। अगर दुकान में पूर्व तथा उत्तर में भी सेफ है तो इन सेफों पर उत्तर एवं दक्षिण की सेफों की अपेक्षा हल्का सामान रखें।
    • यदि दुकान का निर्माण दक्षिण की ओर हुआ है अर्थात shop का मुख दक्षिण दिशा की ओर हो और सामने सड़क हो तो दुकान पर आने के लिए सीढ़ियां दक्षिणी आग्नेय कोण में बनवाएं। सीढ़ियों के बीचों-बीच अर्द्धचन्द्राकार सीढ़ियां भी निर्मित करा सकते हैं। दक्षिणी नैऋत्य कोण में सीढ़ियां न बनवाएं क्योंकि नैऋत्य कोण की ओर से जाना-आना वास्तु के अनुसार ठीक नहीं है।
    • दुकान में माल का स्टॉक, पश्चिम-दक्षिण दिशा या नैऋत्य कोण की ओर रखा जाना चाहिए।
    • पानी का बर्तन हमेशा ईशान कोण में रखना चाहिए।
    • उत्तरोन्मुखी दुकान पर चढ़ने के लिए सीढ़ियां उत्तरी ईशान कोण में बनवाएं। सीढ़ियां वायव्य कोण से ईशान कोण तक सम्पूर्ण भाग में भी निर्मित करवाई जा सकती है।
    • जो लोग दुकान में वर्कशॉप बनाते हैं या मशीनों का व्यवसाय करते हैं उन्हे अपनी दुकान में मशीनों को दक्षिण दिशा या नैऋत्य कोण में रखनी चाहिए।
    • पूर्व या उत्तर की ओर मुख वाली दुकानों में अर्द्धचन्द्राकार सीढ़ियां निर्माण नहीं करानी चाहिए।
    • दुकान या Office में मेजेनाइन फ्लोर या दुछत्ती बनायी जाए तो उसके लिए दक्षिण, पश्चिम दिशा ही उपयुक्त है।
    • यदि डबल शटर वाली पूर्वोमुखी दुकान में दोनों शटरों को खोल पाना संभव न हो और केवल एक ही शटर खोला जाना संभव हो तो ईशान कोण की ओर वाला शटर खुला रखें। आग्नेय कोण की तरफ वाला शटर बंद ही रखना चाहिए।
    • व्यावसायिक सफलता पाने के लिए दुकान के निर्माण भवन का चुनाव करना हो तो वास्तु शास्त्र के नियमों को ध्यान में रखना चाहिए। वास्तु सम्मत होने पर शुभ व्यवसाय संभव हो सकता है। यदि वास्तु सम्मत भवन में निर्माण नहीं हो तो इसमें सुधार की कितनी गुंजाइश है, काफी उल्ट-फेर करना पड़े तो भी और फिर भी संभव न हो पाए तो ऐसे भवन को त्यागकर दूसरे भवन का चयन कर लेना चाहिए। कोई भी भवन या दुकान वास्तु सम्मत हैतो भरण-पोषण, बुद्धिकारक, शुभफलप्रद होगी अन्यथा मानसिक और आर्थिक क्लेश हमेशा ही रहेगा।
    • अगर किसी की दुकान का मुख पश्चिम की ओर हो तो उस दुकान पर सड़क से चढ़ने के लिए सीढ़ियों का निर्माण करवाना चाहिए जो पश्चिमी वायव्य कोण में हो। यदि चाहें तो सीढ़ियों में बीचो-बीच चन्द्राकार सीढ़ियां भी बनवा सकते हैं। इस बात का विशेष ध्यान रखे कि सीढ़ियां नैऋत्य कोण में कभी न बनें।
    • दुकान का शोकेस बनवाने के लिए उपयुक्त स्थान दक्षिण एवं पश्चिम दिशाएं हैं। शोकेस भी ईशान कोण में नहीं बनवाना चाहिए।
    • Shop owner को अपने बैठने का स्थान हमेशा नैऋर्त्य कोण में रखना चाहिए। उसे कभी भी पूर्व तथा उत्तर की दिशा की ओर मुख करके नहीं बैठना चाहिए।
  • दुकान में वजन करने वाली मशीन को पश्चिमी या दक्षिणी दीवार के साथ किसी स्टैंड पर रखें। यदि आधुनिक मशीन हो तो भी उसे उसी दिशा में दीवार के पास रखें।
  • Electric Supply के लिए स्विच बोर्ड तथा मीटर आदि को दुकान में आग्नेय कोण में व्यवस्थित करवाएं।
  • यदि दुकान का मुख पूर्व दिशा की ओर हो तो दुकान पर चढ़ने के लिए सीढ़ियां ईशान कोण में बनवानी चाहिए या सीढ़ियां इस प्रकार बनवानी चाहिए कि पूर्व में दुकान के सामने पूरी लाइन में आ जाए।
  • दुकान में अलमारी, शोकेस, फर्नीचर आदि दक्षिण-पश्चिम दिशा या नैऋत्य कोण में बनवाना चाहिए तथा पूर्व एवं उत्तर का स्थान ग्राहकों के आने-जाने के लिए खाली रखना चाहिए।
  • पूजा का स्थान ईशान कोण में उत्तर या पूर्व में रखने से व्यावसायिक सफलता प्राप्त होती है।
  • दुकान जिस स्थान हो उस स्थान के ईशान कोण को खाली एवं पवित्र रखें।
  • दुकान में सामान का भंडारण दक्षिण, पश्चिम या नैऋत्य कोण में करें।
  • दुकान के अन्दर दुछत्ती न बनवाएं, अगर बनवाएं भी तो दक्षिण या पश्चिमी क्षेत्र में ही बनवाएं। उत्तर-पूर्व क्षेत्र को खाली रखना चाहिए।
  • जूते या भारी सामान के कार्टन ईशान कोण में नहीं रखने चाहिए। जहां तक हो सके इस प्रकार का सामान दक्षिण या पश्चिम दिशा में रखें।
  • यदि दुकान में सीढ़ियां बनवाने की आवश्यकता हों तो ईशान कोण को छोड़कर अन्य स्थान पर बनवाएं।
  • दुकान, दफ्तर, घर, फैक्ट्री के सामने द्वारवेध नहीं होना चाहिए यानी खम्भा, सीढ़ी, बिजली, टेलीफोन आदि का खम्भा या पेड़ आदि।

वास्तु शास्त्र के अनुसार दुकान या ऑफिस में बैठने के लिए स्थान-

  • अगर दुकान का मालिक या व्यवस्थापक अपनी दुकान में बैठने के लिए केबिन बनवाना चहता है तो उसे केबिन नैऋत्य कोण में बनवाना चाहिए तथा उसका मुख ईशान कोण, उत्तर या पूर्व दिशा में बनवाना चाहिए। द्वार बनवाते समय विशेष ध्यान दे कि केबिन का मुख आग्नेय या वायव्य कोण की ओर न हो। ऐसा करने से कारोबार में व्यावसायिक सफलता प्राप्त होती है।
  • अगर दुकान का मुख पूर्व दिशा में हो तो उसके फर्श की ढलान पश्चिम से पूर्व की दिशा या दक्षिण से उत्तर की दिशा की ओर करवाएं। दुकान के मालिक या व्यापारी को पूर्व और दक्षिण की दीवारों से हटकर उत्तर की ओर मुख करके बैठना चाहिए। अलमारी या cash box उसके बाएं हाथ पश्चिमी दिशा की ओर तथा मुख पूर्व की ओर रखना चाहिए।
  • चाहे तो अलमारी अपने दाहिनी ओर दक्षिण दिशा में रखी जा सकती है। कैश बॉक्स को इस प्रकार रखना चाहिए जिससे उत्तर दिशा के स्वामी कुबेर की दृष्टि कैश बॉक्स पर पड़ती रहे। यदि मेज-कुर्सी लगानी हो तो उन्हें आग्नेय कोण में लगाया जा सकता है। मेज-कुर्सी ईशान कोण या वायव्य कोण में नहीं लगाई जानी चाहिए। इन्हे दक्षिण या पश्चिम दिशा में लगा सकते हैं ऐसा करने से भी व्यावसायिक सफलता प्राप्त होती है।
  • यदि दुकान का मुख उत्तर दिशा की ओर हो तो फर्श की ढलान उत्तर की ओर तथा पश्चिम से पूर्व की ओर वास्तु के अनुसार रखें। व्यवसायी को वायव्य कोण में उत्तरी तथा पश्चिमी दीवारों से कुछ दूरी पर बैठना चाहिए। यदि उत्तर की ओर मुख हो तो अपना cash box बाईं ओर रखें। यदि पूर्व की ओर मुख करके बैठें तो कैशबॉक्स दाहिनी ओर रखें। कैशबॉक्स को इस तरह से रखें कि वह उत्तर दिशा में खुलें और उस पर कुबरे की दृष्टि पड़े। यदि मेज-कुर्सी डालकर बैठना हो तो उन्हे दक्षिण-पश्चिम में लगाकर उत्तर तथा पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए। मेज-कुर्सी ईशान कोण या आग्नेय कोण में कभी न लगाएं जिससे ग्राहकों को आने-जाने में परेशानी में हों। यदि दुकान के दो शटर हो तो ईशान कोण की ओर वाला शटर खुला रखें तथा वायव्य कोण वाला शटर बंद कर दें।
  • यदि दुकान का मुख पश्चिम दिशा की ओर हो तो उसके फर्श की ढलान पश्चिम से पूर्व दिशा की ओर तथा दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर होनी चाहिए। दफ्तर या दुकान के मालिक को नैऋत्य कोण में उत्तर दिशा की ओऱ मुख करके बैठना चाहिए और कैशबॉक्स को अपनी बायीं ओर रखना चाहिए। यदि पूर्व की ओर मुख करके बैठे हो तो कैश बॉक्स को अपनी दाहिनी तरफ रखें।
  • व्यावसायिक सफलता प्राप्त करने के लिए cash box को इस प्रकार रखें कि वह उत्तर दिशा की ओर खुले अर्थात उत्तर दिशा के स्वामी कुबेर की दृष्टि कैशबॉक्स पर पड़े। यदि दुकान का मुख पश्चिम दिशा की ओर हो तो दुकान के मालिक को ईशान कोण, वायव्य या आग्नेय कोण में नहीं बैठना चाहिए। यदि दुकान में उपरोक्त वास्तु निर्देश के अनुसार भवन व्यवस्थित है तथा वास्तु के नियमानुसार बना है तो दुकान के मालिक की सभी प्रकार उन्नति के योग बनते हैं और वह सभी प्रकार से उन्नति, प्रतिष्ठा तथा समृद्धि को प्राप्त कर लेता है।

वास्तु शास्त्र के अनुसार अस्पताल या नर्सिग होम के लिए निर्देश-

  • Hospital या nursing होम की सीढ़ियां पश्चिम दिशा या आग्नेय या वायव्य कोण में सुविधानुसार निर्माण कराई जा सकती है।
  • अस्पताल या नर्सिंग होम की दीवारों का रंग सफेद एवं हल्का नीला होना चाहिए।
  • Hospital का बीच वाला भाग खुला एवं खाली रखना चाहिए।
  • अस्पताल में पीने के पानी की व्यवस्था ईशान कोण में करवानी चाहिए।
  • यदि अस्पताल का मुख पूर्व दिशा की ओर हो तो बहुत अच्छा होता है।
  • अस्पताल के भूखण्ड की ढाल पूर्व तथा उत्तर दिशा की ओर हो तो वह अच्छा फल देने वाला होता है।
  • रोगियों को देखने के डॉक्टर का कमरा अस्पताल में उत्तर दिशा में होना चाहिए तथा डॉक्टर को पूर्व दिशा या उत्तर दिशा की ओर मुख करके निरीक्षण करना चाहिए।
  • Hospital में रोगियों के बिस्तर सफेद रंग व ओढ़ने के कंबल लाल रंग के होने चाहिए क्योंकि लाल रंग जीवंतता का प्रतीक है।
  • शल्य चिकित्सा कक्ष अस्पताल में पश्चिम दिशा की ओर होना चाहिए जिस रोगी का कक्ष में ऑप्रेशन होना है उसे दक्षिण दिशा में सिर करके लिटाना चाहिए तथा डॉक्टर उत्तर दिशा या पूर्व दिशा की ओर मुख करके ऑप्रेशन करें।
  • आपातकालीन कक्ष वायव्य कोण में होना चाहिए।
  • रोगियों के लिए कमरे उत्तर, पश्चिम या वायव्य कोण में होने चाहिए।
  • Hospital का Cash converter कमरा दक्षिण-पश्चिम दिशा में होना चाहिए तथा लेन-देन के लिए खिड़की उत्तर या पूर्व की ओर हो तो कारोबार में व्यावसायिक सफलता मिलती है।
  • अस्पताल का मुख्य द्वार पूर्व या ईशान कोण में होना चाहिए।
  • एक्स-रे मशीन का कमरा एवं विद्युत उपकरण आग्नेय कोण में रखने चाहिए।
  • वास्तु शास्त्र के अनुसार अस्पताल में Toilets का निर्माण दक्षिण या पश्चिम दिशा में तथा स्नानघर पूर्व या उत्तर की दिशा में बनवाना चाहिए।

वास्तु शास्त्र के अनुसार होटल निर्माण के लिए निर्देश-

  • व्यावसायिक सफलता में लाभ पाने के लिए होटल निर्माण करने में ऐसे स्थान का चुनाव करना चाहिए जो वास्तु शास्त्र के अनुसार उचित हो। hotels  के लिए जो जगह निश्चित की गई हो वह ईशान कोण में फैला हुआ एवं आग्नेय कोण में छोटा होना चाहिए। इस तरह की जगह होटल के लिए अधिक शुभ फलदायक होती है।
  • बास्तुशास्त्र के अनुसार होटल बनवाते समय इस बात का ध्यान रखें कि होटल के उत्तर दिशा में दक्षिण एवं पश्चिम दिशा के अपेक्षा अधिक खाली स्थान रखें।
  • hotels में द्वार बनवाते समय ध्यान रखें कि वास्तु शास्त्र के अनुसार मुख्यद्वार उत्तर या पूर्व दिशा की ओर हो। वास्तु शास्त्र के अनुसार ईशान कोण में भी मुख्य प्रवेशद्वार बनाया जा सकता है।
  • होटल का मुख्य प्रवेशद्वार वास्तु शास्त्र के अनुशार तथा पूर्व दिशा या ईशान कोण में होना चाहिए, ऐसा करने से व्यावसायिक सफलता प्राप्त होती है।
  • होटल बनवाते समय पूर्व से पश्चिम दिशा की अपेक्षा उत्तर से दक्षिण दिशा वाला भाग अधिक ऊंचा होना चाहिए।
  • hotels के building के बाहर ऊंचे पेड़ दक्षिण एवं पश्चिम में लगाने चाहिए। उत्तर एवं पूर्व दिशा में पार्क, फुलवारी एवं लॉन बनाए जा सकते हैं।
  • होटल का मुख्य प्रवेशद्वार पश्चिम दीवार पर रखना है तो उत्तर-पश्चिम दिशा में रखना चाहिए।
  • होटल में किचन आग्नेय कोण में होना चाहिए यदि ऐसा न हो सके तो पश्चिमी वायव्य कोण में करना चाहिए।
  • फर्श की ढलान पूर्व दिशा, ईशान कोण एवं उत्तर दिशा की ओर रखें।
  • Hotels में खाने-पीने का कमरा दक्षिण-पश्चिम में निर्माण कराएं तथा उत्तर-पूर्व दिशा हल्की रखें। उत्तर पूर्व दिशा में बालकनी बनवाई जा सकती है एवं बरामदा निर्माण करा सकते हैं।
  • स्वीमिंग पुल, तालाब, फव्वारें आदि उत्तर, पूर्व या ईशान कोण में बनवाएं।
  • Hotels में उपयोग किए जाने वाले जल के लिए नलकूप की व्यवस्था ईशान कोण, उत्तर तथा पूर्व दिशा में करवाना चाहिए परंतु ईशान कोण से भवन के ईशान कोण को मिलाने वाली रेखा पर नलकूप की बोरिंग न की गई हो।
  • व्यावसायिक सफलता के लिए किचन के लिए प्रयोग किए जाने वाले अन्नादि का भण्डारण वायव्य कोण में करना चाहिए।
  • होटल की बालकनी को ईशान कोण में बनाया जाना चाहिए।
  • यदि होटल के किचन में लकड़ियों का उपयोग किया जाना है तो इसका भण्डारण दक्षिणी भाग में होना चाहिए।
  • एयर कंडीशनिंग प्लाट को भवन के आग्नेय कोण में स्थापित करना चाहिए।
  • बिजली का मीटर हॉल के मध्य स्थान में या किसी भी दीवार पर स्थापित न करें।
  • Washing Dinning Hall के बीच कभी नहीं होनी चाहिए। वाशबेसिंग उत्तर दिशा, पूर्व दिशा या ईशान कोण की ओर बनाई जानी चाहिए।
  • होटल के भूमितल पर स्वागत स्थान बनाया जाना चाहिए।
  • व्यावसायिक सफलता का ज्ञान प्राप्त करने के लिए, वास्तु शास्त्र का अध्ययन करने पर पता चलता है कि भूमितल पर रसोईघर नहीं बनाया गया हो तो वहां Conference halls, बैंक्वेट रूम और दूसरा रेस्टोरेंट या डायनिंग हॉल बनाया जा सकता है। यह डायनिंग ह़ॉल रेस्टोरेंट के थोड़ा सा पश्चिमी भाग की ओर निर्माण किया जाना चाहिए। पूर्वी भाग एवं उत्तरी भाग में बालकनी छोड़ देनी चाहिए।
  • रिसेप्शन नैऋत्य कोण में स्थापित होना चाहिए। इससे काउन्टर पर खड़े व्यक्ति का मुख उत्तर या पूर्व दिशा की ओर रहे जो कि शुभ फलदायक रहता है।
  • विद्युत उपकरण, ट्रांसफार्मर आग्नेय कोण में स्थापित होना चाहिए।
  • होटल में kitchen के लिए अधिक स्थान की जरूरत होती है। रसोईघर में हवा और वायु की आवश्यकता होती है। रसोईघर आग्नेय कोण में स्थापित होना चाहिए। विशेष स्थितिवश इसे पश्चिम दिशा में स्थापित कर सकते हैं परंतु अग्नि संबंधी कार्य आग्नेय कोण में ही होना चाहिए।
  • शौचालय एवं स्नानघर ईशान कोण में निर्माण कराएं।
  • बिजली के स्रोत साधन उपकरण जेनेरेटर, ट्रांसफार्मर आदि सभी आग्नेय कोण में स्थापित होने चाहिए।
  • होटल बहुमंजिला हो तो इसके ऊपर की मंजिलों में रहने के लिए कमरे एवं Restaurant बनाए जा सकते हैं। इन कमरों में स्नानघर एवं शौचालय का निर्माण ईशान कोण में नहीं करना चाहिए।
  • होटल के दक्षिण-पूर्व दिशा में जेनरेटर बिजली का मीटर न लगवाएं।
  • यदि Hotel में स्वीमिंग पुल बनाना हो तो भवन के उत्तरी-पूर्व भाग में ही बनवाएं।
  • नैऋत्य कोण में रिसेप्शन काउंटर और कैश काउंटर फर्श की सतह से थोड़ ऊंचाई पर बनाना चाहिए। यदि काउंटर अन्य दिशाओं में स्थापित होता हैं तो वहां पर चबूतरा या चौकी नहीं बनाई जानी चाहिए। चबूतरे का उद्देश्य नैऋत्य कोण ऊंचा रखने से है।
  • होटल के मालिक का कमरा नैऋत्य कोण में स्थापित होना चाहिए। होटल के मालिक में स्थायित्व रहेगा। इस कमरे में उनके बैठने की व्यवस्था ऐसी हो कि उसका मुख पश्चिम या दक्षिण दिशा की ओर रहे। इस कमरे में तिजोरी या कैशबॉक्स की व्यवस्था उत्तर दिशा की ओर होनी चाहिए।
  • व्यावसायिक सफलता में लाभ पाने के लिए होटल के कमरों के द्वार उत्तर-पूर्व या ईशान कोण की ओर रहें। कमरे का फर्नीचर, पलंग, सोफा आदि दक्षिण व पश्चिम दिशा में रखें। वॉशबेसिंग पश्चिम में हो तो सही है। द्वार उत्तर-पूर्व या ईशान कोण में रखने से कमरों में उत्तर या पूर्व खाली व हल्का रहेगा और आने-जाने का रास्ता उसी में ही रहेगा।

रेस्टोरेंट के लिए वास्तु शास्त्र का निर्देश-

  • Restaurant दो भागों में बंटा होता है- पहला रसोईघर और दूसरा डायनिंग हॉल। रसोईघर आकार में घरेलू रसोईघर से कहीं अधिक बड़ा होता है। साथ ही इसमें अनेक कार्य भी किए जाते हैं। घरेलू डायनिंग हॉल में एक टेबल ही प्रयोग में आती है जबकि डायनिंग हॉल में अनेक डायनिंग टेबल का प्रयोग होता है। रेस्टोरेंट में रसोईघर के अतिरिक्त शेष हिस्सा डायनिंग हॉल के रूप में प्रयोग किया जाता है।
  • रेस्टोरेंट के Dining hall के रूप में प्रयोग रंगों की पुताई कराएं। हल्के लाल रंग की पुताई करनी चाहिए। यह रंग स्वास्थ्य और जीवंतता का प्रतीक है। अधिकतर अस्पताल, नर्सिंग होम के कम्बल इसी रंग के होते हैं। फ्रिज को नैऋत्य कोण में कभी न रखें अन्यथा यह जगह खराब ही रहेगी।
  • Restaurant के Dining hall के ईशान कोण को शुद्ध व स्वच्छ रखें। यहां पर पूजास्थल स्थापित कराएं। यदि पूजा स्थल का निर्माण नहीं करते हैं तो इस स्थान पर कोई धार्मिक चित्र या प्राकृतिक दृश्य, जो जल प्रधान हो लगाना चाहिए, इससे व्यावसायिक सफलता बनी रहती है।
  • रेस्टोरेंट के रसोईघर में टांड का निर्माण नैऋत्य कोण, दक्षिण या पश्चिमी दिशा में करवाएं।
  • व्यावसायिक सफलता प्राप्त करना हो तो रेस्टोरेंट के रसोईघर में झूठे बर्तनों के धोए जाने की व्यवस्था नैऋत्य कोण में होनी चाहिए, साथ ही साफ बर्तनों को तैयार भोजन एवं परोसने के स्थान के बीच ऊपर या परोसे जाने वाले स्थान पर ऊपर रखना चाहिए। यहां पर बर्तन तुरंत प्रयोग आने वाले ही रखने चाहिए। शेष बर्तनों को धोए जाने वाले स्थान के निकट अलमारी में रखना चाहिए।
  • ईधन या गैस सिलेण्डर, कोयला या लकड़ी आदि का भण्डारण पश्चिमी भाग में होना चाहिए।
  • Restaurant के अंदर डायनिंग हॉल में काऊंटर पूर्व या दक्षिण दिशा में स्थित होना चाहिए।
  • सब्जियों एवं सलाद काटने का स्थान पूर्व दिशा में हो।
  • रेस्टोरेंट के डायनिंग हॉल के उत्तर, पूर्व दिशा या ईशान कोण में वॉशवेसिंन हो लेकिन वाशवेसिंन में कोई थूके नहीं।
  • Restaurant के Dining hall के अन्दर हिंसक पशुओं या युद्ध के चित्र नहीं लगाना चाहिए। उस स्थान पर सौम्य, लुभावने, मन को पुलकित करने वाले, समाज के अनुकूल चित्र लगाएं। उस स्थान पर अश्लील चित्र कदापि न लगाएं।
  • रेस्टोरेंट के रसोईघर में भोजन को वायव्य कोण में रखना उचित है। तैयार भोजन को भण्डार कमरा या अलमारी के पास रखा जा सकता है। इस स्थान से पूर्व दिशा की ओर भोजन को परोसे जाने की व्यवस्था होनी चाहिए।
  • Restaurant का रसोईघर आग्नेय कोण में स्थापित होना चाहिए। परिस्थितिवश पश्चिमी दिशा प्रयोग में ला सकते हैं।
  • रेस्टोरेंट के रसोईघर में अन्नादि का भण्डारण वायव्य कोण में स्थापित एक कमरा में करना चाहिए। यदि कमरे का बनना संभव न हो तो अलमारी बनवाकर उसमें भण्डारण करें। दैनिक प्रयोग के लिए अन्नादि वायव्य कोण में रखें। आग्नेय कोण में घी, तेल का भण्डारण करें।
  • रेस्टोरेंट के रसोईघर में चूल्हा, ओवन, ग्रांइडर आग्नेय कोण में होने चाहिए। रसोईघर में कार्य करने वाले कुक का मुख पूर्व में रहना चाहिए।
  • Restaurant के kitchen में पीने का पानी ईशान कोण या उत्तर दिशा में रखना चाहिए।  उपर दी गई बातो पर यदि अमल की जाये तो हमें अवश्य व्यावसायिक सफलता मिलेगी।

वास्तु शास्त्र के अनुसार सिनेमाहॉल का निर्माण-

  • Cinema hall एक व्यावसायिक स्थल भी है और मनोरंजन स्थल भी इसके निर्माण में वास्तु नियमों का पालन सर्वोपरि है अन्यथा कई बार सिनेमाहॉल तैयार होने में बहुत पैसे खर्च हो जाते हैं तथा चालू होने में भी काफी समय लग जाता है। कभी-कभी उचित स्थिति एवं दिशा में सिनेमाहॉल का निर्माण न होने पर अनेक प्रकार की रुकावट पैदा होने लगती है। वास्तु शास्त्र के सिद्धांतों का पालन किया जाना चाहिए। सिनेमाहॉल के तैयार होने के बाद भी कोई अन्यथा निर्माण करना भी पड़े तो वास्तु सलाहकार की मदद अवश्य लें।
  • व्यावसायिक सफलता पाने के लिए सिनेमाहॉल का पर्दा उत्तर या पूर्व दिशा में हो और प्रोजेक्टर दक्षिण या पश्चिम दिशा में हो। कुछ वास्तु शास्त्रियों का मत इसके विपरीत है यदि आप स्वयं विचार करें तो पाएंगे कि प्रोजेक्टर पर जब फिल्म चलती है तो प्रकाश की किरणें पर्दें पर पड़कर उस फिल्म के दृश्यों को दिखाती हैं। किरणों का प्रवाह ऊपर से नीचे की ओर होता है। भला पर्दा उत्तर या पूर्व दिशा में उचित रहेगा, प्रोजेक्टर एक मशीन है और मशीन के लिए दक्षिण या पश्चिम में ही हो।
  • Cinema hall के अंदर या बाहर, उत्तर या पूर्व दिशा में बगीचा या फव्वारा लगाएं। पूर्व दिशा या ईशान कोण में फुलवारी या फव्वारा लगवाएं।
  • सिनेमाहॉल के लिए जो जमीन खरीदें उसके लिए वास्तु शास्त्र के नियमों का प्रयोग करें। अगर सिनेमाहॉल क्रय किया तो वास्तु सलाहकार से परामर्श लेकर स्थायी निर्माण शुरु करें व वास्तु दोष निवारण कराएं।
  • Cinema hall में बालकनी की व्यवस्था दक्षिणी या पश्चिमी भाग में करें।
  • उत्तर-पूर्व दिशा में पूजा का स्थान बनवाना चाहिए।
  • Cinema hall के मालिक एवं मैनेजर को उत्तर या पूर्व मुखी होकर बैठने के लिए केबिन बनवाना चाहिए। कैशबॉक्स दाहिनी हाथ की ओर रखें।
  • सिनेमाहॉल में पीने के पानी की व्यवस्था उत्तर-पूर्व दिशा में होनी चाहिए, इससे व्यवसाय में व्यावसायिक सफलता मिलती है।
  • अगर सिनेमाहॉल से लगी दुकानें बनानी हों तो दुकानों का मुख उत्तर-पूर्व की ओर खुलना चाहिए।
  • सिनेमाहॉल (Cinema hall) में बिजली के स्विच, जेनरेटर आदि का स्थान दक्षिण-पूर्व भाग में करें, जेनरेटर को नैऋत्य कोण में रखा जा सकता है परंतु जेनरेटर से बिजली आग्नेय कोण में आनी चाहिए।
  • Cinema hall के भूखण्ड का उत्तर-पूर्व दिशा का कोना कम होना चाहिए यदि वह हिस्सा बढ़ा हुआ है तो शुभ है।
  • भूखण्ड या तो आयताकार हो या वर्गाकार, भूखण्ड में कोने अधिक नहीं होने चाहिए।
  • पूर्व एवं उत्तर दिशा में दक्षिण एवं पश्चिम दिशा की अपेक्षा अधिक स्थान खुला रखें।
  • दक्षिण-पश्चिम के कोने 90 डिग्री में होने चाहिए। इस तरह उत्तर-पश्चिम दिशा का भाग भी वास्तु अनुरूप रहे।
  • कैंटीन, साइकल स्टैंड उत्तरी भाग एवं उत्तर पूर्वी दिशा में न बनाएं। कैंटीन का निर्माण दक्षिण पूर्व दिशा में कराया जाना चाहिए।
  • Cinema hall में पानी की ढलान उत्तर-पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए।
  • ऊपर जाने के लिए सीढ़ियों का प्रवेश पश्चिम से दक्षिण दिशा की ओर तथा उनका पूरा भाग इन्हीं दिशाओं में हो तो उचित है। सीढ़ियों में घुमाव बाएं से दाएं होना चाहिए। सीढ़ियों की संख्या विषम होनी चाहिए।
  • मुख्य प्रवेशद्वार पूर्व दिशा में होना चाहिए।
  • Cinema hall की टिकट खिड़की उत्तर दिशा या ईशान कोण में हो तथा कैश बॉक्स दाएं हाथ पर हो तो इससे कारोबार में व्यावसायिक सफलता प्राप्त होती है।

जानकारी- कोई भी व्यवसाय जैसे दुकान, कार्यालय, रेस्टोरेंट, अस्पताल, सिनेमाहॉल आदि सभी व्यवसायी और अधीनस्थ कर्मचारियों की जीविका का साधन होता है। वास्तु सम्मत निर्माण कार्य उन्नति समृद्धि, मानसिक शांति प्रदान करता है। यदि वास्तु शास्त्र के सिद्धांत का प्रयोग करने के बाद भी व्यवधान आ रहा हो तो किसी प्रसिद्ध वास्तु शास्त्री से सलाह लेकर प्रतिष्ठान का निरीक्षण करवाकर वास्तुदोषों को दूर करें।

वास्तुशास्त्र और उसकी अन्य जानकारियां (Vastu Shastra and its other information)

  1. जीवन और वास्तुशास्त्र का संबंध
  2. वास्तु का व्यक्ति के जीवन पर प्रभाव
  3. घरेलू उद्योग व औद्योगिक संरचनाएं समाज की उन्नति के लिये क्यों आवश्यक है?
  4. वास्तु पुरुष की उत्पत्ति तथा उसका सत्कार
  5. वास्तु पुरुष की विशेषताएं

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